पांच सौ रोज कमाने का रोजगार मॉडल

अच्छी भली स्वस्थ काया। देखने में मेधा भी कुंद नहीं लगती। पर कुछ सार्थक उद्यम की बजाय मंदिर की “प्रेरणा” से भिखमंगत्व को अपना कर पिछले पांच छ साल से जीवन यापन कर रहा है।


मैं अपने मित्र गुन्नीलाल पाण्डेय के यहां घर के बाहर धूप मैं बैठा था। गांव देहात की, इधर उधर के जीवन की, खेत खलिहान की और उनके वृद्ध पिता की बुढापे की गतिविधियों की बातें चल रही थीं। अचानक एक व्यक्ति साइकिल ले कर पैदल आया और पास में रुका। उसने लुंगी की तरह धोती और कुरता पहन रखा था। सर्दी के मौसम के हिसाब से एक जाकिट (शायद खादी का) भी था कुरते के ऊपर। हैण्डल में दोनो ओर थैले टांग रखे थे। दुबला शरीर, सिर पर पीला गमछा लपेटा और हल्का सा तिलक लगाने का मेक-अप था – इतना कि साधू और गृहस्थ के बीच में अंदाज लगाना कठिन हो।

अचानक एक व्यक्ति साइकिल ले कर पैदल आया और पास में रुका।

वह आ कर पूरे आत्मविश्वास से गुन्नीलाल जी के पास धूप में रखी खाली कुर्सी पर बैठ गया। मानो कोई परिचित व्यक्ति हो। पर गुन्नीलाल उसे जानते नहीं थे। फिर भी अतिथि के साथ जिस सभ्यता से पेश आया जाता है; उसको निभाते हुये उन्होने पूछा – “बोलें महराज। आने का प्रयोजन?”

उसने बिना भूमिका के कहा कि वह प्रयागराज से आ रहा है। उसे “प्रेरणा” हुई है कि फलानी जगह मंदिर बनाना है। उसी के लिये श्रद्धालू जनों से सहयोग की अपेक्षा से दरवाजे दरवाजे जा रहा है।

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दुबला शरीर, सिर पर पीला गमछा लपेटा और हल्का सा तिलक लगाने का मेक अप था – इतना कि साधू और गृहस्थ के बीच में अंदाज लगाना कठिन हो।

गुन्नी जी ने कहा – “बईठा रहअ महराज (बैठे रहिये महराज)।” फिर घर में जा कर कुछ दक्षिणा लाने गये।

गुन्नी घर में गये थे तो मैंने उस व्यक्ति से पूछा – कितना चलते हैं आप रोज?

“राम जितना चलायें।” उसने निरर्थक सा जवाब दिया। फिर सोच कर जोड़ा कि पांच छ साल से वह इस ध्येय (प्रॉजेक्ट मंदिर) में जुटा है। “मंदिर क काम फाने हई त उही में लगा हई (मंदिर का काम हाथ में लिया है तो उसी में लगा हूं)।”

हम जब अपने देश को बेहतर बनाना चाहते हैं, प्रगति करना चाहते हैं; तब इस तरह के भिखमंगत्व को बहुत कड़ाई से निपटना होगा। … आखिर भारत में भी कई प्रांत हैं जहां भिखमंगे नहीं हैं। इस तरह के एबल-बॉडीड भिखमंगे तो बिल्कुल नहीं हैं।

“कहां रुकते हैं?”

“बस, जहां शाम, वहां बिश्राम। रमता जोगी, बहता पानी का क्या? जहां जगह मिली, रुक गये।”

गुन्नी पांड़े ने घर से एक नोट ला कर उस व्यक्ति को दिया। बोले – बस यही दे सकता हूं। आप ग्रहण करें और जायें।

वह व्यक्ति नोट को जेब में रख कर उठा और साइकिल ले कर पड़ोस का घर खटखटाने चल दिया।

वह व्यक्ति नोट को जेब में रख कर उठा और साइकिल ले कर पड़ोस का घर खटखटाने चल दिया।

गुन्नी पांड़े से मैंने कहा – कितना दिया?

“दस रुपया। इससे ज्यादा देने लायक नहीं लगा मुझे।”

आपने दस दिया, बहुत दिया। मैं तो बैरंग लौटाता।

गुन्नी पांड़े अपने संस्मरण सुनाने लगे – “कई आते हैं। एक तो फलाने गांव के बाबाजी ने मंदिर बनवाना प्रारम्भ किया। मेरे पास आये तो बहुत पेशोपेश में पड़ा। फिर उन बाबाजी से कहा कि यह पांच सौ रुपया दे रहा हूं। इसे ग्रहण करें और इसके बाद किसी और सहयोग की अपेक्षा आगे न करें।” पर वे बाबाजी फिर भी नहीं माने। अगली बार आये तो गुन्नी पांड़े उन्हे दूर से देखते ही घर के अंदर चले गये और बाहर निकले ही नहीं।

इस पोस्ट को अयोध्या के राम मंदिर के लिये जन जागरण द्वारा जुटाये जा रहे चंदे से जोड़ कर कदापि न देखा जाये। अयोध्या का रामलला मंदिर भारत की हिंदू अस्मिता और जागरण का प्रतीक है। यहां बात केवल धर्म के नाम पर अपनी अकर्मण्यता को छिपा कर आजीविका कमाने की वृत्ति का विरोध है। अनेकानेक मंदिर भारत में हैं जो उपेक्षित हैं। उनकी साफ सफाई और देख रेख करने वाला कोई नहीं। मुहिम तो उनके उद्धार की और उसके माध्यम से हिंदू जागरण की होनी चाहिये।
एक स्पष्टीकरण

“बहुत बढ़िया धंधा है। अब यही व्यक्ति जो यहां से दस रुपये ले कर गया; दिन भर में कम से कम पांच सौ कमा लेगा। कहीं कहीं चाय, नाश्ता, भोजन भी पा जायेगा।”

भारतवर्ष में अच्छी खासी जमात इस तरह के लोगों की है जो भगवान के सपने में आने की कथा बांटते हुये “प्रोजेक्ट मंदिर” ले कर छान घोंट रहे हैं। ये आत्मनिर्भर भारत नहीं; अकर्मण्य भारत के आईकॉन हैं! 😦

इस व्यक्ति की अच्छी भली स्वस्थ काया। देखने में मेधा भी कुंद नहीं लगती। पर कुछ सार्थक उद्यम की बजाय मंदिर की “प्रेरणा” से भिखमंगत्व को अपना कर पिछले पांच छ साल से जीवन यापन कर रहा है। लोग रोकड़ा देते होंगे तो जेब में रखता होगा और जो सीधा-पिसान-सामान देते होगे उसके लिये साइकिल पर दो थैले लटकाये है। पहले भिखमंगे दो गठरियां – एक आगे और एक पीठ पर लटकाये चलते थे। अब सुविधा के लिये साइकिल ले ली है।

मेरे गांव में लोग दैनिक मेहनत मजूरी से रोज का औसत दो ढाई सौ कमाते हैं। यह निठल्ला पांच सौ रोज पीटता है! अपना आत्मसम्मान व्यक्ति वेताल की तरह पेड़ पर टांग कर निकल दे तो भिखमन्गे की जिंदगी में बेहतर खा सकता है। भारतवर्ष में अच्छी खासी जमात इस तरह के लोगों की है जो राम जी के सपने में आने के कारण “प्रोजेक्ट मंदिर” ले कर छान घोंट रहे हैं। ये आत्मनिर्भर भारत नहीं; अकर्मण्य भारत के आईकॉन हैं! 😦

भारत में यह भिखमंगा वृत्ति आज के युग की नहीं है। एक आईरिश महिला देर्वला मर्फी ने साइकिल से आयरलैण्ड से भारत तक की यात्रा की 1960 के दशक में। उनके संस्मरण हैं Full Tilt – Ireland to India With a Bicycle में। इसमें उन्होने लिखा है कि भिखमंगे उन्हे ईरान और भारत में पाये। आश्चर्यजनक रूप से अफगानिस्तान में, जहां ज्यादा विषमता थी, ज्यादा विपन्नता, वहां भिखमंगे नहीं थे।

हम जब अपने देश को बेहतर बनाना चाहते हैं, प्रगति करना चाहते हैं; तब इस तरह के भिखमंगत्व को बहुत कड़ाई से निपटना होगा। लोगों को किसी तरह से समझाना होगा कि सम्पन्नता भीख मांगने से नहीं आती, मेहनत और उद्यम से आती है। … आखिर भारत में भी कई प्रांत हैं जहां भिखमंगे नहीं हैं। इस तरह के एबल-बॉडीड भिखमंगे तो बिल्कुल नहीं हैं।

“नारि मुई घर सम्पति नासी। मूड़ मुडाइ भये सन्यासी।” – तुलसी बाबा का वह सन्यासी युग भी अब नहीं है। अब तो सन्यासी भी मोबाइल ले कर चलते हैं। इस बंदे से मैंने पूछा नहीं; क्या पता यह भी मोबाइल लिये हुये हो! पांच सौ रोज कमाता है तो होगा ही। शायद स्मार्टफोन भी हो!


रघुनाथ पांड़े और धर्मराज के दूत

रघुनाथ पांंड़े मुझसे बताते हैं – “ई जरूर बा कि ऊ धर्मराज क दूत रहा।” उनके अनुसार स्वर्ग के दूत सफेद कपड़े में गौर वर्ण के होते हैं। यमराज के दूत काले, मोटे और बदसूरत होते हैं।


जिस तरह से बताते हैं अपने बचपन की बातें; उसके अनुसार रघुनाथ पांड़े जी सन 1927 के आसपास की पैदाइश होंगे। अब नब्बे पार की उम्र। उस उम्र के हिसाब से पूरी तरह टनमन हैं। घर में, आसपास और सौ दो सौ मीटर के दायरे में खूब घूमते मिलते हैं। बोलते हैं कि आंख से कम दिखता है। पर उनके पुत्र गुन्नीलाल जी आंख टेस्ट करवा कर डेढ़ हजार का चश्मा ले आये तो वह इस्तेमाल नहीं करते। चश्मा से उलझन होती है। धुँधला ही सही, सब देख लेते हैं।

कहते हैं कि कान से सुनाई कम देता है; पर बकौल गुन्नी पांड़े; अपने काम की हर बात सुन लेते हैं।

रघुनाथ पाण्डेय जी

हर बार मिलने पर चहुचक मिलते हैं, इधर उधर की सब बातेँ प्रेम से करते हैं। पर उनका हालचाल पूछने पर लटक जाते हैं। “हाल त ठीक नाहीं बा। हमार जियई घबरात रहथअ। अब न जियब। (हाल ठीक नहीं है, मेरा जी घबराता है। अब नहीं जियूंगा)” उन्हे ऐसा कहते तीन चार साल से देख रहा हूं। एक आध बार उनकी तबियत उन्नीस बीस हुई है, पर बाउंस बैक कर गये हैं।

“मोट क रहा। माने हृष्टपुष्ट। उज्जर कपड़ा पहिरे रहा। गोर रहा। करिया भुजंग नाहीं। हम त जचकि गये। गोहरावा – के आ हो! बोले पर पराइ गवा। दूर से ताकत रहा। ”।

पं. रघुनाथ पांड़े

अभी चलेंगे पण्डित रघुनाथ पाण्डेय!

तीन दिन पहले उनके घर गया तो सवेरे के नौ बज चुके थे। वे सवेरे का भोजन कर धूप सेंक रहे थे घर के सामने नीम के नीचे खटिया पर बैठे हुये। आज का नया आख्यान यह था कि धर्म राज का दूत आया था। “मोट क रहा। माने हृष्टपुष्ट। उज्जर कपड़ा पहिरे रहा। गोर रहा। करिया भुजंग नाहीं। हम त जचकि गये। गोहरावा – के आ हो! बोले पर पराइ गवा। दूर से ताकत रहा। (मोटा था, माने तंदुरुस्त्। सफेद कपड़े पहने था और गौरवर्ण था। मैंने अचकचा कर पूछा तो दूर चला गया और दूर से मुझे देखता रहा।)”।

पता नहीं, वैसे धुँधला दिखता है पर उस दूत की तंदुरूस्ती और उजले कपड़े पहनना और दूर से इनको निहारना – यह सब स्पष्ट देख पाए पंडित रघुनाथ पांड़े!


साढ़े तीन साल पहले रघुनाथ पाण्ड़ेय जी पर लिखी पोस्ट – अगियाबीर के रघुनाथ पांड़े जी


उम्र बढ़ने के साथ साथ उन्हे मृत्यु के हेल्यूसिनेशन होने लगे हैं। गुन्नीलाल जी का कहना है कि उनका और सब ठीक है, पर सोचने में नकारात्मकता बहुत हो गयी है। घर से कोई भी बाहर जाता है तो परेशान होने लगते हैं। कल्पना करते हैं कि उसके साथ कोई दुर्घटना न हो गयी हो। उसका किसी ने अपहरण न कर लिया हो। उससे किसी ने छिनैती न कर ली हो।

मेरे मुंह के पास अपना चेहरा ला कर वे मुझसे बताते हैं – “ई जरूर रहा कि ऊ धर्मराज क दूत रहा।”

मेरे मुंह के पास अपना चेहरा ला कर वे मुझसे बताते हैं – “ई जरूर बा कि ऊ धर्मराज क दूत रहा।” उनके अनुसार जब स्वर्ग ले जाने वाले दूत आते हैं तो वे सफेद कपड़े में और गौर वर्ण के होते हैं। यमराज के दूत काले, मोटे और बदसूरत होते हैं। ऐसा उन्होने (अपने भाई की स्मृति में पण्डित द्वारा कहे) गरुड़ पुराण में सुना था। उन्हे लेने आया दूत धर्मराज का ही था।

याददाश्त ठीक है रघुनाथ पांड़े जी की। यह उन्हे याद है कि मैं उनके घर बहुत दिनों बाद आया हूं। मेरे साथ आने वाले (राजन भाई) नहीं आये? वे पूछते हैं। राजन और राजन के छोटे भाई बच्चा दूबे की भी याद करते हैं। उनका सब कुछ चहुचक है; बस उम्र बढ़ने का भय और नकारात्मकता घर कर गयी है। उनका हम उम्र कोई बोलने बतियाने को होता तो शायद ठीक रहता।

ऐसा नहीं है कि रघुनाथ पांड़े जी अभी मृत्यु की सोचने लगे हैं। पिछ्ले साढ़े तीन साल से तो मैं देखता/सुनता ही रहा हूं उनका यह मृत्यु-पुराण। एक पोस्ट और फेसबुक नोट्स पर है इस विषय में। देर सबेर उसे भी ब्लॉग पर सहेजूंगा। फेसबुक की “कांइया” नीति ने फेसबुक नोट्स गायब जो कर दिये हैं! 😀

गुन्नी पांड़े मेरा और मेरे साथ गये मेरे बेटे का अतिथि (अतिथि ही था मैं – बिना किसी प्रयोजन के, बटोही का हेण्डल उनके घर की ओर घूम जाने के कारण ही उनके यहां पंहुचा था) सत्कार किया। मटर की पूड़ी-तरकारी; जो सर्दियों का इस इलाके में प्रिय नाश्ता है; कराया और चलते चलते अपनी दालान की दीवार पर लटकी एक लौकी भी मुझे साथ ले जाने को दी। इसके समतुल्य आवाभगत की शहर में कोई कल्पना नहीं कर सकता।

गुन्नीलाल पाण्डेय जी मेरे लिये लौकी तोड़ते हुये। पास का पूरा खेत नीलगाय का झुण्ड चर गया है।

गुन्नीलाल जी ने लौकी तोड़ते हुये मुझे पास के अपने खेत को दिखाया। रात में घणरोज (नीलगाय, जो अगियाबीर के टीले पर बड़े झुण्ड में रहते हैं) पूरी तरह चर गये हैं। उनकी लौकी की बेल भी जितनी जमीन पर थी उसे या तो चर गये या पैरों से रौंद गये हैं। इस नुक्सान को वे बहुत स्थितप्रज्ञ भाव से मुझे बताये। “अब ठण्ड की रात में जाग जाग कर उन्हें भगाना मेरे बस में नहीं है। उफरि परईं सरये (भाड़ में जायें वे)।”

गुन्नी पांड़े के घर से लौटते समय मैं पण्डित रघुनाथ पाण्डे और धर्मराज के दूत की सोचता रहा। दूर दूर तक मुझे कोई हृष्टपुष्ट और सफेद कपड़े पहने नजर नहीं आया। कहां गया होगा वह दूत। ऐसे दूतों के ट्रेवलॉग पर कोई क्लासिक पुस्तक है क्या?


मातृ ऋण चुकाया नहीं जा सकता

उस धनी का कहना भर था कि उस मंदिर की नीव का पत्थर मिट्टी में धसकने लगा। मंदिर एक ओर को झुकने लगा। वह झुका मंदिर एक वास्तविकता है।


गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी कह रहे थे कि पिता, गुरु या देव ऋण तो व्यक्ति उतार भी सकता है मातृऋण नहीं उतारा जा सकता। उन्होने एक कथानक बताया।

एक व्यक्ति पढ़ लिख कर और व्यवसाय में उन्नति कर सफल हो गया। बहुत समय बाद अपनी माँ से मिला तो बोला – माँ, तेरे बहुत से ऋण हैं, बता तुझे मैं क्या दूं? मैं तेरा ऋण उतारना चाहता हूं।

माँ ने बहुत मना किया कि वैसी कोई आवश्यकता नहीं है। तू सफल हो गया, यही मेरे लिये संतोष की बात है। पर बेटा जिद पर अड़ा रहा। अंतत: माँ ने कहा – तेरे साथ बहुत समय एक बिस्तर पर सोई हूं; आज वैसे ही सोने का मन है।

Photo by Laura Garcia on Pexels.com

बेटा मां के साथ सोया। जब नींद में था तो मां ने एक लोटा पानी उसपर उंड़ेल दिया। वह फनफनाते हुये उठा। माँ ने कहा – बेटा, बुढ़ापे में मेरे हाथ कांपते हैं; सो तेरे उपर पानी गिर गया। चल सो जा।

मैं तुम्हें कितनी रातोंं साथ ले कर सोई हूं। तुम्हे सूखे में सुला कर खुद गीले में सोती रही हूं। हमेशा तेरा ध्यान रखा कि तेरी नींद न टूट जाये। और तू एक रात भी वैसा नहीं कर सका? रुपया पैसा, धन दे कर उसकी बराबरी करना चाहता है।

यही नाटक तीन बार हुआ। अंत में बेटा तमतमा कर खड़ा हो गया – “रात भर पानी क्या पीती है, और पीना भी हो तो मुझे जगा कर मांग लिया होता। … मैं दूसरे बिस्तर पर लेटता हूं।”

“बेटा बस इतने में ही तुम क्रोध में आ गये? मैं तुम्हें कितनी रातोंं साथ ले कर सोई हूं। तुम्हे सूखे में सुला कर खुद गीले में सोती रही हूं। हमेशा तेरा ध्यान रखा कि तेरी नींद न टूट जाये। और तू एक रात भी वैसा नहीं कर सका? रुपया पैसा, धन दे कर उसकी बराबरी करना चाहता है। बेटा, माँ की ममता उसका अपनी है। कुछ दे कर उससे उऋण होने की मत सोचना?” – माँ के इन वचनों को सुन कर बेटे की आंखें खुल गयीं। वह समझ गया कि मातृ ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता!

कुछ ऐसा ही मैंने विश्वनाथ घोष की पुस्तक एमलेस इन बनारस (Aimless in Benaras) में है। उसमें वे 17वें अध्याय मेँ लिखते हैं – मेरी माँ की इस और परेशानी थी। वह सोचती थीं कि कहीं मैं उन्हें उनके बुढ़ापे में छोड़ तो नहीं दूंगा। वे हमेशा कहा करती थीं कि बेटा चाहे जितना धनवान हो जाये, वह माँ के ऋण से उऋण नहीं हो सकता। कोई भी मां से जो मिला है, उसकी भरपाई कितना भी धन दे कर नहीं कर सकता। इसके पक्ष में माँ बनारस के एक मंदिर की कहानी बताती थीं।

कहानी के अनुसार एक धनी ने अपनी माता की प्रतिष्ठा में एक मंदिर बनारस में गंगा किनारे बनवाया। बनने पर मां को वहां बुला कर सगर्व कहा – माँ, यह तुम्हारे सारे ऋण को चुकता करने के लिये है!

रत्नेश्वर महादेव मंदिर, वाराणसी। इसे मातृऋण मंदिर भी कहा जाता है। चित्र विकीपेडिया से साभार। https://bit.ly/3nMeFym

उस धनी का कहना भर था कि उस मंदिर की नीव का पत्थर मिट्टी में धसकने लगा। मंदिर एक ओर को झुकने लगा। वह झुका मंदिर एक वास्तविकता है। रत्नेश्वर महादेव मंदिर 1820 में बना। इसे मातृऋण मंदिर भी कहा जाता है।

मणिकर्णिका घाट पर स्थित यह मंदिर अन्य मंदिरों से अलग, नदी के तल पर बना है और काफी समय यह जल मग्न रहता है।


मेरे साले साहब (शैलेन्द्र दुबे) ने मातृ ऋण मंदिर का नाम नहीं सुना, यद्यपि ये बनारस में रहते हैं। पर चित्र देखने पर बोले – यह तो काशी करवट मंदिर है!

Kashi Karvat के नाम से सर्च करने पर इसी मंदिर के चित्र मिलते हैं। पीसा की मीनार सा यह मंदिर कई किंवदन्तियों को जन्म देने वाला है।


[पोस्ट के हेडर में चित्र – Ratneshwar Mahadev in Mist (Picture by Piyush Singh)]


अशोक शुक्ल ने दैनिक पूजा का लाभ बताया, और वह बड़ा लाभ है!

अशोक पण्डित ने कहा कि शोक और दु:ख अलग अलग मानसिक अवस्थायें हैं। जहां दु:ख का मूल अभाव में है; वहीं शोक अज्ञान से उपजता है – अज्ञान प्रभवं शोक: (गरुड़ पुराण)।


अशोक कुमार शुक्ल जी के घर लड़की की शादी पड़ी है। शादी के दिन मैं नहीं जा सकता था, तो एक दिन पहले उनके घर जा कर शगुन दे कर आने की सोची। घर पर अशोक थे जरूर, पर पूजा में बैठे थे। विवाह सम्बंधित कोई पूजा नहीं थी; उनकी दैनिक पूजा थी। बताया गया कि नित्य एक घण्टा पूजा में लगता है।

पूजा के बाद अशोक आये और साथ में चाय भी। पीते हुये मैंने उनसे पूछा – मैं आपकी पूजा के धार्मिक पक्ष की बात नहीं कह रहा। जानना चाहता हूं कि आपके रोज के कामकाज में इसका कोई महत्व है? इससे कोई लाभ होता है आपकी दैनिक गतिविधि में?

पण्डित अशोक कुमार शुक्ल अपनी दैनिक पूजा के बाद मिले।

“हां, बहुत लाभ है। दिन में कई बार ऐसा होता है कि मानसिक व्यग्रता होती है। हर व्यक्ति को होती है। एक बार व्यग्र होने पर व्यक्ति उससे बहुत देर तक जूझता है। पर पूजा का लाभ यह है कि मैं पांच या दस मिनट तक ही व्यग्र होता हूं। उसके बाद सोचता हूं, स्मरण (ईश्वर का स्मरण) करता हूं और व्यग्रता उनको सरेण्डर कर देता हूं।… उस समर्पण के बाद वह समस्या उनकी हो जाती है। नित्य पूजा के प्रभाव से यह स्मरण और समर्पण बड़े सहज तरीके से होता है। आदत की तरह। किसी किसी दिन जब पूजा में विघ्न होता है तो बेचैनी होती है।”

अशोक जी की इस बात से मुझे श्री अरविंद की याद हो आयी। वे Letters on Yoga में लिखते हैं – Step back and remember The Mother:

It is more difficult to separate oneself from the mind when it is active than from the body. It is quite possible however for one part of the mind to stand back and remember the Mother and receive her presence and the force while the other is busy with the work.

Meanwhile what you are doing is the right way.

Remember always that whatever the difficulties the Mother’s love is with you and will lead you through.

Ref: Letters on Yoga – IV

[आपके मस्तिष्क का एक भाग काम में लगा हो सकता है पर दूसरा भाग रुक कर माँ का स्मरण करता है। ऐसा करने से माँ का प्यार आपकी समस्याओं से आपको पार लगाता है।]

दो दशक पहले वह समय था जब मैं श्री अरविंदो आश्रम के साधकों से सम्पर्क में रहता था। उस समय थोड़े थोड़े समय पर रुक कर स्मरण (और समर्पण) का अभ्यास किया करता था और उससे मेरी व्यग्रता में बहुत कमी हुआ करती थी। आज पण्डित अशोक कुमार शुक्ल ने वही बात एक अन्य प्रकार से मेरे सामने रखी। आजकल मैं कई प्रकार के दु:स्वप्नों को अचेतन में देखता हूं और मन के पार्श्व में कुछ व्यग्रतायें हैं, जिनका स्वरूप और आकार मुझे स्पष्ट नहीं है। अनिश्चित भविष्य की व्यग्रतायें। अशोक पण्डित ने सुझा दिया कि उन व्यग्रताओं को असीम सत्ता को समर्पित/सरेण्डर कर देना एक पुख्ता समाधान है।

मुझे लगता है कि “स्टेप बैक एण्ड रिमेम्बर” एक प्रकार से सतत ध्यान (meditation) की आदत है। अन्य ध्यान पद्धतियां भी यह लाभ न्यूनाधिक मात्रा में देती होंगी।

उदाहरण के लिये मैंने पाया कि सेपियंस के प्रख्यात लेखक युवाल नोवा हरारी ने अपनी एकाग्रता और लेखन की उत्कृष्टता के लिये विपस्सना को बड़ा सहायक बताया है। दुनियां में जिन लोगों से वे प्रभावित हैं, उनमें विपस्सना गुरु एस जी गोयनका प्रमुख हैं। हरारी अपने जीवन में नित्य कार्यों की लिस्ट बनाने और उसके अनुसार चलने पर बहुुत जोर देते हैं और बताते हैं कि लिस्ट में सबसे महत्वपूर्ण आइटम दो घण्टे की विपस्सना होता है। उसी का परिणाम है कि वे अपने लेखन और अपने व्याख्यानों के लिये गहन चिंतन कर पाते हैं। सेपियंस उन्होने अपने हिब्रू विश्वविद्यालय में पहले साल के विद्यार्थियों के लिये दिये नोट्स के आधार पर लिखी थी। उसके पहले रूप की 2000 प्रतियां बिकीं। हरारी ने सोचा कि शायद यही सीमा है उनके लेखन की। पर उनके पति (वे समलैंगिक हैं) ने उन्हे विपस्सना के लिये प्रेरित किया। और उसका परिणाम है कि उनकी पुस्तकें कालजयी हो गयी हैं। आप उनके टिम फेरिस शो के इस पौने दो घण्टे के इण्टरव्यू का श्रवण करें।

अशोक जी का बड़ा कुटुम्ब है। वे छ भाइयों में सबसे बड़े हैं। पर शायद सबसे प्रतिभावान भी हैं। वे किसान भी हैं और संस्कृत के अध्यापक भी। जजमानी/पण्डिताई भी होगी। उनके बोलने का ढंग बहुत प्रभावी है। गांवदेहात में वैसी वक्तृता शक्ति कम ही मिलती है। उनके पिता बाला प्रसाद शुक्ल भी 84 वर्ष की उम्र में बहुत एक्टिव हैं। उनकी घनी शिखा जो उनके वक्ष तक आ रही थी, मुझे बहुत अकर्षक लगी। उनको मैंने चरण स्पर्श किया तो बहुत आत्मीयता से उन्होने आशीष दिया। लालचंद जी (जो मुझे उनके घर ले गये थे) ने बताया कि वे आस पास की जमीन में खुरपी ले कर लगे रहते हैं। शायद वही उनके स्वास्थ्य का राज है।

पण्डित बाला प्रसाद शुक्ल, अशोक कुमार जी के पिताजी।

अशोक जी ने अपनी व्यग्रता निवारण के लिये ही नहीं, अपने दु:ख और शोक से उबरने में भी दैनिक पूजा के महत्व को रेखांकित किया। उनके अनुसार अभावों के कारण दु:ख तो होते ही हैं। उनसे उबरने के लिये स्मरण और समर्पण बहुत काम आता है। उन्होने कहा कि शोक और दु:ख अलग अलग मानसिक अवस्थायें हैं। जहां दु:ख का मूल अभाव में है; वहीं शोक अज्ञान से उपजता है – अज्ञान प्रभवं शोक: (गरुड़ पुराण)।

शायद दु:ख तो कर्मठता और अपने जीवन के अभावों को दूर करने के यत्न से शमित हो सकते हैं; पर शोक के निवारण के लिये सत्य और मिथ्या के अंतर को समझना और अपने जीवन के मूलभूत दार्शनिक उत्तर पाने की जद्दोजहद से गुजरना होगा। दु:ख बाह्य प्रयत्नों के डोमेन में है। शोक की समझ के लिये अपने अंदर जाना होगा। ध्यान और पूजा (पूजा भी ध्यान की एक विधा है, नहीं? अशोक पण्डित के साथ बैठा तो इस पर चर्चा करूंगा) उसमें सहायक हो सकते हैं। या शायद वे ही औजार हों शोक की सर्जरी के।

सर्दी का मौसम, गुनगुनी धूप और अशोक कुमार शुक्ल जी से मुलाकात। मुझे लगा कि मेरा दिन बन गया। पिछले वर्ष मेरे पिताजी की मृत्यु हुई थी। माता के जाने के बाद वही मेरे माता-पिता थे। उनके जाने की रिक्तता अभी भी भरी नहीं है। शोक जब तब मौका पाता है, मेरे अंदर पसर जाता है। अशोक जी की मानूं तो वह मेरे अज्ञान में वास करता है।

ज्ञानी बनो, जीडी। केवल नाम भर ज्ञानदत्त होने से कोई समाधान नहीं होने वाला।


गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी और वामपंथ से टकराव

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर लगा कि ये वामपंथी लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं।


एक विवाह कार्यक्रम में गया था मैं। सूबेदार गंज, प्रयागराज के रेलवे परिसर में कार्यक्रम था। पुरानी जानी पहचानी जगह। फिर भी मुझे यह लग रहा था कि मेरे परिचित कम ही लोग होंगे और मैं वहां निरर्थक हीहीहाहा किये बिना कर जल्दी लौट सकूंगा। पर वैसा हुआ नहीं। और मुझे चार पांच अच्छे लोग मिले। सार्थक हुआ वहां जाना।

मेरे बंधु ओमप्रकाश मिश्र के पुत्र का विवाह था। उन्होने मुझे कहा – भाई साहब, आपको एक महत्वपूर्ण सज्जन से मिलवाता हूं। कार्यक्रम में मेरी व्यस्तता के कारण मैं स्वयम उनके पास बैठ नहीं पाऊंगा। अत: मेरे स्थान पर आप उन्हें कम्पनी दीजिये।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी

वे सज्जन थे श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके हैं (अभी भी होंगे, शायद) और संस्कृत के भी विद्वान हैं।

मुझे अटपटा लगा। जिंदगी भर मैं ट्रेन परिचालन में थानेदारी भाषा में जूझता रहा और यह बंधु मुझे एक एकेडमिक क्षेत्र की शीर्षस्थ विभूति के साथ घंटा-डेढ़ घंटा के लिये “फंसा” रहे हैं। मेरे और उनके बीच बातचीत के कोई कॉमन मीटिंग प्वाइण्ट ही कहां होंगे?

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी से सामान्य परिचय के बाद मैं उनके पास सोफे पर बैठ गया। उनसे उनके बारे में उन्ही से पता करना शायद उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं होता; सो मैंने इण्टरनेट सर्च की शरण ली। “Girish Chandra Tripathi BHU” के नाम से सर्च करने पर न्यूज18 का यह लेख मेरे सामने था – Meet BHU VC Girish Chandra Tripathi, A ‘Proud Swayamsevak’ Who is in Eye of The Storm .

थोड़ा अंश पढ़ कर, उन्हें लगभग सुनाते हुये मैंने कहा – वाह! यह तो लिखता है कि आपने लड़कियों की हॉस्टल की मेस में मांस निषेध कर दिया था। और वहीं से अपरिचय की बर्फ पिघलनी प्रारम्भ हुई। मेरा मोबाइल ले कर त्रिपाठी जी ने वह लेख पूरा पढ़ा। फिर उन्होने बताना शुरू किया। उसके बाद सामान्यत: वे बोलने वाले और मैं सुनने वाले की भूमिका में आ गये। उनकी बातें इतनी रोचक थीं कि मुझे अपने श्रोता होने में कोई कष्ट नहीं था।

उन्होने बताया कि यह (लेख में वर्णित) संदीप पाण्डेय विश्वविद्यालय में नौकरी करते हुये भी छात्रों के बीच राजनीति करता था। जब नहीं माना तो मुझे निकाल देना पड़ा। वामपंथी है। मेगसेसे अवार्ड विजेता भी। बहुत से मेगसेसे अवार्ड पाने वाले उसी प्रकार के हैं। अपना काम करने की बजाय यह व्यक्ति विश्वविद्यालय में येन केन वाम विचारधारा का प्रसार करने और छात्रों को उकसाने में लिप्त रहता था। और वैसा आचरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तथा महामना मालवीय जी की विश्वविद्यालय की परिकल्पना के अनुकूल कदापि नहीं है।

प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर (जैसा मैं पहले भी महसूस करता था) लगा कि ये लोग – शैक्षणिक संस्थानों में घुसे संदीप पाण्डेय जैसे और मीडिया के एक बड़े वर्ग के लोग मसलन राजदीप सरदेसाई, रवीश कुमार या बरखा दत्त – लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं। इसके अलावा प्रायोजित आंदोलनों में इनकी उत्तरोत्तर विघटनकारी भूमिका उजागर हो रही है। हिंदी साहित्य में भी इनकी सोची समझी पैठ है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करते समय जिन आदर्शों को महामना मालवीय जी ने सामने रखा था, उनसे इन लोगों की विचारधारा का सामंजस्य नहीं है। गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी भारतीय जीवन पद्यति, शासक के जीवन मूल्य और समाज में नारी के स्थान के बारे में विस्तार से बताने लगे। उस संदर्भ में अनेक संस्कृत के कथन भी उद्धृत किये। मैं कई बार उनसे पूछ्ता रहा – यह कहां/किस ग्रंथ में है? बाद में पढ़ने के लिये मैंने दो पुस्तकें चिन्हित कीं – कालिदास का अभिज्ञानशाकुंतल और दण्डी का दशकुमार चरित्र। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य पुस्तकें – स्वप्नवासवदत्ता, मृच्छकटिक, उत्तररामचरित्र, कुमारसम्भव, मुद्राराक्षस आदि हिंदी अनुवाद में सहजता से उपलब्ध हैं। उन सब को भी देखने पढ़ने के लिये पर्याप्त समय है मेरे पास! 🙂

“दुष्यंत मृग का पीछा करते हुये अनजाने में कण्व के आश्रम में प्रवेश कर जाते हैं। तपस्वी उन्हें चेताता है – रुको, अपना बाण नीचे करो, यह आश्रम है और यहां हरिण अवध्य है। किसी प्राणीमात्र की हत्या नहीं की जा सकती यहां।… और दुष्यंत का उसके बाद आचरण ध्यान देने योग्य है। वे रथ से उतरते हैं; अपना धनुष-बाण नीचा करते हैं। उनका सिर अपराध बोध से झुक जाता है। उन्हे पश्चाताप होता है कि वे गुरुकुल/आश्रम में प्रवेश कर गये पर अपना मुकुट उतारा नहीं! … आज के समय में इस आचरण की कल्पना की जा सकती है? आज का शासक होता तो ऐसा कहने पर बेचारे तपस्वी को तो कारागार मेंं डाल दिया जाता।… जब हम विश्वविद्यालय की सोचते हैं तो उसकी गरिमा और उसके आदर्श के रूप में यह सब सामने आता है।” – मैं श्री गिरीश चंद्र जी के शब्दों को यथावत नहीं रख पा रहा (मेरी स्मरण शक्ति उस लायक नहीं है), पर उनका आशय ऐसा ही था।

वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश के साथ सीता। चित्र देवदत्त पटनायक की पुस्तक “सीता” से।

समाज में नारी की स्थिति के बारे में उन्होने अपने विचार रखे। राम के आदर्श की भी बात की। वनगमन के विषय में माता की बात पिता के आदेश के ऊपर थी, ऐसा उन्होने बताया। कौशल्या राम को कहती हैं – जो केवल पितु आयसु ताता; तो जिनि जाऊ जानि बड़ि माता। जो पितु मातु कहेऊं बन जाना; सो कानन सत अवध समाना। (अगर केवल पिता ने ही वनगमन का आदेश दिया है तो माता को बड़ा मान कर उनके आदेश का अनुसरण मत करो। पर अगर माता-पिता दोनो ने कहा है तो जंगल तुम्हारे लिये अवध समान है।)… माता का स्थान पिता से ऊपर है। इसी प्रकार सीता को वनवास देने के प्रसंग में राम (अपने राजधर्म की आवश्यकता के बावजूद) सीता को वन नहीं जाने देना चाहते। तब सीता उन्हें उनका राजधर्म समझाने के लिये उस कक्ष में ले कर जाती हैं, जिसमें उनके पूर्ववर्ती रघुवंशीय राजाओं के चित्र लगे हैं। सीता राम को वे चित्र दिखा कर कहती हैं – अगर वे राम के व्यक्ति को राजा के ऊपर रख कर आचरण करेंगे तो परलोक में अपने इन पूर्वजों को क्या उत्तर देंगे? … तब राम सीता के वनगमन के बारे में निश्चय कर पाते हैं।

उनके कहने में मुझे बहुत रस मिल रहा था और मैंने उन्हे बहुत नहीं टोका। एक अनुशासित श्रोता बना रहा। उनके कहने के बाद मैंने गिरीश चंद्र जी से उनके अपने लेखन की बात की; जिसे पढ़ कर मैंं उनके विचारों के विषय में और जान सकूं। उन्होने बताया कि “यह उनकी कमजोरी रही है कि उन्होने लिखा बहुत कम है”। उनसे बातचीत में लगा कि यह उनकी ही नहीं, सभी दक्षिण पन्थी विचारधारा वालों की भी कमी रही है। “दक्षिण पंथी मीडिया भी नाममात्र का है”।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी (बाँये) और मेरे मित्र श्री ओमप्रकाश मिश्र (दांये)

मैंने स्वराज्य का नाम लिया। गिरीश जी ने उस मीडिया संस्थान के विषय में भी अपना असंतोष व्यक्त किया। उनके अनुसार स्वराज्य के लोगों को भी भारतीय सोच, दर्शन, परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की गहन समझ नहीं है। वामपंथ से जूझने के लिये यह कमजोरी है ही। … मुझे भी ऐसा लगा। मेरे दैनिक न्यूज-व्यूज और ओपीनियन खंगालने के लिये जो साइट्स हैं उनमें हैं – न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्डियन, द टेलीग्राफ, पाकिस्तान का डॉन और भारत का द हिंदू। ये सभी वाम पंथी या लेफ्ट-ऑफ-सेण्टर की सामग्री परोसते हैं। इसके अलावा साहित्य में भी अधिकतर इसी विचारधारा का वर्चस्व दिखता है। मेरे पास ले दे कर स्वराज्य का सब्स्क्रिप्शन है, जिसे राइट या राइट ऑफ सेण्टर कहा जा सकता है।

काश गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी जैसे विद्वान नियमित लेखन कर लोगों की विचारधारा को पुष्ट करने का बड़ा कार्य करते। यहां गांव में एकांत में रहने वाले मुझे भविष्य में गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी का सानिध्य मिलेगा; कह नहीं सकता। उस समारोह में एक पत्रकार श्री मुनेश्वर मिश्र जी भी आये थे। उनको त्रिपाठी जी ने भविष्य मेंं बैठक/गोष्ठी आयोजित करने के लिये कहा है, जिसमें शायद गिरीश जी से मिलना सम्भव हो।

गिरीश चंद्र जी से मुलाकात के बाद मुझे यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि मुझे भारतीय सोच/विचारधारा/दर्शन का बेहतर और विधिवत अध्ययन करना चाहिये; इधर उधर चोंच मारने और चुगने के अंदाज में नहीं। पर संस्कृत साहित्य को उसके मूल रूप में पढ़ना-समझना फिलहाल मेरे लिये सम्भव नहीं है – मेरी भाषा की सीमायें हैं। बारबार संस्कृत-हिन्दी शब्दकोष रेफर करना असम्भव तो नहीं, ऊबाउ काम है।

इसलिये फिलहाल मैंने अभिज्ञान शाकुंतल और दशकुमार चरित्र का हिंदी अनुवाद त्रिपाठी जी से मिलने के बाद ढूंढ़ कर पढ़ा। पैंसठ साल की उम्र में जीवन में पहली बार इन पुस्तकों को मैंने पहचाना। अभी आधा दर्जन अन्य संस्कृत के ग्रंथों के अनुवाद भी पढ़ने के लिये चिन्हित कर लिये हैं। इसके अलावा तुलसी के रामचरितमानस और विनयपत्रिका को एक बार फिर से पढ़ने की सोची है। इसी वर्ष मैंने राजाजी का महाभारत और इरावती कर्वे का युगांत पढ़ा है। और आगे यह सब जारी रखने के लिये प्राइम मूवर गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी से उक्त वर्णित मुलाकात ही है।