विलायती बनाम देसी कुत्ता पालने के बारे में विचार

विलायती कुकुर में अर्थराइटिस और लीवर की बीमारी बहुत होती है। उनकी तुलना में भारतीय कुकुर भी 10-12 साल जीता है। भोजन ठीक मिले तो शायद विलायती से ज्यादा जिये। और स्वामिभक्ति के किस्से जितने गंवई कुकुरों के सुने हैं, उतने विलायती के नहीं।


कुकुर पालने से सामाजिक स्टेटस, जैसा भी हो, बढ़ जाता है। गांव में रिहायश बनाने के कारण एक शहराती अफसर की अपेक्षा हमारे स्टेटस में ‘पर्याप्त’ गिरावट आ गयी थी। उसे बढ़ाने के लिये पांच साल पहले मेरी बिटिया ने हमें एक लेब्राडोर ब्रीड के पिलवा को भेंट किया था। नाम भी रखा था – गब्बर।

पर गब्बर चला नहीं। उस समय घर में यहां चारदीवारी नहीं थी। कोई भी निर्बाध आ सकता था। एक छुट्टा घूमता रेबीज युक्त कुत्ता कहीं से घर में घुस आया और उस महीने भर के पिल्ले को झिंझोड़ गया।

Labrador puppy
मार्च 2016 में मेरी बिटिया ये लेब्राडोर के पिल्ले ले कर आयी थी। उनमें से एक था गब्बर। ज्यादा चला नहीं।

उसको आये एक दो दिन ही हुये थे और उसे रेबीज का टीका भी नहीं लगा था। हम कुत्ते के डाक्टर साहब के पास भी ले गये उसे। पर उसे रेबीज हो गयी। हमारे घर के बहुत से लोगों को उसने काटा और अंतत: गब्बर बेचारा मर गया। हमने रेबीज से बचाव के लिये खुद को पांच पांच रेबीपोर की सुईयां लगवाईं। बहुत खर्चा करना पड़ा, तनाव और झंझट अलग हुआ।

मनुष्य शायद दु:ख से भयभीत नहीं होता। वह दु:खों को अनदेखा कर, आत्मीयता तलाशता है, भले ही उसके साथ दु:ख जुड़ा आता हो। जन्म, पालन, विवाह, प्रजनन, परिवार, जरा और मृत्यु – सब में दु:ख है। पर सब आत्मीयता से गुंथे हैं।

गांव में आने के पहले हमारे पास एक कुत्ता था, गोलू पाण्डेय। वह आठ साल चला। उसके मरने पर घर के सदस्य के जाने सा दुख हुआ था। तब सोचा था कि कुत्ता पालना अंतत: दुख ही देता है। पर फिर, बार बार एक कुत्ता पालने की बात मन में आती है।

मनुष्य शायद दु:ख से भयभीत नहीं होता। वह दु:खों को अनदेखा कर, आत्मीयता तलाशता है, भले ही उसके साथ दु:ख जुड़ा आता हो। जन्म, पालन, विवाह, प्रजनन, परिवार, जरा और मृत्यु – सब में दु:ख है। पर सब आत्मीयता से गुंथे हैं।

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इस गोल्डन रिट्रीवर कुतिया के पिल्ले को पालने का प्रस्ताव मेरी बिटिया ने रखा

इसलिये मुझे लगा कि पालने के लिये बेहतर है कि एक स्वस्थ लोकल कुकुरिया के पिल्ले को पाल लिया जाये। उसका अच्छे से टीकाकरण और डी-वॉर्मिंग आदि कराया जाये। खाना उसे अपने घर के सदस्य की तरह (एक सामान्य कुकुर एक आदमी के बराबर खाता है) दिया जाये।

यह वैसे ही है कि स्वादिष्ट भोजन सबको प्रिय है पर उसके साथ मोटापा, कोलेस्ट्रॉल आदि अनेकानेक समस्यायें साथ जुड़ी आती हैं। पानमसाला खाने से मुख का कैंसर होता है, ऐसा लोग जानते हैं, पर स्वाद के सुख के लिये पानमसाला खाना नहीं छूटता। उसकी बिक्री बराबर जारी है।

खैर, बात कुत्ते को पालने की है। कुत्ते की जिंदगी आदमी की जिंदगी से काफी कम है। एक व्यक्ति के जीवन काल में आठ नौ पालतू कुत्ते बदल सकते हैं। उन सब का विरह कष्ट दे सकता है। पर उन सब का होना अपने आप में बहुत आनंददायक है।

हमने एक कुत्ता पुन: पालने की सोची। मेरी बिटिया ने बोकारो से बताया कि एक गोल्डन रीट्रीवर कुतिया ने बच्चे जने हैं। उनमें से एक हमारे लिये लहा सकती है। वह देने के लिये वह बोकारो से यहां तक अपने वाहन में यात्रा भी कर सकती है – जैसा पांंच साल पहले उसने किया था। कुतिया और पिल्लों के चित्र भी वाणी पाण्डेय ने भेजे।

दाम? बताया कि जिसने गोल्डन रिट्रीवर कुतिया ब्रीडिंग के लिये पाली है, वह पपी बेच रहा है। सोलह हजार का एक पिलवा। सोलह हजार के नाम पर मैंने साफ मना कर दिया। सोलह हजार का कुकुर/पिलवा रखने पालने का फ्रेम ऑफ माइण्ड ही मेरा नहीं है! पांच साल पहले, जब ताजा ताजा रिटायर हुआ था और टेंट में पैसा खनक रहा था, तब शायद सोलह हजार का कुकुर ले भी लेता; अब तो बिल्कुल नहीं। 😀

विलायती ब्राण्ड के कुकुर में क्या फायदा है। साहबियत का नफा है। और भी कुछ? क्या देसी सिरके से एप्पल साइडर विनेगर ज्यादा बढ़िया है? देसी गाय की बजाय जर्सी, फ्रेजियन ज्यादा अच्छी है? देसी कुकुर क्या विलायती जितना होशियार और स्वामिभक्त नहीं होता?

विलायती कुकुर में बीमारियाँ (जैसा मैंने पढ़ा), काफी होती हैं। भारतीय वातावरण में वे उतने एडॉप्ट नहीं कर पाते जितना देसी। उनमें अर्थराइटिस और लीवर की बीमारी गली के कुकुरों से ज्यादा होती है। भारतीय कुकुर भी 10-12 साल जीता है। भोजन ठीक ठाक मिले तो शायद विलायती से ज्यादा जिये। और स्वामिभक्ति के किस्से जितने गंवई कुकुरों के सुने हैं, उतने विलायती के नहीं सुने।

इसलिये मुझे लगा कि पालने के लिये बेहतर है कि एक स्वस्थ लोकल कुकुरिया के पिल्ले को पाल लिया जाये। उसका अच्छे से टीकाकरण और डी-वॉर्मिंग आदि कराया जाये। खाना उसे अपने घर के सदस्य की तरह (एक सामान्य कुकुर एक सामान्य आदमी की खुराक बराबर खाता है) दिया जाये।

यह सोचने के बाद सड़क पर और आसपास के सारे पिलवों को मैं ध्यान से देख रहा हूं। पर अभी कोई पिलवा मुझे मोहित नहीं कर पाया। कल पण्डित देवेंद्रनाथ दुबे के अहाता में एक कुतिया दिखी। उसका नाम रखा है रिन्गी। उसके सारे पिलवे इधर उधर चले गये हैं।

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पं. देवेंद्रनाथ दुबे के अहाता कि कुतिया रिन्गी। लॉन के पलेवा की कीचड़ में से घूम आने के कारण पैर गीले हैं उसके; अन्यथा देखने में ठीकठाक है।

रिन्गी से वे पीछा छुड़ाना चाहते थे। घर से दस किलोमीटर दूर कछवाँ बाजार तक छोड़ आये, पर रिन्गी वहां से भी वापस आ गयी। जो कुतिया इतना पहचान रखती हो, उसका पिलवा पालने योग्य होगा। दुर्भाग्यवश इस समय रिन्गी के सारे पिलवे इधर उधर चले गये हैं।

मैं रिन्गी के पिलवों की अगली खेप का इंतजार करूंगा। अगर (और यह बड़ा अगर है) मेरे परिवार के लोगों ने देसी कुकुर पालने पर नाक-भौं नहीं सिकोड़ी, तो!