आज आंधी आई

नित्य के काम होल्ड पर चले गये थे। आखिर आंधी जो आ गयी थी! चैत्र मास में आंधी-पानी और बिजली का कौंधना देखा।


रात में आंधी आई। सुग्गी ने अपना सरसों और अरहर का खलिहान सफरा लिया है। गेंंहूंं अभी खेत में खड़ा है। सिर्फ चना, थोड़ा सा, काट कर मेरे परिसर में रखा है। उसी की फिक्र थी उसे।

पानी गिरा। थोड़ा चना भीगा पर जल्दी से उसके मेरे पोर्टिको में रख दिया। बच गया।

खेतों में गेंहू की कटाई चल रही है। जहां काट कर खेत में लेहना (कटे पौधे सलीके से लिटाना) बना दिया है और उनका बांध कर बोझ नहीं बना है; वहां रात में आंधी में उड़ गया होगा। एक का लेहना उड़ कर दूसरे के खेत में गया होगा तो बड़ी किचाइन (किचकिच) होगी वापस लेने को। 😆

रात में ही पास के पसियान और केवटान के बच्चे दौड़ने लगे टिकोरा (कच्चा आम) बीनने के लिये। सवेरे चाय पीते समय पत्नी जी बचे टिकोरे में से कुछ पा गयीं। उनसे पुदीना के साथ चटनी बनेगी।

सवेरे की चाय के समय बीने टिकोरे

चाय हम पोर्टिको में बैठ प्रकृति का अवलोकन करते पीते हैं। आज हम खुले और झाल में बंधे चने के खलिहान के बगल में बैठे। अजीब था चने के सूखे पौधों के बगल में बैठ कर चाय पीना।

पोर्टिको में चने के खलिहान की बगल में चाय का अनुष्ठान रहा आज

आजकल तापक्रम चालीस तक चला जा रहा है। पर सवेरे बादल थे। हवा भी थी और कभी कभी पानी भी बरस जा रहा था। पत्नीजी को सर्दी लग रही थी। दुपट्टे का प्रयोग बतौर शॉल किया उन्होने। चाय का अनुष्ठान पूरा हुआ, पर मौसम ऐसा था कि एक बार और चाय बनी और वहीं बैठ हमने पुन: पी।

दुपट्टा शॉल की तरह ओढ़े रीता पाण्डेय

नित्य के काम होल्ड पर चले गये थे। आखिर आंधी जो आ गयी थी! चैत्र मास में आंधी-पानी और बिजली का कौंधना देखा।

और फिर एक बार पानी फिर बरसने लगा है!


ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट में नहीं लगते

कटाई करने वाले ही नहीं, ईंट भठ्ठा मजदूर, आनेवाले पेट्रोल पम्प की दीवार बनाते आधा दर्जन लोग, सूखते ताल में मछली पकड़ते ग्रामीण, ठेले वाले, किराना की दुकान में छोटे वाहन से हफ़्ते भर की खेप लाने वाले, कटाई के बाद खेत से बची हुई गेंहू की बालें बीन कर जीवन यापन करने वाले, धोबी, नाई .. ये सब काम पर लगे हैं। ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था (लगभग) सामान्य है।


टेलीवीजन जो दिखाता है वह अर्धसत्य है। उसके कर्मी उतने कुशल नहीं हैं, जितने अन्य देशों (विशेषकर) अमेरिका के हैं। वे चिल्लाचिल्ला कर टिल्ल सी बात को “बड़ी खबर, बड़ी खबर” के नाम से दिन भर बांटते रहते हैं। सरकारी फीड पर जिंदा रहने वाले परजीवी हैं – अधिकांश। एक और नौटंकी – पैनल डिस्कशन की बिसात बिछा कर रोज करते हैं। वही घिसेपिटे चेहरे जो अपने घर के ड्राइंगरूम से उन्ही की तरह बिना शिष्टाचार के चबड़ चबड़ एक दूसरे पर बोलने वाले हैं, उन पैनल डिस्कशन के घटक होते हैं। देखना बंद कर दिया है मैंने।

निकोलस क्रिस्टॉफ का एक लेख है न्यूयार्क टाइम्स में। शीर्षक है – Life and Death in the ‘Hot Zone’। जरा देखिये और पढ़िये। उसमें एक डॉक्यूमेण्ट्री है। उसका स्तर देखिये। क्रिस्टॉफ कहते हैं कि रिपोर्टिन्ग वैसी ही कर रहे हैं वे लोग, जैसे युद्ध के संवाददाता करते हैं।

हमारे यहां कोरोना वायरस पर युद्ध स्तर की रिपोर्टिंग करने वाले संवाददाता विरले हैं। गिनेचुने। … यह मत मैने आजकल की रिपोर्टिंग देख कर नहीं बनाया। पहले भी ऐसा सोचता रहा हूं। हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्ण युग में हिन्दी के कई पत्रकार हिन्दी ब्लॉग लिखा करते थे; उस समय उनके स्तर को बहुत बारीकी से ऑब्जर्व किया था मैने। और बहुत से घटिया थे। स्नॉब और स्तरहीन। प्यूट्रिड!


ग्रामीण जन जीवन की बहुत रिपोर्टिन्ग मीडिया में नहीं है। मैं सर्च करता हूं तो अन्दाज लगता है कि 20-30 करोड़ के आसपास लोग खेती-किसानी या उससे सम्बन्धित कार्य पर निर्भर हैं। और वह दिखता भी है। पर मीडिया रिपोर्ताज में वह गायब है।

“कहां कोरोना? इस ओर कोई कोरोना नहीं है। इस तरफ़ तो गेंहू की कटाई की धूल है।”

खडंजे की खराब सड़क से गुजरते हुये एक गेंहू की कटाई करने वाले के पास रुकता हूं। सोशल डिस्टेंसिंग के नॉर्म के आधार पर उससे दूरी बनाये बनाये पूछता हूं – यह मास्क काहे पहन रखा है?

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