सवेरे तीन बजे उठ जाना

मैंने रेल जीवन या रेल यात्राओं के बारे में बहुत नहीं लिखा। पर वह बहुत शानदार और लम्बा युग था। जब मैंने अपने जूते उतारे तो यह सोचा कि यादों में नहीं जियूंगा। आगे की उड़ान भरूंगा गांव के परिदृष्य में। पर अब, आज सवेरे इकतीस दिसम्बर के दिन लगता है कि फ्लैश-बैक में भी कभी कभी झांक लेना चाहिये।


सवेरे तीन बजे; कुछ उससे पहले ही नींद खुल गयी। शायद शरीर को श्रम नहीं करना पड़ रहा, तो नींद ठीक से नहीं आती। शायद उम्र का भी असर है। उम्र बढ़ने के साथ साथ नींद कम होती जाती है और जब तब बिन बुलाये झपकी आती रहती है। यह खराब है। और इसका उपाय यही है कि साइकिल और चलाई जाये – आखिर वही एक व्यायाम है मेरे पास।

Gyan Dutt Pandey, Gyandutt Pandey,
अ‍ॅंधेरे बेड रूम से टटोल कर ब्लू टूथ वाला हेडफोन कानों पर लगा कर मोबाइल में अमेजन ऑडीबल का एक एपीसोड सेट करता हूं।

पास सो रही पत्नीजी की नींद को बिना खलल डाले मैं अपना शौच कर लेता हूं। बिजली आ रही है, तो बिजली की केतली में पानी गर्म कर एक थर्मस चाय – बिना दूध वाली, चाय की ग्रीन पत्ती के साथ – बना कर बैठ जाता हूं घर के दालान नुमा ड्राइंग रूम में। किण्डल पर कोई पुस्तक पढ़ने का प्रयास करता हूं। फिर लगता है कि एक्सरसाइजर पर व्यायाम ही कर लिया जाये। वह साइकिल चलाने जैसा है। टाइमर भी है जिससे पता रहे कि कितने मिनट पैर चलाये। बताने को तो वह कैलोरी जैसी चीज भी बताता है – पर उसपर बहुत यकीन नहीं होता। मुझे लगता है कि वह टाइम बताने के अलावा बाकी झूठ बोलता (दिखाता) है।

My Indian Odyssey Podcast

एक्सरसाइजर के लिये इंतजाम करता हूं। अंधेरे बेड रूम से टटोल कर ब्लू टूथ वाला हेडफोन कानों पर लगा कर मोबाइल में अमेजन ऑडीबल का एक एपीसोड सेट करता हूं। यह विंसेण्ट इब्राहिम की माई इण्डियन ओडिसी में आगरा से दार्जिलिंग यात्रा का पॉडकास्ट है।

उस पॉडकास्ट में ट्रेन की आवाजें, सेकेण्ड एसी डिब्बे की खटर पटर, इब्राहिम की स्वप्निल आवाज में यात्रा विवरण और यात्रा के दौरान चाय वाले, साथ यात्रा कर रहे यात्रियों से बातचीत, रात बीतने के बाद सवेरे नाश्ता सर्व किया जाना और न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर उतरना – यह सब मुझे अपने अतीत में ले जाता है। अंधेरे बेड रूम से टटोल कर ब्लू टूथ वाला हेडफोन कानों पर लगा कर मोबाइल में अमेजन ऑडीबल का एक एपीसोड सेट करता हूं। कभी कभी पास के गार्ड साहब के डिब्बे में जा कर गार्ड बतियाना हुआ करता था। मैं अपने जूनियर स्केल से विभागाध्यक्ष बनने तक के अपने पीयून लोगों की याद करता हूं। और साथ में यात्रा करने वाले अपने इंस्पेक्टर लोगों की भी। कभी कभी मुझे लगता था – और ऐसा बहुधा होता था – कि वे इंस्पेक्टर अगर सिविल सर्विसेज पास कर रेल में लगे होते तो मुझसे बेहतर अधिकारी होते। वे अधिकतर बहुत होशियार, ईमानदार, और कर्मठ हुआ करते थे। अधिकतर वे मेरे मन को जान जाया करते थे और मेरे स्वाद, रुचियों और खब्तीपन से परफेक्ट तालमेल बनाये हुये होते थे। वे चपरासी और वे इंस्पेक्टर मेरे सुहृद मित्र होते थे। बहुत से तो परिवार के सदस्य की तरह, या परिवार का सदस्य ही थे। उनका जितना तालमेल मुझसे हुआ करता था, उससे ज्यादा मेरी पत्नीजी के साथ होता था।

उस पॉडकास्ट में ट्रेन की आवाजें, सेकेण्ड एसी डिब्बे की खटर पटर, इब्राहिम की स्वप्निल आवाज में यात्रा विवरण और यात्रा के दौरान चाय वाले, साथ यात्रा कर रहे यात्रियों से बातचीत, रात बीतने के बाद सवेरे नाश्ता सर्व किया जाना और न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पर उतरना – यह सब मुझे अपने अतीत में ले जाता है।

Vincent Ebrahim
विंसेण्ट इब्राहिम

मैं व्यायाम खत्म कर विंसेण्ट इब्राहिम के बारे में मोबाइल पर खंगालता हूं। यह दक्षिण अफ्रीका का कोई अभिनेता है। चेहरे से भारतीय लगता है। उसके दादा यहां सत्रह साल भारत में रहे। मुहम्मद कासिम। दादा जहां जहां रहे वहां वहां की यात्रा कर दादा की जिंदगी से परिचय पाने का प्रयास कर रहा है वह। और उस प्रक्रिया में क्या शानदार पॉड्कास्ट बनाये हैं विंसेण्ट इब्राहिम ने। उस पॉडकास्ट की बदौलत मैं अपने रेल अतीत में हो आया। अन्यथा, सामान्यत: मैं रेल छोड़ने के बाद साइकिल ले कर गांवदेहात की ही सोचता-जीता रहा हूं।

मैंने रेल जीवन या रेल यात्राओं के बारे में बहुत नहीं लिखा। पर वह बहुत शानदार और लम्बा युग था। जब मैंने अपने जूते उतारे तो यह सोचा कि यादों में नहीं जियूंगा। आगे की उड़ान भरूंगा गांव के परिदृष्य में। पर अब, आज सवेरे इकतीस दिसम्बर के दिन लगता है कि फ्लैश-बैक में भी कभी कभी झांक लेना चाहिये।

इब्राहिम का पॉडकास्ट खतम कर मैं अपने लैपटॉप पर यह लिखने बैठ गया हूं। अब जब खत्म कर रहा हूं यह लेखन तो सवेरे पौने छ बजे का अलार्म बज रहा है। मेरे सामान्यत: उठने का समय हो गया है। पर उठने के समय पर आज बहुत कुछ कर चुका हूं। नये साल के लिये कुछ सोचने की भूमिका होगी यह! 🙂


जैसा मैंने कहा, मैंने बहुत नहीं लिखा है अपनी रेल यात्राओं के बारे में। पर यात्रा पर एक छोटी पोस्ट है – सोनतलाई। शायद आपको रुचिकर लगे।


रसूल हम्जातोव का त्सादा और यहां का गांव

रसूल हम्जातोव जैसी दृष्टि मेरी क्यों नहीं? अपने गांव को ले कर क्यों मैं छिद्रान्वेशी बनता जा रहा हूं। उसके लोगों, बुनकरों, महिलाओं, मन्दिरों, नीलगायों, नेवलों-मोरों में मुझे कविता क्यों नहीं नजर आती। नदी, ताल और पगडण्डियां क्यों नहीं वह भाव उपजाते?


जन्मदिन पर बहुत से लोगों ने शुभकामनायें दीं। सोशल मीडिया में जन्मदिन की शुभकामनायें ठेलने का रिवाज है। लोग आलसी भी हों तो फेसबुक वाला जबरी ठिलवाता रहता है। प्रियंकर जी रस्म अदायगी वाले अन्दाज में नहीं, हृदय के कोर से दिये मुझे शुभकामनायें। उनका ई-मेल मिला।

उसमें शुभकामनाओं के साथ एक लम्बी हिंदी पुस्तकों की सूची थी तथा उपहार स्वरूप एक पुस्तक की पीडीएफ प्रति भी –

“साथ ही रसूल हम्जातोव की अनुपम गद्य-पुस्तक ‘मेरा दागिस्तान’ आपको जन्मदिन के उपहार की तौर (पीडीएफ फॉर्म में) भेज रहा हूं . यह मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तकों में से एक है . हम्जातोव का गद्य कविता को नाकों चने चबवाता भावपूर्ण गद्य है . वैसे भी पुस्तक सूची में आपको कविता के प्रकोप से बचा कर रक्खा है ।” 🙂

पुस्तकों की लम्बी सूची में हिन्दी के उत्कृष्ट फिक्शन और नॉन-फिक्शन थे। वह सब जिसे पढ़ने में मुझे शायद एक दशक लग जाये।


फेसबुक नोट्स में नवम्बर 19′ 2017 को पब्लिश की गयी पोस्ट।



मैने यह सूची उनसे इस लिये मांगी थी कि वे पुस्तकें पढ़ कर हिन्दी भाषा में मेरा शब्द ज्ञान 2000 से बढ़ कर पांच सात गुणा हो जायें। वे शब्द जिनके साथ सोना-जागना हो। पहले तो प्रियंकर जी ने यह कह कर टालने की बात की थी कि कोई आवश्यकता नहीं है – मेरा शब्द ज्ञान पर्याप्त है। पर बाद में मेरी बात मान कर यह ई-मेल भेज दिया।

Rasul Gamzatov
Rasul Gamzatovich Gamzatov was a popular Avar poet. Among his poems was Zhuravli, which became a well-known Soviet song.
रसूल हम्ज़ातोव

पर असल चीज, असल उपहार वह सूची नहीं, रसूल हम्ज़ातोव का हिन्दी अनुवाद में उपन्यास था – मेरा दागिस्तान। रसूल हम्ज़ातोव (रूस के) काकेशिया के दागिस्तान के अवार भाषा के कवि थे। यह उनकी गद्य रचना है। और क्या गजब की रचना। यह उनके गांव त्सादा के इर्द-गिर्द घूमती पुस्तक है। एक गद्य काव्य। ज्यादा इस लिये नहीं लिखूंगा कि – 1) प्रियंकर जी को मेरे पठन का उथलापन स्पष्ट हो जायेगा और; 2) अभी पढ़ने में जो आनन्द आ रहा है, उसे शब्दों में समेटना सम्भव नहीं लग रहा।

मैने उनके द्वारा भेजी गई पीडीएफ़ प्रति को किण्डल के अनुसार परिवर्तित किया और अब किण्डल पर पढ़ रहा हूं। जन्मदिन पर इससे बेहतर कोई उपहार नहीं हो सकता था। प्रियंकर जी, सुन रहे हैं न?!

मेरा दागिस्तान के बारे में कल अपनी पत्नीजी से चर्चा कर रहा था – रसूल जैसी दृष्टि मेरी क्यों नहीं? अपने गांव को ले कर क्यों मैं छिद्रान्वेशी बनता जा रहा हूं। उसके लोगों, बुनकरों, महिलाओं, मन्दिरों, नीलगायों, नेवलों-मोरों में मुझे कविता क्यों नहीं नजर आती। नदी, ताल और पगडण्डियां क्यों नहीं वह भाव उपजाते? क्यों मन में रागदरबारी जैसा व्यंग ही घूमता रहता है? कहीं न कहीं गलती मेरे अपने मन में है। मुझे अपना कोर्स करेक्शन करना चाहिये।

Rasul Gamzatov
My Dagistan in Hindi
 on Kindle
रसूल हम्ज़ातोव की मेरा दागिस्तान का एक पृष्ठ, किण्डल पर।

इसी भाव से आज सबेरे घर से निकला बटोही (साइकिल) के साथ। द्वारिकापुर में गंगा तट पर दृष्य बहुत आनन्ददायक था। मछली पकड़ने-खरीदने वालों के अलावा आज मुझे सोंईस कई बार उछलती दिखी। लगता है, सरकार ने जो कुछ भी किया है, उससे प्रदूषण कुछ कम हुआ है और सोंईस (गांगेय डॉल्फिन) की संख्या बढ़ी है।

boats for tourists Prayag to Varanasi
पाल वाली रंगबिरंगी सैलानी डोंगियां।

सोंईस के अलावा मुझे बनारस से बिन्ध्याचल लौटती सैलानी वाली तीन पाल वाली डोंगियां भी दिखीं। अपने परिवेश के बारे में आज सब कुछ काव्यात्मक था। पर वापस लौट कर साइकिल का ताला खोला तो नजर पड़ी कि आगे वाले पहिये में हवा नहीं है। देखा तो पीछे वाला पहिया भी वैसा ही था। किसी व्यक्ति ने दोनो पहियों के वाल्व (छुछ्छी) चुरा लिये थे।

“काव्य से कर्कशता के मोड में चला गया मन। गंगा के करार पर उतरते-चढ़तें मेरे गठियाग्रस्त घुटने थक कर चूर थे। पत्नीजी को फोन किया तो उल्टा सुनने को मिला – मैं तो पहले ही कहती थी कि कहां ऊचे-खाले घूमते रहते हो!”

काव्य से कर्कशता के मोड में चला गया मन। गंगा के करार पर उतरते-चढ़तें मेरे गठियाग्रस्त घुटने थक कर चूर थे। ऐसे मे साइकिल ढो कर ले चलना मेरे लिये सम्भव नहीं था। मेरी कार का ड्राइवर भी आज रविवार होने के कारण आने वाला नहीं था कि कार बुला कर घर लौटा जाये। पत्नीजी को फोन किया तो उल्टा सुनने को मिला – मैं तो पहले ही कहती थी कि कहां ऊचे-खाले घूमते रहते हो!

भला हो राजन भाई मेरे साथ थे। उन्होने पता किया कि उस गांव में हरिजन बस्ती में एक साइकिल रिपेयर करने वाला है। मैं कुंये की जगत पर बैठा और वे अपनी साइकिल मेरे पास छोड़ मेरी साइकिल ठीक करवाने गये।

इस दौरान कौतूहल वश लोग आते जाते मुझे देख रहे थे। एक ट्रेक्टर वाला रोकने की मुद्रा में आया, फिर चलता चला गया। रोज सवेरे गंगा स्नान को आने वाले रिटायर्ड मास्टर चौबेजी गुजरे। उन्होने मुझसे पूछा – क्या हुआ? मैने बताया कि कोई मेरे साइकिल के पहियों के वाल्व चुरा ले गया है।

मैं कन्फ्यूज हो गया – गांव को किस नजर से देखूं – रसूल हम्ज़ातोव का त्सादा गांव मानूं या श्रीलाल शुक्ल की “रागदरबारी” का शिलिर-शिलिर जीने वाला शिवपालगंज?

मुझे लगा कि वे सहानुभूति में कुछ कहेंगे। पर वे “अच्छा-अच्छा” कह कर आगे बढ़ गये। मानो कोई खास बात नहीं हो।

राजन भाई साइकिल ठीक करा कर लौटे। उस साइकिल वाले ने छुछ्छियां लगाईं और हवा भरी। कोई पैसा भी नहीं लिया। एक ही गांव में छुछ्छी-चोर भी निकले और निस्वार्थ सहायता करने वाले भी।

मैं कन्फ्यूज हो गया – गांव को किस नजर से देखूं – रसूल हम्ज़ातोव का त्सादा गांव मानूं या श्रीलाल शुक्ल की “रागदरबारी” का शिलिर-शिलिर जीने वाला शिवपालगंज?

(पोस्ट में रसूल हम्जातोव के चित्र विकीपीडिया से, साभार)

छुछ्छी का चोरी-स्थल। चित्र में राजन भाई।