छोटी मछली से बड़ी पकड़ने की तकनीक

गहरी नदी यानी करारी। इन लोगों ने बताया कि उथली नदी को पटपट कहते हैं। करारी नदी में मछलियां होती हैं, पटपट में नहीं। मछली पकड़ने की सम्भावना बढ़ाने के लिये उनके लिये यह जानना जरूरी था कि नदी करारी है या पटपट।


रास्ता ट्रेक्टर के गंगा तट पर बालू की (अवैध) ढुलाई लिये बना था। नयी सरकार के आने के बाद यह सुनिश्चित करने के लिये कि बालू की ढुलाई न हो सके, रास्ते को काट दिया गया था उस पर आड़ी खाई बना कर। उस खाई के साइड से अपनी मोटर साइकिल लाते हुये वे तीन नौजवान गंगा तट की ओर बढ़े। जितनी तेजी दिखा रहे थे, उससे हमें (राजन भाई और मुझे) यह लगा कि वे कहीं कोई अवैध काम न करने जा रहे हों गंगा तट पर।

गंगा हैं ही ऐसी नदी – जिसके किनारे हर कर्म-कुकर्म-अकर्म-विकर्म करने वाला पंहुचता है। जन्म लेता है, तब पंहुचता है। मरता है, तब तो पंहुचता ही है।

हम दोनो उनके पीछे पीछे गये। सतर्क मुद्रा में। पर वे मात्र मछली पकड़ने वाले निकले। मछली पकड़ना तो ठीक, पर उसके लिये जो तकनीक प्रयोग में ला रहे थे, वह मैने पहले नहीं देखी थी। अपने 65 साल के जीवन में राजन भाई ने भी नहीं देखी थी।

प्लास्टिक की बोतल में पानी में रखी सऊरी मछलियां दिखाता व्यक्ति।
गंगा हैं ही ऐसी नदी – जिसके किनारे हर कर्म-कुकर्म-अकर्म-विकर्म करने वाला पंहुचता है। जन्म लेता है, तब पंहुचता है। मरता है, तब तो पंहुचता ही है।

एक बोतल में चारे के रूप में पानी भर कर उसमें जिन्दा मछलियां ले कर आये थे। छोटी मछलियां जो उन्होने अपने गांव के तालाब से पकड़ी थीं। उन मछलियों का नाम बताया – सऊरी। सऊरी को कांटे में फंसाया। कांटा एक लम्बी नायलोन के तार से बंधा था। तार उन्होने बांस की दो खप्पच्चियों से बांध दिया था और खपच्चियां गंगा किनारे गाड़ दी थीं। किनारे पंहुच बड़ी फुर्ती से किया था यह काम उन्होने।

16 नवम्बर 2017 की फेसबुक नोट्स पर पोस्ट। फेसबुक की नोट्स को फेज आउट करने की पॉलिसी के कारण ब्लॉग पर सहेजी गयी है।

Fishing
मेरे सामने सऊरी को बड़ी जोर लगा कर नदी में फेंका। लगभग 15 फुट दूर वह तार मछली पानी में गिरी और पानी में तैरने लगी।

मेरे सामने कांटे में फंसाई सऊरी को उनमें से एक ने बड़ी जोर लगा कर नदी में फेंका। लगभग 15 फुट दूर वह तार मछली पानी में गिरी और पानी में तैरने लगी। उसके नदी में तैरने के अनुसार तार हिलने लगा। बस अब इन लोगों का काम तार में असाधारण गति का इन्तजार करना था जो यह बताती कि बड़ी मछली सऊरी को खाने के चक्कर में कांटे में फंस गयी है।

बांस की गाड़ी खपच्चियों से बंधा तार। दायें कोने में खड़े हैं राजन भाई।

सिंपल तकनीक।

उन लोगों से मैने बात प्रारम्भ की। वे महराजगंज (5किमी) के पास कल्लू की पाही गांव से आ रहे थे। सवेरे छ बजे घर से निकले। अब सात बजने को था। दो घंटा मछली पकड़ेंगे। बहुधा आते हैं। कभी मछली नहीं भी मिलती।

कौन मछली पकड़ेंगे?

जो मिल जाये! जैसे पहिना।

दूर गंगा में विष्णु अपनी नाव पर था। इनमें से एक ने जोर से पूछा – मछली है?

दूर गंगा में विष्णू अपनी नाव पर था। इनमें से एक ने जोर से पूछा – मछली है?

अर्थात ये लोग न केवल मछली पकड़ने निकले थे, अगर मल्लाह से मछली मिल जाये तो खरीदने का इरादा भी रखते थे। विष्णु ने जवाब दिया – “नहीं, आज मछली मिली ही नहीं।”

वह, मछली न मिलने के कारण एक बार और जाल बिछाने के उद्यम में लगा था। मुझे भी उस पार घुमा कर लाने से मना कर दिया उसने – जाल बिछाना ज्यादा महत्वपूर्ण था इस समय उसके लिये।

गंगा यहां गहरी हैं कि नहीं? कितना पानी है? इन लोगों ने विष्णु से पूछा।

“गहरी हैं करीब एक लग्गी” (8-10फुट)।

गहरी नदी यानी करारी। इन लोगों ने बताया कि उथली नदी को पटपट कहते हैं। करारी नदी में मछलियां होती हैं, पटपट में नहीं। मछली पकड़ने की सम्भावना बढ़ाने के लिये उनके लिये यह जानना जरूरी था कि नदी करारी है या पटपट।

कोई उम्र ऐसी नहीं होती जब आपको नयी जानकारी न मिले। अपने परिवेश में इतना बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते। मैं तो क्या, राजन भाई भी नहीं जानते थे कि सऊरी मछली से पहिना पकड़ी जाती है, करारी नदी के किनारे से!

आपको मालुम था?


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