ढेरों कैम्प, ढेरों रूहें और बर्बरीक


बर्बरीक फिर मौजूद था. वह नहीं, केवल उसका सिर. सिर एक पहाड़ी पर बैठा सामने के मैदान पर चौकस नजर रखे था.

ढेरों रूहों के शरणार्थी कैम्प, ढेरों रूहें/प्रेत/पिशाच, यातना/शोक/नैराश्य/वैराग्य/क्षोभ, मानवता के दमन और इंसानियत की ऊंचाइयों की पराकाष्ठा सब का स्थान और समय के विस्तार में बहुत बड़ा कैनवास सामने था. हर धर्म-जाति-वर्ग; आदिमानव से लेकर आज तक के आतंकवादी और निरीह मानवों की रूहों का प्रतिनिधित्व था उस मैदान में. बर्बरीक सब देख रहा था जैसे उसने महाभारत को देखा था.

बर्बरीक साक्षी था. बर्बरीक दृष्टा था समय और स्थान के अनंत से अनंत तक के विस्तार का. वह सत्य बता सकता था कि क्या हुआ और क्या हो रहा है. पर सब अपने में मशगूल थे. मायें बच्चों से मिल रही थीं. आतंकी रूहें अट्टहास करती घूम रही थीं. काइंया नेताओं के प्रेत शकुनि की तरह चालें सोच रहे थे. पर वहां किसी की कुटिलता से किसी और को फर्क नहीं पड़ रहा था वे सब रूहें जो थीं.

Barbareek is a mythological character in Mahabharata. He was the son of Ghatotkacha and grandson of Bhima. He wanted to participate in Mahabharata from the weaker side. Lord Krishna sensing that he was too powerful, removed him from the fight tactfully. He asked Barbareek his head in charity. Barbareek complied.

Krishna was pleased with the sacrifice and blessed him so that he could watch the whole battle from the hillock, where his head was placed.

The Talking Head (Barbareek) is a symbol for a less confined, more global perspective. All of us see the world, wars and annihilation limited by our prejudices, our experiences and expectations. And when Barbareek voices his opinions, we see it quite differently. When he speaks, we realize the Pandavas and Kauravas are tiny elements of a God’s greater canvas. The Mahabharata is not just about one kingdom, it is about cosmic order…

अच्छी और बुरी रूहें अलग अलग मशगूल थीं पर एक जगह उनमें वार्तालाप हो ही गया. बोस्निया की एक मां और चेचेन्या के एक आतंकी में दुआ-सलाम हो गयी. दोनो में एक सूत्र तो मिला कि दोने एक ही इलाके के थे. दोनो में बात चली कि कौन जीता इस हत्या और बर्बरता के खेल में. पास ही एक भारतीय भी खड़ा था. महाभारत काल का प्रेत. उसे अभी तक मुक्ति न मिल पायी थी. दोनो को सुन कर बोला कौन जीता? यह तो बर्बरीक ही बता सकता है. वह तो मेरे जमाने से दृष्टा रहा है सभी युद्धों, आतंकों, हत्याओं और त्रासदियों का. उसी से पूछो.

बोस्निया की मां और चेचेन्या का आतंकी बर्बरीक के पास गये. सवाल किया. दोनो को देख बर्बरीक का सिर हंसा वैसे ही जैसे महाभारत काल में हंसा था. फिर बोला एक ही छाया थी, हर जगह. इस ओर भी; उस ओर भी. जो मार रही थी और मर रही थी. वही तलवार बन रही थी और वही ढ़ाल भी बना रही थी. वही बच्चे को दूध पिलाने को आतुर थी और वही कोख फाड़ कर अजन्मे के दो टुकड़े भी कर रही थी.

फिर कुछ रुक कर बर्बरीक ने कहा जीतने और हारने का कोई मतलब ही नहीं है. वही एक छाया है जो हार भी रही है, जीत भी रही है और हार-जीत के परे भी है.

बर्बरीक ने दोनो को इस प्रकार देखा मानो कह रहा हो यह समझने के लिये उसकी तरह लम्बे समय तक देखते रहना पड़ता है.

अफसरी के ठाठ और आचरण नियमों की फांस


कल मैने अपनी मजबूरी व्यक्त की थी कि मै‍ ब्लॉग पर एक सीमा तक लिख सकता हूं, उसके आगे बोलने के लिये मुझे अपने रिटायरमेण्ट तक रुकना पड़ेगा. बहुत से लोगों ने टिप्पणियों में कहा कि वे मेरे डिस्क्लोजर के लिये मेरे रिटायरमेण्ट का इंतजार नहीं कर सकते. वैसे मुझे कोई मुगालता नहीं है – मेरी पोस्ट की शेल्फ-लाइफ लोगों की याददाश्त में कुछ दिन भर है – एक सप्ताह भी नहीं होगी!

प्रारम्भ आलोक पुराणिक जी ने किया. मेरे लटकाने को टीटीई का लटकाने के समतुल्य माना. टीटीई तो शायद कुछ और कंसीडरेशन से (जिस कंसीडरेशन की शिकायतें मैं नौकरी के प्रारम्भ से डील करता आया हूं और जो कन्सीडरेशन जनता सहर्ष करने को तत्पर होती है!) लटकाना समाप्त कर आपको यह अनुभूति करा देता हो :

सकल पदारथ हैं जग माहीं; बिन हेर-फेर नर पावत नाहीं.

पर मेरे पास वह कंसीडरेशन नहीं है. मैं सरकारी नौकरी के आचरण नियमों और व्यक्तिगत नैतिकता से बंधा हूं. पुराणिक जी ने मेरी पोस्ट पर एक जगह टिपेरा था कि उनकी लम्बी टिप्पणी बराबर लेख के उन्हे 2000 रुपये मिलते हैं. मेरे थोड़े से घटिया लेखन के अगर 1000 रुपये प्रति लेख भी मिलें तो मै इस नौकरी को बेहिचक छोड़ कर लेखन प्रारम्भ कर सकता हूं. और तब कई लोगों की कई बखिया उधेड़ कर कई चिन्दियां सिल सकूंगा. वर्ना अभी तो यह दशा है कि लिखे का 30% तो मन मार कर रोक लेना पड़ता है; कहीं सरकारी आचरण नियम का उल्लंघन न हो जाये!

The Conduct Rules which exist, need to undergo change as more and more accessibility to Internet as form of expression is available to people in general and Government Officials in particular. The personal diaries which we maintain are going to be increasingly on the net in which people can peep into. And there shall be progressive tendency in the Officials to speak out.
I think, in the years to come; some changes will do take place. Right To Information Act has started playing some role in opening up. Though initial Officials’ reaction is to cover-up.
With society opening up, salaries improving, corruption going down and privatisation/globalisation making headway; we are going to be in new set of working equations.

मसिजीवी जी ने बेनाम लेखन का ऑप्शन सुझाया है. बड़ा सीधा सा है. पर पेंच यही है कि भारत ने एक बुढ़ऊ पैदा किये थे, जिनका पोता अभी गुजरा है. उनका कहना था कि आप कम्पार्टमेंटलाइज्ड जीवन नहीं जी सकते. छ्द्म और बेबाक एक साथ नहीं हो सकते. उन बुढ़ऊ से ड़र लगता है क्योकि उस बुढ़ऊ की आवाज अपने अन्दर की आवाज है जिसे फ़ेस करना एक चैलेन्ज होता है. इसीलिये मैने अपने ब्लॉग को सेल्फ-एडवर्टाइजमेण्ट की सीमा तक खुला रखा है. उसमें अगर विरोधाभास हैं तो वे मेरे व्यक्तित्व के छेद हैं. जो मेरे सोच की गरीबी और फटेहाली बयान करते हैं. बेनाम लेखन से वह फटेहाली आसानी से छिप सकती है. और इंटेलेक्चुअल पाइरेसी कर तो बड़े मजे से अपने को बुद्धिजीवियों की कतार में लाया जा सकता है. मगर अंतत: क्या होगा सब ठाठ पड़ा रह जायेगा जब लाद चलेगा बंजारा.

मुझे हिन्दी लिखने का तात्कालिक जुनून अवश्य है पर रामकृष्ण परमहंस की दशा नहीं है कि कैवल्य प्राप्ति हो गयी हो और हांक लगा रहा होऊं कि आओ सुपात्रों मेरा रहस्य शेयर करो!

जो कुछ सरकारी नौकरी के कारण नहीं बोल सकता वह मानवों के छुद्र स्वभाव, साम्प्रदायिकता से निपटने का नीतिशास्त्र, राजनैतिक दखलन्दाजी और सरकारी नीतिगत मामलों से सम्बन्धित हैं. उनका क्या किया जाये? वे रहेंगे ही. अन्यथा मेरे लेखन से जीवनयापन भर को मिले तो नौकरी (नौकरी का सरकारी ताम-झाम छोड़ना बहुतों को रुलाई ला देता है!) छोड़ आलोक पुराणिक से जुगलबन्दी सहर्ष की जा सकती है!
(दोनो महानुभावों की फोटो उन्ही के ब्लॉग से उखाड़ी हैं. वहां फिर जम आयी होंगी. फिरभी, अगर उन्हे आपत्ति हो तो मैं वापस कर दूंगा.)

बहुत अच्छा कहा खालिद मसूद जी!


पाकिस्तान में श्री खालिद मसूद, चेयरमैन, काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडिय़ॉलाजी ने कहा है कि हड़पी जमीन पर बनाये गये मदरसे और मस्जिदें शरीया के खिलाफ़ हैं. वहां की गयी प्रार्थना स्वीकार नहीं की जायेगी. कितने नेक विचार हैं. भारत में हर नुक्कड़-गली में हनुमान जी के मन्दिर, शिवजी की पिण्डी, पीर बाबा की मज़ार सार्वजनिक स्थल के अतिक्रमण के टाइम टेस्टेड फार्मूला हैं. अगर यहां भी देवबन्द वाले और वीएचपी वाले कह दें कि सार्वजनिक स्थल का अतिक्रमण कर बनाया धर्म स्थल खुदा/भगवान जी को स्वीकार्य नहीं होगा और वहां की गयी इबादत/पूजा केवल कुफ/आसुरिक होगी तो यातायात और रिहायश की धर्मनिरपेक्ष और बड़ी समस्यायें हल हो जाये!

The news item in Expressindia quoted in above Hyper Link:
‘Mosques on encroached land un-Islamic’
Islamabad, June 15: A top Islamic organisation in Pakistan has said mosques and madrassas, including Jamia Hafsa that has been involved in a stand-off with the government over its attempt to forcefully implement Sharia, built on encroached land were considered illegal in Islam and ‘prayers offered there would not be accepted’.
Khalid Masud, Chairman of the Council of Islamic Ideology (CII), said all mosques and madrassas (seminaries), including Jamia Hafsa, built on encroached land were un-Islamic, and ‘prayers offered there are not accepted’.

हनुमान जी शरीफ से देवता हैं. किसी कोने में टिका दो – बेचारे स्थापित हो कर वरदान बांटने लगते हैं. शिव लिंग और उसके ऊपर मटकी से गिरता पानी जुंये भरे बालों वाले गंजेडियों की पनाह/अड्डा बन जाता है. पीर बाबा की मजार पर चादर चढ़ने लगती है. लोबान जलने लगता है. अजीबो-गरीब पोशाक में एक बन्दा मुरछल घुमाते हुये लोगों को अभुआ कर (हिस्टिरिकल बना कर) जिन्न उतारने लगता है. इस प्रक्रिया में जमीन का बेशकीमती टुकड़ा दब जाता है धार्मिक उन्माद की भेंट!
यहां भारत में भी एक नेक खालिद मसूद की दरकार है – और उनके हिन्दू क्लोन की भी!

मैं आपको अपना अनुभव सुनाता हूं.
स्टेशन के सामने व्यापक मॉडीफिकेशन हो रहा था. तोड़-फोड़ करने में एक मजार निकल आई और एक हनुमान जी का मन्दिर. मजार कोने पर थी. पड़ी भी रहती तो हम अपना प्लान बदल कर काम चला सकते थे. पर हनुमान जी तो बीच सड़क में आ रहे थे. लिहाजा मेरे जिम्मे काम आया कि मैं दोनो समुदायों से समझौता वार्ता कर समाधान निकालूं. मैं जब मौके पर पंहुचा तो मेरे आने का समाचार सुन हनुमान चालिसा का पाठ माइक पर तेज हो गया. पहले मैं मजार के पास गया तो एक बन्दा वज्रासन जैसी मुद्रा में झूम-झूम कर कपड़े में लिपटी किसी किताब को खोल कर उसमें से पढ़ने लगा. मैं जितना नजदीक पंहुचा, उसका धड़ और ज्यादा स्विंग करने लगा. अनेक मुसलमान मजार पर आते-जाते नजर आ रहे थे. एक आदमी मेरे पास आ कर पीर बाबा का विवरण देने लगा तो मेरे साथ का स्टेशन मैनेजर बुदबुदाया – “पिछले दस साल से यहां हूं मै. अबतक तो मेरे घर की चार दीवारी में यह कब्र थी. पहले बताते थे कि अंग्रेज स्टेशन मास्टर की रखैल की है, और अब तोड़ने की बारी आयी तो पीर बाबा की हो गयी! आजतक किसी ने दिया तक नहीं जलाया और अब भीड़ चली आ रही है!”
हनुमान जी के पास तो और बड़ा नाटक था. ज्यादा से ज्यादा जमीन घेरने को बड़ी कनात लगा कर श्रद्धालु जै – श्रीराम की अनवरत नारे बाजी कर रहे थे. कुछ लोग तो रिपीटेड हनुमान चालिसा पढ़ रहे थे. दृष्य ऐसा था कि हनुमान जी तो क्या, उनकी पूंछ भी नहीं सरकाई जा सकती थी.
हिन्दू और मुसलमान – दोनो में गजब का उन्माद और गजब की श्रद्धा थी. यह श्रद्धा एक दूसरे समाज पर प्वाइण्ट स्कोर करने, मौके की जमीन दबाने और आने वाले चुनाव के लिये मुद्दा क्रियेट करने के लिये थी.
आगे का नेगोशियेशन कैसे चला वह मैं ही जानता हूं. दस साल बाद, अगर रिटायर होने पर ब्लॉगरी करता रहा तो बताऊंगा.

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