विष्णु मल्लाह – बैकर मछरी पकड़े बा!


किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।

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