प्रो. अशोक सिंह – अगियाबीर के पुरातत्व खोजी के संस्मरण


मेरे ब्लॉग के पाठक गण अगियाबीर, पुरातत्व और डा. अशोक सिंह से परिचित हैं। प्रोफेसर सिंह के बारे में वे जो नहीं जानते, वह उनकी संस्मरण सुनाने की ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा है। अब चूंकि पॉडकास्ट का एक नया माध्यम मेरे हाथ लग गया है, मैं उनके संस्मरण सुनवाने में समर्थ हो गया हूं।

डा. अशोक कुमार सिंह

प्रोफेसर सिंह पुरातत्व में मध्य गंगा घाटी के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके पास लगभग चार दशक का आर्कियॉलॉजिकल एक्सकेवेशन का अनुभव है। वे फील्ड के पुरातत्वविद हैं; आर्मचेयर आर्कियॉलॉजिस्ट नहीं। अगियाबीर की महत्वपूर्ण अतिप्राचीन नगरीय सभ्यता की खोज का सेहरा उन्हीं के सिर बंधा है। अगियाबीर आज से पैंतीस सौ साल पहले का गंगा घाटी का औद्योगिक और वाणिज्यिक केंद्र हुआ करता था, यह डा. सिंह के उत्खनन से स्पष्ट होता है।

यह मेरा सौभाग्य है कि वे अपने संस्मरण मेरे पॉडकास्ट पर सुनाने को राजी हो गये। आज उस कड़ी में पहला पॉडकास्ट है जिसमें वे अगियाबीर की खोज की बात बताते हैं।

Anchor पर प्रो. अशोक सिंह – अगियाबीर के पुरातत्व खोजी के संस्मरण

उनके संस्मरण बहुत रोचक हैं। आप कृपया आधे घण्टे के इस पॉडकास्ट को सुनने का कष्ट करें। उसकी रिकार्डिंग में थोड़े ग्लिचेज मेरी ओर से हो सकते हैं; पर उन्होने जो कहा है, वह पूरी तरह बांधे रखेगा आपको!

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भदोही जनपद का इतिहास और पुरातत्त्व – डा. रविशंकर जी का पॉडकास्ट


पॉडकास्टिंग मेरा नया जुनून है। लगभग 66 की उम्र में, जब लोगों की आवाज में खनक गायब होने लगती है, तब मुझे आवाज के प्रयोग की सूझ रही है! और जैसे ब्लॉग के लिये अपने आसपास के लोग, विषय, दृष्य लताशने की प्रवृत्ति थी, अब पॉडकास्ट के लिये भी वही तलाश हो रही है। वह सब की तलाश जिसमें ध्वनि हो और मोबाइल फोन के ध्वनि-रिकार्डर की जद में वह आ सके।

Dwarikapur Archeological site
द्वारिकापुर आर्किऑलॉजिकल साइट पर मिले अवशेष लिये मेरी पत्नी जी के हाथ

जब मैंने पॉडकास्टिंग में इनपुट्स देने के लिये सुपात्र तलाशने प्रारम्भ किये तो डा. रविशंकर की याद हो आयी। रिटायरमेण्ट के बाद यहां गांव में अगियाबीर पुरातत्व प्रॉजेक्ट चलते समय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डा. रविशंकर जी से परिचय हुआ था।

मुझे ज्ञात था कि भदोही के पुरातत्व सर्वेक्षण पर उनसे बेहतर व्यक्ति कोई नहीं है। उनकी थीसिस इसी विषय पर है और मैंने वह थीसिस देखी है। वह तब जब वह अप्रूव भी नहीं हुई थी और वे उस समय रिसर्च स्कॉलर थे। खैर, उनकी थीसिस देख कर कोई संशय ही नहीं था कि निकट भविष्य में वे डाक्टरेट की सनद प्राप्त कर लेंगे। कालांतर में वे डा. रविशंकर हो गये। अभी वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पुरातत्व के पोस्ट डॉक्टरल फैलो हैं। उनकी थीसिस नायाब है और उसके पब्लिश होने का इंतजार कर रहा हूं मैं।

Anchor पर पॉडकास्ट – भदोही जनपद का इतिहास और पुरातत्त्व

पॉडकास्ट के लिये मैंने उनसे सम्पर्क किया और उनसे उनके भदोही के पुरातत्व पर कथ्य रिकार्ड करने की इच्छा जताई। डा. रविशंकर बिना कोई न नुकुर किये तैयार हो गये और वह पॉडकास्ट आपके समक्ष उपलब्ध है।

मेरे ब्लॉग के बधुओं ने; जिन्होने पुरानी पोस्टें पढ़ी हैं, वे इस पॉडकास्ट की सामग्री से बहुत कुछ परिचित होंगे। मेरी अप्रेल 2018 की पोस्ट भदोही की आर्कियॉलॉजी के तत्वशोधक रविशंकर में उनके इस विषय में विचार उपलब्ध हैं। पर पॉडकास्ट का अपना अलग शऊर है, अपना अलग आनंद। आप उस पॉडकास्ट को सुनने का कष्ट करें। उम्मीद है यह अच्छा ही होगा। डा. रविशंकर ने उसमें बड़े पैशन से बोला है – वे आर्कियालॉजी ओढ़ते बिछाते हैं। अगर कमी होगी तो वह नौसिखिया सूत्रधार की ही होगी। मेरी होगी। आप सुनें –

भदोही जनपद का इतिहास और पुरातत्त्व – डा. रविशंकर जी का पॉडकास्ट। Spotify पर।

मानसिक हलचल पर पॉडकास्ट प्रस्तुत करने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ है तो दूर तक जायेगा। अनगढ़, खुरदरे प्रयोग होंगे। एक सामान्य से मोबाइल से रिकार्ड होगा पॉडकास्ट। बहुत मिनिमल एडिटिंग और उसमें सूत्रधार की सधी नहीं, लटपटाती आवाज; जिसमें प्रवाह नहीं शब्द को तलाशता एक रिटायर्ड आदमी होगा। बस उसके पास समय खाली समय होगा और परनिंदा या दोष दर्शन से बचने के लिये कुछ नया करने का मंद मंद उत्साह।

जीडी ब्लॉगर से पॉडकास्टर बन ही जायेगा। बिना किसी टीम, बिना नेटवर्किंग, बिना किसी फॉलोवर ब्रिगेड के। :lol:

बस चरैवेति, चरैवेति! कीप मूविंग जीडी! बाज की असली उड़ान बाकी है! :-)


रस्सी बनाने की मशीन – गांव की आत्मनिर्भर सर्क्युलर इकॉनॉमी का नायाब उदाहरण


मैं बाजार जा रहा था तो रेलवे फाटक के पास एक दो फिट लम्बा लकड़ी का बक्सा दिखा जिसपर लिखा था रस्सी बनाने की मशीन। मैंने अपने वाहन चालक अशोक पण्डित से पूछा – वह क्या था अशोक?

अशोक ने जवाब दिया, “ऊ लाल लाल मिठाई बनवई क मशीन अहई।”

रस्सी बनाने की मशीन – गांव की आत्मनिर्भर सर्क्युलर इकॉनॉमी का नायाब उदाहरण – पॉडकास्ट

मैंने कहा – “अच्छा बुढ़िया का काता बनाने की मशीन? जरा गाड़ी मोड़ो। देखें कि उस लकड़ी के डिब्बे से कैसे बनाता है। उसपर तो रस्सी बनाना लिखा था?”

अशोक ने वाहन मोड़ कर रेलवे फाटक पर वापस पंहुचाया। पर वहां जो दिखा वह तो आश्चर्य जनक चीज निकली। गांवदेहात की इंवेन्शन करने की एक शानदार मिसाल! मैं तो गदगद हो गया।

रस्सी बनाने की मशीन

गांव में रस्सी और मोटी रस्सी यानी गाय-गोरू बांधने का पगहा की बहुत जरूरत होती है। पहले लोग सनई की खेती करते थे। सनई यानी पटसन। वह निचली जमीन में उगता था। फिर उसके तनों को काट कर पत्थर पर पीटा जाता था। उससे जो रेशे निकलते थे उससे किसान खाली समय में चरखी चला कर रस्सी बुनते थे। कालखण्ड बदला तो पटसन या सनई का स्थान प्लास्टिक ने ले लिया। नाईलोन की रस्सियां बाजार में आ गयीं। अब तो गांवदेहात की खटिया भी नाइलोन मिश्रित रस्सी से बुनने की प्रथा चल गयी है। जूट या सन की बुनाई दुगनी तिगुनी मंहगी पड़ती है।

गांवदेहात के किफायती लोग घर में अनुपयोगी वस्तुओं का बहुत प्रयोग करते हैं। सिवाय सिंगल यूज प्लास्टिक और थर्मोकोल के, बाकी सभी चीजें किसी न किसी तरह काम में आ जाती हैं। प्लास्टिक तो कबाड़ी के हाथ चला जाता है। और गांवदेहात में कबड़ियों तथा कबाड़ की दुकानों की भरमार हो गयी है। इसके अलावा गांव के बच्चे स्कूल नहीं जाते तो दिन भर प्लास्टिक की बोतलें बीन कर उसे कबाड़ी को देते हैं और बदले में उससे पुपली या टॉफी-कम्पट लेते हैं।

गांव बहुत सशक्त रीसाइकलिंग और सर्क्युलर अर्थव्यवस्था के मॉडल पर काम करता है। ज्यादा कार्बन फुटप्रिण्ट नहीं छोड़ता।

लोगों के घरों की पुरानी धोतियां या साड़ियां; कथरी, लेवा या रस्सी बनाने के काम आती हैं। कथरी सीने वाली महिलायें तो अब कम होती जा रही हैं; पर रस्सी जरूर घर घर में बनाई जाती है। वह बहुत सुघड़ या मजबूत नहीं होती पर कामचलाऊ तो होती ही है।

साड़ी के तीन लम्बे टुकड़े मशीन के हुकों में फंसाये जाते हैं।

यहां जो मोटरसाइकिल पर लदी रस्सी बुनने की मशीन दिखी, वह बुढ़िया का काता बनाने वाली नहीं, बाकायदा रस्सी बुनने की मशीन थी। उस बक्से में तीन हुक बाहर निकले थे जो बक्से के अंदर गियर सिस्टम से घूमते थे। बक्से के दूसरी ओर खड़ा बच्चा एक हेण्डल से बक्से के अंदर एक चक्का घुमाता था और रस्सी बुनने वाला मुख्य कारीगर उन हुकों में साड़ी के तीन लम्बे टुकड़े फंसा कर उनमें एक साथ बल (घुमा) देता था।

मशीन के हेण्डल से घूर्णित कर तीन रस्सियां बुनी जाती हैं।

बड़ी तेजी से वे टुकड़े रस्सी में तब्दील हो जाते थे। फिर तीनों रस्सियों को एक लकड़ी के गुटके से नेह्वीगेट करते हुये तीनों घूमते गीयर सिस्टम से घूर्णन देकर एक मोटी रस्सी बना देता था। सब कुछ करने में दो चार मिनट से ज्यादा समय नहीं लगता था।

तीन रस्सियों को लकड़ी के तीन खांचे वाले गुटके के सहारे बेल कर मोटी रस्सी बनाता अजय

लकड़ी के गुटके को मैंने ध्यान से देखा। वह हाँथ की ग्रिप में आने वाले बेलनाकार आकार का था। उसमें तीन रस्सियों को साधने के लिये तीन खांचे बने थे। इसको उसने नाम दिया था – कलियुग! मानो वह रस्सी बेलने वाला गुटका कलियुग की ही आवश्यकता हो। भारत की ग्रामीण और सर्क्युलर अर्थव्यवस्था का प्रतीक जैसा है यह कलियुग!

लकड़ी का गुटका – कलियुग

मोटर साइकिल पर लदी वह गियर सिस्टम वाली रस्सी बुनने की मशीन, हैण्डल घुमाने वाला बच्चा और रस्सी बुनने वाला वयस्क – ये तीन मुख्य घटक थे। इन तीनों के योग से कितनी शानदार रस्सी बनाने की मोबाइल दुकान बन गयी थी।

इस नये आविष्कार से आमदनी भी उसकी अच्छी होती होगी, तभी वह रस्सी बुनने वाला साइकिल की बजाय मोटरसाइकिल की हैसियत रखता था। मोटर साइकिल की सहायता से वह लम्बे इलाके में रस्सी बुनने का व्यवसाय कर सकता था।

पहले की बुनी एक मोटी रस्सी (पगहा) दिखाता अजय

उसने अपना नाम बताया – अजय। जातिसूचक नाम न उसने बताया न मैंने पूछा। महामलपुर का वह रहने वाला है। पास के मिर्जापुर जिले का एक बड़ा गांव है महामलपुर। अजय ने ग्रामीण आत्मनिर्भरता का जो जंतर बनाया है; वह गांधीजी के जमाने में होता और अजय बापू से मिला होता तो गांधीजी खूब खुश हुये होते। चरखे और खादी जैसा ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्त सिम्बल है यह रस्सी बनाने की मशीन।

अपनी रस्सी बनाने की मशीन लदी मोटरसाइकिल के साथ अजय

खैर अब गांधी का नहीं, नरेंद्र मोदी का जमाना है। पर आत्मनिर्भरता का नारा देने वाले मोदीजी को भी अजय का यह उपकरण जरूर पसंद आयेगा; ऐसा मुझे लगता है।


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