शांति, बद्री साधू और बंसी

बंसी कलकत्ता में सम्भवत: ड्राइवर थे। बंगाल में कहीं वे शांति के सम्पर्क में आये होंगे और उनसे विवाह कर अपने गांव वापस लौटे। गांव में उन्हे स्वीकार नहीं किया गया। तब बंसी के मामा, बद्री साधू ने उन्हें अपने यहां आश्रय दिया।


तीन दिन वे नहीं दिखी थीं। और मेरे मन में कुछ होने लगा था। बुढ़िया, अशक्त और कोई पुख्ता सोशल सिक्यूरिटी नहीं। कहीं कुछ हो न गया हो।

परसों सड़क के दूसरी ओर के किराना दुकानदार से उनके बारे में रुक कर पूछा भी था।

दुकानदार से शांति बारे में रुक कर पूछा भी था।

उनका नाम है शांति, जैसा मैंने पिछली पोस्ट में लिखा भी था। उसके अलावा उनके बारे में विशेष जानकारी नहीं थी। अब कुछ जानकारी सुभाष (रवींद्रनाथ दुबे) जी ने दी है।

शांति को बंगाल से बंसी साथ ले कर आये थे। विवाह कर ही लाये थे। पर उनके गांव के ब्राह्मण समाज ने (शायद) विजातीय या विप्रांतीय महिला/किशोरी को ले कर आना स्वीकार नहीं किया। तब बंसी के मामा, बद्री साधू ने उन्हे अपने घर यहां इस गांव में आश्रय दिया। यहां भी शायद कुछ सामाजिक अनिच्छा रही हो; पर वे यहीं रम गयीं।

बद्री साधू

बद्री साधू के बारे में रवींद्रनाथ जी ने बताया कि वे बहुत आकर्षक व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे। शुरुआत में वे साधू हो कर अयोध्या चले गये थे। शायद वैराग्य में कुछ मन नहीं रमा, या शायद उन्हे पता चला कि चकबंदी के बाद उन्हें जमीन मिलने वाली है, वे वापस गांव लौट आये। उनका लौटना कुछ लोगों को पसंद नहीं आया। विशेषकर उन लोगों को, जिन्हे उनके न रहने से जमीन मिल जाती। उन्होने बद्री को बद्री मानने से इनकार कर दिया। पर बद्री अपनी पहचान, और लोगों की गवाही से, स्थापित करने में सफल रहे। इस पूरे प्रकरण के बाद वे आजीवन अविवाहित रहे।

बद्री साधू – इसी नाम से वे जाने जाने लगे। वे रामचरित मानस के अच्छे पाठक थे। अन्य ग्रंथों पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी। नौजवान लोग, जिनमेंं रवींद्रनाथ भी थे, उनके पास समय व्यतीत करने में रस पाते थे। बद्री साधू अपना भोजन एक ही बार बनाते थे। सादा भोजन – भात, दाल, चोखा। भोजन बनाते जाते थे और नौजवान मण्डली का मानस उच्चारण भी सुनते जाते थे। बीच बीच में, गलत उच्चारण होने पर हस्तक्षेप भी करते थे।

बद्री साधू की धार्मिकता का उनकी वेश-भूषा से भी लेना देना था। चौड़ा ललाट था। शरीर भी स्वस्थ। साफ कपड़े पहनते थे और मेक-अप में भी उन्हे घण्टा भर लगता था। उनके आकर्षक व्यक्तित्व और वजनदार आवाज का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ता था।

मेरी पत्नीजी की भी बद्री साधू के बारे में यादें हैं। उनके बचपन में बद्री के घर की ओर जाने की मनाही थी, पर वे बच्चे किसी प्रकार निकल कर पंहुच ही जाते थे। साफ सुथरा कमरा हुआ करता था बद्री साधू का। वहां गुड़-पानी और अन्य कुछ भी खाने को मिल जाता था। बद्री ने कुछ बाग-बगीचा भी लगाया था। कुल मिला कर बद्री साधू के घर जाना अच्छा लगता था उनको।

और, सब जगह से बहरियाये गये बंसी तथा उनकी पत्नी शांति को बद्री साधू ने ही शरण दी थी।

बंसी और शांति

बंसी कलकत्ता में सम्भवत: ड्राइवर थे। बंगाल में कहीं वे शांति के सम्पर्क में आये होंगे और उनसे विवाह कर अपने गांव वापस लौटे। गांव में उन्हे स्वीकार नहीं किया गया। तब बंसी के मामा, बद्री साधू ने उन्हें अपने यहां आश्रय दिया। पर्सनालिटी बंसी की भी आकर्षक थी और शांति भी सुंदर थीं। बंगला किशोरी पूर्वी उत्तर प्रदेश के वातावरण को समझती नहीं थी।

मेरी पत्नी जी अपने बचपन की शान्ति के बारे में उस समय के अपने एक हम उम्र बालक का कहा याद करती हैं। उसने बताया था – “अरे वह कछाड़ मार कर (अपनी साड़ी कमर तक लपेट कर) पोखरा (तालाब) में झम्म से छलांग लगाती है और हम लोगों से कहती है – आओ, तुम भी आओ, तैरो!” निश्चय ही, गांव के बच्चों के लिये किसी विवाहित महिला का ताल में यूं नहाने के लिये कूदना और तैरना एक अजूबा था।

शांति गांव की सामाजिक व्यवस्था के लिये एक बड़ा विघटक तत्व थीं! और शायद अब भी हैं।

कालांतर और वर्तमान

शांति बैठी थीं आज अपनी जगह पर

रवींद्रनाथ जी बताते हैं कि उसके बाद वे गांव में नहीं रहे। अपनी आजीविका के सम्बंध में बम्बई शिफ्ट हो गये। गांव में उनका आना जाना कम होता गया। उसके बाद बद्री साधू भी चल बसे। अब रवींद्रनाथ मेरी तरह रिटायर हो कर गांव में रमने – रहने आये हैं। उनके पास बहुत यादें हैं #गांवदेहात की। मीठी-खट्टी सब प्रकार की!

अपने बगीचे में सवेरे श्रम करते रवींद्रनाथ दुबे और उनकी पत्नी जी।

जितना आकर्षक उनका यौवन और अधेड़ावस्था थी, उतना ही दारुण उनका बुढ़ापा था। मैले कुचैले वस्त्रों में बैठे रहते थे। शांतिं जबान की तेज थीं। बंगला-हिंदी-भोजपुरी के बीच अच्छा तालमेल भी नहीं था। बद्री साधू को सधुय्या – सधुय्या कह कर सम्बोधित करती थीं, जो शायद उनका आशय नहीं था, पर वृद्ध बद्री के प्रति हिकारत दर्शाता सा प्रतीत होता था। फिर बंसी भी नहीं रहे। शांति के लड़के विरासत सम्भालने के बारे में कच्चे साबित हुये। … कुल मिला कर शांति का वर्तमान जो है, वह सामने दीखता है।

चार दिन पहले शांति देवी बैठी थीं उसी स्थान पर। उनकी गोद में एक जलेबी का प्लास्टिक का थैला था। कोई दे गया होगा। वह जलेबी खा रही थीं। उसके बाद तीन दिन वे दिखी नहीं। पड़ोस के दुकानदार ने बताया था कि घर में ही हैं। अब पौरुख नहीं है उनमें। बहत्तर-पचहत्तर की उम्र होगी। सुन लेती हैं पर आवाज बहुत कम निकलती है। अंग लकवा मारने के कारण शिथिल हैं। बुढापा दबोच रहा है। बुढापे के समय आर्थिक पुख्तापन कुछ सहायता करता है। शांति के पास वह भी नहीं है। रवींद्रनाथ बताते हैं कि उनका बेटा शांति की दशकों तक मदद करता रहा है। अब भी करता ही होगा। रवींद्रनाथ स्वयम उनके लिये हृदय में कोमलता रखते हैं।

पर अपनी जरावस्था तो शांति देवी को स्वयम ही काटनी है। … स्वर्गारोहण में तो अंतत: श्वान (स्वधर्म) ही साथ बचता है।

खैर, आज शांति देवी अपने स्थान पर बैठे दिखीं और उन्होने धीरे धीरे हाथ उठा कर मुझे नमस्कार किया। उनका उत्तर देते समय मुझे सुकून हुआ। … शांति का जीवन शांतिमय हो और हम उनके लिये, जो यथायोग्य सम्भव हो, कर सकें; यही सोचता हूं!


नारी, बुढ़ापा और गांव

जाने कितनी योजनायें आयीं। आवास की योजना, शौचालय की योजना, सोलर लाइट की योजना। उन सब योजनाओं ने भी इस महिला को नहीं छुआ। … मेरी पत्नीजी इस को गरीब सवर्ण की सामान्य उपेक्षा का उदाहरण मानती हैं।


अशोक (मेरा वाहन चालक) बताता है कि उनका नाम शांति है। वे रोज सवेरे मुझे सड़क के किनारे यूं एक कुर्सी पर बैठे नजर आती हैं। मेरी पत्नीजी का कहना है कि उन्हें शायद लकवा का अटैक हुआ था। अब बेहतर हैं पर बोल नहीं पातीं। सुन लेती हैं। इशारों से बात करती हैं। गली की सड़क के किनारे बैठने पर आते जाते लोगों को देखना शायद अच्छा लगता हो।

गांव की ब्राह्मण बस्ती में शायद अगर किसी को मदद की सख्त जरूरत है तो उन्हें है। गांव मदद करता है, या नहीं, मैं नहीं कह सकता। इस प्रकार के वृद्ध लोगों की सहायता के लिये एक सामुहिक फण्ड होना चाहिये। सभी परिवार उसमें मासिक योगदान दें और उससे एक समिति तय करे कि किन व्यक्तियों को मासिक सहायता दी जाये। लोग भोज और समारोह में अनाप शनाप खर्च कर देते हैं, पर इस तरह के काम के लिए नहीं।

ब्राह्मणों में वृद्धों और उनमें विशेषत: महिलाओं की दशा दयनीय है। वृद्ध अशक्त होते ही उपेक्षित होने लगते हैं। महिलायें तो और भी। शांति, या जो भी नाम है उनका, और भी अशक्त, और भी उपेक्षित नजर आती हैं मुझे।

शांति

मैं उन्हे रोज सवेरे साढ़े सात बजे इस तरह बैठे देखता हूं। आजकल मेरी नित्य की क्रिया में पण्डित देवेंद्रनाथ जी के अहाता में गाय का दूध लेने जाना होता है। और हर दिन वे मुझे इसी मुद्रा में बैठी दिखती हैं। पूर्व की ओर से मुंह पर आती रोशनी से उनके मुंह का दांया भाग चमकता है। मुंह पूरी तरह सममित है – well proportioned. यौवनावस्था में सुंदर रही होंगी। अब तो देख कर करुणा का भाव ही आता है।

वे अपने हाथ जोड़ कर मुझे नमस्कार करती हैं। मैं उसका उत्तर देता हूं। और उत्तर देते समय हमेशा मेरे मन में आता है कि उनकी सहायता करनी चाहिये। मेरी पत्नी जी कहती हैं कि उनके घर में मुख्य कमरा – बद्री साधू का कमरा – तो खण्डहर हो गया है। इनके पति बंसी के मामा थे बद्री। बंसी अपने मामा के यहां आ कर रहे। अब बद्री नहीं हैं, बंसी भी नहीं हैं। बंसी के दो बेटे विरासत ठीक से संभाल-संवर्धन नहीं कर पाये।

इस गांव में पंचायती प्रधानी कम से कम पच्चीस साल से सवर्णों के पास रही। जाने कितनी योजनायें आयीं। आवास की योजना, शौचालय की योजना, सोलर लाइट की योजना। उन सब योजनाओं ने भी इस महिला को नहीं छुआ। … मेरी पत्नीजी उस सब को सवर्ण वर्ग की सामान्य उपेक्षा का उदाहरण मानती हैं। सवर्ण अपनी गरीबी और बदहाली को भुनाने में संकोच करता है तो उसे योजनाओं का लाभ कम ही मिलता है।

मेरे पास उनके बारे में बहुत जानकारी नहीं है। हमारी ओर से कोई विशेष पहल भी नहीं है। मैं अपनी पेंशन में अपने परिवार को पालते हुये थोड़ी बहुत सहायता, जो कर सकता हूं, उससे आगे नहीं सोचता। या सोचता भी हूं तो वह मात्र मानसिक मंथन भर है। मैं पूरी तरह अपने को सामाजिक ताने बाने में उलझाने से या गांव की जिंदगी में परिवर्तन की कोई कोशिश नहीं करता। मुझे लगता है रिटायरमेंट मेरे व्यक्तिगत सुकून से जीने और अपनी जिंदगी को अपनी सीमित रचनात्मकता में रमाने का अवसर है। और मुझे पुन: राजसिक वृत्तियों में नहीं उलझाना चाहिये।

पर तब, रोज सवेरे यह महिला दिखती है। उनकी धीरे से हाथ उठा कर नमस्कार करने की मुद्रा सामने आ ही जाती है। मैं उसका उत्तर देते हुये चलता चला जाता हूं। सोचने जरूर लगता हूं मैं।