रेल की दुनिया – सन 1999 में जनसत्ता में छपा लेख



स्क्रैप-बुक बड़े मजे की चीज होती है. आप 8-10 साल बाद देखें तो सब कुछ पर तिलस्म की एक परत चढ़ चुकी होती है. मेरी स्क्रैप-बुक्स स्थानांतरण में गायब हो गयीं. पिछले दिनों एक हाथ लगी – रद्दी के बीच. बारिश के पानी में भी पढने योग्य और सुरक्षित. उसी में जनसत्ता की अक्तूबर 1999 की कतरन चिपकी है. यह “दुनिया मेरे आगे” स्तम्भ में “रेल की दुनिया” शीर्षक से लेख है श्री रामदेव सिंह का. उस समय का सामयिक मुद्दा शायद दो सांसदों द्वारा टाटानगर स्टेशन पर पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के कण्डक्टर की पिटाई रहा हो; पर लेख की आज भी वही प्रासंगिकता है. मैं रामदेव सिंह जी से पूर्व अनुमति के बिना ब्लॉग पढ़ने वाले मित्रों के अनुरोध पर यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं, अत: उनसे क्षमा याचना है. आप कृपया लेख देखें:


रेल की दुनिया
रामदेव सिंह

हिन्दी के बहुचर्चित कवि ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता है “श्रमजीवी एक्स्प्रेस” जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:

सवाल यह है
श्रमजीवी एक्सप्रेस में
तुम श्रमिकों को
चलने देते हो या नहीं
कि अघोषित मनाही है उनके चलने की
कि रिजर्वेशन कहां तक है तुम्हारा, कह
बांह उमेठ, उमेठ लेते हो उनका अंतिम रुपैया तक
या अगले स्टेशन पर उतार देते हो
यदि सींखचों के पीछे भेजते नहीं

पूरी कविता तो भारतीय रेल की नहीं, सम्पूर्ण देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था की पोल खोल कर रख देती है. इन पंक्तियों से भी भारतीय रेल की एक छवि तो स्पष्ट होती ही है जिसमें प्रतिनिधि खलनायक और कोई नहीं, रेल का टीटीई ही है, जिसका नाम कवि ने नहीं लिया है. इससे अलग हिन्दी का एक चर्चित उपन्यास “अठारह सूरज के पौधे” (लेखक रमेश बक्षी, जिसपर “सत्ताइस डाउन” नाम से फिल्म बन चुकी है) का नायक भी एक टीटीई है, जिसके संत्रास की कई परतें हैं. लोहे के रास्ते पर लगातार अप-डाउन करते, कन्धे छीलती भीड़ एवम नियम और व्यवहार के विरोधाभासों के बीच झूलते एक टीटीई का भी एक निजी संसार होता है जिसे सिर्फ बाहर से देख कर नहीं समझा जा सकता है. भागती हुई रेल के बाहर की दुनियां कितनी खुशनुमा होती है, खुले मैदान, खुश दिखते पेड़-पौधे, कल-कल बहती नदी, नीला आकाश, और अन्दर? अन्दर कितनी घुटन, कितना शोर, चिल्ल-पों, झगड़ा-तकरार! एक टीटीई इन दोनो दुनियाओं के बीच हमेशा झूलता रहता है.

रेलवे जनसेवा का एक ऐसा उपक्रम है, जिसकी संरचना वाणिज्यिक है, जिसके रास्ते में हजार किस्म की परेशानियां भी हैं. राष्ट्रीय नैतिकता में निरंतर हो रहे ह्रास से इस राष्ट्रीय उद्योग की चिंता भला किसे है? रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता ही इसलिये हुई होगी कि वह रेलवे का दुरुपयोग रोके और डूब रहे रेलवे राजस्व की वसूली करे. अंग्रेज रेल कम्पनियों के दिनों में ही टीटीई को ढेर सारे कानूनी अधिकार दे दिये गये थे. लेकिन उससे यह उम्मीद भी की गयी थी कि वह “विनम्र व्यवहारी” भी हो. रेल में बिना टिकट यात्रा ही नहीं, बिना कारण जंजीर खींचने से लेकर रेल परिसर में शराब पीना और गन्दगी फैलाना तक कानूनन अपराध है. एक टीटीई की ड्यूटी इन अपराधों को रोकने एवम अपराधियों को सजा दिलाने की है लेकिन शर्त यह है कि होठों पर मुस्कुराहट हो. कितना बड़ा विरोधाभास है यह. अब खीसें निपोर कर तो ऐसे अपराधियों को पकड़ा नहीं जा सकता है. जाहिर है इसके लिये सख्त होना पड़ेगा. सख्त हो कर भी 20-25 के झुण्ड में जंजीर खींच कर उतर रहे “लोकल” पैसेंजर का क्या बिगाड़ लेगा एक टीटीई?

गांधीजी तो रेलों के माध्यम से हो रही राष्ट्रीय क्षति से इतने चिंतित थे कि उन्होने कभी यहां तक कहा था कि “यदि मैं रेल का उच्चाधिकारी होता तो रेलों को तब तक के लिये बन्द कर देता, जब तक लोग बिना टिकट यात्रा बन्द करने का आश्वासन नहीं दे देते.” आज से 15-20 वर्षों पहले तक गांधीजी का यह कथन बड़े-बड़े पोस्टर के रूप में रेलवे स्टेशन की दीवारों पर चिपका रहता था. अब यह पोस्टर कहीं दिखाई नहीं देता. ऐसा नहीं कि गान्धी के इस कथन पर लोगों ने अमल कर लिया हो और अब ऐसे पोस्टरों की जरूरत नहीं रह गयी हो. सच्चाई तो यह है कि जैसे गांधी जी की अन्य नैतिकतायें हमारे देश के आम लोगों से लेकर राजनेताओं के लिये प्रासंगिक नहीं रह गयी हैं, उसी तरह रेलवे स्टेशनों पर प्रचारित यह सूत्र वाक्य उनके लिये महत्वहीन हो गया. अब तो यह दृष्य से ही नहीं दिमाग से भी गायब हो गया है. अब के राजनेता तो अपने साथ बिना टिकट रैलियां ले जाना अपनी शान समझते हैं.

टाटा नगर रेलवे स्टेशन पर पुरुषोत्तम एक्प्रेस के कण्डक्टर की पिटाई सत्ताधारी दल के दो सांसदों ने सिर्फ इसलिये करदी कि उन्हें वातानुकूलित डिब्बे में जगह नहीं मिली. जबकि उनका आरक्षण पहले से नहीं था, न हीं तत्काल डिब्बे में कोई जगह थी. सांसद द्वय के गणों ने घण्टों गाड़ी रोक कर रेल प्रशासन की ऐसी-तैसी की. सैकड़ों लोग तमाशबीन बन कर यह सब देखते रहे. रेलवे में बिना टिकट यात्रा का प्रचलन पुराना होते हुये भी इधर 20-25 वर्षों में ऐसे यात्रियों के चरित्र में एक गुणात्मक फर्क आया है, जो गौर तलब है. पहले जहां रेलगाड़ियों में टीटीई को देख कर बिना टिकट यात्री दूर भागता था, ऐसी चोर जगहों में बैठ कर यात्रा करता था जहां टीटीई नहीं पंहुच सके वहीं अब बिना टिकट यात्री ठीक वहीं बैठता है जहां टीटीई बैठा हो. बल्कि तरह तरह की फब्तियों को सुनने के बदले टीटीई ही वहां से हट जाना पसन्द करता है. भिखारियों और खानाबदोशों को छोड़ दें तो गरीब और मेहनतकश वर्ग के लोग बिना टिकट यात्रा से परहेज करते हैं. टिकट लेने के बाद भी सबसे ज्यादा परेशान वही होते हैं जबकि खाते पीते वर्ग के लोग ही सबसे अधिक बिना टिकट यात्रा करते हैं. सुप्रसिद्ध व्यंगकार परसाई जी ने अपने संस्मरणों में उन कई तरीकों का वर्णन किया है जिनके सहारे टीटीई पर या तो धौंस जमा कर या गफलत में डाल कर लोग बिना टिकट यात्रा करते हैं.

यह नयी रेल संस्कृति है जिसकी दोतरफा मार टीटीई झेलता है. एक तरफ अपने बदसलूक और बेईमान होने की तोहमद उठाता है जिसमें बड़ा हिस्सा सच का भी होता है. दूसरी तरफ वह ईमानदारी से काम करने की कोशिश करता है तो बड़े घरों के उदण्ड मुसाफिर अपनी बदतमीजियों के साथ उसे उसकी औकात बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते.


टीटीई की नौकरी के विरोधाभास



ट्रेन के समय पर कोच के टीटीई को निहारें. आप कितने भी लोक प्रिय व्यक्ति हों तो भी आपको ईर्ष्या होने लगेगी. टीटीई साहब कोई बर्थ खाली नहीं है कहते हुये चलते चले जा रहे हैं; और पीछे-पीछे 7-8 व्यक्ति पछियाये चल रहे हैं. टीटीई साहब मुड़ कर उल्टी दिशा में चलने लगें तो वे सभी लोग भी पलट कर फिर पछिया लेंगे.बिल्कुल अम्मा बतख और उसके पीछे लाइन से चलते बच्चे बतखों वाला दृष्य!

टीटीई साहब को गोगिया पाशा से कम नहीं माना जाता. वे आपके सामने पूरा चार्ट फैलादें, पूरी गाड़ी चेक कर दिखादें कि कोई बर्थ खाली नहीं है. पर हर आदमी सोचता है कि वे अगर इच्छा शक्ति दिखायें तो आसमां में सुराख भी कर सकते हैं और एक बर्थ का जुगाड़ भी. उनके पीछे चलने वाली “बच्चा बतख वाली” जनता यही समझती है. इसी समझ के आधार पर अर्थशास्त्र की एक शाखा कार्य करती है. कई उपभोक्ता लोग हैं जिन्हे इस अर्थशास्त्र में पीएचडी है. और वे इस अर्थशास्त्र को गाहे-बगाहे टेस्ट करते रहते हैं.

मेरे पिताजी किस्सा सुनाते है कि उनके छात्र होने के दिनों में फलाना टीटीई था, जिसका आतंक इलाहाबाद से मेजा-माण्डा तक चलने वाले स्टूडेण्टों पर बहुत था. टीटीई-पावर और स्टूडेण्ट-पावर में अंतत: स्टूडेण्ट-पावर जीती. स्टूडेण्टों ने एक दिन मौका पा कर टौंस नदी में उस फलाने टीटीई को झोक कर उसका रामनाम सत्त कर दिया. यह आज से 50 साल पहले की बात होगी.वैसे मैं अपने पिताजी की पुराने समय की बातों को चुटकी भर नमक (पिंच ऑफ सॉल्ट) के साथ ही लेता हूं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने दिनों के जितने वे किस्से सुनाते हैं; उन्हें वैलिडेट करने का मेरा न कोई मन है और न संसाधन. पर फलाने टीटीई के टौंस नदी में झोंकने की जो कथा वे सुनाते हैं, उससे छात्र वर्ग में टीटीई के प्रति गहन अरुचि स्पष्ट होती है.

रेलवे की दुनिया

(रामदेव सिंह के सन 1999 में जनसत्ता में छपे एक लेख के अंश):

रेलवे जनसेवा का एक ऐसा उपक्रम है, जिसकी संरचना वाणिज्यिक है, जिसके रास्ते में हजार किस्म की परेशानियां भी हैं. राष्ट्रिय नैतिकता में निरंतर हो रहे ह्रास से इस राष्ट्रीय उद्योग की चिंता भला किसे है? रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता ही इसलिये हुई होगी कि वह रेलवे का दुरुपयोग रोके और डूब रहे रेलवे राजस्व की वसूली करे. अंग्रेज रेल कम्पनियों के दिनों में ही टीटीई को ढेर सारे कानूनी अधिकार दे दिये गये थे. लेकिन उससे यह उम्मीद भी की गयी थी कि वह “विनम्र व्यवहारी” भी हो. रेल में बिना टिकट यात्रा ही नहीं, बिना कारण जंजीर खींचने से लेकर रेल परिसर में शराब पीना और गन्दगी फैलाना तक कानूनन अपराध है. एक टीटीई की ड्यूटी इन अपराधों को रोकने एवम अपराधियों को सजा दिलाने की है लेकिन शर्त यह है कि होठों पर मुस्कुराहट हो. कितना बड़ा विरोधाभास है यह. अब खीसें निपोर कर तो ऐसे अपराधियों को पकड़ा नहीं जा सकता है. जाहिर है इसके लिये सख्त होना पड़ेगा. सख्त हो कर भी 20-25 के झुण्ड में जंजीर खींच कर उतर रहे “लोकल” पैसेंजर का क्या बिगाड़ लेगा एक टीटीई?@

ब्लॉग पढ़ने वाले 8-10 परसेण्ट लोग परदेस में भी हैं – वहां टीटीई जैसी जमात के क्या जलवे हैं? कोई सज्जन बताने का कष्ट करेंगे?

जलवे तो तभी होते हैं जब डिमाण्ड-सप्लाई का अंतर बहुत हो. यह अंतर टीटीई की “जरूरत” और ग्राहक की “तत्परता” में हो या ट्रेनों में उपलब्ध बर्थ और यात्रा करने वालों की संख्या में हो. आप समझ सकते हैं कि जलवे ग्रीष्मकाल या दशहरा-दिवाली के समय बढ़ जाते हैं. ऐसा कोई अध्ययन तो नहीं किया गया है कि इस जलवे के समय में टीटीई वर्ग छुट्टी ज्यादा लेता है या वर्षा ऋतु के चौमासे में. पर यह अध्ययन किसी रिसर्च स्कॉलर को एच.आर.डी. में पीएचडी की डिग्री दिलवा सकता है.

मैं यहां टीटीई पर केवल व्यंग नहीं करना चाहता. उनकी नौकरी में जोखिम बहुत हैं. बहुत से वीवीआईपी सही-गलत तरीके से यात्रा करते हैं. कभी किसी सही को गलत तरीके से या गलत को सही तरीके से उन्होनें चार्ज कर लिया तो बड़ा हाई-प्रोफाइल मामला बन जाता है – जो बड़ों-बड़ों के सलटाये नहीं सलटता. बेचारे टीटीई की क्या बिसात! उसकी नौकरी तलवार की धार पर है. इसके अलावा उस जीव से दो विरोधी आवश्यकतायें हैं – व्यवहार विनम्र हो और बिना टिकट की वसूली कस के हो. भारत में शराफत से सीधी उंगली कुछ नहीं निकलता. अत: जब टीटीई यात्रियों से जायज पैसे वसूलता है तो उसपर अभद्र व्यवहार, नशे में होने और (अनुसूचित जाति-जनजाति के मामले में) जाति सूचक अपशब्द प्रयोग करने के आरोप तो फट से लगा दिये जाते हैं. हर तीसरा-चौथा टीटीई इस प्रकार की शिकायत का जवाब देता पाया जाता है. और अगर वह जड़भरत की तरह निरीह भाव से काम करता है – तो उसे प्रशासन की लताड़ मिलती है कि वह कसावट के साथ टिकट चैकिंग नहीं कर रहा.

जब टीटीई की बात हो रही है तो मैं एक टीटीई की भलमनसाहत की चर्चा के बिना नहीं रह सकता. हम लोग, एक दशक से भी अधिक हुआ, रेलवे स्टाफ कॉलेज बडौदा में कोई कोर्स कर रहे थे. हमें दो-दो के ग्रुप में बडौदा स्टेशन पर कर्मचारियों की कार्य के प्रति निष्ठा जांचने भेजा गया. चूकि हम लोग लोकल नहीं थे, हमें बतौर यात्री स्वांग रच कर यह जांचने को कहा गया था. मेरे साथ मेरे मित्र थे. हेड टिकेट कलेक्टर के दफ्तर के बाहर मैं अचानक लंगड़ाने लगा. मेरे मित्र मुझे सहारा देकर हेड टीसी के दफ्तर में ले कर गये. मैने पूरी पीड़ा से बयान किया कि फुट ओवर ब्रिज से उतरते हुये सीढ़ियों की चिकनाहट से मेरा पैर स्लिप कर मोच खा गया है. तेज दर्द है. हेड टीसी ने तुरंत मुझे बैठने को कुर्सी दी. मोजा उतार कर मेरा पैर चेक किया और बोला कि फ्रेक्चर नहीं लगता. वह दौड़ कर दवा की दूकान से मूव/आयोडेक्स ले आया. मेरे पैर पर धीरे-धीरे लगाया और कुछ देर आराम करा कर ही मुझे जाने दिया. धन्यवाद देने पर वह हल्का सा मुस्कुराया भर. मुझे हेमंत नाम के उस नौजवान हेड टीसी की याद कभी नहीं भूलेगी.

तो मित्रों टीटीई की नौकरी अलग अलग प्रकार की अपेक्षाओं से युक्त है. टीटीई करे तो क्या करे!


@ रामदेव सिंह जी का यह लेख मेरी ब्लॉग पोस्ट से कहीं बेहतर लिखा गया लेख है. लालच तो मन में ऐसा हो रहा है कि पूरा का पूरा लेख प्रस्तुत कर दिया जाय, पर वह लेखक के साथ अन्याय होगा और शायद चोरी भी.


ममता बैनर्जी और निचले तबके के लोग



मैं जॉर्ज फर्नाण्डिस को मेवरिक नेता मानता हूं. और लगभग वैसा मत ममता बैनर्जी के विषय में भी है. एक ट्रेन के उद्घाटन के सिलसिले में नवम्बर 1999 में बतौर रेल मंत्री उनका मेरे मण्डल पर आगमन हुआ था. जैसा रेल मंत्री के साथ होता है – कार्यक्रम बहुत व्यस्त था. ट्रेन को रवाना कर रेजिडेंसी में वे बहुत से लोगों से मिलीं और मीडिया को समय दिया. सारे काम में देर रात हो गयी थी. लगभग अर्ध रात्रि में उन्होने भोजन किया होगा. अगले दिन सवेरे वायुयान से हम उन्हे रवाना कर लौटे.

उस समय मेरे स्टाफ ने बताया कि ममता जी ने रात में बहुत सादा भोजन किया था. सर्विस देने वाले वेटर से उसका हालचाल पूछा था और धन्यवाद देते हुये 500/- अपने व्यक्तिगत पैसे में से दिये थे. वह वेटर बता रहा था कि आज तक किसी बड़े नेता ने ऐसा हाल नहीं पूछा और न किसी ने टिप दी.

वैसा ही ममता बैनर्जी ने कार के ड्राइवर से भी किया. ड्राइवर का हाल पूछा और व्यक्तिगत टिप दी. सामान्यत: रेल मंत्री लोग तो ईनाम घोषित करते हैं जो सरकारी तरीके से मिलता है – बाद में. उसमें सरकारी पन झलकता है – व्यक्तिगत समझ की ऊष्मा नही.

ये दोनो साधारण तबके के लोग तो ममता दी के मुरीद हो गये थे. इनके साथ ममता जी का व्यवहार तो उनके व्यक्तित्व का अंग ही रहा होगा – कोई राजनैतिक कदम नहीं. वे देश के उस भाग/शहर में कभी वोट मांगने आने से रहीं! और वे दोनो कभी उनके या उनके दल के लिये वोट देने का अवसर भी पाने वाले नहीं रहे होंगे.

मैं इस घटना को भूल चुका था; पर कल अपनी स्क्रैप-बुक देखते हुये फ्री-प्रेस में छपे इस आशय के पत्र की कतरन मुझे मिल गयी. वह पत्र मैने उस अखबार में छपे लेख – “ब्राण्ड पोजिशनिंग – ममता बैनर्जी इज लाइकली टु अपील टु द अण्डरडॉग्स” अर्थात “ब्राण्ड का बनना – ममता बैनर्जी निचले तबके को पसन्द आ सकती हैं” के विषय में प्रतिक्रिया देते हुये लिखा था. इस पत्र में मैने उक्त दोनो व्यक्तियों – वेटर और ड्राइवर का विवरण दिया था.

ममता बैनर्जी बंगाल में आजकल जैसी राजनीति कर रही हैं – उसमें मुझे समग्र जन का लाभ नजर नहीं आता. वे वाम मोर्चे के गढ़ को भेदने में बार-बार विफल रही हैं. पर यहां तो मैं उनकी एक मानवीय अच्छाई का उल्लेख भर कर रहा हूं. मुझे उनका प्रशंसक या फॉलोअर न समझ लिया जाये.


मैं अभी तन से अस्वस्थ महसूस कर रहा हूं, अत: किसी नये विषय पर सोच कर लिखने की मनस्थिति में स्वयम को नहीं पाता. पर ममता बैनर्जी का उक्त सरल व्यवहार मुझे लिखने में बिल्कुल सटीक लगा – जिसपर बिना किसी राग-द्वेष के लिखा जा सकता है. व्यवहार में अच्छाई, अच्छाई है – किसी राजनेता में हो या आपके पड़ोस में.


एसएमएस आर्धारित भुगतान व्यवस्था



मैने 8 मई’2007 को एक पोस्ट लिखी थी : पैसे ले कर चलना खतरनाक है. इस पोस्ट में मैने कहा था कि रोकड़ ले कर चलना/भुगतान करना उत्तरोत्तर जोखिम भरा होता जा रहा है. द मेकेंजी क्वाटर्ली” के एक लेख के अनुसार या तो एटीएम की श्रृंखला या एसएमएस आर्धारित भुगतान व्यवस्था इसका उपाय है. एसएमएस आर्धारित व्यवस्था कहीं अधिक (1:33 के अनुपात में) सस्ती है और पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना इस दिशा में सोच रहा है.

आज अस्वस्थता के कारण देर से उठने पर अखबार (बिजनेस स्टैण्डर्ड) के पहले पन्ने पर छपे विज्ञापन पर नजर पड़ी तो पाया कि कॉर्पोरेशन बैंक भारत में एसएमएस आर्धारित मोबाइल फोन से भुगतान व्यवस्था की शुरुआत कर चुका है. कार्पोरेशन बैंक का कहना है कि वह एम-कॉमर्स में कदम रखने वाला पहला पब्लिक सेक्टर बैंक है. यह सुविधा वह पे-मेट के साथ जुड़ कर दे रहा है. आप पे-मेट की साइट देखें. वह सिटी बैंक, कार्पोरेशन बैंक और चार-पांच और कम्पनियों के लोगो अपनी साइट पर चमका रहा है. बस, अब इंतजार है कि यह सुविधा मेरे गांव मे रहने वाला 4 बीघे का किसान अवधनारायण कब प्रयोग करने लगेगा!

समय बहुत तेज चल रहा है – परिवर्तन बड़ी तेजी से हो रहे हैं!

आप जरा विज्ञापन की कतरन पर नजर डाल लें:
Corporation Bank


लोग मनमोहन सिंहजी के पक्ष में क्यों नहीं बोलते?



हमारे प्रधानमंत्री देश के गौरव हैं. जैसे कलाम साहब के प्रति मन में इज्जत है, वैसे ही मनमोहन सिंह जी के प्रति भी है. जॉर्ज जी कह रहे हैं कि प्रधान मंत्री किसी और देश में होते तो उनका वध कर दिया जाता. जॉर्ज जी के प्रति भी मन में आदर है, पर वे मेवरिक राजनेता हैं और उनसे हमेशा सहमत नहीं हुआ जाता. मनमोहन जी स्वयम कह रहे हैं कि कुछ लोगों ने उनके लिये पंसेरी लुढ़काई है (अवधी में पंसेरी लुढ़काना का अर्थ मरने की इच्छा करना है) और अनुष्ठान कराया है. मनमोहन सिन्ह जी जैसे के लिये कोई यह कर सकता है ठीक नहीं लगता. शायद उनकी सूचना सही न हो. पर शिखर पर बैठा व्यक्ति एकाकी होता है और अगर वह सूक्ष्म सम्वेदना का व्यक्ति हुआ तो उसके कष्ट का अन्दाजा बहुधा दूसरे नहीं लगा सकते. यह लोगों का कर्तव्य है कि सरकार के प्रति चाहे जो सोचें, मनमोहन सिन्ह जी के साथ व्यक्तिगत सॉलिडारिटी प्रकट करें.

ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिन्ह जी की आलोचना पहली बार हो रही हो. बतौर वित्तमंत्री जब नरसिम्हाराव सरकार में उन्होने बजट पेश किये थे तो यह शोर मचा था कि वे देश को चौपट कर देंगे. पर अब देखिये कि अगर वे उस समय देश को नयी आर्थिक दिशा न देते तो शायद देश चौपट होता. सम्भव है कि इस समय नाभिकीय ऊर्जा के विषय में जो कहा जा रहा है, उस बारे में भी भविष्य में वैसा ही निकले.

जीतेन्द्र ने अपनी इस पोस्ट में नाभिकीय समझौते के दस्तावेज का लिंक दिया है. उसे आप डाउनलोड कर सकते हैं और चल रही बहस में अगर कुछ तथ्यपरक कहा जाये तो वैलिडेट कर सकते हैं. पर दुर्भाग्यवश मात्र राजनैतिक बयान हो रहे हैं. और समझौते में तो लेन-देन होता ही है, उसे मानते हुये व्यापक हित की बात खोजनी चाहिये.

खैर, नाभिकीय समझौता एक तरफ, मैं तो मनमोहन सिन्ह जी की बतौर एक सज्जन पुरुष बात कर रहा हूं. उनके समर्थन में खड़ा हुआ और कहा जाना चाहिये.


मल्लन साहब – सीक्वेल मल्लन चाचा



समीर लाल जी ने कल मल्लन चाचा को अपने ब्लॉग पर ठेला – क्या आप मल्लन चाचा को जानते हैं? मल्लन एक ऐसे चरित्र का नाम है जो सामान्य से अलग हो. हमें लगा, ये क्या; अपन भी अनुगूंज स्टाइल में ठेल सकते हैं. मान लें आलोक (9+2=11) जी ने नया टॉपिक दिया है मल्लन. मल्लन के आगे पीछे आप कुछ भी लगा सकते हैं. चाहे तो (यदि आप खुद पर सटायर कर सकते हों) खुद को मल्लन बना सकते हैं.

हां तो अपने मल्लन, मल्लन चाचा नहीं, मल्लन साहब हैं. मेरी उम्र के होंगे. शादी नहीं करी. क्यों नही करी यह तो हम और हम जैसे अनेक जिज्ञासु नहीं जान पाये. पर सभी ने अपने पड़ोस की थोड़ी उम्रदराज कुवांरियों का उनसे विवाह का पुनीत कार्य कराने का यत्न किया. कुछ ने तो चुपके से उनके लिये अपने खर्चे पर हिन्दुस्तान टाइम्स में मेट्रीमोनियल कॉलम में विज्ञापन भी दिये. कई तो उनके जन्म दिन/नक्षत्र/घड़ी के आधार पर उपयुक्त लड़कियों का मिलान कर, उनके साथ बैठक कर चुके पर नतीजा कुछ नहीं निकला. उम्र बढ़ती गयी.

मेरी उनसे गहरी छनती है. असल में मैने उनकी शादी कराने या किसी लड़की का बॉयोडाटा ठेलने का कभी कोई यत्न नहीं किया. मैं उन्हे प्रारम्भ से ही चिर कुमार की भूमिका में स्वीकार कर चुका हूं.

मल्लन साहब धुर निराशावादी हैं. मैं उन्हे फोन कर पूछता हूं क्या सीन है बन्धु?

हर बार एक ही जवाब मिलता है सीन क्या है. सब ऑबसीन है!

क्यों, क्या हुआ?

हुआ क्या; इन्दौर जाना था. कैरिज (सैलून) मेरे नाम था. ऐन मौके पर फलाना बोला कि उसकी बीवी का आंख का ऑपरेशन है इन्दौर में डा. हर्डिया के पास. अब सैलून का मेन बेडरूम उसे देना पड़ा और हम कूपे में टंग कर गये. कुंवारा होने पर यही फजीहत होती है.

मैने पूरी सहानुभूति जताई.

एक बार और मुंह लटकाये मिले. पूछा क्या बात है?

बोले ढ़िमाके की पोस्टिंग हो गयी है बाहर. उसने अपनी फैमिली मेरे घर में मय सामान रख दी है दो महीने के लिये यह कह कर कि मुझ अकेले को तो एक कमरा ही काफी है. अब मुझे अपने ही घर में एक कमरे में सिमटना पड़ गया है. उस कमरे में भी ढ़िमाके ने पैकिंग कर सामान के कार्टन रख दिये हैं. मेरे किचन पर उसकी बीवी का कब्जा है और रोज मसूर की दाल खानी पड़ रही है जो मुझे बिल्कुल पसन्द नही! बड़ी तल्खी से कैलेण्डर के दिन काट रहा हूं.

मैं जब भी उनके पास जाता हूं; कुंवारा होने के कारण एक न एक परेशानी से ग्रस्त पाता हूं जो मित्र लोग उन्हें थमा देते हैं. मित्र समझते हैं कि अकेला आदमी है, बम्बई में चार कमरे का फ्लैट ले कर रह रहा है; शरीफ है, सो फायदा उठाया जाये.

एक दिन मैने पूछ ही लिया. बन्धु, जब इतना चोट देते हैं दोस्त लोग तो शादी क्यों नही कर लेते?

बहुत देर तक मल्लन साहब उडिपी रेस्तराँ में दोसे का टुकड़ा कांटे में फंसाये रहे. फिर धीरे से बोले यार अभी जितना कष्ट है, उसका तो अभ्यास हो गया है. शादी कर ली इस उम्र में, और नहीं चल पायी तो कहीं ज्यादा कष्ट होगा. पचास साल का होने पर किसी के साथ एडजस्ट करना भी तो कठिन काम है.

मैं कोई तर्क/वितर्क/कुतर्क नहीं कर पाया. मल्लन साहब के हाथ में शायद विवाह की रेखा ही नहीं है.