भट्ठा मजदूर महिला


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कल भी मिली थी वह महिला।

नीले रंग की साड़ी पहने जोगिया रंग के कपड़े से बंधी परात में कुछ सिर पर लिये वह कल भी वह जा रही थी और आज भी। आज उसके साथ एक और महिला भी थी। सवेरे साइकिल चला रहा था मैं डेढ़ी पर। अपनी साइकिल रोक कर पूछा – कहां जाती हैं आप? गंगा स्नान कर लौटती हैं?

उसने जवाब दिया – “नहीं, अपने घर पर ही नहा कर चली हूं। गंगा नहाने का समय कहां। भट्ठा पर काम पर जा रही हूं।“

साथ वाली महिला ने बताया कि आदमी, बच्चे सवेरे सवेरे चले गये हैं भट्ठे पर काम करने। वे खाना बना, नहा कर निकल रही हैं।

क्या काम करते हैं?

“सगड़ी पर ईंट ढोते हैं। ऊंचे-नीचे पर सगड़ी (ठेला) चलता नहीं तो हम औरतें भी खींचती हैं या धक्का लगाती हैं।“

महिलाओं की बात से लगा कि पूरा परिवार सामुहिक रूप से ईंट ढुलाई का काम करते हैं। सवेरे जाती हैं ये महिलायें और शाम को वापस लौटती हैं। परिवार भी दिन भर वहीं काम करता है।

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उन दोनों महिलाओं से मैने कहा – एक चित्र ले लूं? मैने सहमति का इन्तजार नहीं किया। एक औरत ने जल्दी से अपना पल्लू मुंह पर डाल लिया और दूसरी ने मुस्कुराहट दी। उन्होने पूछा – मैं कहां रहता हूं?

बताने पर कि पास के गांव विक्रमपुर से हूं, एक ने कहा – अच्छा बाभन? मन्ना दूबे हयेन उहां।

मैने कहा – हां, मन्ना मेरा साला है। उनसे परिचय का एक राउण्ड पूरा हुआ।

सामने दायें एक भट्ठा नजर आ रहा था। उसमें काम भी चल रहा था। सगड़ी (ठेले) और ट्रेक्टर ट्रॉली काम कर रहे थे। मजदूर भी दिख रहे थे। ये महिलायें इस भट्ठे पर नहीं, कटका पड़ाव के पास के भट्ठे पर काम करने जा रही थीं।  कटका पड़ाव के भट्ठे पर पूरे परिवार को मिल कर ठेला खींच सड़क पार कराते देखा था मैने कुछ दिनों पहले। वह दृष्य याद आ गया।

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पूरे इलाके में लगभग हर वर्ग किलोमीटर में एक भट्ठा है। सरकार ने मिट्टी के खनन पर प्रतिबन्ध हटा लिये लगते हैं – तभी हर भट्ठे पर अच्छा उत्पादन होता नजर आ रहा है। सभी की चिमनियां धुआं उगल रही हैं। कच्ची-पकी ईंटों के प्रचुर भण्डर नजर आते हैं। उसी अनुपात में रोजगार भी मिल रहा है। ट्रेक्टर ट्रालियां ईंटे ढोती नजर आती हैं।

मजदूर महिला। प्रसन्नमन।

ईंटें बन रही हैं तो ईंट की खपत भी हो रही होगी।  निर्माण गतिविधियों में भी आसपास ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा होगा। निर्माण गतिविधि जो पहले 8-10 महीने सुस्त थी, अब तेजी पकड़ती नजर आ रही है। यहां नेशनल हाईवे और रेल – दोनों पर बहुत गहमागहमी हैं निर्माण की। उनमें ज्यादातर मजदूर बाहरी नजर आते हैं, पर आसपास बहुत निर्माण स्थानीय मजदूरों से भी हो रहा होगा!

ईंट भट्ठा अभी गंगा दशहरा तक काम करते रहेंगे बरसात के मौसम से पहले। मैं आशा करता हूं कि इन महिलाओं और उनके परिवार को भट्ठे पर और उसके बाद अन्य कामों में सतत रोजगार मिलता रहे।

घर आ कर अपनी पत्नीजी से मैं पूछता हूं – इस तरह बीच सड़क रोक कर मेरे द्वारा प्रश्न करने को किस तरह लेती होंगी वे महिलायें? कोई स्पष्ट का जवाब नहीं मिला।

आपका क्या सोचना है?


 

डेढी और लेवल क्रासिंग की जरूरत


डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी सड़क जो उत्तर में रेलवे लाइन और दक्षिण में गंगा किनारे के गांव द्वारिकापुर के बीच है और जिसके पूर्व में मिर्जापुर, पश्चिम में भदोही जिले के गांव हैं; के बारे में कल मैने बताना शुरू किया था। मेरा विचार है कि इस सड़क के माध्यम से गांव के जीवन की बहुत सी बातें मैं देख/समझ/बता पाऊंगा। इस सड़क पर रोज सवेरे मैं 8-9 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। डेढ़ी के लगभग तीन चक्कर। घर से सात बजे निकलता हूं – उदर में दो कप चाय डाल कर। बटोही (अपनी साइकिल) को एक बोतल पानी थमाता हूं। जस्ट इन केस प्यास लग जाये!

उत्तर छोर पर डेढ़ी रेलवे लाइन के पहले ठिठक कर खत्म हो जाती है। उसके आगे और दांये, बांये रेलवे की जमीन है। डेढ़ी के भगीरथ – परधान लोग अपनी सीमा में ही डेढ़ी के बहाव को तय कर सकते हैं। रेलवे पर जोर नहीं उनका।

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एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर।

एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर। उसे रेल लाइन के उस पार जाना था। मेरे सामने पटरी पार की उसने।DSCN0412

उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

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उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

डेढ़ी के सामने कटका रेलवे स्टेशन का शण्टिंग नेक का छोर दिखता है। अगर स्टेशन की लूप लाइन को चीरता लेवल क्रासिंग इस जगह पर शिफ़्ट कर दिया जाये तो स्टेशन सेक्शन के लेवल क्रासिंग को ब्लॉक सेक्शन में किया जा सकता है। रेलवे यातायात के लिये ज्यादा सुरक्षित विकल्प होगा वह। वर्तमान के लेवल क्रासिंग नम्बर 23 से इस जगह के बीच अपनी जमीन पर लगभग 400 मीटर पतली सड़क जरूर बना कर देनी होगी रेलवे को। और डेढ़ी के ग्रेडियेण्ट (समतल से ऊंचाई) को भी अगर टटोला जाये तो शायद नई जगह पर लेवल क्रासिंग की बजाय रोड-अन्डर-ब्रिज (पुलिया) बनाई जा सके शायद। वह रेलवे की लेवल क्रासिंग खत्म करने की पॉलिसी के अनुरूप होगा। अभी रेलवे लाइन का दोहरीकरण का काम चल रहा है। उस दशा में यह और भी ज्यादा सुरक्षित रेल यातायात का निमित्त होगा। गांव और रेल – दोनो के लिये विन-विन सिचयुयेशन।

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रेलवे फाटक की स्थिति और प्रस्ताव

मैं अगर रेल सेवा में होता तो यह करा पाना मेरे लिये बहुत सरल होता। अब मैं सुझाव भर दे सकता हूं। आसपास के चार-पांच प्रधान लोग, लोकल एमएलए/सांसद यह काम करा सकते हैं। शायद मण्डल रेल प्रबन्धक इसपर ध्यान दे सकें। पर इन सब प्रकार के जीवों के लिये फैज़ की वह नज्म है न! “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।“ मुहब्बत की जगह रेलवे क्रासिंग और डेढ़ी पढ़ें! 😊

लेवल क्रासिंग तो एक मुद्दा है। इसी तरह के अनेक मुद्दे हैं जिनपर मैं चर्चा योग्य सोच रखने लगा हूं।  पर उस सब के क्रियान्वयन को ले कर मन में एक गहन उदासीनता है। यह रिटायर्ड जीवन का सच है। व्यक्ति कर्मक्षेत्र में छलांग नहीं लगाना चाहता। कर्मक्षेत्र जो कमिटमेण्ट मांगता है उसमें आशा/निराशा/हर्ष/खिन्नता/थकान सब कुछ है। उसमें रक्तचाप और व्यग्रता की मात्रा में बढ़ना भी निहित है। वह शायद मैं पुन: नहीं चाहता। बहुत हुआ।

हां, पर डेढ़ी यूंही डेड-एण्ड में खत्म नहीं होनी चाहिये। उसकी तार्किक परिणिति नेशनल हाईवे तक पंहुचने की है। और वहां तक पंहुचने के लिये जरूरी है लेवल क्रॉसिंग या रोड-अण्डर-ब्रिज।

देखें, कौन भगीरथ उसे वहां पंहुचाता है।

गांव में बिजली समस्या का निदान – सोलर ऊर्जा की शरण से


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छत पर लगे 250वाट के आठ सोलर पैनल। पहले चार दो साल पहले लगवाये थे। बाकी अब के हैं।

गांव में शिफ़्ट होते ही मैने 2016 के प्रारम्भ में घर में 1 केवीए का सोलर पैनल लगवा लिया था। पर उसको लगाने के समय यह आकलन किया था कि उस सिस्टम से एक किलोवाट पावर आउटपुट बैटरी को मिलेगा और बैटरी लगभग उतना ही मुझे मेरे काम चलाने के लिये देगी। ऐसा हुआ नहीं। बाद में पता चला कि 250वाट के चार पैनल करीब 600वाट की शक्ति बैटरी को देते हैं। बैटरी लगभग 80% स्टोर की हुई ऊर्जा इनवर्टर के माध्यम से घरेलू उपकरणों को देती है। सो, पैनल लगाने के बाद भी हमारी ग्रामीण विद्युत सप्लाई पर निर्भरता बनी रही।

जब लगभग 10-12 घण्टे बिजली की सप्लाई आती थी, तब पैनल और सप्लाई दोनों को मिला कर सतत बिजली उपलब्धता की जरूरत पूरी कर देते थे। पर गांव में जर्जर सप्लाई नेटवर्क के कारण साल में 10-12 मौके आये जब कई दिनों तक बिजली नहीं आती थी।

एक बार तो बिना बिजली के पूरा हफ़्ता गुजर गया था।

कई दिनों बिजली न आने दशा में सोलर पैनल जरूरी पंखे और लाइट लगभग 18-20 घण्टे ही चला पाते थे। फ्रिज चालू करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। मुझे याद है कि एक बार हमें एण्टी-रेबीज इन्जेक्शन फ़्रीजर में रखने थे और फ़्रिज चालू न होने के कारण आईस बॉक्स का इन्तजाम करना पड़ा था। उसके लिये बर्फ़ का इन्तजाम करना भी एक कठिन काम था। सब्जियां और भोजन अधिक बन जाने और उसके स्टोर न कर पाने को ले कर परिवार में कई बार चिक चिक हुई।

हमारा यह गांव सांसद महोदय ने गोद लिया हुआ है। तथाकथित आदर्श गांव होने के बावजूद भी बिजली की सप्लाई अनियमित है। इसमें बिजली कर्मी भी बहुत कुछ नहीं कर पाते। उनके पास लाइनमैन स्तर के कर्मियों की बहुत किल्लत है और दशकों की रूरल नेटवर्क के प्रति उपेक्षा के कारण हल्के आंधी और बयार से भी सप्लाई अवरोधित हो जाती है। एक बार अवरोधित हुई तो ठीक होने में दिनों लग जाते हैं। प्रान्त में नई सरकार आने के बाद स्थिति कुछ बेहतर हुई, पर अब लगता है कर्मचारी शुरुआती दौर की कर्मठता से उबर चुके हैं। अब वे समझ गये हैं कि नई सरकार में भी कमोबेश उसी “आनन्दमय” दशा में स्थितप्रज्ञ रहा जा सकता है, जिसमें वे पहले जी रहे थे। आखिर कब तक वे कमर कस कर जियें?

अकेले मोदी (या योगी) कितनी तलवार भांजेंगे?! उन्हें कई शॉक ट्रीटमेण्ट करने चाहियें गांव के स्तर पर। बिजली की वायदे अनुसार उपलब्धता एक प्रमुख बिन्दु है।

सभी घटकों पर विचार कर, कुल मिला कर, मुझे बहुत आशा नजर नहीं आई कि अगली गरमी में पर्याप्त बिजली सप्लाई मिलेगी। अंत: मैने घर में एक ऐसा बिजली उपलब्धता का तन्त्र बनाने की सोची जिसमें अनवरत बिजली सप्लाई बाधित होने के दशा में घर के एलईडी के बल्ब, पंखे, वाईफाई, आरओ मशीन, मोबाइल चार्जिंग, लैपटॉप और फ़्रिज सुविधाजनक रूप से चल सकें। केवल गीजर, वाशिंग मशीन और पानी छत की टंकी पर चढ़ाने के लिये बिजली सप्लाई/जेनरेटर की जरूरत हो।

अन्य बड़े खर्चों पर वरीयता देकर हमने दो हफ्ते पहले 250 वाट के चार सोलर पैनल, सोलर पावर चेंजओवर यूनिट और दो बैटरियों का एक सेट और लगवा लिया। इसके लगवाने में दो साल पहले की बजाय कम खर्च हुआ। पैनल की कीमत करीब 25-30% घट गयी है।

इस प्रकार मेरे पास 1-1 किलोवाट के दो सिस्टम हो गये – एक दिन की जरूरतों के लिये और दूसरा रात के लिये। इस सिस्टम की हॉट लाइन चेकिंग भी हो गयी। कल लगभग 30-32 घण्टे तक बिजली की सप्लाई नहीं थी। उस दौरान सभी पंखे और अन्य उपकरण सुचारु रूप से चल गये सोलर सिस्टम पर।

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पहले (दायें) और अब के (बांये) बैटरी/इनवर्टर/पी.सी.यू. सेट। नये सिस्टम में 1कि.वाट के सोलर पैनल और जोड़ने की गुंजाईश है। 

अब लगता है इस साल गर्मी और बरसात के महीनों में बिजली सप्लाई को ले कर हाय हाय नहीं रहेगी। हां, गांव वाले अपने मोबाईल चार्ज करवाने आते रहेंगे। (वैसे गांव में इतनी सोलर लाइट बंट गई हैं कि उसमें जुगाड लगा कर लोग अपने मोबाइल चार्ज करने में दक्ष होते जा रहे हैं।)

देर सबेर सौर ऊर्जा ही शरण देगी गांव देहात को।


 

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