अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई का कार्य अन्तिम चरण में


मार्च के उत्तरार्ध में आये थे बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व विभाग के लोग अगियाबीर टीले के दक्षिणी-पूर्वी भाग में उत्खनन करने। करीब तीन सप्ताह बाद प्रोफेसर अशोक सिंह जी ने मुझे इस बारे में बताया। मैने पुरातत्व टीले पर चढ़ने में अपने घुटनों की तकलीफ की बात की तो डा. अशोक सिंह जी ने मेरा हौसला बंधाया – “मेरे भी घुटनों में अर्थराइटिस की समस्या है। पर जब मैं खुदाई स्थल पर होता हूं तो यह तकलीफ गायब हो जाती है।“

कुछ वैसा ही मेरे साथ हुआ। मैं साइकिल से द्वारिकापुरके प्राइमरी स्कूल में लगे उनके कैम्प तक जाता हूं और वहां साइकिल खड़ी कर एक छड़ी का सहारा ले नाले को पार करते हुये करीब 500 कदम नीचे-ऊंचे चलते हुये टीले पर पंहुचता हूं। लगभग रोज। मेरे घुटनों और कूल्हों का दर्द उसके आड़े नहीं आया। मैने सीखा – बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक अक्षमता उतना भौतिक नहीं है। उसकी जड़ें मन में हैं। मन को पर्याप्त तैयार कर लें तो असामान्य/घटती शारीरिक क्षमता के साथ भी सामान्य जीवन जिया जा सकता है।

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एक छड़ी का सहारा ले नाले को पार करते हुये करीब 500 कदम नीचे-ऊंचे चलते हुये टीले पर पंहुचता हूं।

अगियाबीर की खुदाई को निकट से देखते; और बकौल एक ट्विटर मित्र, सोशल मीडिया पर उसके “चारण (bard)” का कार्य करते, महीना होने को आया। अब यह खुदाई अपने अन्तिम चरण में है। टीम ने साफ़ सफाई कर एक लम्बी सीढ़ी का सहारा ले सवेरे सवेरे की सूर्य की रोशनी में साइट का जनरल व्यू (विहंगम दृष्य) कैमरे में कैद करने का काम सम्पन्न कर लिया है। एक वलय कूप को और नीचे जा कर खोदना था। वह कार्य भी कल सम्पन्न कर लिया।

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पूरे आकार के वलयकूप के साथ मैं। चित्र रविशंकर जी ने खींचा।

कल एक कैल्कोलिथिक (ताम्रपाषाण युग) भट्टी (1500-900BCE काल) का पूरा आकार समझने के लिये पास में एक नयी ट्रेंच खोद कर अध्ययन करने का काम भी कल पूरा हो गया। आज टीम के सदस्य गण खुदाई मजदूरों को छुट्टी दे कर अपने पॉटरी-यार्ड में स्थान और काल के क्रम में जमाये मृद्भाण्डों का अध्ययन सम्पन्न करेंगे। चूंकि इसमे मजदूरों का प्रयोग नहीं है – टीम के सदस्य अपनी सुविधानुसार ज्यादा समय तक भी काम कर सकते हैं।

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एक कैल्कोलिथिक (ताम्रपाषाण युग) भट्टी (1500-900BCE काल) का पूरा आकार समझने के लिये पास में एक नयी ट्रेंच खोद कर अध्ययन करने का काम भी पूरा हो गया। नयी ट्रेंच बायें है। भट्टी का चन्द्राकार स्पष्ट होता है नयी ट्रेंच खोदने से।

इस खुदाई की फण्डिंग आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया ने की है। अत: ए.एस.आई. के पटना सर्किल के अधिकारी कल साइट पर खनन का मुआयना करेंगे। उससे साथ ही इस बार की खुदाई का कार्य लगभग पूरा हो जायेगा। शायद तीन-चार दिन ही टिके यहां पर खुदाई की टीम।

डा. रविशंकर ने बताया कि यहां से जाने के बाद लगभग 5-6 महीने लगेंगे बी.एच.यू. में इस खुदाई के व्यापक डाटा को एनलाइज करने में। प्राप्त मृद्भाण्ड सहेजे जायेंगे। मिले सिक्कों का उनके विशेषज्ञ अध्ययन करेंगे। बीरबाल साहनी पेलियोसाइंसेज संस्थान के वैज्ञानिक डा. अनिल पोखरिया अपनी रिपोर्ट देंगे। इस बार अगियाबीर के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर प्राप्त नवपाषाण युग के मानव के परिवेश के सैम्पल भी ले कर गये हैं वे। बहुत सम्भव है अगियाबीर टीले पर प्रागैतिहासिक मानव कबीले की बसावट के कार्बन फुटप्रिण्ट्स भी मिलें। अगर एक चौंकाने वाली प्रागैतिहासिक तिथि सामने आये तो आश्चर्य नहीं होगा।

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बीरबाल साहनी पेलियोसाइंसेज संस्थान के वैज्ञानिक डा. अनिल पोखरिया, गंगा किनारे राख और अधजले बीजों को वाटर फ़्लोटेशन तकनीक से छानते हुये।

यद्यपि मैने इस बार की टीले की खुदाई का दृष्टा-भाव से बहुत पास से अवलोकन किया है, पर मेरी निगाह से बहुत कुछ होगा, जो गुजरा ही नहीं। बहुत कुछ वैसा भी होगा जो समझ नहीं आया। डा. अशोक कुमार सिंह और उनके प्रवीण शिष्य डा. रविशंकर के पास बहुत कुछ साक्ष्य और विश्लेषण के रूप में जरूर होगा जो चौंकाने वाला होगा। पर जहां वे पुरातत्वविदों की जमात को एड्रेस करते हैं, मैं आम सोशल-मीडिया-यूजक को सम्बोधित करता हूं। और दोनों की अलग अलग उपयोगिता है।

खैर, अब इन पुरातत्वविदों के द्वारिकापुर/अगियाबीर से चले जाने के बाद क्या करोगे, जीडी? तुमने आधा दर्जन पुरातत्व विषयक पुस्तकें खरीद ली हैं, उनके अध्ययन में समय लगेगा। एक “पुरातत्वविद्” नामक उपन्यास की कल्पना तो कर सकते हो, जिसमें जवान रविशंकर जैसा हीरो हो और जिसके कथानक को अशोक सिंह जी के संस्मरण परिपुष्ट करते हों। प्यारे जीडी, इस विषय से जुड़े रहने का अपना अलग आनन्द है। अपने बचे ढाई-तीन दशक में दो साल तो इस विषय के अध्ययन को दे ही सकते हो।

और अगर आर्कियालॉजी जैसे रुक्ष/शुष्क/खुरदरे (?) विषय को व्यापक ऑडियेंस को परोस पाये तो उससे बढ़ कर और क्या होगा?

अगियाबीर की पुरातत्विक खुदाई का कार्य अन्तिम चरण में है, तो क्या? पिक्चर अभी बाकी है दोस्त!

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बांस की लम्बी सीढ़ी पर अपने को साधे साइट के जनरल व्यू लेने के लिये कैमरा सही करते रविशंकर। अगर कभी लिखा तो यह नौजवान मेरे “पुरातत्वविद्” उपन्यास का नायक होगा! :-)

भदोही की आर्कियॉलॉजी के तत्वशोधक रविशंकर


प्रोफेसर (डा.) अशोक सिंह ने अगियाबीर टीले के खुदाई स्थल मुझे रविशंकर से परिचय कराते बताया कि अगर आपको भदोही के पुरातत्व पर जानकारी चाहिये तो इन (रविशंकर) से बेहतर सोर्स कोई नहीं। तभी मुझे लग गया कि मुझे रविशंकर जी को कस कर पकड़ना है अपने आस-पास की जानकारी में गहराई और सांद्रता लाने के लिये।

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रविशंकर

यहां जिससे भी बात करो – तथाकथित जागरूक स्थानीय से भी – तो वे भदोही को मात्र भरों से जोड़ते हैं। पर आसपास जो भी दिखता है, उसे मेरे जैसा सतही जानकारी वाला जीव भी भांप सकता है कि वह सब 1200ईस्वी के बहुत पहले की सभ्यता की बदौलत है। दूसरे; भर या भारशिव केवल भदोही में नहीं हैं। विकीपेडिया पर एक काल में उत्तर भारत के बड़े हिस्से में उनका प्रभाव दिखता है। तब भर या भर-द्रोह को भदोही मात्र से जोड़ना और भदोही की पहचान वही बना देना क्या चीज है?

मैने अपने आप से कहा – “जीडी, अगर इस इलाके में तुम्हें अपने जीवन का तीसरा और चौथा भाग काटना है तो रविशंकर जैसे से मिलना और जानकारी समेटने-सहेजना तुम्हारी बंजर बौद्धिक जमीन को जबरदस्त नैसर्गिक उर्वरक इनपुट देगा। मत चूको उससे।“

और मैने रविशंकर जी से फोन कर समय मांगा। अगियाबीर टीले पर आर्कियॉलॉजिकल खुदाई सवेरे छ बजे प्रारम्भ हो जाती है। अपने साथ कर्मी ले कर रविशंकर छ बजे वहां पंहुंच जाते हैं। वहीं उनके किशोर महराज (बीएचयू के रसोइये) नाश्ता-चाय ले कर 8-9 बजे के बीच पंहुचते हैं। इग्यारह बजे तक खुदाई चलती है।

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अगियाबीर की खुदाई निर्देशित करते रविशंकर

दोपहर के भोजन/विश्राम के बाद तीन से शाम छ बजे दूसरी शिफ्ट में खुदाई चलती है। पूरे खुदाई के समय वहीं मौजूद रह कर निर्देशित करने और प्राप्त सामग्री को तरतीबवार जमवाने का काम करते हैं रविशंकर जी। खुदाई करने वाले कर्मी यद्यपि लम्बे अनुभव के कारण पुरातत्व की आवश्यकताओं के प्रति पर्याप्त संवेदित किये जा चुके है; पर खुदाई उनके भरोसे छोड़ कर ये पुरातत्ववेत्ता वहां से हट नहीं सकते। मेरे फोन करने पर रविशंकर जी ने कहा कि शाम 6 बजे खाली हो कर वे नहाने के बाद सात बजे चाय पीते हैं। उस समय मैं उनसे मिलने आ सकता हूं।

शाम सात बजे, सूर्यास्त बाद के धुंधलके में, द्वारिकापुर के प्राइमरी स्कूल, जहां पुरातत्व विभाग की टीम रुकी है, पंहुचा मैं। बहुत आत्मीयता से मिले रविशंकर जी। साथ में दो अन्य व्यक्ति – आशीष और पटेल जी भी थे। लगभग एक घण्टा समय दिया रविशंकर जी मुझे और बताया अपने भदोही पर किये शोध के बारे में।

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संझा समय द्वारिकापुर प्राइमरी स्कूल पर अपने कैम्प में मिले रविशंकर। चाय पीते हुये हुई चर्चा।

बीएचयू के एक कुशल अध्यापक की तरह हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने और अपनी बात दृढता से कहने की वाक्पटुता है रविशंकर में। वैसी कुशलता मैं अपने आप में डेवलप करने के स्वप्न देखता हूं। और कहीं न कंहीं यह भी जानता हूं कि अब वैसी पटुता सम्भव नहीं है पाना! अंत: मन्त्र मुग्ध सा सुनता हूं रविशंकर जी को।

भदोही की बात करते रविशंकर बताते हैं कि भर-द्रोह भर में भदोही का इतिहास समेटना एक व्यापक षडयन्त्र का हिस्सा है – उस प्रकार के लोग जो 1200-1400इस्वी के मध्य भरों के किलों के होने और उसके बाद मुहम्मद गोरी की सेना द्वारा पददलित/ध्वस्त किये जाने को ही भदोही के इतिहास का खूंटा मानते हैं; उन लोगों का षडयन्त्र। और इस षडयन्त्र में स्यूडो-सेक्युलर लोग महती भूमिका निभाते हैं।

भदोही के प्राचीन इतिहास के बारे में रविशंकर जो भी कह रहे थे, उसकी भाषा मेरी स्मृति में जस की तस नहीं है, नोट्स भी बहुत अच्छे लिये नहीं हैं; पर उनके कहने से यह जरूर समझ गया कि आज से 50 हजार से 5 हजार साल पहले तक गंगा की धारा बहुत उथली थी और वे अपना कोर्स व्यापक रूप से बदलती थीं। बहुत कुछ कोसी नदी की तरह। भदोही जिले में सभी पुरातत्व स्थल (100 के आसपास तो रविशंकर जी ने ही आइडेण्टीफ़ाई किये हैं अपने सर्व में) कमोबेश गंगा के किनारे ही थे नव पाषाण युग में। कालान्तर में गंगा की धारा संयत हुई और वर्तमान दशा में (लगभग) स्थिर हुई।

रविशंकर मेरे समक्ष इतिहास-प्रागैतिहास का तिलस्म खोल रहे थे – यह द्वारिकापुर जहां हम बैठे थे; वह तब भी यहीं था और इसी नाम से! उन्होने बताया कि भदन्त आनन्द कौशल्यायन का पाली से अनुदित कुलाल जातक का उन्होने अध्ययन किया। उसमें वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म की चर्चा है – वाराणसी नगर के द्वारग्राम में कुम्भकार कुल में उत्पन्न पूर्व जन्मना तथागत। यह संदर्भ 600 बीसी के आसपास द्वारग्राम (द्वारिकापुर) में एक बड़ी कुम्हार बस्ती का होना बताता है।

रविशंकर बताते हैं कि भूमि खनन का माफिया (या निरीह किसान भी) खेत-जमीन से मिट्टी निकालने की प्रक्रिया में आर्कियॉलॉजिकल साइट्स को खत्म किये दे रहा है। इलाके की 100 में से तीस-चालीस प्रतिशत साइट्स उनके देखते देखते गायब या इनसिग्नीफिकेण्ट हो गयी हैं।

भदोही का इतिहास भू ठेकेदार माफिया; मनरेगा और खनन विभाग की तिकड़ी द्वारा नष्ट कर दिया जा रहा है और आर्कियालॉजिकल सर्वे वाले भिखारी के मानिन्द वह सब होते देख रहे हैं!

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खनन माफिया के आराध्यदेव हनुमान जी।

रविशंकर भदोही को भद्रा नदी (कूर्म/वाराह पुराण में वर्णित गंगा का एक नाम भद्रा) या जिले में प्राप्त भैदपुर (भद्रपुर) जो मौर्यकालीन पुरातत्व प्रमाण युक्त स्थान है अथवा भदरांव (भद्रांव) से जोडने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार ये जगहें वहां हैं, जहां गंगा (भद्रा) कभी बहती रही होंगी। रविशंकर स्वयम् अपनी इस सोच से संतुष्ट नहीं हैं; पर वे इस दृढ मत के हैं कि भदोही के नाम और इलाके का अस्तित्व 1200 इस्वी से तो कहीं ज्यादा पुराना है। नव पाषाण युग तक तो वह जाता ही है।

रविशंकर से मिल कर मैं अपने घर के लिये जब चला तो वे और उनके दोनो मित्र मुझे मेरे वाहन तक छोड़ने आये। पूरा आदर-सम्मान दिया मुझे और भविष्य में अनेकानेक उठने वाले मेरे सवालों का उत्तर देने का प्रयास करने का आश्वासन भी दिया।

चलते समय मुझे लगा कि डा. अशोक कुमार सिंह, रविशंकर (और कुछ सीमा तक मैं भी) गंगा नदी के इर्दगिर्द अपने लिये वर्तमान और भविष्य का स्थान खोज रहे हैं। हम लोग अपने लिये लीगेसी (legacy – भविष्य की पीढियों के लिये छोड़ी जाने वाली अपनी विरासत) के मेगालिथ खोज रहे हैं। डा. अशोक को वह अगियाबीर में नजर आता है। रविशंकर (भले ही भदोही पर रिसर्च करने को रिलक्टेण्टली तैयार हुये) भदोही इलाके के प्रागैतिहास/इतिहास में वह लीगेसी तलाश रहे हैं। मुझे अपने ब्लॉग से उम्मीद है कि कालान्तर में वह मुझे लीगेसी प्रदान करेगा। ब्लॉग जो आस-पास (मुख्यत: गंगा नदी के इर्दगिर्द) घूमता है। गंगा नदी अमृतवाहिनी हैं और हम लोगों को – डा. अशोक, रविशंकर और मुझे – लीगेसी का अमृतत्व प्रदान करेंगी। बस, अपनी अपनी जद्दोजहद; अपनी अपनी कशमकश में हम लगे रहें।… अमृतस्य गंगा!

अपनी धुन में रमे हैं और अपनी धुन के पक्के हैं डा. अशोक और रविशंकर। और यह सुदृढ लीगेसी के अमृत की चाह, एक जुनून से ही मिलती है! मुझे पक्का यकीन है उस विषय में!

हां, पूरा और पक्का!

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रविशंकर जी ने खींचा अगियाबीर पुरातत्व खनन स्थल पर मेरा (बायें), शिवकुमार (विभागीय ड्राफ़्ट्समैन) और किशोर महराज (रसोईया) का चित्र।

सोलर लालटेल झल्लर के पास रही नहीं


छ दिन पहले मैने सोलर लालटेन झल्लर को उपहार में दी थी। अकेले मड़ई में रहने वाले वृद्ध को। पर मुझे अन्देशा था कि उनके यहां से कहीं कोई चुरा न ले। या फिर इलाके के लिये फ़ैंसी वस्तु मान कर परिवार वाले ही न ले जायें।

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छ दिन पहले मैने सोलर लालटेन झल्लर को उपहार में दी थी।

वही पता करने के लिये सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान झल्लर की मड़ई की ओर चला गया। झल्लर थे और कुछ लकड़ियां तरतीबवार रख रहे थे – उन्हें जला कर चाय बनाने के लिये। मैने पूछा – किससे बनाते हैं चाय?

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झल्लर थे और कुछ लकड़ियां तरतीबवार रख रहे थे – उन्हें जला कर चाय बनाने के लिये।

झल्लर ने बताया कि दूध तो होता नहीं उनके पास; सो चाय की पत्ती के साथ नीम, लसोड़ा और हरापत्ता (जो जब मुझे दिखाया तो लेमन ग्रास निकला) डाल कर काली चाय बना कर पीते हैं। ये सभी झल्लर के महुआरी/अमराई परिसर में उपलब्ध हैं। लेमन ग्रास तो मुझे पता था कि चाय में फ़्लेवर के लिये मिलाया जाता है। लसोड़ा और नीम का पत्ता भी गुणकारी है, यह आज ही पता चला।

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झल्लर की मड़ई के पास पानी के स्रोत के पास लगी लेमान-ग्रास

झल्लर टपकते महुआ को भी इकठ्ठा कर रहे हैं। तीन अलग अलग समूहों में रखे थे महुआ के फ़ूल। उन्होने बताया कि ये तीनों ढेर फूलों के सूखने की अलग अलग अवस्था में हैं। परसों, कल और आज के इकठ्ठा किये फूल हैं ये। उनकी महुआरी में इस साल महुआ बहुत कम हुआ है। झल्लर ने बताया कि महुआ का हलुआ, ठेकुआ, रस, रोटी – अनेक तरह से उपयोग करता है उनका परिवार। एक बार कुछ पंजाबी आये थे उनके पास। वे कह रहे थे कि महुआ तो किशमिश से ज्यादा स्वादिष्ट है।

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अपनी मड़ई के सामने इकठ्ठे किये महुआ के फूलों के साथ झल्लर

पुराने जमाने की बताने लगे झल्लर। ये जो सामने जीटी रोड है, तब इसपर डामर बिछाया जा रहा था। इकहरी सड़क थी तब। बड़े बड़े गढ्ढे हुआ करते थे। कछवां के सेठ बंधू लाल का इक्का चला करता था कच्चा तम्बाकू ले कर गोपीगंज के लिये। गढ्ढों में जब इक्का फंस जाता था तो गांव वाले पहिये को हाथ से धकेलते थे। गढ्ढे से निकालने के धन्यवाद स्वरूप अंजुरी अंजुरी भर कर तम्बाकू इक्केवान लोगों को दे दिया करता था।

पुराना बताते समय क्रॉनालाजिकल सीक्वेंस का कोई ध्यान नहीं रखते झल्लर। अपने मस्तिष्क में शायद सूचनायें भी सिलसिलेवार नहीं रखी हैं उन्होने। बोलने लगे कि बंगाल में दंगे हो गये थे हिन्दू मुसलमानों के। बहुत मार काट मची थी। उनके पिता कलकत्ता में नौकरी करते थे। तब वापस लौट आये। उनके सेठ ने अपनी गाय बचाने के लिये उनको गाय के साथ ही रवाना कर दिया था। कोई ट्रक तो होते नहीं थे, पैदल ही गाय के साथ आये थे दो और जनों के साथ उनके पिताजी।

मेरे पास नोट करने के लिये कागज कलम नहीं थी झल्लर के कहे को सहेजने के लिये। सो मैने कहा कि कल-परसों आ कर उनके पास बैठूंगा यह सब सुनने और कागज पर करने के लिये।

झल्लर ने कहा – जरूर आइयेगा। आप जैसे सुनने और ग्रहण करने वाले कम ही होते हैं। आम तौर पर तो लोगों के पास समय ही नहीं है।

चलते चलते मैने झल्लर से सोलर लालटेन के बारे में पूछा। उन्होने बताया कि ठीक चल रही है। पर उन्हें बटन ठीक से दबाना नहीं आता था, सो गांव में लड़कों को दे दी है। बकौल उनके “वो पुरानी वाली टार्च ही ठीक है उनके लिये!”

मुझे जो अन्देशा था, वही हुआ। चमकदार लालटेन झल्लर जैसे वृद्ध के पास रुकना कठिन था। सो परिवार वालों ने उनसे ले ही ली!

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