मॉथ मनोवृत्ति वाला प्रबन्धन



मै‍, अपनी दैनिक ड्यूटी के तहद अपने महाप्रबन्धक महोदय के पास सवेरे साढ़े दस बजे जाता हूं। वहां रोज की मालगाड़ी परिवहन पर रिव्यू होता है और कुछ सामान्य बातचीत।


शुक्रवार को मैने चलते चलते कहा – “हम आज लदान के लिये एक बीटीपीएन रेक (नेफ्था/पेट्रोल/डीजल के लदान के ४८ टैंक वैगन की मालगाड़ी) बढ़ाने का जोर लगा सकते थे, अगर उसके रेक का परीक्षण (अगले १५ दिन के लिये प्रभावी होने के लिये) गहन तरीके से कराने की बजाय एक ट्रिप के लिये करा लेते। वह किया नहीं। पर आपका विचार क्या है, इस विषय में?”


श्री विवेक सहाय, महाप्रबंधक, उत्तर-मध्य रेलवे मेरे रेल नौकरी प्रारम्भ करने के समय से मेरे अधिकारी रहे हैं – विभिन्न समय पर और विभिन्न केपेसिटी में। लिहाजा मैं उनसे इस प्रकार की लिबर्टी ले पाया।


उन्होने कहा – “ऐसा बिल्कुल नहीं होना चहिये। यह तो ऐसा मैनेजमेण्ट होगा जैसा कोई मॉथ (moth – nocturnal butterfly like insect) करेगा”।


मैं समझ न पाया। मैने जोड़ा – “शुतुरमुर्ग जैसा एटीट्यूड?” उन्होने कहा – “नहीं मॉथ जैसा। मॉथ की जिन्दगी जरा सी होती है। वह मैनेज करेगा तो उतनी अवधि को ध्यान मे‍ रख कर करेगा”।


जरा सोचें – कितना काम हम मॉथ की प्रवृत्ति से करते हैं! करमघसेटा काम। आज का धक्का लग जाये, बस। जियेंगे भूत और भविष्य की चिन्ताओं में, पर आज के काम में मॉथ की वृत्ति दिखायेंगे। इलियाहू एम गोल्दरेत्त अपनी पुस्तक “द गोल” में इसे नाम देते हैं लोकल ऑप्टीमा को चेज करना। अपने लक्ष्य में संस्थान के समग्र, दूरगामी लक्ष्य की बजाय अपने या अपने विभागीय छोटे सब-ऑप्टीमल गोल को चेज करना – यह हमारे चरित्र का अंग बन गया है।


येन-केन-प्रकरेण काम हो जाये। परीक्षा में पास होना है तो लास्ट मिनट रट्टा लगा लिया जाये। और नैतिकता आड़े न आती हो तो नकल मार कर काम चला लिया जाये। बाग कोई नहीं लगाना चाहता। फल सबको चाहिये।


मुझे बहुत जमा “मॉथ-मैनेजमेण्ट” का नामकरण!


फुट रेस्ट न होना असुरक्षा का कारण



मैने कही‍ पढ़ा था कि लेनिन असुरक्षित महसूस करते थे – उनके पैर छोटे थे और कुर्सी पर बैठने पर जमीन पर नहीं‍ आते थे। मेरा भी वैसा ही हाल है। छोटे कद का होने के कारण मुझे एक फुट रेस्ट की जरूरत महसूस होती है। घर मे‍ यह जरूरत मेज के नीचे उपलब्ध एक आड़ी लकड़ी की पट्टी से पूरी हो जाती है। और घर मे‍ तो पैर मोड़ कर कुर्सी पर पालथी मार कर भी बैठ जाता हूं।

दफ्तर मे‍ मेरी पिछली पोस्ट वाले कमरे मे‍ एक फुट-रेस्ट था। नये पद वाले कमरे में नहीं है। मेरे से पहले वाले सज्जन को जरूरत नहीं थी। उनके पैर लम्बे थे। जरूरत मुझे भी न होती अगर कुर्सी की ऊंचाई एडजेस्टेबल होती। कुर्सी एडजेस्टेबल हो तो आप उस कुर्सी की अपेक्षायें भी एडजेस्ट कर सकते हैं!

कुर्सी की ऊंचाई कम नहीं कर पा रहा, सो, मैं भी एक तरह की अन-इजीनेस महसूस करता हूं। अकेला होने पर पैर मेज पर रख कर बैठने का मन करता है – जो रीढ़ के लिये सही नहीं है। मजे की बात है कि दफ्तर की आपाधापी में कभी याद नहीं आता कि एक फुट रेस्ट का ऑर्डर दे दिया जाये।

आज घर पर हूं तो सोच ले रहा हूं। नोट बुक में लिख भी लेता हूं। एक फुट-रेस्ट बनवाना है। मुझे लेनिन नहीं बनना है!
(कभी-कभी बुद्धिमान ब्लॉगरों की तरह गोल-गोल बात भी कर लेनी चाहिये! Thinking)


काश कुछ छोटी छोटी चीजों के होने न होने से आदमी लेनिन, गांधी या माओ बन सकता! लेनिन से मिलने वाला उनके नौ फुट के होने की कल्पना ले कर गया होता था। एक छोटे कद का व्यक्ति देख कर उसे निराशा होती थी। पर लेनिन के ओजस्वी वार्तालाप से वह व्यक्ति थोड़ी देर में स्वयं अपने को नौ फुट का महसूस करने लगता था।

आप लेनिन से असहमत हो सकते हैं। पर क्या उनकी महानता से भी असहमत होंगे?


एचटीएमएल की रेल-पटरी और नौ-दो-ग्यारह!



आलोक 9-2-11 के पोस्ट के हेडिंग और विषयवस्तु बड़े सिर खुजाऊ होते हैं। और जब तक आप समझ पायें, वे नौ-दो-ग्यारह हो जाते हैं।

पहले वे बोले कि उनके चिठ्ठे का एचटीएमएल अवैध है। फिर वे इतराये कि वे शुद्ध हो गये हैं। पर लोगों की टिप्पणियों का ब्लॉग पर संसर्ग उनके ब्लॉग के गुणसूत्र बिगाड़ देता है। अपने को समझ नहीं आया। अब यह HTML कूट कहां से सवर्ण-विवर्ण होने लगा!


फेयरी क्वीन इंजन का मॉडल

भला हो, हमारे अनुरोध पर उन्होने अपनी उलटबांसी वाली भाषा छोड हमें बताया कि एचटीएमएल कूट भी मानक/अमानक होता है। ठीक वैसे जसे रेल के काम में कुछ मानकीकृत तरीके से है और कुछ धक्केशाही में। एचटीएमएल में भी खासी धक्केशाही है। और यह धक्केशाही संगणक जगत में बहुत है; यह बताने के लिये उन्होने बहुत धैर्य के साथ अपने मानक के खिलाफ माइक्रो नहीं, मैक्सी पोस्ट लिखी।

खैर, आप अपने ब्लॉग की एचटीएमएल शुद्धता जांचें वैलिडेटर साइट से। हमारे ब्लॉग का वैलिडेशन तो फेल हो गया है। कल अगर HTML मानक के अनुसार ही चलने लगा तो हमारा ब्लॉग तो हुआ ठप्प। पर तब तो Y2K जैसा चीत्कार मचे शायद (जो अंतत: निरर्थक साबित हुआ था)!

(आप नीचे के चित्र पर भी क्लिक कर वैलिडेटर साइट पर जा सकते हैं। वहां Address में अपने ब्लॉग का एड्रेस भरें और परिणाम देखें।)

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अब हम होते हैं नौ-दो-ग्यारह!


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