आज जो देखा #गांवदेहात #गांवपरधानी

“मेरे पास परधानी की तीन चार झकाझक, सनसनीखेज खबरें हैं। पर सुनाऊंगा तभी जब बढ़िया हलुवा बनेगा। और एक खबर, जो बहुत ही खास है, वह तो तभी सुनाऊंगा, जब हलुये में काजू किशमिश भी पड़ेगा।”


#गांवपरधानी की हलचल पीक पर है। हर उम्मीदवार कह रहा है कि वह जीत रहा है। सुनने में आ रहा है पैसा बंटने लगा है। पुचकारने और धमकाने की बातें सुनने में आ रही हैं। परधानी और जिलापंचायत के उम्मीदवारों में वोट ट्रांसफर के डील भी हो रहे हैं। यहां प्रधानी के लिये सीट शेड्यूल कास्ट – महिला के लिये आरक्षित है। महिला उम्मीदवार केवल पोस्टर पर हैं। नाम और प्रचार उनके पति या पुत्र का ही हो रहा है।

महिला उम्मीदवार केवल पोस्टर पर हैं। नाम और प्रचार उनके पति या पुत्र का ही हो रहा है।

महिला उम्मीदवार अपने बूते पर, अपने लिए चुनाव लड़ने में सशक्त बनने में अभी कम से कम 15 साल लगेंगे। अभी तो उनका केवल नाम का ही प्रयोग उनके पति/पुत्र/स्वसुर कर रहे हैं। … कम से कम पिछले पांच साल में महिला प्रत्याशी की हैसियत में कोई बदलाव मैंने तो नहीं पाया।

एक चीज बड़ी साफ नजर आ रही है। शिड्यूल कास्ट उम्मीदवार या उनके प्रचारक भले ही कुछ मैले कपड़े में आते हैं, पर उनकी स्थानीय राजनीति की समझ और चुनाव जिताने के घटकों का चतुराई से प्रयोग वे बखूबी समझते हैं। उत्तरोत्तर चुनावों नें उन्हे राजनीति सिखा दी है। और शायद इसी समझ से वे आमचुनावों में भी वोट करते हैं। पंचायती चुनावों नें समाज को बांटा जरूर है, पर प्रजातंत्र को मजबूत किया है। सामन्ती पकड़ बहुत धसकी है!

मेरा और मेरी पत्नीजी का इस प्रधानी-पंचायती चुनाव से “बाजार से गुजरा हूं, खरीददार नहीं हूं” वाला नाता है। लिहाजा स्थानीय खबरों, अफवाहों और आकलन का जो कुछ पता चलता है उसे पसस्पर शेयर करने का आनंद लिया जा रहा है। कल तो मैंने ब्लैकमेल किया; बोला – “मेरे पास परधानी की तीन चार झकाझक, सनसनीखेज खबरें हैं। पर सुनाऊंगा तभी जब बढ़िया हलुवा बनेगा। और एक खबर, जो बहुत ही खास है, वह तो तभी सुनाऊंगा, जब हलुये में काजू किशमिश भी पड़ेगा।” 😆

और आप यकीन मानिये हलुआ बना, और शानदार बना! काजू किशमिश भी मजे से पड़ा! परधानी-पंचायती चुनाव की खबर की लोकल टीआरपी मैंने खूब भुनाई! 😀

गांवदेहात में गेंहूं की थ्रेशिंग से जो धूल उठ रही है, उससे बचने के लिये भी मास्क ज्यादा फायदेमंद है।

कोरोना बढ़ रहा है। आज मुझे कुछ ज्यादा लोग मास्क लगाये दिखे। गांवदेहात में गेंहूं की थ्रेशिंग से जो धूल उठ रही है, उससे बचने के लिये भी मास्क ज्यादा फायदेमंद है। गेंहू की कटाई में लगे लोग भी या तो गमछा बांधे हैं, या मास्क लगाये हैं।

लेवल क्रासिंग पर मिला किसान जो गेंहू के गठ्ठर बनाने के लिये पुआल की रस्सी ले कर जा रहा था, बोला था – हफ्ता भर में खेत साफ हो जायेंगे। वही लगता है।

वैसे जितनी तेजी से गेंहूं की कटाई, थ्रेशिंग हो रही है, उसके अनुसार खेत बिल्कुल खाली हो जायेंगे पंद्रह अप्रेल तक। लेवल क्रासिंग पर मिला किसान जो गेंहू के गठ्ठर बनाने के लिये पुआल की रस्सी ले कर जा रहा था, बोला था – हफ्ता भर में खेत साफ हो जायेंगे। वही लगता है।

गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नीलाल पाण्डेय की स्थानीय समझ का मैं कायल हूं। कल उन्होने बड़े काम की बात बताई। “अभी जो गले में हाथ डाल कर घूम रहे हैं, जो डील कर रहे हैं वोटों की। वह सौहार्द ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं है। साल भर में ही विधानसभा चुनाव आयेंगे। तब ये सारी लोकल समीकरण पलट जायेंगी। जो आज दोस्त हैं, कल वे विपरीत खेमे में चले जायेंगे। विधान सभा के लिये टिकट अगर एक के मनमाफिक आया तो दूसरा (जो अभी मित्र/पट्टीदार बना घूम रहा है); डाह के मारे शत्रु बन जायेगा या जड़ खोदने में लग जायेगा।”

इमली को वोट दो। यह अजब गजब टोपी पहने आदमी आज दिखा प्रचार करता हुआ।

यह सब समाज, कुटुम्ब, परिवार, जाति का विग्रह भले कराये; प्रजातंत्र तो मजबूत हो रहा है। लोग ‘परजा (प्रजा)’ होने के फ्रेम ऑफ माइण्ड से मुक्त हो कर अपने वोट की ताकत समझ रहे हैं।

अच्छा ही है!


ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट में नहीं लगते

कटाई करने वाले ही नहीं, ईंट भठ्ठा मजदूर, आनेवाले पेट्रोल पम्प की दीवार बनाते आधा दर्जन लोग, सूखते ताल में मछली पकड़ते ग्रामीण, ठेले वाले, किराना की दुकान में छोटे वाहन से हफ़्ते भर की खेप लाने वाले, कटाई के बाद खेत से बची हुई गेंहू की बालें बीन कर जीवन यापन करने वाले, धोबी, नाई .. ये सब काम पर लगे हैं। ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था (लगभग) सामान्य है।


टेलीवीजन जो दिखाता है वह अर्धसत्य है। उसके कर्मी उतने कुशल नहीं हैं, जितने अन्य देशों (विशेषकर) अमेरिका के हैं। वे चिल्लाचिल्ला कर टिल्ल सी बात को “बड़ी खबर, बड़ी खबर” के नाम से दिन भर बांटते रहते हैं। सरकारी फीड पर जिंदा रहने वाले परजीवी हैं – अधिकांश। एक और नौटंकी – पैनल डिस्कशन की बिसात बिछा कर रोज करते हैं। वही घिसेपिटे चेहरे जो अपने घर के ड्राइंगरूम से उन्ही की तरह बिना शिष्टाचार के चबड़ चबड़ एक दूसरे पर बोलने वाले हैं, उन पैनल डिस्कशन के घटक होते हैं। देखना बंद कर दिया है मैंने।

निकोलस क्रिस्टॉफ का एक लेख है न्यूयार्क टाइम्स में। शीर्षक है – Life and Death in the ‘Hot Zone’। जरा देखिये और पढ़िये। उसमें एक डॉक्यूमेण्ट्री है। उसका स्तर देखिये। क्रिस्टॉफ कहते हैं कि रिपोर्टिन्ग वैसी ही कर रहे हैं वे लोग, जैसे युद्ध के संवाददाता करते हैं।

हमारे यहां कोरोना वायरस पर युद्ध स्तर की रिपोर्टिंग करने वाले संवाददाता विरले हैं। गिनेचुने। … यह मत मैने आजकल की रिपोर्टिंग देख कर नहीं बनाया। पहले भी ऐसा सोचता रहा हूं। हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्ण युग में हिन्दी के कई पत्रकार हिन्दी ब्लॉग लिखा करते थे; उस समय उनके स्तर को बहुत बारीकी से ऑब्जर्व किया था मैने। और बहुत से घटिया थे। स्नॉब और स्तरहीन। प्यूट्रिड!


ग्रामीण जन जीवन की बहुत रिपोर्टिन्ग मीडिया में नहीं है। मैं सर्च करता हूं तो अन्दाज लगता है कि 20-30 करोड़ के आसपास लोग खेती-किसानी या उससे सम्बन्धित कार्य पर निर्भर हैं। और वह दिखता भी है। पर मीडिया रिपोर्ताज में वह गायब है।

“कहां कोरोना? इस ओर कोई कोरोना नहीं है। इस तरफ़ तो गेंहू की कटाई की धूल है।”

खडंजे की खराब सड़क से गुजरते हुये एक गेंहू की कटाई करने वाले के पास रुकता हूं। सोशल डिस्टेंसिंग के नॉर्म के आधार पर उससे दूरी बनाये बनाये पूछता हूं – यह मास्क काहे पहन रखा है?

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