पटेल, नेहरू, कांग्रेस और कुरियन की किताब


'I Too Had a Dream' by Verghese  Kurien
‘I Too Had a Dream’ by Verghese Kurien

सरदारपटेल और नेहरू जी (कांग्रेस) को ले कर एक बात आजकल चली है। पटेल को कांग्रेस ने किस प्रकार से याद किया, इस बारे में श्री वर्गीस कुरियन की किताब I Too Had a Dream में एक प्रसंग है। मैं उसे जस का तस प्रस्तुत करता हूं (बिना वैल्यू जजमेण्ट के)। अनुवाद के शब्द मेरे हैं। आप पढ़ें –


“एक अन्य व्यक्ति जो मेरी आणद की जिन्दगी में आयी और जिन्होने मुझे और मेरे परिवार को बहुत प्रभावित किया, वे मणिबेन पटेल थीं, सरदार वल्लभ भाई पटेल की पुत्री। मणिबेन आणद और को-आपरेटिव में नियमित रूप से आया करती थीं। वे कभी भी औपचारिक रूप से खेड़ा कोआपरेटिव का हिस्सा नहीं थीं और कभी भी उन्होने कोई पद नहीं संभाला। वे केवल सरदार पटेल की पुत्री के रूप में सम्पर्क में रहती थीं, और वे यह जानती थीं कि उनके पिता खेड़ा जिला के किसानों के भले और प्रगति के लिये कितना सरोकार रखते थे। आणद में उनका हमेशा स्वागत था – न केवल सरदार पटेल की पुत्री के रूप में वरन् उनके अपने मानवीय गुणों के कारण भी। यद्यपि वे काफ़ी अच्छी कद-काठी की महिला थीं और बाहर से रुक्ष लगती थीं, मैने पाया कि वे बहुत सौम्य स्वभाव की थीं और हम बहुत अच्छे मित्र बन गये।

मणिबेन नितान्त ईमानदार और समर्पित महिला थीं। उन्होने अपना पूरा जीवन अपने पिता को समर्पित कर दिया था। उन्होने बताया कि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद वे उनका एक बैग और एक किताब ले कर दिल्ली गयीं जवाहरलाल नेहरू से मिलने। उन्होने वे नेहरू के हवाले किये; यह कहते हुये कि उनके पिता ने मरते समय कहा था कि ये सामान वे नेहरू को ही दें और किसी को नहीं।  बैग में 35 लाख रुपये थे जो कांग्रेस पार्टी के थे और किताब उसका खाता थी। नेहरू ने वह ले कर उनका धन्यवाद किया। मणिबेन ने इन्तजार किया कि नेहरू कुछ और बोलेंगे पर जब वे नहीं बोले तो वे उठीं और चली आयीं।

मणिबेन (बीच में) और कुरियन दम्पति
मणिबेन (बीच में) और कुरियन दम्पति

मैने मणिबेन से पूछा कि वे नेहरू द्वारा क्या अपेक्षा करती थीं कि वे कहते। “मैने सोचा कि वे पूछेंगे कि मैं आगे अपना काम कैसे चलाऊंगी? या कम से कम यह कि वे मेरी क्या सहायता कर सकते हैं? पर यह उन्होने कभी नहीं पूछा।” – मणिबेन ने बताया।

मणिबेन के पास अपना कोई पैसा नहीं था। सरदार पटेल की मृत्यु के बाद बिड़ला परिवार ने उन्हे कुछ समय बिड़ला हाउस में रहने का अनुरोध किया। पर यह उन्हे मन माफ़िक नहीं लगा तो वे अपने भतीजे के पास रहने के लिये अहमदाबाद चली आयीं। उनके पास कोई अपनी कार नहीं थी, सो वे बसों या थर्ड क्लास में ट्रेनों में यात्रा करती थीं। बाद में त्रिभुवन दास पटेल (खेडा कोआपरेटिव के संस्थापक) ने उनकी मदद की संसद का सदस्य चुने जाने में। उससे उन्हें प्रथम श्रेणी में चलने का पास मिल गया पर एक सच्चे गांधीवादी की तरह वे सदा तीसरे दर्जे में ही यात्रा करती रहीं। वे आजन्म खादी की साड़ी पहनती रहीं, जिसका सूत वे स्वयं कातती थीं और वे जहां भी जाती थीं, उनके साथ चरखा रहता था।

सरदार पटेल ने जो त्याग किये देश के लिये; उन्हे देखते हुये यह कहते दुख होता है कि देश ने उनकी बेटी के लिये कुछ नहीं किया। अपने बाद के वर्षों में, जब उनकी आंखें बहुत कमजोर हो गयी थीं; वे अहमदाबाद की सड़कों पर बिना किसी सहारे के चलती थीं। बहुधा वे लड़खड़ा कर गिर जाती थीं, और वहीं पड़ी रहती थीं, जब तक कोई गुजरता व्यक्ति उनकी सहायता कर उठाता नहीं था। जब वे मर रही थीं तो गुजरात के मुख्य मन्त्री चिमनभाई पटेल उनके पास आये एक फोटोग्राफर के साथ और फोटोग्राफ़र को निर्देश दिया कि उनके साथ एक फोटो खींची जाये। वह फ़ोटो अगले दिन अखबारों में छपी। थोड़े से प्रयास से वे मणिबेन के अन्तिम वर्ष बेहतर बना सकते थे।”


मैने वर्गीस कुरियन की यह किताब साल भर पहले पढ़ी थी। कल जब सरदार पटेल की लीगेसी पर क्लेम करने लगे उनके पुराने समय के साथियों के उत्तराधिकारी; तो मुझे याद हो आया यह प्रसंग। मैने वर्गीस कुरियन के शब्दों को रख दिया है। बाकी आप समझें।

(चित्र कुरियन की पुस्तक से लिये हैं)

डेण्टिस्ट से एक अप्वॉइण्टमेण्ट


Ghost-train-to-the-Easter-001मैं पॉल थरू की दूसरी यात्रा पुस्तक – द घोस्ट ट्रेन टू द ईस्टर्न स्टार पढ़ रहा था। पॉल थरू अंकारा में अपने दांत की एक लूज फिलिंग के इलाज के लिये डेण्टिस्ट के पास गये थे। सामान्यत: डेण्टिस्ट के पास जाने की बात किसी ट्रेवलॉग में बहुत बारीकी से नहीं लिखी जायेगी। पर पॉल थरू एक अद्वितीय ट्रेवलॉग लेखक हैं। उन्होने डाक्टर इसिल इव्सिमिक के साथ इलाज के समय का भी अच्छा वर्णन किया है। डाक्टर इव्सिमिक अपना काम करते समय अपने मरीज के साथ अनवरत हल्की आवाज में कमेण्ट्री देते बात भी करती जाती थीं। और एक अच्छे ट्रेवलॉग लेखक के रूप में थरू वह सब बाद में पुस्तक में री-प्रोड्यूज भी करते गये।

***

मुझे भी डेण्टिस्ट के पास जाना था। मुझे अपने सामने के दांतों में कहीं कहीं कालापन और क्षरण महसूस हो रहा था पिछले साल भर से। जब तक उसके कारण कोई दर्द नहीं था, मैने वह अनदेखा कर दिया – थोड़ा टूथब्रश ज्यादा चला लेता था, यह मान कर कि उससे कालापन मिट जायेगा और दांत चमक जायेंगे। पर अब लगभग 15-20 दिन से लगने लगा कि ठण्डे-गरम के सम्पर्क में आने पर दांत में दर्द होने लगा है तो मैने समझ लिया कि दांतों के डाक्टर के पास गये बिना चारा नहीं है।

एक मरीज काअपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू
एक मरीज का अपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू

मुझे बताया गया कि रेलवे अस्पताल, इलाहाबाद में डाक्टर मंजुलता हाण्डू डेण्टिस्ट हैं। और एक अत्यंत कुशल डेण्टिस्ट हैं। मैने जब अपने सहकर्मी श्री राजेश पाण्डेय को उनके पास अप्वाइण्टमेण्ट लेने के लिये भेजा तो बड़ी सहजता से मिल भी गया। न मिलता तो शायद मैं विशेष यत्न न करता और टालता रहता दांत की समस्या। पर अब, वृहस्पतिवार को अपना दफ्तर का सवेरे का काम खत्म कर डाक्टर हाण्डू के पास मैं चला ही गया।

अस्पताल में घुसते ही उनका चेम्बर है। दो केबिन का चेम्बर। एक में एक अन्य डाक्टर मरीरों को बतौर ऑउटपेशेण्ट निपटा रहे थे। एक व्यक्ति ने उठ कर मुझे अपनी कुर्सी दे दी बैठने को। जैसे बस में अपंगों और महिलाओं को सीट दे देने का शिष्टाचार है; रेलवे में अफसर को अपनी सीट खाली कर देने का शिष्टाचार है। मुझे वह लाभ मिला। पर जल्दी ही मुझे दूसरे चेम्बर, जहां डेण्टिस्ट के काम करने के लिये बड़ी रिक्लाइनिंग सीट-कम-बिस्तर लगे थे, में बैठने के लिये जगह मिल गयी। उस चेम्बर में उपकरण नये थे। बिस्तर पर अभी नया पॉलीथीन कवर भी नहीं उतरा था। कुल मिला कर काफ़ी आधुनिक डेण्टल क्लीनिक का एम्बियेन्स दे रहा था वह चेम्बर। डाक्टर हाण्डू एक रिक्लाइनिंग सीट पर लेटे एक मरीज के दांतों की मरम्मत करने में व्यस्त थीं। उनके मुंह पर डाक्टरी मास्क लगा था। वे यदा कदा मरीज को या अपने सहायक को निर्देश में कुछ कह रही थीं। मुझे कुछ मायूसी हुई कि पॉल थरू के पुस्तक की डाक्टर इसिल इव्सिमिक की तरह रनिंग कमेण्ट्री नहीं दे रही थीं। 😦

जल्दी ही मेरा नम्बर आ गया। मुझे उस चेम्बर में उपलब्ध दूसरी सीट पर रिक्लाइन करने को कहा गया। डाक्टर हाण्डू ने मेरे दांतों का मुआयना किया और मेरी समस्या पूछी।

कुछ महीनों से आगे के नीचे और ऊपर के दांतों में ठण्डा या गरम के कॉण्टेक्ट में आने पर तेज अहसास होता है। अदरवाइज़ दर्द नहीं होता।

डाक्टर ने दांतो को ठक ठक ठोंकते हुये पूछा – दर्द होता है?

नहीं, केवल ठण्डा-गर्म से तकलीफ है।  

दांतों में कीड़ा लग गया है।

दांत के कीड़े की परिकल्पना
दांत के कीड़े की परिकल्पना

मुझे मन ही मन यह लगा कि कोई कीड़ा है जो दांतों में घुसा खाये जा रहा है दांतों को। मैने मेण्टल नोट किया कि बाद में इस कीड़े को इण्टरनेट पर तलाश करूंगा। बाद में तलाश करने पर पता चला कि ऐसा कोई कीड़ा नहीं है। चीनी या अन्य खाद्य पदार्थों से पैदा होने वाले अम्ल में पनपने वाले बेक्टीरिया दांतों का कैविटी या केरीज (cavity, caries) के रूप में क्षरण करते हैं। उसे ही सामान्य भाषा में कीड़ा लगना कहा जाता है। दांत या चमड़ी के डाक्टरों को मैने जन सामान्य को समझाने के लिये मैडिकल जार्गन रहित भाषा का प्रयोग करते पाया है – जैसे डाक्टर हाण्डू ने कीड़ा का प्रयोग किया या जैसे बहुत पहले एक चर्म रोग विशेषज्ञ मुझे डर्मेटाइटिस के सुधार के बारे में कहते थे कि “चार आना भर” सुधार हो गया है।


दांतों में समस्या भारतीय लोगों में पान-तम्बाकू खाने के कारण अधिक होती है। लोगों में मीठा खाने की प्रवृत्ति कम है। पर मेरे साथ पान खाने का कोण नहीं है। अलबत्ता मीठा बाभन नहीं खायेगा तो कौन खायेगा! 🙂
मुझे बताया गया कि दवाओं के लम्बे समय तक सेवन से भी हड्डियों (जिनमें दांत भी शामिल हैं) में क्षरण होता है। वह भी एक कारण हो सकता है मेरे साथ।


दांतों में दर्द न होने के कारण डाक्टर ने सफाई कर दांत की फिलिंग का निर्णय किया। उन्होने मुझे बाद में बताया कि अगर फिर भी ठण्डा-गर्म की सेन्सिटीविटी (आम भाषा में “पानी लगना”) होती है तो वे आर.सी.टी. (root canal treatment) करेंगी। दांतों की सफ़ाई और फिलिंग की प्रक्रिया में मुझे कई बार थूकना पड़ा। पानी या दवाओं की फुहार, खुरचने की क्रिया, फिलिंग की तकनीक – सभी मेरे मुंह पर अजमायी जा रही थीं और मेरे मन में यह था कि अगर इस सब की एक फिल्म बनती जो मैं बाद में देख पाता तो वह मुझे काफ़ी इनसाइट देती डेण्टिस्ट्री के बारे में। अन्यथा मैं तो लेटा लेटा यदा कदा दीवार पर टंगी उस सफ़ेद स्वस्थ दांत वाली सुन्दर लड़की का फोटो ही देख पा रहा था, या फिर डाक्टर के उस असिस्टेण्ट को; जिसके सिर के पृष्ठ भाग में उसको सवर्ण घोषित करती उसकी छोटी चोटी थी, जो छोटे खिचड़ी रंगत के बालों का अधेड़ था, जो काम दक्षता से कर रहा था पर शक्ल सूरत से देहाती लग रहा था – मेरी तरह!

अपने इण्ट्रोवर्ट नेचर के विपरीत मैं वहां अधिकधिक सम्प्रेषण की अपेक्षा कर रहा था – जो मिला नहीं। यह मेरी डाक्टर के साथ पहली सिटिंग थी। इसमें मेरे नीचे के दांत की फिलिंग हुई। शनीवार को दूसरी सिटिंग है, जिसमें ऊपर के दांत की फिलिंग होनी है। शायद उस दिन मैं डाक्टर हाण्डू से कुछ प्रश्न कर पाऊं।

दूसरी सिटिंग

शनिवार को नियत समय पर पंहुच गया। इन्तजार करते समय मेरे बगल में मैले कुचैले कपड़े पहने, चारखाने का स्कार्फ़ जैसा गमछा सिर पर बांधे एक वृद्ध बैठा था। हाथ में एक पतली सी बांस की लकड़ी थी जो ठीक से न संभालने के कारण यदाकदा गिर जाती थी। हाथ में अपने कागज लिये, लम्बी प्रतीक्षा के लिये तैयार बैठा था वह।

दीवार पर दांतों को दिखाते हुये विज्ञापनी महिला का चित्र था – किसी Glizer कम्पनी का। देखने वाले को निहारती हंसती महिला अपने स्वस्थ दांत दिखा रही थी। पर देखने वाला मेरे जैसा इनफ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स वाला हो तो उसे लग सकता है कि अपने अच्छे दांतों से वह चिढ़ा रही है। वहां बैठे मैं बहुत जल्दी उकताने लगा।

डाक्टर हाण्डू एक महिला के दांतों की डेण्टिस्ट्री में व्यस्त थीं। ॒अपने महीन स्वर में यदा कदा अपने सहायक या उस महिला को निर्देशात्मक कुछ कहती थीं। आज सहायक कोई दूसरा व्यक्ति था – परसों वाले से ज्यादा स्मार्ट।

मुझे ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा और सिटिंग में भी ज्यादा समय नहीं लगा। मैने बताया कि पिछली सिटिंग के बाद नीचे के दांतों में मुझे पानी लगने की समस्या नहीं हुयी। एक आध बार लगा कि हल्का सेनसेशन है, पर वह शायद ऊपर वाले दांतों का सेनसेशन नीचे वाले दांतों का होने का समझने की मेरी गलती भी हो सकती है। डाक्टर को शायद मेरा यह तर्क सही न लगा। पर उन्होने बिना समय गंवाये मेरे ऊपर के दो दांतों की सफ़ाई-घिसाई और फिलिंग का काम लगभग बीस मिनट में पूरा कर लिया।

डाक्टर मंजुलता हाण्डू
डाक्टर मंजुलता हाण्डू

डाक्टर हाण्डू ने काम पूरा कर अपना मास्क उतारा तो पहली बार मैने उनका चेहरा देखा। उनकी अनुमति मांगी कि उनका एक फोटो अपने ब्लॉग के लिये ले लूं? और जैसा एक घुटा हुआ ब्लॉगर करता है – इससे पहले कि सामने वाला व्यक्ति अपनी सहमति या विरोध दर्ज करे, मैं उनका चित्र ले चुका था। उन्हे मैने बताया कि इस सिटिंग्स के बारे में मैं एक पोस्ट लिखूंगा और उन्होने कहा कि भविष्य में कभी भी आवश्यकता हो तो मैं उनके डेण्टल क्लीनिक पर आ सकता हूं।

मेरे मन में पहले यह धारणा थी कि डेण्टल डाक्टर के पास जाने का मतलब ही होता है लगभग 80% सम्भावना कि दांत उखाडा जायेगा और कुछ दिन तक भीषण दर्द रहेगा या फिर चेतावनी मिल जायेगी कि आपके सही तरीके से दांतों की देखभाल न करने से उनकी की आयु लगभग समाप्त है… पर वैसा नहीं हुआ। डाक्टर की दांतों की दक्ष फ़िलिंग के बाद अब काफी समय तक मुझे परेशान नहीं होना होगा। उनके कहे अनुसार सॉफ्ट ब्रश और हल्के से मंजन की शुरुआत मुझे करनी है।

बाकी, दांतों की फिलिंग लगभग कितना चलेगी, यह डाक्टर हाण्डू से पूछना भूल गया…

मछुआरा


नदी की ओर जाता मछुआरा
नदी की ओर जाता मछुआरा

वह तेजी से गंगा किनारे चलता जा रहा था। एक हाथ में मछली पकड़ने की बन्सी (डण्डी) लिये और दूसरे हाथ में तितली पकड़ने वाला जाल। गेरुये रंग की टी-शर्ट पहने और नीचे गमछा लपेटे था। उग रहे सूर्य के सामने वह आस पास के वातावरण में विशिष्ट लग रहा था। मैं अपनी सवेरे की सैर पूरी कर कछार से लौट रहा था पर उसका चित्र लेने के लोभ में वापस, उसकी ओर मुड़ गया। वह निकल न जाये, मैने लगभग आदेश के स्वर में उससे कहा – रुको, जरा फोटो लेनी है।

***

दूर जाता दिखा था वह मछुआरा सूर्योदय की रोशनी में।

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***

वह रुका। एक पोज सा बनाया। गेरुआ टी-शर्ट में बांस की डण्डी कांधे पर टिकाये वह दण्डी स्वामी जैसा लग रहा था – मानो किसी मठ का सन्यासी हो!

चित्र लेते हुये मैने पूछा – कैसे पकड़ते हो मछली?

मछुआरा
मछुआरा

इस जाल में छोटी मछली पानी में ऐसे ही बीन लेते हैं और फिर छोटी को कांटे में फंसा कर बड़ी पकड़ते हैं।

अच्छा, कितनी बड़ी मिल जाती हैं?

वह साइज़ पर प्रतिबद्ध नहीं हुआ। ठीक ठाक मिल जाती है।

कुल कितनी मिल जायेगीं, दो तीन किलो?

हां, काम भर को। कभी मिलती हैं, कभी नहीं।

कब तक पकड़ते हो?

यही, कोई आठ बजे तक।

छ बज रहे थे सवेरे के। उसके पास मेरे सवालों का जवाब देने को ज्यादा वख्त नहीं था। मेरे सामने वह तट पर उथले पानी में जाल से छोटी मछलियां पकड़ने लगा।

समय हो चुका था लौटने का। मैं चला आया।

उथले पानी में वह तट के पास छोटी मछलियां निथारने लगा वह मछुआरा।
उथले पानी में तट के पास छोटी मछलियां निथारने लगा वह मछुआरा।

हिन्दू धर्म की फूहड़ श्रद्धा


नवरात्रि के बाद यहां इलाहाबाद में संगम पर मूर्ति विसर्जन में रोक थी। काफी असमंजस का माहौल था। अन्तत: शायद विसर्जन हुआ।

फूहड़ हिन्दू श्रद्धा का प्रमाण।
फूहड़ हिन्दू श्रद्धा का प्रमाण।

हमारे धर्मावलम्बी मुसलमानों को दकियानूसी होने, कुराअन और हदीज़ का भाव वर्तमान समाज के परिप्रेक्ष्य में न लेने आदि के आक्षेप लगाने में नहीं चूकते। पर अपने धर्म में भी बदलते समय के अनुसार उपयुक्त बदलाव के प्रति उनमें जागृत चेतना का अभाव व्यापक दीखता है। नदी में मूर्ति-विसर्जन के कारण हो रहे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव को ध्यान में रखते हुये उन्हे मूर्तियों, हवन सामग्री और अन्य यज्ञ आदि के कचरे को निपटाने की वैकल्पिक विधि का विकास करना था। वह उन्होने नहीं किया।

न करने पर हिन्दू जनता की धर्म के प्रति फूहड़ श्रद्धा गंगा किनारे बिखरे इन मूर्तियों के अवशेषों के रूप में दिखने लगी है। शिवकुटी, इलाहाबाद में गंगा किनारे इन मूर्तियों के अवशेषों के चित्र ले रहा था तो एक 12-13 साल का बच्चा मेरे पास आया।

उसने बताया – ये मूर्ति पुल से नीचे गिराई गयी थी।

तुम्हे कैसे मालुम?

हम गये थे। उहां (संगम की दिशा में इशारा कर) बहाने की मनाही कर दी थी, तो पुल पर ले कर गये थे। नदी में गिरा दिया था।

अच्छा, नदी में बह कर आई?

हां।

उस लड़के ने मुझे महत्वपूर्ण जानकारी दी। मूर्तियां विधिवत विसर्जन की सुविधा (?) न मिलने पर लोग वैकल्पिक निस्तारण की बजाय फाफामऊ पुल से टपका गये मूर्तियां।

फूहड़ श्रद्धा! कल अगर पर्यावरण के प्रभाव में रसूलाबाद का दाह-संस्कार का घाट बन्द कर दिया जाये, तो लोग विद्युत शवदाहगृह तलाशने की बजाय लाशें कहीं पुल से न टपकाने लग जायें। फूहड़ संस्कारी हिन्दू। 😦

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गोनूडीह की ओपनकास्ट खदान


कुसुण्डा, धनबाद के पास अण्डरग्राउण्ड कोयला खदान (गोधर कोलियरी) देखने के बाद मैं BOBR वैगनों में कोयला लदान देखने के लिये कुसुण्डा2 साइडिंग में गया। कुसुण्डा के यार्डमास्टर श्री चटर्जी ने बताया कि वहां सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं और प्लेसमेण्ट के लिये जाने वाले कोल-पाइलट (इंजन जो कोयले का रेक ले कर साइडिंग में जाता है, पाइलट कहाता है) पर चढ़ कर भी। वे हमें कोल पाइलट में ले कर गये।

रास्ता कोयलामय था। कहीं लोग कोयला इकठ्ठा कर जला रहे थे - हार्ड कोक बनाने के लिये।
रास्ता कोयलामय था। कहीं लोग कोयला इकठ्ठा कर जला रहे थे – हार्ड कोक बनाने के लिये।

रास्ता कोयलामय था। कहीं लोग कोयला इकठ्ठा कर जला रहे थे – हार्ड कोक बनाने के लिये। यह हार्डकोक (फोड़) ईन्धन के रूप में या साइकल पर ले जा कर मार्किट में बेच कर आमदनी के लिये करते हैं वे। कहीं अण्डरग्राउण्ड खदान से निकला पानी पाइप के माध्यम से बाहर फैंका जा रहा था और उसमें लोग नहा रहे थे। श्रमिकों और रेल कर्मियों की बस्तियां थीं। छोटे छोटे मकान, झोंपड़ी नुमा। आशा से ज्यादा साफसुथरे। कोयला बेच कर प्रतिदिन 400 रुपये की आमदनी और परिवार में सभी का उस काम में लगे रहना एक अच्छी खासी कमाई का संकेत देता है; पर जीवन स्तर उसके अनुरूप नजर नहीं आता था। जीवनस्तर की मध्यवर्गीय मानसिकता – जो उस स्तर की आमदनी के साथ जुड़ी रहती है, का नितांत अभाव दिखा मुझे। पैसा निश्चय ही अनेक कुटेव-कुरीतियों में जा रहा होग। वह कोण पता करने के लिये मैं उचित माहौल/मानसिकता में नहीं जा रहा था। आप उसके लिये साहब की तरह नहीं जाते…

साइडिंग लगभग कोयला विहीन थी। पिछले दिनों की बरसात में वहां कोयले का खनन न होने से आमद नहीं हो पायी थी।
साइडिंग लगभग कोयला विहीन थी। पिछले दिनों की बरसात में वहां कोयले का खनन न होने से आमद नहीं हो पायी थी।

कुसुण्डा2 साइडिंग में रेक प्लेस हुआ। साइडिंग लगभग कोयला विहीन थी। पिछले दिनों की बरसात में वहां कोयले का खनन न होने से आमद नहीं हो पायी थी। बीसीसीएल के साइडिंग एजेण्ट श्री सुनील निगम ने बताया कि यह रेक तो एक डेढ़ दिन तक लोड नहीं हो पायेगा। मेरी लदान की प्रक्रिया देखने की इच्छा वहीं दब गयी।

मेरे साथ चल रहे धनबाद रेल मण्डल के सहायक परिचालन प्रबन्धक श्री सन्दीप कुमार ने बताया कि पास ही में एक एक्स्केवेटर जमीन खोद कर ओपनकास्ट खदान बनाने का उपक्रम कर रहा है। चित्र लेने के उत्साह में मैने ध्यान नहीं दिया कि खोदी गयी जमीन ऊपर से सूखी है, पर सूखी पपड़ी के नीचे दलदल है। मेरे पैर उस दलदल में धंस गये। लगभग टखने तक। चमड़े का रेड-चीफ का (मेरे बजट के हिसाब से) मंहगा जूता और मेरा पतलून कोयला-कीचड़ मिश्रित दलदल से सन गया। यह तो गनीमत थी, कि दलदल और गहरी नहीं थी, और टखने तक धंसाव के बाद मैं सम्भल गया। हमारे साथ चल रहे टी.आई. श्री संजीव कुमार झा ने आगे बढ़ कर मुझे उस दशा से उबारा। तीन चार बालटी पानी, गेटमैन की लाल-हरी झण्डी व उनका गमछा प्रयोग करते हुये पैर व जूता इस दशा में लाये गये, जिससे मैं अपना आगे का कार्यक्रम जारी रख सकूं। झा जी ने बहुत सहायता की ऐसे में।

ओपनकास्ट माइन बनाने वाले दृष्य़ को खैर कैमरे में लेना नहीं भूला मैं! बहुत मंहगा पड़ा था यह दृष्य मुझे!
ओपनकास्ट माइन बनाने वाले दृष्य़ को खैर कैमरे में लेना नहीं भूला मैं! बहुत मंहगा पड़ा था यह दृष्य मुझे!

ओपनकास्ट माइन बनाने वाले दृष्य़ को खैर कैमरे में लेना नहीं भूला मैं! बहुत मंहगा पड़ा था यह दृष्य मुझे!  😆

बीसीसीएल के अधिकारी महोदय ने कहा कि वे हमें पास की एक ओपनकास्ट माइन तक ले चलेंगे अपनी कार में। उनके साथ हम गोनूडीह ओपनकास्ट खदान देखने गये। विशालकाय खदान क्षेत्र। हम लोग ऊंचाई पर खड़े थे। नीचे विस्तृत खदान थी। उसके एक हिस्से में खनन चल रहा था। एक तरफ दोपहर 1 से 2 बजे के बीच होने वाले कोयले के विस्फोट की तैयारी करती ड्रिलिंग मशीन कार्यरत थी। ऊंचाई से देखने पर ये ड्रिलिन्ग, एक्स्केवेटर, डम्पर आदि बच्चों के खिलौनों जैसे लग रहे थे। कार्यरत कर्मी तो बहुत ही छोटे प्रतीत होते थे।

विशालकाय खदान क्षेत्र। हम लोग ऊंचाई पर खड़े थे। नीचे विस्तृत खदान थी। उसके एक हिस्से में खनन चल रहा था।
विशालकाय खदान क्षेत्र। हम लोग ऊंचाई पर खड़े थे। नीचे विस्तृत खदान थी। उसके एक हिस्से में खनन चल रहा था।

ऊंचाई पर हम लोगों के पास एक व्यक्ति कोयला खनन/वहन का असेसमेण्ट के लिये एक ट्राइपॉड पर दूरबीन लगाये हुये थे। नीचे अपने सहकर्मी से वे मोबाइल के माध्यम से बात कर रहे थे। दूरबीन और मोबाइल के माध्यम से लगभग वैसे वार्तालाप हो रहा था, मानो वीडियो-कांफ्रेंसिंग हो रही हो। पता नहीं यह मानक तकनीक है या विशुद्ध हिन्दुस्तानी जुगाड़मेण्ट! यह तकनीक मुझे बहुत पसन्द आयी!

एक व्यक्ति कोयला खनन/वहन का असेसमेण्ट के लिये एक ट्राइपॉड पर दूरबीन लगाये हुये थे। नीचे अपने सहकर्मी से वे मोबाइल के माध्यम से बात कर रहे थे।
एक व्यक्ति कोयला खनन/वहन का असेसमेण्ट के लिये एक ट्राइपॉड पर दूरबीन लगाये हुये थे। नीचे अपने सहकर्मी से वे मोबाइल के माध्यम से बात कर रहे थे।
ओपनकास्ट खदान के एक ओर जहां पर्याप्त खनन हो चुका था, पानी की एक झील बन चुकी थी।
ओपनकास्ट खदान के एक ओर जहां पर्याप्त खनन हो चुका था, पानी की एक झील बन चुकी थी।

ओपनकास्ट खदान के एक ओर जहां पर्याप्त खनन हो चुका था, पानी की एक झील बन चुकी थी। खनन के बाद बनने वाले इस तरह के गढ्ढों को भरने के विषय में भी कोई नियम होगा … पर उस नियम के पालन में कोई गम्भीरता या कड़ाई हो, ऐसा प्रतीत नहीं हुआ।

सुनील निगम जी अपनी समस्यायें बताने में पूरी तरह नहीं खुले, पर उनसे बात करने पर मुझे लगा कि माइनिंग के लिये जमीन का अधिग्रहण और एनवायरमेण्टल क्लियरेंस बड़े अवरोध हैं। कोयले में माफिया की दखलन्दाजी, राजनैतिक दलों/यूनियनों की चौधराहट और कोल इण्डिया की अपनी अक्षमता/भ्रष्टाचार आदि तो घटक होंगे ही। खैर, वह सब पता करने के ध्येय से मैं वहां गया भी नहीं था, और अपनी पतलून, रेड-चीफ का जूता कीचड़ में सानने के बाद बहुत उत्साह बचा भी न था।

यह सब देखने के बाद जब कुसुण्डा के एक केबिन पर यार्ड मास्टर श्री चटर्जी जी ने फ्रूट-जूस पिलाया तो सरलता से गटक गया मैं – कोई ना नुकुर नहीं किया कि मुझे टाइप 2 डाइबिटीज़ है!

बहुत अच्छा लगा कुसुण्डा, धनबाद में यह देखना। मौका मिलेगा तो फिर जाना चाहूंगा। विकल्प रहे कि ताजमहल देखना हो या यह खदान क्षेत्र; तो इसी क्षेत्र में आना चाहूंगा।

ऑफकोर्स, अगली बार सस्ते जूते पहन कर आऊंगा! 😆

गूनूडीह खदान का एक अन्य दृष्य
गोनूडीह खदान का एक अन्य दृष्य

गोधर कोलियरी – अण्डरग्राउण्ड खदान


खदान दिखाने वाले नन्दकुमार दास (बांये) और अजित।
खदान दिखाने वाले नन्दकुमार दास (बांये) और अजित।

धनबाद के पास स्टेशन है कुसुण्डा। वहां कई कोयला खदानें हैं। ओपन-कास्ट भी और अण्डरग्राउण्ड भी। मैं वहां खदान देखने नहीं, रेलवे के वैगनों में लदान देखने गया था। पिछले तीन चार दिन तेज बारिश होती रही थी। खनन का काम बहुत नहीं हो पाया था। इस लिये लदान का काम धीमा था। बहुत जगह साइडिंग में रेलवे के रेक थे, पर पर्याप्त मात्रा में कोयला नहीं था। मौसम खुला रहने पर एक दो दिन में खनन और लदान का काम तेजी पकड़ेगा।

गोधर कोलियरी के बाहर का दृष्य। ट्रॉली की पटरी और कोयले का भण्डार दिख रहा है।
गोधर कोलियरी के बाहर का दृष्य। ट्रॉली की पटरी और कोयले का भण्डार दिख रहा है।

लदान का काम देखने को  नहीं था, तो मैने आस पास की कोयला खदान को देखने की ओर अपने को मोड़ा। कुसुण्डा के पास यह थी – गोधर कोलियरी।

गोधर कोलियरी का प्रवेश।
गोधर कोलियरी का प्रवेश।

इस अण्डरग्राउण्ड कोलियरी के बाहर काफ़ी कोयला था। बचपन से छोटे वैगनों में खदान से कोयला निकालने के लिये बिछी रेल-पटरी का चित्र हम देखते आये हैं। वे ट्रॉली/वैगन और रेल की पटरी दिखाई दे रही थी। मैं उन्ही का चित्र ले रहा था। कुछ खदान श्रमिक खदान में जा रहे थे। एक श्रमिक नें मेरे साथ सहायक ऑपरेटिंग मैनेजर और टी.आई. साहब से पता किया कि हम रेलवे से हैं। फिर उसने मुझे निमन्त्रण दिया – अन्दर आ कर देखिये न!

उस श्रमिक से बाद में मैने नाम पूछा। बताया नन्दकुमार दास। उनके साथ पीली कमीज पहने दूसरे सज्जन भी थे। अजित। इन दोनों ने हमें खदान दिखाई।


खदान देखने में मेरे साथ थे –

श्री सन्दीप कुमार, धनबाद रेल मण्डल के सहायक परिचालन प्रबंधक और श्री संजीव कुमार झा, यातायात निरीक्षक, धनबाद रेल मण्डल। सन्दीप मोतिहारी के रहने वाले हैं और इस समय धनबाद रेलवे स्टेशन के स्टेशन मैनेजर का भी काम देख रहे हैं। संजीव भी मूलत: उत्तर बिहार – मधुबनी के हैं।


हमारे साथ के टी.आई. साहब ने सोचा कि खदान में घुसने के पहले विधिवत पता कर लिया जाये। खदान के मैनेजर साहब ने कहा कि थोड़ी दूर हम लोग जा कर देख सकते हैं। वे हमें खदान के अन्तिम छोर तक जाने की भी अनुमति दे देंगे, अगर हम इण्डेमिनिटी बॉण्ड भर कर दें कि कुछ होने पर खदान प्रबन्धन की जिम्मेदारी न होगी। हमारा इरादा अन्तिम छोर तक जाने का नहीं था – सो इनडेमिनिटी बॉण्ड भरने पर विचार नहीं किया। उस खदान श्रमिक – नन्दकुमार दास के आमन्त्रण पर खदान में कुछ दूर तक गये हम। करीब 100-125 मीटर तक।

पाली बदलने का समय था। श्रमिक अन्दर जा रहे थे। साइड में जो पाइप दिख रहा है, उससे खदान में होने वाला पानी बाहर निकाला जाता है।
पाली बदलने का समय था। श्रमिक अन्दर जा रहे थे।
साइड में जो पाइप दिख रहा है, उससे खदान में होने वाला पानी बाहर निकाला जाता है।

लगता है पाली बदलने का समय था। श्रमिक अन्दर जा रहे थे। अपने टोप हाथ में लिये। कुछ के हाथ में बेलचे थे। अपनी पोटली/झोले लिये थे। शायद अपना भोजन रखा होगा उनमें। खदान के प्रारम्भ में काली मां का चित्र था दीवार पर। उस चित्र को नमस्कार कर आगे बढ़ रहे थे वे। खदान में काम करना खतरे से खाली नहीं। और जहां खतरा हो, वहां दैवी शक्ति का ध्यान व्यक्ति बरबस कर लेता है।

खदान के मुहाने पर काली मां का चित्र। सामने नदकुमार दास हमें बुलाते हुये।
खदान के मुहाने पर काली मां का चित्र। सामने नदकुमार दास हमें बुलाते हुये।

नन्दकुमार और अजित ने अपने टोप लगा लिये और उसके सामने लगी टॉर्च जला ली। वे हमारे आगे आगे चले और हमें बारबार हिदायत देते रहे कि फ़िसलन है, इस लिये हम लोग संभाल कर पैर रखें। बरसात का मौसम था। खदान की छत से पानी टपक रहा था। खदान में फर्श पर कोयले की परत होने से फिसलन भी थी। श्रमिक लोग तो गम-बूट पहने थे, हमारे जूते जरूर उस फ़िसलन में चलने लायक नहीं थे। फिर भी स्थिति इतनी खराब नहीं थे।

खदान के अन्दर रोशनी।
खदान के अन्दर रोशनी।

खदान में रोशनी थी कुछ कुछ दूरी पर। उससे रास्ता स्पष्ट हो रहा था। लगभग 30 अंश के ढलान पर हम चल रहे थे। तीस चालीस कदम पर मैं रुक गया तो नन्दकुमार जी ने कहा – “थोड़ा और आइये। आगे जंक्शन है। वहां तक देख जाइये”।

जंक्शन यानी वह स्थान जहां सीधी खदान की सुरंग से दो दिशाओं में लम्बवत सुरंगें फूटती थीं। वहां रोशनी कुछ ज्यादा थी। बाजू की तरह की सुरंगों में हम कुछ दूर घूमे। मुझे लगा कि अनजान आदमी इन सुरंगों की भूलभुलैया में अगर फ़ंस जाये तो इन्ही में उसका दम निकल जाये।

जंक्शन के पास दीवार पर लिखा यह संरक्षा का नारा।
जंक्शन के पास दीवार पर लिखा यह संरक्षा का नारा।

लम्बी सुरंग में दूर तक रोशनी दिख रही थी। मानो अन्त में बाहर निकलने का मार्ग हो और अन्त में सूर्य की रोशनी हो। पर नन्दकुमार ने बताया कि सुरंग के अन्त में भी काम चल रहा है खनन का। “करीब सताईसवें पिल्लर पर खुदाई हो रही है।”

नन्दकुमार ने मुझे अपनी टॉर्च से पिल्लर (पिलर) दिखाये। खदान को सपोर्ट देने के लिये दीवार में ईंटों से मोटे खम्भे बने थे। इसके अलावा खदान की छत को धसकने से बचाने के लिये कुछ कुछ दूरी पर बल्लियां रखी हुई थीं फ़र्श पर; जिन्हे जरूरत पड़ने पर छत को टेका दिया जा सकता था।  दो पिलर के बीच 70 से 100 फ़िट का फ़ासला है। इस तरह लगभग पौना किलोमीटर लम्बी खदान है गोधर कोलियरी। इसके अलावा जंक्शन से बाजू में फैली सुरंगें अलग।

खदान के अन्दर पिलर दिखाते नन्दकुमार दास।
खदान के अन्दर पिलर दिखाते नन्दकुमार दास।

नंदकुमार ने बताया कि एक ट्रॉली में लगभग सवा टन कोयला समाता है। पांच ट्रॉली का सेट एक साथ लोड हो कर रोप-पुली के जरीये बाहर आता है। अन्दर निकलने वाला कोयला और पत्थर, दोनो इसी ट्रॉली में बाहर भेजे जाते हैं।

लगभग 15-20 मिनट हम लोग रहे होंगे खदान में। अजित और नन्दकुमार कुछ दूर हमें वापस छोडने आये। बहुत अच्छा लगा उनका साथ। पता नहीं, जिन्दगी में फिर कभी उनसे मिलना होगा या नहीं; पर उनसे मुलाकात का यह दस्तावेज ब्लॉग पर तो रहेगा!

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खदान में पानी काफी होता है। बारिश का पानी भी रिस कर खदान में पंहुचता है। यह पाइप के माध्यम से बाहर निकाला जाता है। कोलियरी के बाहर मैने एक जगह इस पानी की निकासी और उसमें नहाते बच्चे-बड़े देखे।

खदान का पानी बाहर गिराया जा रहा है।
खदान का पानी बाहर गिराया जा रहा है।