कंटिया भाग दो: कंटिये में तो हम ही फंस गये हैं.


कल की पोस्ट पर एक दूसरे मिसिर जी ने जो गुगली फैंकी; उससे लगता है कि कंटिये में हम खुद फंस गये हैं. छोटे भाई शिव कुमार मिश्र ने जो रोमनागरी में टिप्पणी दी है पहले मैं उसे देवनागरी में प्रस्तुत कर दूं:

सिस्टम भ्रष्ट है…

और तब तक रहेगा जब तक मिसिराइन अपने को सिस्टम का हिस्सा नहीं मानतीं…. पूरी समस्या यहीं से शुरू होती है कि तथाकथित समाज खुद को सिस्टम का हिस्सा नहीं मानता. हमारे लिये सिस्टम में नेता, सरकारी अफसर, पुलीसवाले और कानून वाले ही हैं… बड़ा आसान है सिस्टम को गाली देना.

सरकारी अफसर अगर घूसखोरी में लिप्त न रहे तो उसके घर वाले उसे कोसते हैं. अगर अपने किसी रिश्तेदार को (जो निकम्मा है) सिफारिश कर के नौकरी न लगवा दे तो कोई उस अफसर से बात नहीं करता. रिश्तेदार यही कहते मिलेंगे कि कुछ नहीं है इस अफसर में आज तक किसी का भला नहीं किया.

भ्रष्टाचार के सबके अपने-अपने खण्ड-द्वीप हैं, और सब अपने द्वीप पर सुख से रहना चाहते हैं…

भ्रष्ट कहने को उंगली जब हम किसी की तरफ उठाते हैं तो पंजे की तीन उंगलियां हमारी तरफ फेस करती हैं. हमारी पिछली पोस्ट की मिसिराइन सिस्टम का अंग हैं इसमें मुझे शक नहीं है. आम आदमी (अगर कोई आम आदमी है तो) जब अपनी सुविधा चाहता है तो भ्रष्टाचार पर चिंतन नहीं करता. जब वह भ्रष्टाचार पर चिंतन करता है तो उसे नेता, सरकारी अफसर, पुलीसवाले और कानून वाले जो भी उससे अलग हैं; ही नजर आते हैं.

पर छोटे भाई शिव कुमार मिश्र ने सरकारी अफसर के घूस खोर न होने की दशा वाली जो बात कही है, उसने मुझे सोचने पर बाध्य किया है. अगर हम (सरकरी अफसर) भ्रष्ट हैं तो फिर कुछ कहने को बचता ही नहीं. पर अगर नहीं हैं; तो चार चीजें हैं

  1. हम चुगद हैं. ईमानदारी के प्रतिमान बुन कर उसमें कैकून की तरह फंसे हैं.
  2. हम लल्लू हैं. भ्रष्ट होने को भी कलेजा और कला चाहिये. ईमानदार हैं तो इसलिये कि कायर हैं.
  3. हम आदर्शवादी शहीद हैं. अपने चुनाव से भ्रष्टता को नहीं अपनाते. फिर भी उसमें अपने को अलग दिखाने का भाव तो होता है. मेरी कमीज दूसरे से सफेद है यह अहसास हमेशा पाले रहना चाहते हैं.
  4. हम जो हैं, सो हैं. दुनियां में हमारे लिये भी स्पेस है. अपनी तृष्णाओं पर हल्की सी लगाम लगा कर जिन्दगी मजे से काट जायेंगे.

अब काफी समय तक अपने बारे में चिंतन चलेगा. कटिये में फंसे रहेंगे. पत्नी को भी परेशान करते रहेंगे; पूछ-पूछ कर कि हम चुगद हैं, लल्लू हैं, शहीद हैं या जो हैं सो हैं. मजे की बात है कि प्राइमा फेसी, पत्नी जी हमें ये चारों बता रही हैं.

अपने खण्ड द्वीप पर मजे में रहने में भी बाधक है यह सोच.

कटिया फंसाने को सामाजिक स्वीकृति है यहां


मिसिराइन (कल्पित नाम; फिर भी सभी मिसिर-मिसिराइन जी से क्षमा याचना सहित) हफ्ते भर से फड़फड़ी खा रही थीं. बिजली वाले से किसी बात पर तनी तना हो गयी थी और वह इलेक्ट्रानिक मीटर लगा गया था. मीटर फर्र-फर्र चल रहा था और मिसिराइन का दिल डूबा जा रहा था. वो जिस-तिस से समस्या का समाधान पूछ रही थीं.

मिसिराइन गली (मुहल्ला नहीं लिखूंगा, वह ब्लॉगिंग में एक जमात का नाम है) की लीडर हैं. चुनाव का बखत है. वैसे भी बहुत काम हैं उनको. पार्टी का गली में का प्रचार उनके जिम्मे है. गलत मौके पर यह मीटर पुराण हो गया. अच्छी भली जिन्दगी में यह फच्चर फंस गया. मीटर था कि एक दिन में 14 यूनिट चल रहा था. पहले 4-5 सौ रुपये का बिल आता था; अब दो हजार महीने की चपत पड़ने वाली थी…

आज अचानक रास्ते में दिख गयीं मिसिराइन.उनसे नमस्ते कर आगे चलने पर मैने पत्नी से पूछा क्या समाधान निकला मिसिराइन के मीटर का. पत्नी ने बताया कि सिम्पल सा समाधान निकला. मीटर 4-5 सौ रुपये का चलेगा. बाकी काम एक महीने कटिया फंसा कर होगा. उसके बाद मीटर खराब हो जायेगा बिजली वाले से सेट हो गया है. फिर पुराने मीटर रीडिंग के अनुसार बिल आया करेगा.

राम-राम; कटिया फंसाना क्या उचित है? मैने पूछा.

“इसमें क्या है? बहुत लोग ऐसा कर रहे हैं.” पत्नी ने जवाब दिया.

कुछ अटपटा लगा. मैं सोचता था कि गरीब लोग; जिनके पास अथराइज्ड कनेक्शन नहीं हैं वे ही कटिया फंसाते हैं. पर यहां तो सभ्य-सम्पन्न-आदर्श बघारने वाला मध्यवर्ग यह कर रहा है. कटिया फंसाने को सामाजिक स्वीकृति है। ज्यादा कुरेदा जाये तो उसका सैद्धांतिक तर्क भी सामने आ सकता है।

रेलवे के बंगले में रहते यह सब देखने को नहीं मिला था. अब पिताजी के मकान में रहने पर समाज के विभिन्न रंग देखने को मिल रहे हैं. इसे लेकर अपने को (अनुभव के लिये) भाग्यशाली मानूं, या जीवन के पचड़ों से साक्षात्कार होने पर क्षुब्ध महसूस करूं समझ में नहीं आता. खैर, देर सबेर अपने देश-समाज में लौटना ही था. अब नहीं तो अगले दशक में लौटता….

अगले दशक में कटिया रहेगा या नहीं? कटिया न भी रहे समाज में मुफ्तखोरी और सबसिडी की जो लत लग गयी है वह क्या एक दशक में चली जायेगी? शायद नहीं।

यह तो देखना ही था।

ये अखबार की कतरनें क्यों बटोरते हैं लोग?


अखबार में हिन्दी ब्लागिंग के बारे में छप जाये तो सनसनी छा जाती है. नोटपैड एक दिन पहले बताता है कि कल कुछ छ्पने वाला है. अपनी प्रति सुरक्षित करा लें. एक और जगह से विलाप आता है कि अरे हमारे यहां तो फलां पेपर आता नहीं भैया, स्कैन कर एक पोस्ट छाप देना. जिसने अखबार देख लिया, वह दौड़ लगाता है – स्कैन कर पहले छाप देने के लिये. एक और सज्जन कहते हैं कि वे जा रहे हैं देखने कि अखबार के लोकल एडीशन में कवरेज है या नहीं.

यह अखबार-मेनिया कब जायेगा?

हिंदी अखबार, मेरे आकलन में, अपनी साख बहुत कुछ खो चुके हैं. समाज का भला करने की दशा में वे नहीं रहे. दशा क्या बदलेंगे उनके पास दिशा ही नहीं है. कोई अखबार खोल लें; कितनी ओरिजनालिटी है उनमें? ज्यादातर तो थाने की क्राइम फाइल और सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों पर जिन्दा हैं. बाकी पी टी आई की खबर पर फोंट/फोटो बदल कर अपना लेबल चस्पां करते हैं. अखबार के मालिक बेहतर लेखन की बजाय बेहतर विज्ञापन की तलाश में रहते हैं.

चिठेरा अपने आंख-कान-दिमाग से कहीं बेहतर खबर या लेख पोस्ट कर सकता है. उसके पास अगर एक-दो मेगा पिक्सेल का कैमरा हो तो फिर कमाल हो सकता है.

हो सकता है कि आज मेरा कथन थोड़ा अटपटा लगे जब हिन्दी के चिठेरे हजार-पांच सौ भर हैं. पर यह संख्या तेजी से बढ़ेगी. ज्योमेट्रिकल नहीं एक्स्पोनेंशियल बढेगी. परसों मैने देख कि मेरा सहायक भी ब्लॉग बनाने लग गया है. चलता पुर्जा जीव है खबरों का पिटारा है. जवान है. वैसी ही सोच है. ऐसे ही लोग बढ़ेंगे.

मेरे विचार से आने वाला लेखन चिठेरों का लेखन होगा. गूगल या अन्य न्यूज-ब्लॉग समेटक (Aggregator) व्यक्तिगत रुचि के अनुसार नेट पर समाचार, एडिटोरियल और विज्ञापन परोसेंगे. फिर (अगर अखबार जिन्दा रहे तो) फलां अखबार फख्र से कहेगा कि फलां धाकड़ चिठेरे ने उसके लिये ये शुभाशीष कहे हैं.

चिठेरों भावी इतिहास तुम्हारा है!

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