घासफूस बीनना, फिर घर के काम; जिंदगी कठिन है!

दलित बस्ती की महिलायें; अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर पर रहती और घासफूस बीन कर खाना बनाने का ईंधन और सर्दी से बचने का इंतजाम करती महिलायें; उन्हे भी मोदी नाम का नेता पता है जो शायद उनके बारे में सोच सकता है। मुझे लगा कि मोदी की सबसे बड़ी राजनैतिक ताकत तो यह बन गयी है!


वे तीन औरतें थीं। दो खेत से घास बीन कर आ रही थीं और तीसरी गंगा किनारे की झाड़ियां तोड़ कर गठ्ठर बना रही थी। एक वृद्धा थी, दो युवतियां। मैं सड़क किनारे अपनी साइकिल खड़ी कर उनसे बतियाने लगा।

खेतों से खरीफ की फसल कटने के बाद जुताई हो गई है। उनमें अगली फसल की तैयारी के लिए पलेवा (पानी भरना) लगाया जाए, उससे पहले ये महिलायें उसमें से पिछ्ली फसल और खरपतवार की जड़ें (जिन्हे हल चलने के कारण बीनना आसान हो जाता है) इकठ्ठा कर रही थीं। पंजाब हरियाणा में पराली जला कर अगली फसल की तैयारी की जाती है। यहां पुआल (धान निकलने के बाद धान का सूखा पौधा) इकठ्ठा किया जाता है और उसकी अपनी अर्थव्यवस्था है। उसके बाद भी बचे खेत में से जड़ें और घास तक बीनने के लिये लोग तैयार हैं ये महिलाएं। यह गरीबी का स्तर है! कोई भी चीज बरबाद नहीं जाती। उसको इकठ्ठा करने के लिये लगे श्रम की अधिकता को कोई नहीं देखता। और कुछ उद्यम कर ईंधन के वैकल्पिक साधन जुटाने की सम्भावनायें ही नहीं हैं।

यहां धान का पुआल इकठ्ठा किया जाता है और उसकी अपनी अर्थव्यवस्था है। उसके बाद भी बचे खेत में से जड़ें और घास तक बीनने के लिये लोग तैयार हैं ये महिलाएं। यह गरीबी का स्तर है! कोई भी चीज बरबाद नहीं जाती।

महिलाओं में से एक बताती है कि दो घण्टे से वह यह इकठ्ठा कर रही है। घर जाने पर भी बहुत काम करना है। दो बच्चे हैं। इधर उधर घूम रहे होंगे। उनको स्वेटर पहनाना है। सर्दी बढ़ गयी है। उसके बाद इसी घास-फूस से खाना बनाना और कउड़ा तापने का इंतजाम होगा। इससे एक दिन का काम चलेगा। कल फिर इकठ्ठा करने के लिये निकलना होगा। उनके पास गाय-गोरू भी नहीं है जिनके गोबर से उपले बना कर ईंधन का इंतजाम हो सके। इस तरह घूम घूम कर जलावन इकठ्ठा करना उनकी हर रोज की जरूरत है।

“कल से स्कूल खुलेगा। एक दिन छोड़ कर एक दिन चलेगा शायद। बच्चे बहुत बदमाश हो गये हैं। उन्हें मार मार कर स्कूल भेजना होगा। स्कूल जाना थोड़े ही चाहेंगे।”

एक चूल्हा और सिलिण्डर तो मिला है। सब को मिला है। पर भराने को तो पैसा चाहिये। ये फोटो आप ले रहे हैं तो मोदी को भेज दीजियेगा। उसका इंतजाम कैसे होगा, उसका भी तो सोचें।

दलित बस्ती की महिलायें; अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर पर रहती और घासफूस बीन कर खाना बनाने का ईंधन और सर्दी से बचने का इंतजाम करती महिलायें; उन्हे भी मोदी नाम का नेता पता है जो शायद उनके बारे में सोच सकता है। मुझे लगा कि मोदी की सबसे बड़ी राजनैतिक ताकत तो यह बन गयी है! इस महिला को भी मोदी से (हल्की ही सही) आशा है कि उनकी दशा बदलने के लिये वे कुछ कर सकते हैं।

दलित बस्ती की महिलायें; अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर पर रहती और घासफूस बीन कर खाना बनाने का ईंधन और सर्दी से बचने का इंतजाम करती महिलायें; उन्हे भी मोदी नाम का नेता पता है जो शायद उनके बारे में सोच सकता है।

वह सरकार की बात नहीं करती। सरकार को उसने मोदी से रिप्लेस कर दिया है अपनी सोच में। निश्चय ही सारी आशा मोदी से है तो भविष्य में सारी निराशा भी वहीं जायेगी। मोदी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। पर शायद हज़ारों साल से वे अनंत आशा के साथ जिंदा हैं, इसी तरह जद्दोजहद कर एक एक दिन का इंतजाम करते लोग!

एक वृद्ध आते दिखे। वे महिलायें बोलीं – एनहूं क फोटो लई ल। दद्दाऊ चला आवत हयेन कऊडा क इंतजाम करई के (इनका भी फोटो ले लीजिये। दद्दा भी शाम के अलाव जलाने का इंतजाम करने चले आ रहे हैं)। वे वृद्ध हाथ में प्लास्टिक का बोरा जैसा कुछ लिये थे झाड़ियों की टहनियाँ समेटने के लिये। वे भी ढलती शाम और बढ़ती सर्दी के कारण घर परिवार की गर्माहट के लिये जुगाड़ बनाने निकले थे। ठिठक कर वे भी खड़े हो गये अपना फोटो खिंचाने के लिये।

“इनका भी फोटो ले लीजिये। दद्दा भी शाम के अलाव जलाने का इंतजाम करने चले आ रहे हैं”

शाम के साढ़े चार बज रहे थे। बस एक घण्टे से भी कम समय बचा है अंधेरा होने को। इस बीच कुछ लकड़ियां ले कर उन्हें अपने गांव कोलाहलपुर लौटना है।

साइकिल भ्रमण वापसी में आसपास के खेतों पर नजर जाती है तो अनेक महिलायेंं इसी तरह जोते गये खेतों से घास-फूस इकठ्ठा करने में व्यस्त दिखती हैं। उनके आसपास छोटे छोटे ढेर दिखते हैं घास और फसल की जड़ों के। बस आधे घण्टे में यह सब समेट वे घर लौटेंगी और घर में चूल्हा-चौका करने में व्यस्त हो जायेंगी।

खेतों में जलावन के लिये घास और जड़ें बीनती महिलायें।

जिंदगी कठिन है। 😦


अगर आप फेसबुक पर सक्रिय हैं तो कृपया मेरे फेसबुक पेज –

https://www.facebook.com/gyanfb/

को लाइक/फॉलो करने का कष्ट करें। उसके माध्यम से मेरे ब्लॉग की न्यूज-फीड आप तक सीधे मिलती रहेगी। अन्यथा वर्डप्रेस फेसबुक प्रोफाइल पर फीड नहीं भेजता।

धन्यवाद।


उड़द दल रही है सुग्गी; पर गीत गाना नहीं आता

कीली पर घूमती चकरी पर वह ध्यान रखती है। पांच या छ चक्कर लगने पर वह चकरी के मुंह में एक मुठ्ठी उड़द डालती है। चकरी की घरर घरर की आवाज आती है…


उसने पैर में आलता लगाया हुआ है। पायल पहनी है पैरों में। चांदी की मोटी पायल। बांया पैर खोल कर आगे किया हुआ है और दांया चकरी के पहले मोड़ रखा है। दांयी ओर एक तसले में उड़द रखी है जिसे वह चकरी से दल रही है। मैं चित्र इसलिये ले सका कि वह मेरे घर के प्रांगण में एक कपड़ा बिछा कर यह कार्य कर रही थी।

सुग्गी, चकरी से उड़द दल कर उड़द की दाल बनाती हुई।

वह सुग्गी है। आधे पर हमारी खेती करती है। इस साल उड़द ठीक ठाक हुई है। जितनी हुई है उससे मेरे और उसके घर का भोजन का काम चल जायेगा।

मैं ध्यान से देखता हूं। एण्टी क्लॉक वाइज चकरी चलाती है वह। कीली पर घूमती चकरी पर वह ध्यान रखती है। पांच या छ चक्कर लगने पर वह चकरी के मुंह में एक मुठ्ठी उड़द डालती है। ध्यान चकरी पर रहता है और दांया हाथ यंत्रवत तहले में से उड़द निकाल कर चकरी के मुंह तक आता है।

अमृतलाल वेगड़ जी का नर्मदा यात्रा के दौरान बनाया “चक्की पीसती नारी” का एक कोलाज।

मुझे अमृतलाल वेगड़ जी के बनाये एक चित्र की याद हो आयी; जो उन्होने नर्मदा यात्रा के दौरान उकेरा था। शायद मध्यप्रदेश में स्त्रियों का घूंघट निकाल रहना, काम करना न होता हो। … फिर भी सुग्गी का चित्र वेगड़ जी के चित्र जैसा ही है।

चकरी की घरर घरर की आवाज के साथ स्त्रियों का गायन हो सकता है। मैं सुग्गी को पूछता हूं – गाना नहीं गा रही? गाना नहीं आता?

हंस कर वह जवाब देती है – नांही, हमके नाहीं आवत”।

घर में वह अपने पति की बजाय खुद को आगे रख कर काम करती है। आवाज बुलंद है। आस पड़ोस से झगड़े टण्टे उसे ही निपटाने होते हैं। बुलंद आवाज और स्त्रियों के लोक गायन शायद साथ साथ नहीं चलते।

पर सुग्गी का दाल दलने का दृष्य बहुत भाया मुझे। गांवदेहात में भी अब ये दृष्य कम ही देखने को मिलते हैं।

पोस्ट अपडेट –

कौन सी उड़द दल रही थी सुग्गी? पता चला कि उड़द के पौधे पीटने के लिये उसने खलिहान की जमीन गोबर से लीपी थी। उसपर उड़द के पौधे पीटने के बाद जमीन पर जो झाड़न बची थी, उसकी उड़द निकाल कर वह दल रही थी। अर्थात यह जमीन पर गिरा बचा अन्न था। किसान कोई भी अनाज बरबाद नहीं जाने देता। यह लगभग छ किलो उड़द थी।

मैं उसकी मेहनत का मोल लगाऊं तो यह उड़द – अंत की मिट्टी में गिरी/सनी उड़द 4-5सौ रुपये किलो की होगी। पर इस मेहनत का कौन लगाये हिसाब? कौन लगाये मोल? सुग्गी ने गाना नहीं गाया। पर यह श्रम गीत से कम नहीं है!


उनकी गांव में मकान बनाने की सोच बन रही है। बसेंगे भी?

अगर ईमानदारी से कहा जाये तो हर व्यक्ति, जो गांव में रीवर्स माइग्रेट होने की सोचता है, उसे कुछ न कुछ मात्रा में नीलकण्ठ बनना ही होता है। पर मैं अगर गांव में आने के नफा-नुक्सान का अपनी प्रवृत्ति के अनुसार आकलन करता हूं; तो अपने निर्णय को सही पाता हूं।


कल 27 नवम्बर 2020 को भूपेंद्र और विकास, मेरे दो साले साहब वाराणसी से सवेरे सवेरे गांव आये। वे दोनों वहां कारोबार करते हैं। मूलत: बस यातायात से सम्बंधित कार्य। मेरे घर के बगल में अपने मकान बनाने का उनका विचार बन रहा है। पिछले साल भर से वे ऐसा सोच रहे हैं। कोरोना काल में यह विचार और भी प्रबल हो गया है।

मेरे चार साले साहब हैं – एक तो यहीं गांव में रह कर खेती-किसानी-नेताई संभालते हैं। वे (शैलेंद्र) भाजपा के भदोही के बड़े नेता हैं। एक बार भाजपा के प्रांतीय एसेम्बली के उम्मीदवार भी रह चुके हैं। सबसे बड़े, धीरेंद्र बेंगलुरु में किसी कम्पनी के शीर्ष पर थे और अब अपना कोई सलाहकारी का कार्य कर चुके हैं। फेसबुक पर तो शायद उपस्थिति नहीं है – वे लिंक्डइन जैसी साइट के मटीरियल हैं। बाकी दो के बारे में पहले पैराग्राफ में लिख चुका हूं।

मौका मुआयना और जलपान के बाद हमारे घर में ग्रुप फोटो। चित्र में मेरे तीन साले साहब और उनमें से दो की पत्निया हैं।

गांव में शैलेंद्र के पास अपना मकान है। बाकी तीन बनवाने की सोच रहे हैं।

गांव के बगल से गुजरती नेशनल हाईवे 35 (ग्राण्ड ट्रंक रोड) के 6 लेन बनने का काम भी पूरा हो चुका है। गांव से बनारस के किनारे पंहुचने में कार से आधा घण्टा लगता है। घर के बगल से गुजरती बनारस-प्रयागराज रेल लाइन का दोहरीकरण भी लगभग पूरा हो गया है। एक गंगा एक्स्प्रेस वे के बनने की बात भी सुनने में आती है। वह भी शायद गांव के पास, गंगा किनारे से गुजरे। कुल मिला कर गांव में रहना अब उतना गंवई नहीं रह गया। बड़ी तेजी से बदलाव हो रहे हैं।

जमीन का मौका-मुआयना करते मेरे सम्बंधी

इन लोगों ने जमीन का मौका-मुआयना किया। तीन मकान बनने हैं उसमें। दो उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बनेंगे, एक पूर्व की ओर होगा। कितनी जमीन है, कितने कमरे बनेंगे, कितनी चारदीवारी बनानी होगी। मकान की कुर्सी कब, कैसे बनेगी और जमीन कितना ऊपर उठानी होगी – इस सब का प्रारम्भिक विचार विमर्ष हुआ। मेरी पत्नीजी और मेरा उसमें योगदान केवल चाय-नाश्ते का इंतजाम था। हमें तो इसी बात की सनसनी और खुशी हो रही थी कि हमारे आसपास लोग बसने जा रहे हैं। मेरा तो यह मानना है कि अभी अगर मकान बना लेंगे और महीने में एक-आध चक्कर लगाने की सोचेंगे तो अंतत: गांव उन्हें अपनी ओर परमानेण्ट रिहायिश के लिये खींच लेगा। शहर से मात्र आधा घण्टा की दूरी और बेहतर आबोहवा के कारण गांव रहने का बेहतर विकल्प होगा! कोरोना काल ने यह और अच्छे से समझा दिया है लोगों को।

गांव के बारे में वर्णन करने को बहुत कुछ अच्छा है। पर बहुत कुछ ऐसा भी है, जिसे मैंने गांव में रहने के पहले नहीं जाना था। लोगों के पास समय बहुत है और वह आजकल परनिंदा में ज्यादा व्यतीत होता है। ईर्ष्या लोगों में उतनी ही है, जितनी शहरों में। अच्छे और बुरे लोगों का अनुपात भी गांवदेहात में वैसा ही होगा जैसा शहर में। पर शहर में लोगों के पास कुटिलता के आधार पर गलत करने के लिये, अपने पड़ोसियों का बुरा करने के लिये समय कम होता है। जिंदगी की भागमभाग जो है। गांव में “खुराफात” के लिये बहुत समय है।

विकास हो रहा है, पर बन रही सुविधाओं का रखरखाव गांव में शहर की बनिस्पत खराब है। सड़कें बनने के साथ ही टूटने लगती हैं। सोलर लाइटें मेरे गांव में आने के साथ लगी थीं – कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉनिबिलिटी के फण्ड से। गांव जगमग नजर आता था। पर अब वे बेकार हो चुकी हैं। उनकी फिटिंग्स या तो चोरी चली गयी हैं; या उनकी बैटरी बेकार हो गयी है। लगाते समय भी लगता है भ्रष्टाचार (और उसमें पंचायत स्तर का भ्रष्टाचार भी शामिल है) के कारण उनमें बेकार बैटरी लगाई गयी थीं। बालू-मिट्टी के अंधाधुंध खनन से उड़ने वाले गर्दे से पूरा वातावरण धूल भरा हो गया है। दिन भर नौसिखिये ट्रेक्टर चालक बालू-रेत लिये दौड़ते रहते हैं। कूड़ा बिखरा रहता है। प्लास्टिक का कूड़ा बढ़ता जा रहा है और वह तालाबों को भी प्रभावित कर रहा है। शहर में वह नहीं होता।

बहुत सी चीजें हैं, बहुत से मुद्दे जिन्हें मैंने गांव में शिफ्ट होने के निर्णय लेने के दौरान अगर जाना होता तो (भले ही गांव में शिफ्ट होता) बेहतर तरीके से इन मुद्दों को फेस करने के लिये जागरूक होता।

कल शैलेश ने कहा “भईया, आप गांव का जो चित्रण करते हैं अपने ब्लॉग या माइक्रोब्लॉगिंग साइट्स पर; क्या वह अच्छा पक्ष भर नहीं रख रहे? क्या आपने लोगों की कुटिलता और बदमाशी फेस नहीं की? क्या आपने अपने को नीलकण्ठ नहीं बनाया। कितना गरल अपने आप में जब्ज किया?”

अगर ईमानदारी से कहा जाये तो हर व्यक्ति, जो गांव में रीवर्स माइग्रेट होने की सोचता है, उसे कुछ न कुछ मात्रा में नीलकण्ठ बनना ही होता है। पर मैं अगर गांव में आने के नफा-नुक्सान का अपनी प्रवृत्ति के अनुसार आकलन करता हूं; तो अपने निर्णय को सही पाता हूं। यहां रहने का निर्णय हमने किया है तो पहले सामंजस्य बिठाने में बहुत ऊर्जा और संसाधन भी खर्च किये; पर एक समय ऐसा आया कि पूरा बल दे कर तय करना पड़ा कि यहां रहना हैं तो अपनी शर्तों पर, अपने तरीके से ही रहेंगे। गांव के (अच्छे-बुरे) व्यक्तित्व का तुष्टिकरण कर नहीं रहेंगे। और उससे काफी सुकून मिला। जरूरी है कि गांव से अपेक्षायें न रखी जायें। अपनी सामर्थ्य अनुसार जिया जाये। जो है, उसे देखा जाये और उसका आनंद लिया जाये। बस!

मेरे तीन साले साहब जो यहां रिहायश बनाने की सोच रहे हैं; उन्हें यह नफा-नुक्सान का आकलन कर लेना होगा। शायद कर भी लिया हो। आखिर, वे गांव और गांव के निवासियों की वृत्ति-प्रवृत्ति को मुझसे कहीं बेहतर समझते, जानते हैं। वे यहां के मूल निवासी हैं।

फिलहाल, मुझे बहुत प्रसन्नता है कि मेरे घर के आसपास लोग आने और रहने लगेंगे। उनकी देखादेखी दो-चार और लोग भी यहां घर बनायेंगे ही। यह गांव, गांव नहीं रहेगा आज से एक दो दशक बाद। बनारस का सबर्बिया बन जायेगा। बस, वे लोग मकान भर ही न बनायें; यहां बसेंं भी और गांव की प्रवृत्ति में सार्थक बदलाव लायें।


#रागदरबारी लाइव; गंगा तट पर मछली खरीद के संवाद

मैं जानता हूं कि पूरे दृष्य में गजब की रागदरबारियत थी। पर मैं श्रीलाल शुक्ल नहीं हूं। अत: उस धाराप्रवाह लेखनी के पासंग में भी नहीं आती मेरा यह ब्लॉग पोस्ट।


दो समूह थे। एक नाव पर। उसमें तीन लोग थे। गंगा उस पार के सिनहर गांव के केवट। नदी किनारे जमीन पर खड़े लोग थे (शायद) द्वारिकापुर गांव के बाबू साहब लोग। वे मछली बेचने वाले नहीं थे। बेचने वाले सवेरे सवेरे आते हैं इन केवटों से मछली खरीदने। इस समय दोपहर के साढ़े बारह बजे थे। ठाकुर साहबों को शायद दोपहर में मछली खाने का मूड हो आया था।

केवट ठाकुर सम्वाद

मोलभाव का संवाद चल रहा था। अचानक आवाजें तेज हो गयीं। मेरा ध्यान उनकी ओर चला गया। एक केवट नाव पर खड़ा हो कर समझाने लगा कि बेचने के लिये मछली नहीं है। ठाकुर साहब को यह नकार पसंद नहीं आया। उन्होने मांं-बहन आदि के पवित्र सम्बंधों का आवाहन कर जोर दे कर कहा कि देगा कैसे नहीं। केवट ने बताया कि थोड़ी सी मछली है, जो उसके घर के लिये है।

फिर मोलभाव का द्वितीय चरण। फिर मां-बहनों और विशिष्ट अंग से मानवमात्र की उत्पत्ति स्पष्ट करने वाले आदि-युगीन शब्दों का उच्चारण। मानो यज्ञ चल रहा हो और उसमें ऋषिगण ऋचायें पढ़ रहे हों। पर यह यज्ञ माइनर ही था। जल्दी निपटा और ठाकुर साहब ने पचास का नोट लहराया। केवट ने कहा कि इतनी दक्षिणा अपर्याप्त है। उसके असिस्टेण्ट ने मछलियों को निकाल कर दिखाया भी। एक राउण्ड पारिवारिक सम्बंधों वाले मंत्रों का पुन: उच्चारण हुआ। पर ठाकुर साहब को मछली की तलब ज्यादा थी – अपनी ठकुराई से कहीं ज्यादा। उन्होने बीस रुपये और निकाले। तब सौदा पक्का हुआ।


यह पोस्ट भी पढ़ें – बाभन (आधुनिक ऋषि) और मल्लाह का क्लासिक संवाद


मछली लेने के लिये ठाकुर प्लास्टिक की पन्नी लिये थे। उसमें मछली रखवा कर विजयी भाव और बनने वाले भोजन की कल्पना के साथ प्रमुदित वे और उनके साथी अपनी मोटर साइकिलों की ओर लौटे।

लौटते हुये एक जवान (छोकरा ही था) ने अपना एक्सपर्ट कमेण्ट दिया। “बीस ठे रुपिया ढेर दई देहे आप। हमार चलत त एक्को न देइत। ऊ भो*ड़िया वाले के *ड़ी (वह स्थान जहां से अपशिष्ट विसर्जन होता है) से निकारि लेइत सब मछरी (बीस रुपया ज्यादा दे दिया आपने। मेरा बस चलता को एक भी पैसा नहीं देता और उसके नीचे के अंग से सारी मछलियां निकाल लेता)।”

वीर जवान की मोटर साइकिल खड्डे में सरकती गयी।

लेकिन उस उभरते वीर नौजवान की वीरता की जल्दी ही हवा निकल गयी। गंगा घाट से करार पर मोटर साइकिल चढ़ाते समय उस नौसिखिया ने समय पर एक्सीलरेटर नहीं लगाया और मोटर साइकिल पीछे की ओर फिसलने लगी। उसके बहुत यत्न करने के बावजूद खड्ड में सरक गयी। उसका सारा विशिष्ट अंग से मछलियाँ निकाल लेने का ज्ञान ऊपर पंहुचे साथियों की गुहार में बदल गया। गुहार सुन एक अन्य वीर आया और दोनो ने मिल कर मोटर साइकिल निकाली।

एक अन्य वीर आया और दोनो ने मिल कर मोटर साइकिल निकाली।

मैं जानता हूं कि पूरे दृष्य में गजब की रागदरबारियत थी। पर मैं श्रीलाल शुक्ल नहीं हूं। अत: उस धाराप्रवाह लेखनी के पासंग में भी नहीं आती मेरा यह ब्लॉग पोस्ट। पर आपको सीन समझ में आ ही गया होगा; उस सबसे जो मैंने चित्र और लेखन के माध्यम से व्यक्त किया।

ब्लॉग का वही ध्येय होता है। रागदरबारी का सीक्वेल लिखना नहीं होता। 😆

#गांवदेहात में विभिन्न जातियां, उनके कार्य, उनके आपसी सम्बंध, हेकड़ी, अनुनय और अपना बार्गेनिंग पावर को समझना-इस्तेमाल करना युगों से चला आ रहा है। बहुत कुछ तेजी से बदल रहा है। पर बदलाव के बावजूद भी वैसा ही है। शायद तभी रागदरबारी की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है, जितनी श्रीलाल शुक्ल के लिखते समय (या उसके पहले) थी।


पद्मजा के नये प्रयोग

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!


पद्मजा का स्कूल बंद है और खुलने की सम्भावना इस स्कूल सत्र में तो है ही नहीं। उसे घर में पढ़ाने का उपक्रम किया जा रहा है। उस विषय में मैंने पिछली एक पोस्ट में लिखा था।

उसके पास समय बहुत है। समय भी है और ऊर्जा भी अपार है। स्कूल के मित्र नहीं हैं। आसपास दलित-पासवान-बिंद बस्तियां हैं। उनके बच्चे कभी कभी घर में आ कर खेलते हैं। पद्मजा की साइकिल और घर में लगा झूला उनके लिये बड़ा आकर्षण है। यदा कदा पद्मजा को उन्हें टॉफियां देने को भी कहा जाता है।

उनके साथ पद्मजा खेलती है, पर वे स्कूल के मित्रों जैसे अंतरंग नहीं हो पाये हैं। उनके साथ थोड़ी सजगता रखनी पड़ती है। कुछ बच्चे छोटे हैं, पर उनकी भाषा में अपशब्द बहुत सहज भाव से हैं – वे उनका अर्थ नहीं जानते पर सीखे उन्होने अपने परिवेश से हैं। पद्मजा को अंततोगत्वा उनका भी परिचय पाना है; पर शायद यह वह उम्र नहीं है।

पौधा उगाने का प्रयोग करने को तैयार पद्मजा

मैजिक क्रेट में पौधा उगाने का एक एपरेटस आया है। कल पद्मजा ने उसे सेट किया। ऊपर के बर्तन में क्रेट में दी गयी मिट्टी की टिकिया रखी गयी है। नीचे के बर्तन में पानी है। पानी कैपिलरी-एक्शन से एक रस्सी के सहारे मिट्टी को गीला रखेगा। मिट्टी में सरसों के बीज डाले गये हैं। उपकरण को ऐसी जगह पर रख दिया गया है जहां दिन भर पर्याप्त सूरज की रोशनी मिले।

आज उस एपरेटस का निरीक्षण किया। नीचे के बर्तन में पानी कम हो गया है। ऊपर के बर्तन में मिट्टी और गीली हो गयी है और फूल भी गयी है। पानी रस्सी से केपिलरी-एक्शन से ऊपर के बर्तन में पंहुचा है; यह स्पष्ट हुआ है पद्मजा को। एक बर्तन में तो पूरा पानी केपिलरी एक्शन से मिट्टी में चला गया। दूसरी में, जिसमें शुरुआत में मिट्टी ज्यादा गीली थी, आधा पानी ऊपर पंहुचा।

बर्तन में केपिलरी-एक्शन का प्रयोग

पद्मजा को यह भी बताया गया कि रस्सी की तरह पौधों की जड़ें भी पानी को पौधे में ऊपर की ओर ले जाती हैं।

पद्मजा की विज्ञान की किताब में सूरज की छाया के बारे में लिखा है। सवेरे और शाम को छाया बड़ी और अलग अलग दिशा में होती है। दिन में छाया छोटी होती है। यह समझाने के लिये एक धूप घड़ी बनाने का प्रयोग किया। पद्मजा को छोटी-बड़ी छाया और उससे दिन का समय जोड़ने का कॉन्सेप्ट समझ आया। यह सब उसे कमरे में चित्र बना कर भी बताया जा सकता था। उसमें समय कम लगता पर शायद वह उसके दिमाग में ज्यादा देर नहीं टिकता। अब, धूप-घड़ी शायद वह बड़ी होने पर भी याद रखे!

धूप घड़ी का प्रयोग

धूप घड़ी वाले स्थान पर उसे एक बड़ा गोजर (शप्त-पद, सेण्टीपीड) भी दिखा। उस सेण्टीपीड के माध्यम से मैंने कीडो‌ं का भी ज्ञान देने का प्रयास किया।

कुछ भी नया बताने पर बहुत से सप्लीमेण्ट्री प्रश्नों के लिये तैयार रहना होता है। और कई बार प्रश्न नितांत अलग विषय के होते हैं। बहुधा मैं कोई किताब पढ़ रहा होता हूं या आराम कर रहा होता हूं, तब भी वह चली आती है अपनी जिज्ञासा का पिटारा ले कर।

उसकी नयी साइकिल आयी है। जन्म-दिन की भेंट यद्यपि जन्मदिन के रोज नहीं, कुछ सप्ताह बाद आयी। उस साइकिल को ले कर भी भांति भांति की कल्पनायें हो रही हैं। साइकिल का नाम उसने रखा है – पंख। पक्षी पंख से उड़ते हैं, पद्मजा साइकिल से उड़ना सीख रही है। इसी साइकिल से वह भारत घूमना चाहती है।

अपने “पंख” पर सवारी करती पद्मजा

आज बता रही थी कि वह जब साइकिल से मदुराई (मदुरै – तामिलनाडु) जायेगी तो वहां लड़कियों द्वारा बनाया जाने वाला कोलम देखेगी। उसे कोलम (स्त्रियों द्वारा बनाया जाने वाला अल्पना या रंगोली) के बारे में किसने बताया? शायद टेलीविजन ने। पर मुझे खुद भी यह नहीं मालुम था कि मदुरै की लड़कियां कोलम बनाती हैं। 😆

तमिळ महिलाओं द्वारा बनाया कोलम (चित्र सोर्स – https://bit.ly/3fnX2Sb )

गांव में बहुत बड़ा परिसर है पद्मजा के लिये। घर, पेड़, फूलों के पौधे, सब्जियां, परिसर में ही खेत और तरह तरह के जीव और पक्षी। बहुत कुछ है सीखने के लिये। और जो नहीं है वह ऑनलाइन तथा इण्टरनेट पर उपलब्ध वीडियो, पुस्तकों और कुरियर द्वारा आने वाले पैकजों के माध्यम से मिल रहा है। कुल मिला कर उसे एक शहरी बच्चे से कम संतृप्त सीखने को नहीं मिल रहा होगा।

गांव में रहने के कुछ स्वाभाविक नुकसान हैं; पर यहां सीखने को शहर के बच्चे से कम नहीं है। शायद वह जो सीख पाये; वह शहरी बच्चे कभी अनुभव न कर सकें। वह भाषा, मैंनरिज्म और आत्मविश्वास में उन्नीस न पड़े; बाकी सब तो उसके पास जो है, वह बहुत कम को मिलता होगा अनुभव के लिये!