भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
पिताजी को सूर्या ट्रॉमा सेंटर के लोग परसों दोपहर MRI के लिए लेकर गए. पांच छ लोगों ने बड़े संभाल कर बिस्तर से स्ट्रेचर और स्ट्रेचर से एम्बुलेंस में शिफ्ट किया. मेरी पत्नीजी उन्हें उठाने लिटाने में हाथ बटा रही थीं पर मैं तो साथ में खड़ा भर था. एक चित्र भी लिया. एक कर्मी को अजीब सा लगा कि इस अवसर पर भी चित्र लेने की सूझ रही है इस बेटे को.
एक कर्मी को अजीब सा लगा कि इस अवसर पर भी चित्र लेने की सूझ रही है इस बेटे को
मेरी बिटिया कहती है कि मेरे इमोशंस और मेरी चारित्रिक टफ-नेस अलग तरह की है. शायद वह सही हो.
एम आर आई के कक्ष में पिताजी के साथ चेंबर में मुझे बैठने को कहा गया. मशीन की कर्कश खट खट चख चख किट किट की ध्वनि के बीच मैं अपने बचपन से अब तक की मेमोरी लेन में चला गया. माँ के रहते पिता का रोल निभाते पिताजी की याद और अब मां के बाद पिता कम मां ज्यादा के रोल में पिताजी के साथ जीवन का स्मरण होता गया.
वह समय याद है कि एक बार यात्रा से मेरे वापस लौटने पर पिताजी ने सिर पर हाथ रखा और उसके बाद मेरे पूरे मुंह पर हाथ फेरा – वैसे जैसे कोई मां अपने छोटे बच्चे को करती है.
मेरे घुटनों और पैर के तलवों में दर्द रहता है. लगभग हर रोज पिताजी मेरे पास बैठ कर मुझे सहलाते थे. पूछते थे कि दर्द कुछ कम हुआ? दर्द वास्तव में गायब हो जाता था… कुछ लोग कह सकते हैं कि पचासी साल के पिता से सेवा ले रहा है यह 64 साल का व्यक्ति. लेकिन वे समझ नहीं सकते कि सीन वह नहीं जो दिख रहा है. असल सीन है कि एक छोटे बच्चे के हाथ पैर उसकी मां सहला रही है.
पिछले दो महीने से उनकी अस्वस्थता के कारण वह सहलाना बंद है. आगे कभी होगा भी या नहीं – वह भी तय नहीं है. आई सी यू में लेटे उनके हाथ पैर छाती और मुंह सहलाता हूँ. लगता है मेरी आँखों की टियर डक्टस् ब्लॉक हो गई हैं. उसमें पानी ठीक से पास नहीं होता है आजकल.
आईसीयू के बेड पर पिताजी.
डाक्टर कह रहे हैं आप कोई मिरेकल की उम्मीद न करें. अस्पताल में रखेंगे तो हम लोग केयर करेंगे ही, पर वह केयर घर में भी की जा सकती है. कुल मिलाकर वे हमें जबरी जाने को नहीं कह रहे, पर सुझाव दे रहे हैं कि यहां समय गुजरना फायदेमंद नहीं. घर का वातावरण बेहतर रहेगा.
यूँ ही स्टेबल रहा तो कल तक हम घर ले जाएंगे पिताजी को. मन में वही चल रहा है कि कैसे खिलाएं, नहलाऐं, घुमाएं फिरायेंगे. ह्वील चेयर लेना होगा. सर्दियों के लिए कमरे का तापक्रम ठीक रखने के लिए उपकरण लगाने होंगे. फीडिंग की कैलोरी और मेन्यू बनाना होगा. कोशिश रहेगी कि जितना आरामदायक वातावरण दे सकें, वह नियोजित हो जाए.
यह सब सोचने में समय कट रहा है. पर बीच बीच में पिताजी के अंत की आहट भी होती है. मां और पिता दोनों को खोना बड़ा भयावह एहसास है. छटपटाहट होती है.
लगता है कोई सिर दबा दे. पैर सहला दे. पत्नीजी को कहता हूँ. वे करती हैं. पर पिताजी के हल्के पर सधे स्पर्श की याद बनी रहती है.
शाम का समय. रोशनी कम हो रही है बाहर. दिन बीत रहा है. दिवस के अंत की आहट उदास कर जाती है.
एक बार फिर उठ कर आई सी यू में लेटे पिताजी को देख आता हूँ. आंखे मूंदे वे छोटी गौरैया या बीमार मुनिया की तरह पड़े हैं.
मेरे पिताजी औराई के इस अस्पताल – सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – में भर्ती हैं. उन्हे रक्त में संक्रमण था, जो सेप्टिसीमिया निकाला. संक्रमण की घोर वेरायटी. इसके अलावा उनकी बढ़ी उम्र के कारण डिमेंशिया की भी समस्या है. एक ओर का मस्तिष्क, वृद्धावस्था के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो गया है.
सूर्य मणि त्रिपाठी (इन सेट में) और औराई में नया बना सूर्या ट्रामा सेंटर तथा अस्पताल
अस्पताल मेरे घर (गांव विक्रमपुर, भदोही जिला) के सबसे नजदीक (दस किलोमीटर दूर) नया खुला है. जब पिताजी को लेकर पंहुचा तो अस्पताल में किसी को जानता नहीं था. पर बिना किसी भटकाव के काउंटर पर संपर्क करते ही कर्मचारी पिताजी को ह्वील चेयर पर उतार कर आपात चेक अप के लिए ले आए और उपचार प्रारंभ हो गया.
पिताजी आई सी यू में
पूर्वांचल में जहां पहचान और सोर्स सिफारिश के बिना कुछ होता ही नहीं, हम सीधे पंहुचे और इलाज का काम शुरू हो गया. मुझे केवल उचित पेमेंट करने पड़े और दवा ला कर देनी पड़ी.
शाम तक मैं थक गया. हमने कुछ राशि एडवान्स जमा की जिससे रात में हमें आकस्मिक दवाओं के लिए न जगाया जाए. लेकिन फार्मेसी के एक कर्मी ने आधी रात जगा ही दिया – यह जानने के लिए कि दवा की दरकार है, वह दे दे तो सवेरे मैं पेमेंट कर दूँगा या नहीं.
रिटायर्मेंट के बाद किसी ने पिछले चार साल रात में फोन कर नहीं जगाया था. एक बार तो निद्रा में अपने को पुराने फ्रेम ऑफ माइंड में रख कर सोचने लगा कि शायद कोई ट्रेन एक्सिडेंट का मामला है. पर फोन की बात से समझ आ गया कि मामला अस्पताल की दुनियाँ का है, रेल की दुनियाँ का नहीं. रेल की दुनियाँ तो चार साल पहले छूट चुकी है. :lol:
अगले दिन हर छोटे बड़े बिल का अलग अलग पेमेंट करते, वह भी कैश में, मैं उकता गया. मुझे समझ नहीं आया कि इतना बड़ा अस्पताल कैश की बजाय POS मशीन, UPI या Paytm से पेमेंट क्यों नहीं लेता; जब हर जगह स्टिकर लगे हैं कि “कृपया बिना रसीद के कोई पेमेंट न करें”?
श्री सूर्य मणि तिवारी
एक स्टिकर पर अस्पताल के मुखिया श्री सूर्य मणि तिवारी का फोन नंबर लिखा था. मैंने उन्हें फोन लगाया. पब्लिक को डिस्प्ले किए नंबर के बारे में सोचा कि वह कोई कर्मचारी मैनेज करता होगा. पर फोन तिवारी जी ने स्वयं उठाया और पूरी विनम्रता से बातचीत की.
मेरा पूरा नजरिया बदल गया उस बातचीत के बाद. तिवारी जी ने खेद व्यक्त किया कि अस्पताल नया होने के कारण POS मशीनें अभी नहीं आई हैं. कुछ ही दिन में आ जाएंगी. तब तक के लिए उन्होंने आस पास उपलब्ध एटीएम की जानकारी दी. उन्होने अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट साहब, प्रशांत जी को भी मेरे पास भेजा. प्रशांत जी ने सूर्या ट्रामा सेंटर के बैंक खाते का विवरण दिया जिसमें मैं एडवान्स ट्रांसफर कर सकूं.
सूर्य मणि जी के पॉजिटिव एक्शन से मेरी समस्या का निदान हो गया. यह भी स्पष्ट हुआ कि यह अस्पताल खोलने का उनका ध्येय पैसा कमाना नहीं, अपने इलाके में परोपकार करने का है.
मैने तिवारी जी को हृदय से धन्यवाद दिया.
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इसके दो दिन बाद सूर्यमणि जी से फोन पर और आमने सामने एक लंबी परिचयात्मक बात हुई. उन्होने मेरे बारे में पूछा और अपना भी बताया. पता चला कि वे सेल्फ मेड व्यक्ति हैं. वे जब इंटर कॉलेज में थे, तभी उनके पिताजी का निधन हो गया था. पढ़ने मेें अच्छे थे तो पढ़ाई के बाद अध्यापक बन गये पास में जंगीगंज के एक स्कूल में. उन्हें जब यह समझ आया कि 3 भाई और दो बहनों का परिवार स्कूल मास्टरी की सेलरी में नहीं संभाला जा सकता तो घोसियां के अपने एक मित्र के पिताजी से कार्पेट व्यवसाय की बारीकियां समझी. 1971 में वह काम प्रारंभ किया और कालांतर में (1979 में) कार्पेट के बाजार, अमेरिका गए. वहां 1986 में अपने बेटे को ले जा कर पढ़ाया. इंजीनियर और एम बी ए बनाया.
सन 2004 में उनका अमरीका स्थित व्यवसाय 25 मिलियन (डालर) टर्नओवर का बना उनके अथक परिश्रम से.
उनकी वेब साइट surya.com से पता चलता है कि उनका लड़का सत्य उनकी कम्पनी का प्रेसीडेंट है. अब कंपनी टर्नओवर में 2004 की अपेक्षा छ गुना प्रगति कर चुकी है.
मुलाकात में मेरे पिताजी के ट्रीटमेंट के बारे में उन्होंने अपना जेनुईन कन्सर्न दिखाया. उन्होंने और यहां के प्रमुख प्रबंधक डा. रमण सिंह जी ने पिताजी के MRI जांच के बारे में व्यवस्था की.
मेरे जैसे रिटायर्ड व्यक्ति, जिसका विभागीय आभामंडल अब बिला चुका हो, के लिए इस तरह का कन्सर्न अगर सूर्य मणि जी और डा. रमण सिंह जैसे लोग दिखाएं – जिनके लिए मैं दो दिन पहले तक अजनबी था; तो निश्चय ही मेरे कुछ पूर्व संचित पुण्य होंगे. वर्ना कौन पूछता है?!
सूर्य मणि जी का कहना है कि फिलेन्थ्रॉपी के कोण से अगर मैं आनेररी आधार पर अस्पताल के लिए कुछ समय दे सकूं तो अच्छा होगा. मेरी पत्नी जी ने मुझे यह सुन कर कहा – “छुट्टा घूमने की तुम्हारी आदत हो गयी है. इसलिए मना करने की कोशिश करोगे ही. पर ऐसा करना मत. संपर्क बनाना और लोगों से जुड़ना कोई गलत बात नहीं. अंतर्मुखी बने रहे हो, पर वही सदा उचित नहीं होता.”
मुझे अपनी पत्नीजी और सूर्य मणि जी के कहने में सार दिखता है. पर अभी तय नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं कर क्या सकता हूँ. अस्पताल की दुनियाँ मेरी आसक्ति की पटरी की नहीं है…
पर पटरी क्या है? गंगा किनारे छुट्टा घूमना और दस पांच पंक्ति लिख कर, एक दो फोटो सटा कर दिन पर दिन गुजरते देखना – वही पटरी है? शायद नहीं. पर सही क्या है?
शायद सूर्य मणि तिवारी जी के प्रस्ताव पर अपने जीवन के जड़त्व में कुछ बहाव लाऊँ. शायद.
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क्यूं बनाया है सूर्य मणि जी ने यह अस्पताल?
सूर्य मणि जी ने अस्पताल के एक कर्मी, भरत लाल मिश्र जी को मुझे पूरा अस्पताल दिखाने के लिए कहा. विभिन्न प्रकार के परीक्षण कक्ष, CT Scan तक की रेडियोलॉजिकल परीक्षण सुविधा से संपन्न, अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर, फिजियोथेरेपी का विस्तृत कमरा, अनेक प्रकार के वार्ड, सेमी और पूरे प्राइवेट कमरे, केण्टीन, चार मंजिला विस्तृत रैम्प, एम्बुलेंस… सब कुछ इतना प्रचुर और आधुनिक कि किसी मेट्रो शहर के लिए भी उसे ट्रेंडी मान सकते हैं…. ऐसा अस्पताल विकसित हो रहा है यह. बस यहां के लिए डाक्टरों और प्रोफेशनल स्टाफ की और बड़ी फौज चाहिए. उसके लिए, लगता है सूर्य मणि जी सघन हेड हंटिंग में जुटे हैं.
यह है आने वाले समय का ऑपरेशन थियेटर. औराई एक कस्बा या गांव भर है, जहां यह उपलब्ध होगा सूर्या ट्रॉमा सेंटर में.
इतनी पूंजी और श्रम लगे अस्पताल से कमाना तो मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है. और बड़े शहरों से कोई मैडिकल टूरिज्म के लिए यहां आने से रहा.
केवल कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिबिलिटी का निर्वहन भी ध्येय नहीं हो सकता. उस मुद्दे पर अधिकांश कंपनियों को लिप सर्विस करते और उस मद के खर्चे में डंडी मारते मैंने देखा है.
यहां तो सूर्य मणि जी मानो पूरी साध और तन्मयता से अस्पताल बनाए हैं और विकसित कर रहे हैं….हर आधुनिक सुविधा, सहूलियत से संतृप्त अस्पताल की साकार होती परिकल्पना!
मुझे लगता है अगर कोई मोटिव है तो वह अपने इलाके की सेवा और अपनी सात्विक साख की पुष्टि ही हो सकता है. अन्यथा सारे आउट पेशेंट्स को बिना फीस लिए सुविधा देना जब कि पूरे इलाके में झोला छाप डाक्टर भी 100 रूपया झाड़ लेते हैं फटे हाल मरीज से… कोई (आसपास दिखता व्यापक और लूट खसोट का मैडिकल) व्यवसाय करने की वृत्ति तो कदापि नहीं है.
Man, at some point of time in life, breaks from mundane and starts living for his LEGACY. That’s the most pious moment. That can not come, unless the man has some substantial inner stuff in the core. सूर्य मणि जी के साथ वही हो रहा है.
इसी लिए शायद सूर्य मणि जी के इस यज्ञ में अपना योगदान, अपनी आहुति अर्पण करनी चाहिए.
गंगा किनारे मिल गए सभाजीत। एक बांस ले कर आए थे। घर में मनौती है गंगा जी को आरपार की माला चढ़ाने की। उसके लिए किनारे पर यह बांस गाड़ा जाएगा. उससे एक रस्सी ले कर नाव में निकलेंगे उत्सव मनाते परिवार के लोग। रस्सी में कुछ कुछ अन्तराल में आम की टेरी और फूल बांधे जाएंगे। नाव पर लोग नारियल, फल, मिठाई, रोट आदि ले कर जाएंगे। रास्ते में गंगा जी की पूजा होगी और उनके यश में गीत भी गायेंगी महिलाएं। गंगा उस पार भी एक बांस गाड़ कर रस्सी उसपर टांगी जाएगी।
उसके बाद रस्सी का दूसरा फेरा इस पार तक आएगा।
मुझे नहीं मालूम था कि गंगाजी की इस तरह की आरपार की माला की पूजा भी होती है!
सभाजीत मिश्र यह बताते हुए अपने घर ले गए। उनका घर गांव अगियाबीर में ऊंचाई पर स्थित है। सन 1978 की बाढ़ में गंगा उनके घर के आसपास थीं पर घर सुरक्षित था।
सभाजीत के दो भाई वहां थे और वे भी रिटायर्ड हैं. बड़े भाई प्रेम नारायण इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल रह चुके हैं। उनसे मेरा पूर्व परिचय है। छोटे भाई बड़े बाबू थे। सभाजीत औराई ब्लॉक में राजस्व निरीक्षक थे।
गांव के स्तर से एक प्रतिष्ठित परिवार।
सभाजीत जी के घर चाय पीने को मिली। अच्छी चाय। गांव देहात में सलीके से बनी चाय कम ही होती है। उनके आतिथ्य और सत्कार से मन बना की भविष्य में गंगा तट पर जाते आते कभी कभी उनके घर जाया जा सकता है।
सभाजीत और उनके बड़े भाई प्रेम नारायण जी सवेरे उठ कर गाय गोरू की सेवा, दालान और ओसार की सफाई, स्नान पूजा, खेती का प्रबंधन आदि देखते करते हैं। कुल मिलाकर रिटायर्ड जीवन व्यस्त रहता है।
वे लोग स्वस्थ भी दिखे और प्रसन्न चित्त भी।
राजनीति चर्चा भी हुई। सभी इस बात पर सहमत थे कि मोदी को एक बार और मौका मिलना चाहिए।
गठबंधन पर सभाजीत ने टिप्पणी की – साझे में होल्ला ही नीक रहथ (सामूहिक रूप में होलिका दहन ही उपयुक्त है। आग लगाओ, तमाशा देखो और अपने अपने घर जाओ), साझे में सरकार नहीं चलती।
सभाजीत सुरती मल रहे थे। उन्होने मुझे भी ऑफर की सुरती। शायद वे पहले आदमी थे जिन्होंने मुझे सुरती की पेशकश की हो। अब लगता है मैं पर्याप्त गंवई हो गया हूं जिससे लोग सुरती चूना की मित्रता जैसा करने की सोच सकें।
ग्रामीण जीवन की एक पायदान चढ़ने का अहसास हुआ उनके सुरती – आतिथ्य से! 😁