10 साल पहले – मोटल्ले लोगों की दुनियाँ

दुनियाँ मुटा रही है। मुटापे की विश्वमारी फैली है। लोग पैदल/साइकल से नहीं चल रहे। हमारा शरीर मुटापे से लड़ने के लिये नहीं, भुखमरी से लड़ने के लिये अभ्यस्त है। समाज भी मुटापे को गलत नहीं मानता। लम्बोदर हमारे प्रिय देव हैं!


यह दस साल पहले लिखी पोस्ट है। तब मीडिया में था कि मोटापा एक विश्वमारी है। आज मोटापे का असर तब से दुगना हो गया होगा। कोरोना काल में लोग घरों में बंद रहे हैं। इण्टरनेट के प्रयोग से लोग घर बैठे काम कर रहे हैं। चलना फिरना कम हुआ है। गैजेट्स उत्तरोत्तर आदमी को अहदी (आलसी) बना रहे हैं। … कोरोना का हल्ला पटायेगा तो मोटापे का हल्ला एक बार फिर जोर मारेगा। लिहाजा 27 जनवरी 2011 की यह पोस्ट, जो नीचे री-पोस्ट है; अब भी सामयिक है। पढ़ें –


आपने द वर्ल्ड इज फैट नहीं पढ़ी? 2010 के दशक की क्लासिक किताब। थॉमस एल फ्रीडमेन की द वर्ल्ड इज फ्लैट की बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ देने वाली किताब है। नहीं पढ़ी, तो आपको दोष नहीं दिया जा सकता। असल में इसका सारा रॉ-मेटीरियल तैयार है। बस किताब लिखी जानी भर है। आपका मन आये तो आप लिख लें! 😀

पिछले दशक में मोटे (ओवरवेट) और मुटल्ले (ओबेस) लोगों की संख्या दुनियाँ में दुगनी हो गयी है। अब 13 करोड मोटे/मुटल्ले (मोटे+मुटल्ले के लिये शब्द प्रयोग होगा – मोटल्ले) वयस्क हैं और चार करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटल्ले हैं।

The World Is Fat
द वर्ल्ड इज फैट – अ ब्रीफ फ्यूचर ऑफ द वर्ल्ड

मोटापा अपने साथ लाता है एक बीमारियों का गुलदस्ता। मधुमेह, दिल का रोग और कई प्रकार के केंसर। अनुमान है कि ढ़ाई करोड़ लोग सालाना इन बीमारियों से मरते हैं। मानें तो मोटापा महामारी (epidemic) नहीं विश्वमारी (pandemic) है।

मोटापे की विश्वमारी को ले कर यह विचार है कि धूम्रपान में कमी का जो लाभ लाइफ स्पॉन बढ़ाने में हुआ है, वह जल्दी ही बढ़ते वजन की बलि चढ़ जायेगा। मोटापे को ले कर केवल स्वास्थ्य सम्बन्धी चिंतायें ही नहीं हैं – इसका बड़ा आर्थिक पक्ष भी है। कई तरह के खर्चे – व्यक्ति, समाज, उद्योग और सरकार द्वारा किये जाने वाले खर्चे बढ़ रहे हैं।

मेकिंजे (McKinsey) क्वार्टरली ने चार्ट-फोकस न्यूज लैटर ई-मेल किया है, जिसमें मोटापे की विश्वमारी (महामारी का वैश्विक संस्करण – pandemic) पर किये जा रहे खर्चों के बारे में बताया गया है। मसलन ब्रिटेन में मोटापे से सम्बन्धित रोगों पर दवाइयों का खर्च £4,000,000,000 है। एक दशक पहले यह इसका आधा था। और यह रकम 2018 तक आठ बिलियन पाउण्ड हो सकती है।

पर जैसा यह न्यूजलैटर कहता है – खर्चा केवल दवाओं का नहीं है। दवाओं से इतर खर्चे दवाओं पर होने वाले खर्चे से तिगुने हैं। मसलन अमेरिका $450 बिलियन खर्च करता है मुटापे पर दवाओं से इतर। जबकि दवाओं और इलाज पर खर्च मात्र $160 बिलियन है।

ओबेसिटी – स्क्रीन शॉट WHO की साइट से

इन दवाओं से इतर खर्चे में कुछ तो व्यक्ति स्वयम वहन करते हैं – भोजन, बड़े कपड़े, घर के सामान का बड़ा साइज आदि पर खर्च। कई खर्चे उनको नौकरी देने वालों को उठाने पड़ते हैं – उनकी ज्यादा गैरहाजिरी, कम उत्पादकता के खर्चे। साथ ही उनको काम पर रखने से उनके लिये स्थान, यातायात आदि पर खर्चे बढ़ जाते हैँ। ट्रेनों और बसों को बड़ी सीटें बनानी पड़ती हैं। अस्पतालों को ओवरसाइज मशीनें लगानी पड़ती हैं और बड़ी ह्वीलचेयर/स्ट्रेचर का इंतजाम करना होता है। यहां तक कि उनके लिये मुर्दाघर में बड़ी व्यवस्था – बड़े ताबूत या ज्यादा लकड़ी का खर्च भी होता है!

— देखा! मोटल्लत्व पर थॉमस फ्रीडमैन के क्लासिक से बेहतर बेस्टसेलर लिखा जा सकता है। बस आप कमर कस कर लिखने में जुट जायें! हमने तो किताब न लिखने की जिद पकड़ रखी है वर्ना अपनी नौकरी से एक साल का सैबेटिकल ले कर हम ही ठेल देते! 😆


मेरा मोटापा

मेरा बी.एम.आई. (Body-Mass-Index) 28 पर कई वर्षों से स्थिर है। पच्चीस से तीस के बीच के बी.एम.आई. वाले लोग मोटे (overweight) में गिने जाते हैं और 30-35 बी.एम.आई. वाले मुटल्ले (obese)| मोटे होने के कारण मुझे सतत उच्च रक्तचाप और सर्दियों में जोड़ों में दर्द की समस्या रहती है। अगर यह बी.एम.आई. <25 हो जाये (अर्थात वजन में आठ किलो की कमी) तो बहुत सी समस्यायें हल हो जायें।

(दस साल बाद का सीन – आज मेरा बीएमआई 25 है। इसमें योगदान गांव का जीवन और दस-पंद्रह किलोमीटर साइकिल चलाने का है। फिर भी अभी आवश्यकता है इसे 22-23 तक ले जाने की। अर्थात शरीर से डालडा का एक पीपा बराबर वजन अभी भी कम होना चाहिये।)

दुनियाँ मुटा रही है। मुटापे की विश्वमारी फैली है। लोग पैदल/साइकल से नहीं चल रहे। हमारा शरीर मुटापे से लड़ने के लिये नहीं, भुखमरी से लड़ने के लिये अभ्यस्त है। अत: भोजन ज्यादा मिलने पर ज्यादा खाता और वसा के रूप में उसका स्टोरेज करता है। समाज भी मुटापे को गलत नहीं मानता। लम्बोदर हमारे प्रिय देव हैं!

स्वाइन फ्लू को ले कर हाहाकार मचता है (यह दस साल पहले का सीन था। अब कोरोना संक्रमण का हाहाकार है।)। लेकिन मुटापे को ले कर नहीं मचता!


शाम 7 बजे ‘बोधई’ का बाटी चोखा

कुल मिला कर पूरी सेल्समैनी चाइना छाप माल बेचने में पारंगत है। सेल्समैन के गुणों के मोहजाल में स्वदेशी और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत ग्राहक कड़क से मुलायम बनते हुये अंतत: चाइनीज पर टूटता है! आत्मनिर्भरता तेल लेने चली जाती है!


रवींद्रनाथ जी यदा कदा मिलते हैं। उनकी और हमारी दूरी रेल लाइन पार करने की है। अन्यथा हमारी प्रवृत्तियां मेल खाती हैं। वे भी मेरी तरह गांव के बाहर व्यवसाय की लम्बी पारी खेल कर दूसरी पारी के लिये गांव आये हैं। वे भी मेरी तरह गांव में अपनी सूखी जड़ों को पुष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। वे भी, मेरी तरह गांव के बदले बदले अंदाज से हतप्रभ, दुखी और तालमेल तलाशते नजर आते हैं।

कल उन्होने बताया कि अपने घर के सामने वे आसपास के आठ दस लोगों के साथ शाम के समय कऊड़ा पर बैठते हैं। आपस की बातचीत होती है और कभी कभी यह होता है कि वहीं बाटी चोखा बना कर भोजन भी हो जाता है। एक दो लोग हैं जो बाटी चोखा बनाने में कुशल हैं। कुल मिला कर अच्छा सामाजिक मेल मिलाप हो जाता है।

मैंने भी अपनी इच्छा जताई कि एक दिन उस कऊड़ा में बैठ कर अनुभव लेना चाहूंगा। और रवींद्रनाथ जी ने कहा – क्यों नहीं! आज ही शाम को।

यह तय हुआ कि शाम सात बजे उनके यहां पंहुचूंगा। आठ बजे तक बैठकी होगी अलाव के इर्दगिर्द। उसी दौरान भोजन भी बनेगा अलाव पर। भोजन के बाद साढ़े आठ बजे तक घर वापसी हो जायेगी। जनवरी/माघ की सर्दी में उससे ज्यादा बाहर नहीं रहना चाहता था मैं और रवींद्रनाथ जी भी उस समय तक कऊड़ा सम्मेलन समाप्त करने के पक्ष में थे।

बाटी चोखा आयोजन की मेजबानी श्रीमती शैल और श्री रवींद्रनाथ दुबे ने की। चित्र रात साढ़े सात बजे।

शाम 7 बजे, अंधेरा हो गया था। ठीक समय पर मैं उनके यहां पंहुच गया। बाटी एक टेबल पर गोल गोल बनाई जा चुकी थी। चोखा भी बन गया था और एक स्टील की बाल्टी में रखा गया था। एक ओर उपले की आग जल रही थी और उसके बगल में एक ईंट के मेक-शिफ्ट चूल्हे पर दाल का पतीला चढ़ा रखा गया था।

बाटी के लिये जलते उपले (बांये) और चूल्हे पर चढ़ा दाल का पतीला

जय प्रकाश ‘बोधई’ दुबे मुख्य कार्यकर्ता थे इस आयोजन के। उन्होने बताया कि साढ़े पांच बजे से बाटी-चोखा बनाने का कार्यक्रम प्रारम्भ कर दिया था। मेरे सामने जय प्रकाश एक कुशल रसोईये की तरह काम कर रहे थे। रवींद्रनाथ जी ने कहा कि अगर मुझे बाटी-चोखा के आईटम्स पर बाद में लिखना हो तो सभी के चित्र ले लिये जायें! लिखने में आसानी रहेगी।

  • baati
  • chokha
  • Puppy near fireplace
  • daal
  • rice cooking
  • jay prakash 'bodhai'

कुल सात आठ लोग थे वहां। रवींद्रनाथ दुबे जी की पत्नी शैल भी थीं। मैं उन्हे मौजूद देख अपनी पत्नीजी को फोन कर उन्हे आने को कहा, पर वे रजाई में लेटी थीं और आने को तैयार नहीं हुईं। मेरा बेटा ज्ञानेंद्र जरूर मेरे साथ था।

जय प्रकाश की सामान बेचने की कुशलता के बारे में रवींद्रनाथ जी ने टिप्पणी की – ‘बहुत होशियार है जय प्रकाश। गंजे को कंघी ही नहीं; मुर्दे को चवनप्राश भी बेचने का हुनर रखता है!’

जय प्रकाश ‘बोधई’ बड़ी कुशलता से बाटियां उलटते, पलटते; चावल की बटुली में कड़छुल हिलाते मुझसे बातें भी करते जा रहे थे। वे बम्बई में सेल्स मैन हैं – सूटकेस, बैग आदि यात्रा हेतु सामान रखने वाले आईटमों की दुकान में काम करते हैं। सन 2020 के समय होली पर गांव आये थे। उसके बाद कोरोना संक्रमण का लॉकडाउन चल गया। जिस दुकान में वे सेल्समैन थे, लगता है उस कंज्यूमर ड्यूरेबल चीजों का काम अभी भी गति नहीं पकड़ सका है। अभी वे गांव पर ही हैं, “पर जल्दी ही बम्बई लौटेंगे”।

जो ग्राहक ज्यादा ‘कड़ा’ होता है, ब्राण्डेड ही लेना चाहता है और चाईनीज पर नहीं टूटता; वह भी बिल बनाते समय साढ़े अठारह परसेण्ट का जी.एस.टी. जोड़ने पर माथा थाम लेता है! 😀

जय प्रकाश की सामान बेचने की कुशलता के बारे में रवींद्रनाथ जी ने टिप्पणी की – ‘बहुत होशियार है जय प्रकाश। गंजे को कंघी ही नहीं; मुर्दे को चवनप्राश भी बेचने का हुनर रखता है!’

‘बोधई’ ने बताया कि बम्बई के शो रूम पर ग्राहक सामान्यत: ब्राण्डेड सूटकेस लेने आता है। वी.आई.पी., सफारी या सैम्सोनाइट ब्राण्ड। पर जब दाम सुन कर ‘मुलायम’ होता है, तब वे दुकानदार/सेल्समैन के लिये ज्यादा मार्जिन वाले चीनी, थाई या और कहीं के बने सूटकेस दिखाने लगते हैं। मजबूती का भरोसा देने के लिये उसपर बैठ कर, घूंसा मार कर दिखाते हैं। ग्राहक की कद काठी के हिसाब से उसे सूटकेस पर कूदने का भी ऑप्शन देते हैं। वह सब ग्राहक को सस्ता भी पड़ता है और बेचने में मार्जिन भी खूब मिलता है।

जो ग्राहक ज्यादा ‘कड़ा’ होता है, ब्राण्डेड ही लेना चाहता है और चाईनीज पर नहीं टूटता; वह भी बिल बनाते समय साढ़े अठारह परसेण्ट का जी.एस.टी. जोड़ने पर माथा थाम लेता है! 😀

कुल मिला कर पूरी दुकानदारी और सेल्समैनी चाइना छाप माल बेचने में पारंगत है। सेल्समैन के गुणों के मोहजाल में स्वदेशी और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत ग्राहक कड़क से मुलायम बनते हुये अंतत: चाइनीज पर टूटता है! आत्मनिर्भरता तेल लेने चली जाती है!

यह महसूस हुआ कि ग्राहक चाहता है भारतीय सामान लेना और वापरना। पर यह भी जरूरी है कि दाम में उसे इतना पेरा न जाये कि वह दोयम दर्जे के चाईनीज माल की ओर देखे।

सब भोज्य पदार्थ बनने के बाद रवींद्रनाथ जी भोजन के लिये आमंत्रित करने में देर नहीं करते। ‘बोधई’ का बनाया बाटी-चोखा-दाल-चावल A++ कोटि का है। वे भले ही कुशल सेल्समैन हों; अपनी पाक कला की तारीफ खुद नहीं करते। उसके लिये हम ही स्वत: बोलते हैं। एक अच्छा बना भोजन किसी सेल्समैन की दरकार नहीं रखता। भोजन के बाद – सवा आठ बजे, हम घर वापसी की जल्दी मचाते हैं। सर्दी का मौसम है। घर पंहुचने की तलब है।

जय प्रकाश ‘बोधई’ दुबे भोजन बनाते हुये।

सर्दी ज्यादा न होती तो एक आध घण्टा और बैठ कर जय प्रकाश ‘बोधई’ दुबे के संस्मरण और उनकी बोलने की शैली का आनंद लेते। गांव का यह नौजवान; जो दसवीं तक ही पढ़ा है; दुनियां के हर एक देश और उसकी सभ्यता-संस्कृति की जानकारी भी रखता है। यह जानकारी उसे बेहतर सेल्समैन बनाती होगी।

मार्क जुकरबर्ग ने कभी कहा था कि “जवान लोग पहले वाली पीढ़ियों के मुकाबले कहीं ज्यादा स्मार्ट हैं।” और जय प्रकाश में उसका उदाहरण मुझे प्रत्यक्ष दिख रहा था।

आगे, फिर कभी मिलूंगा जय प्रकाश ‘बोधई’ से; उनके बम्बई जाने के पहले!


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