हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 3)


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का तीसरा भाग है।

भाग 2 से आगे –

सन 1948 में एक अत्यंत मेधावी विद्यार्थी और वाद-विवाद का वक्ता छात्र संघ का चुनाव हार गया। यह कहा जा रहा था कि विरोधी उम्मीदवार और उसके समर्थक यह फैला रहे थे कि एक “किताबी कीड़ा” विश्वविद्यालय प्रशासन का “चमचा” ही बन कर रहेगा और बहुसंख्यक विद्यार्थियों के हितों के लिये पर्याप्त आंदोलन नहीं करेगा। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और लालच ने कुटिलता का वातावरण बना दिया था और औसत दर्जे की सोच ने उत्कृष्टता को कोहनिया कर अपना स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया था। नैतिकता का वलयाकार रास्ता नीचे की ओर फिसलने लगा था और “नेतागिरी” धीरे धीरे “गांधीगिरी” का स्थान लेती जा रही थी।

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 2)


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का दूसरा भाग है।

भाग 1 से आगे –

एक छोटे कस्बे से आया नौसिखिया अण्डरग्रेजुयेट बड़ी देर तक बाथरूम में लगाता था। यह 1945-46 की सर्दियों का समय था। गर्म पानी का कोई इन्तजाम नहीं था। कई विद्यार्थी कई कई दिनों तक बिना नहाये रह जाते थे। जो नहाना चाहते थे, उन्हें सवेरे जल्दी नहाना पड़ता था। यह पाया गया कि यह नौसिखिया नौजवान बाथरूम में किसी से बात किया करता है।

हम सभी जानने को उत्सुक थे। हम में से एक ने दरार से झांका। नल चल रहा था और हमारा मित्र एक कोने में अधनंगा खड़ा था। वह अपने आप से बात कर रहा था – “तुम ठण्डे पानी से डरते हो, तुम कैसे ब्रिटिश हुकूमत को देश से खदेड़ोगे, अगर ठण्डे पानी से डरते हो। तुम इण्डियन नेशनल आर्मी के जवानों की सोचो, जो बर्मा में लड़ रहे हैं…” कुछ समय बाद उसमें पर्याप्त साहस आ गया और वह “वन्दे मातरम” का नारा (मानो वह युद्ध-उद्घोष हो) लगा कर नल के बहते पानी के नीचे कूद पड़ा।

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 1)


हेमेन्द्र सक्सेना जी अब 91 वर्ष के हैं और उनकी सम्प्रेषण की क्षमता और काबलियत किसी भी मेधावी नौजवान से अधिक ही है। वे इलाहाबाद के उस समय के गवाह रहे हैं जब वहां हर गली नुक्कड़ पर महान विभूतियां चलती फिरती दिखाई पड़ती थीं। उन्होने “Remembering Old Allahabad” शृखला में नॉर्दन इण्डिया पत्रिका में लेख लिखे हैं। मेरे मित्र श्री रमेश कुमार जी – जो उनके पारिवारिक मित्र भी हैं, ने 14 पृष्ठों की हेमेन्द्र जी की एक हस्तलिखित पाण्डुलिपि की फोटोकॉपी दी है। मुझे नहीं मालुम कि यह एन.आई.पी. में छप चुकी है या नहीं। गौरी सक्सेना (उनकी पुत्री और मेरी रेलवे की सहकर्मी) ने बताया कि और भी बहुत सा उनका लिखा घर पर मौजूद है पर वे उसे प्रकाशित करने के बारे में बहुत मॉडेस्ट हैं।

गौरी सक्सेना ने अपने पिताजी की सहमति उनके लिखे के अनुवाद को ब्लॉग पर प्रस्तुत करने के लिये दी है। मैं उनका आभारी हूं। यह करीब 5 भागों में प्रस्तुत होगा।

इस परिचयात्मक नोट के अन्त में कहा जा सकता है कि यह हेमेन्द्र सक्सेना जी की अतिथि ब्लॉग पोस्ट है।


हेमेन्द्र सक्सेना जी की हस्तलिखित पांडुलिपि का स्क्रीनशॉट

पुराने इलाहाबाद की यादें

“इतिहास केवल वह नहीं है जो घटित हुआ; वरन उसमें वह ज्यादा महत्वपूर्ण है जो घटित होते हुये लोगों ने कहा।” – जी.एम. यंग

छोटी छोटी घटनायें कई बार उस विशेष समय के लोगों की प्रकृति के बारे में बहुत कुछ बताती हैं। सभ्यतायें तब लोगों के मन में बनती और जीवन्त होती हैं, जब उनमें कुछ मूल्य जन्म लेते हैं। मैं कुछ घटनाओं को याद करता हूं, जो घटित होते समय कुछ खास महत्व की नहीं थीं; पर जो केवल तभी हो सकती थीं, जब वे हुईं।

मैं जब सन 1944 में इलाहाबाद में आया तब यह “पूर्व के ऑक्सफोर्ड” के नाम से जाना जाता था; और गहन राजनैतिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से स्पन्दित हो रहा था। दो किलोमीटर के दायरे में विश्वविद्यालय सीनेट हॉल, म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, आनन्द भवन और पब्लिक लाइब्रेरी स्थित थे। यह कहा जाता था कि अगर एक ढेला इस क्षेत्र में फेंका जाये तो यह किसी न किसी महान हस्ती पर गिरेगा।

बहुत से छात्र अपने जेब में ऑटोग्राफ़ की नोटबुक लिये घूमते थे। अगस्त 1946 में, मैने डिस्कवरी ऑफ इण्डिया की एक प्रति खरीदी और तब अचानक जोश में आनन्द भवन चला गया उसपर पण्डित नेहरू से ऑटोग्राफ़ लेने के लिये। पण्डित जी उस रोज अच्छे मूड में थे। उन्होने पुस्तक पर अंग्रेजी और हिन्दी, दोनों में हस्ताक्षर कर दिये।

चित्र, नीलम सरन गौड़ की पुस्तक – Three Rivers and A Tree से

छोटी छोटी घटनायें कई बार उस विशेष समय के लोगों की प्रकृति के बारे में बहुत कुछ बताती हैं। सभ्यतायें तब लोगों के मन में बनती और जीवन्त होती हैं, जब उनमें कुछ मूल्य जन्म लेते हैं। मैं कुछ घटनाओं को याद करता हूं, जो घटित होते समय कुछ खास महत्व की नहीं थीं; पर जो केवल तभी हो सकती थीं, जब वे हुईं।

उस समय कोई इन बातों पर खास ध्यान नहीं दिया करता था कि प्रोफ़ेसर नील रतन धर तेज कदमों से रसायन शास्त्र विभाग की ओर चले जा रहे हैं और ड्रेसिंग गाउन पहने हैं; कृपलानीजी कर्नलगंज में सब्जी वाले से मोल-तोल पर झिकझिक कर रहे हैं या निराला जी फ़िराक साहब के बैंक रोड स्थित घर की ओर बढ़ रहे हैं और उनके हाथ से लटकती एक बड़ी रोहू मछली है। हरिवंशराय बच्चन जी ठीक सवेरे सवा नौ बजे अपनी साइकिल से अंग्रेजी विभाग की ओर विश्वविद्यालय केम्पस में जाते दिखाई देते थे।

फ़िराक साहब और बच्चनजी, दोनो, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया करते थे। अमर नाथ झा वाइस चांसलर थे और वे हमारे अध्यापकों पर गर्व करते थे। हम सब महसूस करते थे कि हम एक एक युग के समापन और दूसरे युग के उन्नयन के संधिकाल पर थे।

“यह आनन्द था कि सवेरा देखते समय हम जिंदा थे। पर उस समय हम जवान थे, यह तो स्वार्गिक अनुभूति थी।” – वर्डस्वर्थ

यह गांधी और टैगोर का युग था। गांधी एक व्यक्ति नहीं, “विचारों की जलवायु” थे। पर मेरा यह लिखना नायक को केन्द्र में रख कर उनका गुणगान करने के लिये नहीं है। मैं आम आदमी की सोच और उस (आम) व्यक्ति की इतिहास की बड़ी घटनाओं तथा बड़ी शख्सियतों पर प्रतिक्रियाओं को बताना चाहता हूं।

मार्च 1946 में हमें बी.ए. की परीक्षायें देनी थीं। परीक्षा के पहले मुझे बहुत तेज सिर दर्द हुआ। और बुखार भी तेज था। मैं विश्वविद्यालय की डिस्पेंसरी में नहीं जाना चाहता था – वह मेरे हॉस्टल से काफ़ी दूर थी। किसी ने मुझे कांग्रेस की डिस्पेंसरी मे जाने की सलाह दी। यह स्वराज भवन में किसी कुटिया में थी। असहयोग आन्दोलन के दौरान यह कांग्रेस के घायल कार्यकर्ताओं के इलाज के लिये अस्पताल का काम आयी थी। डा. मित्रा उसके रेजिडेण्ट डाक्टर थे।

मैं अकेले ही डिस्पेंसरी में चल कर गया और अपनी बारी का इन्तजार करने लगा। डाक्टर अन्य मरीजों को देखने में व्यस्त थे। कुछ समय बाद उन्होने मुझे देखा और लकड़ी की बेंच पर लेट जाने को कहा। मैने आसपास निहारा। क्लीनिक में न्यूनतम फर्नीचर था। खिड़कियों पर खादी के पर्दे थे। महात्मा गांधी का कोई चित्र (जैसा आजकल सरकारी दफ़्तरों और पुलीस थानों पर दिखता है) नहीं था। पर गांधीजी की भावना वहां थी।

श्री हेमेन्द्र सक्सेना, जैसा आज दिखते हैं।

डा. मित्रा ने मेरी नब्ज देखी और मैने अपनी होने वाली परीक्षाओं के बारे में कुछ बताया। उन्होने मुझे लाल मिक्स्चर पिलाया और इन्तजार करने को कहा। कुछ समय बाद उन्होने मेरा फ़िर परीक्षण किया और मुझे हॉस्टल वापस जा कर पढ़ाई करने को कहा।

मैं असहज भाव से खड़ा हुआ और अटपटे ढंग से अपना पर्स निकाला। डा. मित्रा आगबबूला हो गये और मुझसे बोले – “पैसा देने की सोच रहे हो, तब जब तुम्हारी कल परीक्षा है। एक विद्यार्थी को केवल अपनी सेहत और अपनी पढ़ाई की फ़िक्र करनी चाहिये।” वे शान्त हुये और उन्होने मेरी खराब सेहत पर टिप्पणी करते हुये सुझाव दिया कि मैं गर्मियों की छुट्टियों में विवेकानन्द को पढ़ूं। मैं प्रसन्नमन अपने हॉस्टल वापस लौटा और आत्मविश्वास के साथ यूरोपियन इतिहास पूरे ध्यान लगाकर पढ़ा। … यह साठ साल पहले हुआ। मुझे याद नहीं कि मैने क्या पढ़ा था, पर डा. मित्रा का विवेकानन्द के बारे में मुझे दिया गया लेक्चर अब भी जेहन में ताजा है।

(उस समय इलाहाबाद में) अनेक ऐसे लोग थे ज हमें संकीर्णता, जाति-वैमनस्य, असहिष्णुता और घृणा से ऊपर उठने के लिये प्रेरित करते थे। डा. मित्रा जैसे लोग यह प्रमाणित करते थे कि नित्य प्रति के सामाजिक आचरण में कैसे वे गांधीजी के आदर्शों से विमुख नहीं थे।

…. भाग 2 में जारी रहेगा।


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