समसाद मियां – अथ सीक्वलोख्यान


हीरालाल नामक चरित्र, जो गंगा के किनारे स्ट्रेटेजिक लोकेशन बना नारियल पकड़ रहे थे, को पढ़ कर श्री सतीश पंचम ने अपने गांव के समसाद मियां का आख्यान ई-मेला है। और हीरालाल के सीक्वल (Sequel) समसाद मियां बहुत ही पठनीय चरित्र हैं। श्री सतीश पंचम की कलम उस चरित से बहुत जस्टिस करती लगती है। आप उन्ही का लिखा आख्यान पढ़ें (और ऐसे सशक्त लेखन के लिये उनके ब्लॉग पर नियमित जायें): 

Hiralal @  हीरालाल की नारियल साधना

– जहां वे खड़े थे, वह बड़ी स्ट्रेटेजिक लोकेशन लगती थी। वहां गंगा के बहाव को एक कोना मिलता था। गंगा की तेज धारा वहां से आगे तट को छोड़ती थी और तट के पास पानी गोल चक्कर सा खाता थम सा जाता था।

– गंगा के पानी में नारियल बह कर आ रहे थे और उस जगह पर धीमे हो जा रहे थे। उस जगह पर नारियल पकड़ कर निकालने में बहुत सहूलियत थी। हम जैसे घणे पढ़े लिखे भी यह स्ट्रेटेजी न सोच पायें।

Shop जीवन रूपी नदी मे  यह स्ट्रैटजी मैंने  शमशाद मियां के द्वारा अपनाते देखा है। मेरे गांव में ही शमशाद मियां ( समसाद) जी रहते थे। तब हम बहुत छोटे थे। उस  समय लहर सी चली थी कि शहर जाकर कमाओ खाओ। न हो तो सउदी चले जाओ। एक तरह का तेज बहाव था उस समय। जिसे देखो वही, गांव छोड कर बहा चला जा रहा था। और मेरे गाँव का जीवन एक तरह से उस थिर पानी की तरह था जिसे और गांवों की तरह अरसे से कोनिया (कॉर्नर कर ) दिया गया था। बिल्कुल गंगा जी के उस कॉर्नर की तरह जहां पानी थम सा जाता था।   गांव में बिजली नहीं, सडक नहीं, दुकान डलिया नहीं।

लेकिन इस बहाव और ठहराव के स्ट्रैटेजिक पोजिशन को समसाद मिंयां जी ने एक अपॉर्चुनिटी की तरह देखा और ठीक उस नारियल की तरह इस अपॉर्चुनिटी को पकड लिया। उन्होने पांच ओच  रूपये की लागत से दुकान शुरू की। शुरूवात में चुटपुटीया चाकलेट जो पांच पैसे में तीन मिलती थी वह बेचे, नल्ली ( तली हुई पाईप प्रोडक्ट) बेचे, और जब कुछ पैसे आ गये तो बंबईया मिठाई ( दस पैसे में एक) बेचे। इसे बंबईया मिठाई शायद पार्ले प्रोडक्ट होने के कारण कहा जाता था( ऑरेन्ज कलर की होती थी वह) ….

धीरे धीरे नमक, रिबन, पिन, टिकुली वगैरह बेचने लगे। सौदा लाने वह मुख्य बाजार अपनी खडखडीया साईकिल से जाते । और टघरते हुए से शाम तक दुकान वापस आ जाते । उनके आने तक समसाद बौ दुकान संभालतीं थी। धीरे धीरे दुकान चल निकली। उनके यहां सौदा, गेहूं, चावल वगैरह के बदले भी मिलता था। एक तरह  की बार्टर सिस्टम है।  ( अब भी गांवो में बच्चे गेहूँ आदि देकर आईस्क्रीम लेते हैं) …..समसाद मियां जी की दुकान इतनी चल निकली कि जब गांव में किसी के यहां कोई नई पतोहू वगैरह समसाद के यहां से टिकुली आदि किसी बच्चे को भेजकर  मंगवाती  तो सास गाली देती कि -  कुल घरे के अनाज उ समसदवा के घरे में  चल जात बा। कोई कोई तो समसाद जी को खुलकर गरियाती कि इही  दहिजरा के नाती के  कारन से  हमरे घर के कुल पईसा निकसा जात बां….कहां तक जांगर ठेठाई….. :)

समसाद जी की यह स्ट्रैटजी मुझे हीरालाल जी की तरह ही लग रही है। पूछने पर समसाद जी खुद कहते कि -  हम दूबई, मरीका ( अमरीका)  एहीं बना देले बाई :)

स्ट्रैटेजिक पोजिशन लेना मैनेजमेंट गुरूओं की ही थाती नहीं, एक गांव-जवार के किसान इंसान में भी होती है, यह हीरालाल और समसाद मिंया को देखकर समझा जा सकता है। गांव छोड कर तेज बहाव के साथ बाहर जाने वाले लोगो और ठहरे हुए गांव के बीच स्ट्रैटेजिक पोजिशन लेने वाले  समसाद मिंया तो अब रहे नहीं, लेकिन दोतल्ला मकान उनकी स्ट्रैटजी को पुख्ता बता रहा है।

Satish

सतीश पंचम 

Village


श्री इष्टदेव सांकृत्यायन जी ने अपने कम्यूनिटी ब्लॉग इयत्ता-प्रकृति पर लिखने का निमंत्रण दिया। यह ब्लॉग उन्होने पर्यावरणीय मुद्दों को ले कर बनाया है। और उसपर पोस्ट ठेलने में मुझे आधा घण्टा लगा। घर में रात के भोजन की प्रतीक्षा करते यह पोस्ट निकल आयी!


गंगा सफाई – प्रचारतन्त्र की जरूरत


DSC01908 (Small) पिछली बार की तरह इस रविवार को भी बीस-बाइस लोग जुटे शिवकुटी घाट के सफाई कार्यक्रम में। इस बार अधिक व्यवस्थित कार्यक्रम हुआ। एक गढ्ढे में प्लास्टिक और अन्य कचरा डाल कर रेत से ढंका गया – आग लगाने की जरूरत उचित नहीं समझी गई। मिट्टी की मूर्तियां और पॉलीथीन की पन्नियां पुन: श्रद्धालु लोग उतने ही जोश में घाट पर फैंक गये थे। वह सब बीना और ठिकाने लगाया गया।

घाट में वृद्धों को नहाने में कठिनाई होती है – चूंकि गंगाजी की धारा इसी घाट पर कटान कर रही है। घाट काफी ऊर्ध्व हो गया है। उसे सीढ़ियां बना कर सही शक्ल दी गयी। कुछ बोरियों की जरूरत है, जिनमें बालू भर कर किनारे जमा किया जाये – कटान रोकने को। वह शायद अगले सप्ताहांत में हो।

घाट आने के रास्ते में भी एक उतराई है। उसपर भी सीढ़ियों के रूप में मिट्टी काटी गयी। उस मिट्टी में बालू कम, कंकर – पत्थर ज्यादा थे। लिहाजा फावड़े से खोदने में बहुत मेहनत लगी। तीन नौजवान – पंकज सिंह, नरेन्द्र मिश्र और चन्द्रकान्त त्रिपाठी ने बहुत मेहनत की। एक और त्रिपाठी जी भी हैं – जिनका नाम मैं नहीं पूछ पाया। वे भी जोर शोर से लगे थे। आद्याप्रसाद पाण्डेय तो मुख्य संयोजक के रूप में थे ही!

इस बार बालकगण अधिक थे और अधिक उत्साही थे। घूम घूम कर पन्नियां और मूर्तियां बटोरने में बहुत काम किया। एक युधिष्ठिर का कुकुर भी बराबर साथ लगा रहा।

कुछ सज्जन यूंही आये गये जा रहे थे और सीढ़ियां बनाने में व्यर्थ व्यवधान बन रहे थे। उनको जब मैने कड़ी जबान से अलग रास्ते से आने जाने को कहा तो वे ऐसे देखने लगे कि मैं उनके मौलिक अधिकारों में अतिक्रमण कर रहा होऊं!

निश्चय ही बेहतर काम हुआ इस बार।

मुझे व्यक्तिगत रूप में प्रचारतन्त्र से मोह नहीं है। पर लगता है कि लोगों और बच्चों का जोश बनाये रखने को वह चाहिये जरूर और पर्याप्त मात्रा में भी। जन जन को जोड़ने और सामुहिक काम करानें में जो प्रतिभा की दरकार होती है, वह मुझमें ईश्वरप्रदत्त नहीं है, लिहाजा मैं सहायता की आशा ही कर सकता हूं। मैं राजीव और मीडिया से जुड़े लोगों का आवाहन अवश्य करता हूं कि इस को यथासम्भव प्रचार दें। ब्लॉगर्स भी यह बखूबी कर सकते हैं। इस काम के लिये इस पोस्ट की कोई भी तस्वीर आप मुक्त हस्त से प्रयोग करें!

अगले रविवार देखते हैं क्या और कितना काम होता है। गैंती, खुरपी और बोरियों की जरूरत तो महसूस की ही जा रही है। व्यक्ति भी और जुड़ेंगे या नहीं – कहा नहीं जा सकता। इस बार अपेक्षा थी कि कुछ स्त्रियां जुड़ेंगी, पर मेरी पत्नीजी के अलावा अन्य कोई नहीं आईं।   

http://picasaweb.google.com/s/c/bin/slideshow.swf (आप कहेंगे मेरी थकान का क्या हुआ? वह याद ही न रही! :-) )


थकोहम्


मुझे अन्देशा था कि कोई न कोई कहेगा कि गंगा विषयक पोस्ट लिखना एकांगी हो गया है। मेरी पत्नीजी तो बहुत पहले कह चुकी थीं। पर कालान्तर में उन्हे शायद ठीक लगने लगा। अभी घोस्ट बस्टर जी ने कहा –

लेकिन थोड़े झिझकते हुए कहना चाहूंगा कि मामला थोड़ा प्रेडिक्टेबल होता जा रहा है. ब्लॉग पोस्ट्स में विविधता और सरप्राइज़ एलीमेंट की कुछ कमी महसूस कर रहा हूं।

एक तरह से सोचूं तो मुझे प्रसन्नता से उछल जाना चाहिये। घोस्ट बस्टर जी मुझसे वैविध्य और अन-प्रेडिक्टेबिलिटी की अपेक्षा करते हैं। पोस्ट दर पोस्ट सुन्दर और वाह वाह ब्राण्ड टिप्पणी टिपेरना नहीं चाहते! पर 28 BMI (बॉड़ी मास इण्डेक्स) की काया में सेनसेक्सात्मक उछाल आना बहुत कठिन है। शरीर में ट्विचिंग (नस फड़कन) हो कर ही रह जाती है! न लहर उठती है न कोई उछाल आता है। काम का बोझ, थकान और कुछ सार्थक न हासिल हो पाने की सोच – यह सब खदबदाने लगते हैं मन में।

Thakoham1 स्टेलनेस मेरा ही यू.एस.पी. हो, ऐसा नहीं है। आप कई ब्लॉगों पर चक्कर मार आईये। बहुत जगह आपको स्टेलनेस (स्टेनलेस से कन्फ्यूज न करें) स्टील मिलेगा| लोग गिने चुने लेक्सिकॉन/चित्र/विचार को ठेल^ठेल (ठेल घात ठेल) कर आउटस्टेण्डिंग लिखे जा रहे हैं।

सरकारी डेमी ऑफीशियल लैटर लिखने की स्टाइल में ब्लॉग साहित्य सर्जन हो रहा है। कविता भी बहुत जगहों पर प्रोडक्शन की असेम्बली लाइन से निकलता फिनिश्ड प्रॉडक्ट है। जब आप पोस्ट ठेलोन्मुख होते हैं तो हर ड्राफ्ट बिना पालिश किये पोस्ट में तब्दील हो जाता है।

असल में हम लोग बहुत ऑब्जर्व नहीं कर रहे, बहुत पढ़ नहीं रहे। बहुत सृजन नहीं कर रहे। टिप्पणियों की वाहियात वाहावाहियत में गोते लगा रिफ्रेश भर हो रहे हैं!

गंगाजी, अपने किनारों में सिमटिये। सनिचरा, हीरालाल, अवधेश, निषादघाट, माल्या प्वॉइण्ट… बिलाओ सवेरे की धुन्ध में। इन सब पर पोस्ट बनाने में अच्छा लगता है, पर मानसिक हलचल में क्या यही भर होता है/होना चाहिये? नहीं। और घोस्ट बस्टर जी शायद वही इशारा कर रहे हैं।

भरतलाल, जरा गरदन पर फास्ट रिलीफ लगा मालिश करना। और अगर नीद आ जाये तो मैडम रीता पाण्डेय, नियंत्रण कक्ष से फोन आने पर मुझे जगाना मत – जब तक कि रेल यातायात का ट्रंक रूट अवरुद्ध न हो रहा हो किसी अन-यूजुअल से।

बहुत बैडली थकोहम् (बहुत जबरदस्त थका हूं मैं)! ब्लॉग पोस्ट की ऐसी तैसी!


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