रेणु की “एक आदिम रात्रि की महक” से उभरी रेल यादें


उसी दौरान मैं माही नदी के किनारे बहुत घूमा। उसके दृष्य अभी भी याद हैं। माही नदी में एक बरसाती नदी “लाड़की” आ कर मिलती थी। मेरे मन में यह भी साध बाकी रही कि चल कर लाड़की का उद्गम स्थल देखूं।

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