स्मार्टफोन जाओ, साइकिल आओ

उसने मुझे दिखाया था कि साठ रुपये की पुड़िया में दो तीन दिन तक वे तीन चार लोग चिलमानंद मग्न रह सकते थे। वह ‘सात्विक’ आनंद जिसे धर्म की भी स्वीकृति प्राप्त थी। यह सब मैं, अपनी नौकरी के दौरान नहीं देख सकता था।


कार्ल न्यूपोर्ट की पुस्तक पढ़ी है ‘डिजिटल मिनिमलिज्म’। पढ़ कर समझ आ गया है कि सोशल मीडिया कम्पनियाँ मूर्ख बना रही हैं। उनकी कोई रुचि हमारी सोशल कनेक्टिविटी में नहीं है। उनका सारा जोर हमें डिजिटल प्लेटफार्म पर बारम्बार बुलाना और आने पर बांधे रहना है। आप “दारुजोषित की नाईंं” एक बार आते हैं स्मार्टफोन पर केवल आज का मौसम या अभी का समय देखने के लिये और वेब सर्फ करने में या सोशल मीडिया में लाइक – कमेण्ट देखने में लग जाते हैं। उस सर्फिंग से आप कोई विद्वान बनते हों, ऐसा कत्तई नहीं है।

उसमें आप अपना समय खर्च करते हैं और उससे पैसा कमाते हैं फेसबुक या गूगल जी।

अफीम के बाद और अफीम से कई गुना ज्यादा घातक है यह स्मार्टफोन का लती बनना। आप वह किताब खुद पढ़ें और निर्णय लें।

साथी, मेरी साइकिल

फिलहाल, मैंने तो स्मार्टफोन को डीएनडी (डू नॉट डिस्टर्ब) मोड में धर कर अपना दो मेगापिल्सल का नोकिया 3111 और साथी (अपनी साइकिल) का साथ पकड़ा। स्मार्टफोन साथ में इसलिये रखा कि उसके नम्बर पर कोई जरूरी फोन आये तो अटेण्ड कर सकूं। वैसे दूसरी पारी में चल रहे व्यक्ति के पास ऐसे फोन कम ही आते हैं।

मैं देख पाया कि महुआ झर रहा है। भगवानपुर की महुआरी में लोगों ने चादर बिछा दी है। पर चादर पर कम, जमीन पर ज्यादा गिर रहा है महुआ। उसे बीनने के लिये बच्चे पन्नियाँ हाथ में लिये इधर उधर दौड़ रहे हैं।

भगवानपुर की महुआरी

एक व्यक्ति को कहते सुना – आज ठण्डक है मौसम में, इसलिये आज कम झरा है। मौसम की ठण्डक का दृष्य भी दिखा। दिन में ताप 40 डिग्री के आसपास हो रहा है पर सवेरे हवा में सर्दी थी। कुछ जगह लोग कऊड़ा जलाये तापते भी दिखे।

कुछ जगह लोग कऊड़ा जलाये तापते भी दिखे।

गडौली में एक जगह पर महुये का एक पेड़ है जो बहुत फलता है। पिछले तीन साल से वह मैं देख रहा हूं। उसके चित्र लेना नहीं भूलता। साइकिल रोक कर चित्र लेने लगा तो एक लड़की टोकरे में बीने हुये महुआ रखने खड़ी थी। मैं चाहता था वह हट जाये तब चित्र लूं, पर वह मुझे देख कर ठिठक गयी। हम दोनो के पेशोपेश में मोबाइल का बटन दबा और चित्र खिंच गया। फोटोस्केचर एप्प (लैपटॉप पर) से उसको पैण्टिंग का रूप देने से लड़की की पहचान पर्याप्त मिट गयी है, पर चित्र तो है ही।

महुआ बीनने वाली लड़की।

एक घणरोज (नीलगाय) मेरे रास्ते से गुजरा। दो कुत्ते उसके पीछे झपटे और उसे खदेड़ दिया। कुत्तों को नीलगाय लखेदना देखते हुये मेरे मन में विचार आया कि नीलगाय से बचने के लिये गांव वालों को कुत्ते प्रशिक्षित करने चाहियें। जैसे गड़रिया एक दो कुत्ते पालता है अपनी भेड़ों की रक्षा के लिये, वैसे किसान को भी कुत्ते पालने चाहियें। वे भले ही देसी ब्रीड के हों, पर स्वस्थ होने चाहियें। उनकी नियमित डीवॉर्मिंग और टीकाकरण होना चाहिये।

मैं तीन सीनियर सिटिजंस को जानता हूं जो अपने खेतों की घणरोज से रक्षा के लिये रात भर टार्च जला जला कर रखवाली करते हैं। उनके लड़के आराम से खटिया तोड़ते सोते हैं। अगर वे तीन चार कुत्ते इस काम के लिये तैयार कर लें तो शायद उन्हे रात में नींद नसीब हो सके।

दो आदमी सड़क के किनारे घणरोजों पर बातचीत करते दिखे। उनके अनुसार इस साल ज्यादा नुक्सान नहीं हुआ नीलगायों से। मेरे ख्याल से यह उनका अपना पर्सेप्शन था, जो शायद सही न हो।

दो आदमी सड़क के किनारे घणरोजों पर बातचीत करते दिखे।

लोहार के पुरवा के पास रेलवे क्रॉसिंग है। वह कुछ ज्यादा ही देर तक बंद रहा। ट्रेन गुजर रही थी – खाली कवर्ड वैगनों की मालगाड़ी। गुजरने के बाद नियमानुसार दो मिनट तक गेट नहीं खोला जाता। तब मैंने देखा – आठ मोटर साइकिलेंं और मेरे अलावा एक साइकिल वाले खड़े थे। किसी जमाने में साइकिल होना भी स्टेटस सिम्बल था। पहली साइकिल विवाह होने पर मिलती थी। अब विवाह के समय चार चक्का की डिमाण्ड होने लगी है। साइकिल की बजाय आम से भी आम आदमी मोटर साइकिल वाला हो गया है। मेरे जैसे ही बचे हैं साइकिल वाले।

लेवल क्रॉसिंग पर आठ मोटर साइकिल वाले और दो साइकिल वाले थे।

एक महिला सवेरे सवेरे सड़क किनारे घास छील रही थी। बताया कि उसके यहां एक गाय और एक भैंस है। घास ले कर जायेगी। घर में कल है (यानी मशीन) उसपर घास कुट्टी काट कर गाय-भैंस को खाने को दी जायेगी। गाय भले ही भैंस से कम दूध देती हो, भले ही उसका दूध सस्ता बिकता हो; गाय का नाम भैंस से पहले लिया जाता है। यह हिंदू परम्परा है। सीताराम!

गाय-भैंस के लिये सवेरे घास छीलती महिला

अव्वल तो गांवदेहात में पढ़ने वाले कम हैं, पर स्कूली बच्चे सवेरे ट्यूशन पढ़ने जाते-आते दिख जाते हैं। माता पिता ट्यूशन पर पैसे खर्च करते हैं कि बच्चा कलेक्टर-दारोगा बन जाये। पढ़ाई का और कोई ध्येय नहीं है। ट्यूशन के लिये, कहीं कहीं मास्टर जी सड़क के किनारे क्लास चलाते भी नजर आते हैं। एक जगह तो बच्चे यूं पढ़ रहे थे – और यह कोई शांतिनिकेतनी ट्यूशन जैसी लगती थी। पूरी तरह अनौपचारिक। पढ़ाई तो ऐसी ही होनी चाहिये! 😆

एक जगह तो बच्चे यूं पढ़ रहे थे

कटका रेलवे स्टेशन के पास, रेलवे की ही जमीन पर यह मंदिर है। इसमें बनाने वालों का उत्साह (या पैसा) कगूरा बनने के पहले ही खत्म हो गया। आगे जुड़ाई करने के लिये सरिये अभी भी निकले हुये हैं। बड़ी मुश्किल से मंदिर के कमरों और ओसारे की छत डाली जा सकी है। बड़ा ही एकांत है इस मंदिर के पास। और एकांत का लाभ गंजेड़ी लोग ही उठाते हैं। पहले मंगल गिरि (मेरा निर्मोही अखाड़े का साधू मित्र) यहीं डेरा डाले रहता था। उसने मुझे चिलम (गांजे वाली) का बेसिक डिमॉन्स्ट्रेशन दिखाया था। पांच साल पहले। वे चित्र किसी पुराने मोबाइल में शायद दफन हो गये।

रेलवे की ही जमीन पर यह मंदिर है।

उसने मुझे दिखाया था कि साठ रुपये की पुड़िया में दो तीन दिन तक वे तीन चार लोग चिलमानंद मग्न रह सकते थे। वह ‘सात्विक’ आनंद जिसे धर्म की भी स्वीकृति प्राप्त थी। यह सब मैं, अपनी नौकरी के दौरान नहीं देख सकता था। तब कभी कटका से गुजरा भी था तो रेलवे का अमला आगे पीछे हुआ करता था और आरपीएफ वाला निरीक्षण के पहले ही गंजेड़ियों को भगा देता रहा होगा! अब मैं बड़े इत्मीनान से मंदिर की परिक्रमा कर रहा था।

सारी प्रतिमायें प्लास्टर ऑफ पेरिस की हैं। श्रद्धा ग्रेनाइट से बलुआ पत्थर की प्रतिमाओं में निवास करते करते उकता कर अब इस सीमेण्ट/प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों में आ बसी है। और भगवान क्या? वे तो कंकर पत्थर, धूल, गोबर और रेत में भी बसते हैं। रामेश्वरम और ऋषिकेश में भगवान राम ने शिवलिंग स्थापना तो रेत से ही की थी। हनुमान जी तो कैलाश से शंकर जी को लाने में लेट ही हो गये थे। आजकल लोग लेट तो नहीं हैं; उनके पास लक्ष्मी नहीं हैं। या हैं भी तो वे धन परधानी के चुनाव में दारू-मुरगा बांटने में रिलीज कर रही हैं। लिहाजा मूर्तियां भदेस, प्लास्टर ऑफ पेरिस की ही है!

लिहाजा मूर्तियां भदेस, प्लास्टर ऑफ पेरिस की ही है!

सवा घण्टा इस तरह घूमते हुये व्यतीत हो गया। मैं चप्पल उतार मंदिर के दर्शन करने चबूतरे पर चढ़ जाता हूं। हनूमान जी के मंदिर की दीवार चटक गयी है। ज्यादा चलेगा नहीं मंदिर। बीच में शंकर जी हैं और दूसरी तरफ मां जगदम्बा। शैव मंदिर है। उसमें हनूमान जी शायद शैव-वैष्णव समरसता के लिये स्थापित किये गये हैं। हिंदुत्व का यह समरसता वाला पक्ष मुझे रुचता है। तुलसी बाबा की मानस की पूरी थीम ही इसी आधार पर है!

हनूमान जी के मंदिर की दीवार चटक गयी है।
मंदिर के दूसरे छोर पार माता पार्वती हैं। सिंह वाहिनी

मैं मंगल गिरि को मिस करता हूं। लगता है कि अभी कहीं पीछे से आ कर सामने खड़ा हो जायेगा और मैं पूछूंगा – क्या (हरिद्वार) कुम्भ चले गये थे? पर कोई नहीं मिला मंदिर पर – कोई ऑर्डीनरी गंजेड़ी भी। बस एक लड़की साइकिल कैंची से सीखती जरूर गुजरी पास से।

एक लड़की साइकिल कैंची से सीखती जरूर गुजरी पास से।

मंदिर में हाथ जोड़ कर वापस लौटता हूं। एक दिन में सवेरे का भ्रमण इतना होता है। स्मार्टफोन विहीनभ्रमण। नोकिया वाले फोन से चित्र फटे फटे से आते हैं तो उन्हे मैं घर पर पैण्टिंग का सा रूप दे देता हूं फोटोस्केचर एप्प से। स्मार्टफोन विहीन जीवन, साइकिल, पुस्तकों, किण्डल और यदाकदा लैपटॉप के साथ ज्यादा रोचक लगता है। आज चार दिन हो गये हैं उस तरह से। और निरर्थक मोबाइल सर्फिंग से बचे समय में दो ठीक ठाक पुस्तकें और कई पत्रिकायें खत्म करी हैं।

स्मार्टफोन छोड़ो जीडी, साथी (साइकिल) का साथ थामो और एक्टिव लीजर लाइफ (active leisure life) गुजारो। यही मंत्र पढ़ा है किताब में। स्मार्टफोन वजन बढ़ाता है और वजन के साथ जुड़ती हैं अनेकानेक समस्यायें। फीचर फोन+साइकिल आपके स्वास्थ्य के लिये भी उत्तमोत्तम है। स्मॉर्ट टेक्नॉलॉजी के मुरीद बनने की बजाय टेक्नॉलॉजी का स्मार्ट उपयोग ज्यादा फायदेमंद है। 😆


सूर्यमणि तिवारी – अकेलेपन पर विचार

फोन पर ही सूर्यमणि जी ने कहा था कि बहुत अकेलापन महसूस होता है। यह भी मुझे समझ नहीं आता था। अरबपति व्यक्ति, जो अपने एम्पायर के शीर्ष पर हो, जिसे कर्मचारी, व्यवसाय, समाज और कुटुम्ब के लोग घेरे रहते हों, वह अकेलापन कैसे महसूस कर सकता है?


मैं सूर्या ट्रॉमा सेण्टर गया था कोविड-19 का टीका लगवाने। वहां उनका स्मरण हो आया तो उन्हें फोन किया। सूर्यमणि जी ने बताया कि महीना से ज्यादा हुआ, वे कमर के दर्द से बेड-रेस्ट पर हैं। परेशानी ज्यादा ही है। मैं सोचता ही रह गया कि उनसे मिल कर उनका हाल चाल पूछा जाये। इसमें एक सप्ताह गुजर गया।

सूर्यमणि तिवारी

एक सप्ताह बाद उनसे मिलने गया तो उन्होने बताया कि अब तबियत कुछ बेहतर है। वे कमर में बेल्ट बांध कर अपने दफ्तर में बैठे थे। क्लीन शेव, एक जाकिट पहने, कमरे का तापक्रम 29 डिग्री सेट रखे वे काम में लगे हुये थे। मुझे अपेक्षा थी कि वे बिस्तर पर लेटे होंगे। उनका शयन कक्ष उनके ऑफिस से जुड़ा हुआ है। मन में सोचा था कि उसी रीयर-चेम्बर में उनसे मिलना होगा, पर दफ्तर में मिलना सुखद आश्चर्य था। स्मार्ट लग रहे थे वे! बीमार की तरह झूल नहीं रहे थे।

पर शायद उन्होने डाक्टर की सलाह पूरी तरह नहीं मानी। सम्भवत: उनको उनका काम दफ्तर तक खींच लाया। वैसे भी, उनके अस्पताल में अशोक तिवारी जी ने मुझे कहा था – “हां, उनके कमर में तकलीफ है। डाक्टर ने उन्हे बेड रेस्ट करने को कहा है। पर, आप उनसे पूछिये तो कि डाक्टर की बात मानते हैं क्या? जब हर आधे घण्टे में उठ कर काम देखने में लग जायेंगे तो क्या ठीक होगा दर्द? जो महीना लगता, वह दो महीना लगेगा ठीक होने में।”

फोन पर ही सूर्यमणि जी ने कहा था कि बहुत अकेलापन महसूस होता है। यह भी मुझे समझ नहीं आता था। अरबपति व्यक्ति, जो अपने एम्पायर के शीर्ष पर हो, जिसे कर्मचारी, व्यवसाय, समाज और कुटुम्ब के लोग घेरे रहते हों, जिसके स्वास्थ्य के लिये पूरा अस्पताल हो; वह अकेलापन कैसे महसूस कर सकता है?

मैं जब अपने कार्य के शीर्ष पर था तो मुझे अकेलापन नहीं, काम का बोझ और अपनी पद-प्रतिष्ठा की निरंतरता बनाये रहने का भय महसूस होते थे। चूंकि मेरे समकक्ष अन्य विभागाध्यक्ष गण इसी प्रकार की दशा में थे, उनसे शेयर भी होता था। हम में से कुछ उस पद प्रतिष्ठा, उस काम के बोझ से वैराज्ञ की बात जरूर करते थे, पर किसी ने अपनी प्रभुता छोड़ी नहीं – जब तक कि रेल सेवा से रिटायर नहीं हुये। 🙂

इसलिये मैं सूर्यमणि जी की कथन की गम्भीरता का आकलन नहीं कर पा रहा था। शीर्ष का अपना एकांत होता है। शिखर अकेला होता है। यह पढ़ा था, पर अनुभूति नहीं की थी उसकी। उसका कुछ अहसास उनसे मिलने पर हुआ।

अपने विषय में बताने लगे सूर्यमणि जी। किस प्रकार से पिताजी के निधन के बाद स्कूल की मास्टरी की, फिर व्यवसाय सीखा। इस सब के बारे में उनके विषय में पुरानी पोस्ट में जिक्र है।

उनकेे व्यवसाय में मामा लोग साथ लगे। व्यवसाय में सफलता के साथ साथ उन्होने अपने तीन मामा और उनके बारह लड़कों के भरे पूरे कुटुम्ब की देखभाल की। उस दौर में उन्होने मामा लोगों को कम्पनी में हिस्सेदारी दी। अपने भाई की समृद्धि और उनके रुग्ण होने पर इलाज में सामान्य से आगे जा कर यत्न किये। उनका निधन त्रासद था। फिर, एक मुकाम पर यह महसूस हुआ कि लोगों को भले ही साथ ले कर चले हों, वे सम्बंधी-साथी होने की बजाय परजीवी (जोंक) ज्यादा होने लगे थे। उन्हे अलग करने की प्रक्रिया कष्टदायक रही। पैसा लगा ही, मन भी टूटा।

मन टूटने के विषय में सूर्यमणि जी के मुंह से निकल गया – “यह सब देख लगता है कहीं का नहीं रहा मैं।” फिर कहा – “पर यह काम छोड़ा भी नहीं जा सकता। इतने सारे कर्मचारी निर्भर हैं। उनकी महीने की सैलरी ही बड़ी रकम होती है। काम तो करना ही होगा। इसलिये यह बेल्ट बांध कर काम कर रहा हूं।”

“मैंने काम के फेर में अपनी पत्नी जी को उतना ध्यान से नहीं सुना, जितना सुनना चाहिये था। पत्नी ‘मेहना (ताना) भी मारे’ तब भी सुनना चाहिये। और मेरी पत्नीजी तो घर परिवार के लिये बहुत समर्पित रही हैं। उनकी सुनता तो शायद इस दारुण प्रक्रिया से न गुजरना पड़ता…समय पर सुनना चाहिये था।”

“ज्ञानवैराग्यप्रकाश (भाषा वेदांत)” का मुखपृष्ठ

“आज देर तक नींद नहीं आयी रात में। सवेरे चार बजे रजनीश बाबा को फोन मिलाया। पूछा – क्या जीवन बेकार चला गया। ईश्वर कितनी परीक्षा लेते हैं?! पर मेरी परीक्षा तो राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा की तुलना में तो कुछ भी नहीं है।”

रजनीश जी धारकुण्डी (जिला सतना, मध्यप्रदेश) आश्रम में हैं। उनका फोन नम्बर मुझे दिया कि उनसे बात कर मुझे भी अच्छा लगेगा। स्वामी जी से अभी बात नहीं की है। वे अड़गड़ानंद के गुरु स्वामी परमानंद परमहंस जी की सौ साल पहले लिखी पुस्तक “ज्ञानवैराग्यप्रकाश (भाषा वेदांत)” का पुन: प्रकाशन करने में लगे हैं। यह पुस्तक पढ़ने की प्रक्रिया में जो जिज्ञासायें होंगी, उनके विषय में रजनीश बाबा से बात करने का उपक्रम करूंगा। सूर्यमणि जी ने उस पुस्तक की फोटोकॉपी मुझे पढ़ने को दी है। पुस्तक की हिंदी भारतेंदु युगीन है। पर कण्टेण्ट तो वेदांत की किसी पुस्तक की तरह सदा-सर्वदा नवीन है।

मैंने सूर्यमणि जी से कहा – “आप यह अकेलेपन की बात करते हैं। आपके पास लोगों का मजमा लगा रहता है। दिन भर लोग आपसे मिलने के इच्छुक रहते हैं।… इन सब में पांच सात मित्र तो होंगे, जिनसे शेयर किया जा सकता हो?” उन्होने कुछ उत्तर दिया, पर मैं जो समझा, उसके अनुसार शायद पत्नी ही वह व्यक्ति हैं जिनसे शेयर किया जा सकता है, पर पत्नीजी यह तो कहेंगी ही कि “उस समय तो आप अपनी वाहावाही में रहे!”

सूर्यमणि जी अपनी बात कहते हुये आध्यात्म की ओर मुड़े। “कोई मित्र नहीं, असली मित्र तो ईश्वर हैं। पर लोगों में अध्ययन, मनन की प्रवृत्ति कम होती गयी है। लोग मन निग्रह पर ध्यान नहीं देते। ईश्वर का स्कूल खाली हो गया है। माया के फेर में हैं लोग। मायारूपी सर्प ने डंस लिया है।”

वे मन के निग्रह, ध्यान, श्वांस-प्रतिश्वांस को ऑब्जर्व करने की बात कहने लगे। उन्हे सम्भवत: अपने उमड़ते घुमड़ते विचारों – जिनमें निराशा, कर्म करने की प्रबल इच्छाशक्ति, परिस्थितियों से जूझने का संकल्प, और अपने खुद के मन निग्रह की जद्दोजहद का केलिडोस्कोप था; को व्यक्त करना था और मैं शायद (उनके हिसाब से) उसके लिये उपयुक्त श्रोता था। बड़ी साफगोई से अपनी व्यथा, अपना एकाकीपन, अपनी आध्यात्मिक जद्दोजहद मुझसे व्यक्त की। वे बोलते गये। प्रवाह से यह स्पष्ट हुआ कि वे कुछ होल्ड-बैक नहीं कर रहे। I felt honored. आजकल मुझे ऑनर्ड की फीलिंग मिलना भी लगभग नहीं के बराबर हो गया है। 😀

मैं अभी भी स्पष्ट नहीं हूं कि वे अकेलापन (Loneliness) व्यक्त कर रहे थे या अपना एकांत (Solitude)। आध्यात्म, ध्यान और जीवन के उच्च मूल्यों की बात व्यक्ति तब सोच पाता है जब मन स्थिर हो और व्यक्ति एकांत अनुभव कर रहा हो। वह एकांत (सॉलीट्यूड) – अगर आपका अभ्यास हो – भीड़ में भी महसूस किया जा सकता है। रमानाथ अवस्थी की कविता है – भीड़ में भी रहता हूं, वीराने के सहारे, जैसे कोई मंदिर किसी गांव के किनारे! … यह भी सम्भव है कि एकाकीपन अंतत: व्यक्ति को सॉलीट्यूड की ओर ले जाता हो। और उसमें धारकुण्डी के बाबाजी, स्वामी अड़गड़ानंद आदि निमित्त बनते हों। पर यह सब लिखने के लिये मेरा कोई विशद अध्ययन या अनुभव नहीं है। शायद सूर्यमणि जी के पर्सोना को और गहराई से जानना होगा। स्कूल की मास्टरी से आज तक वे घोर कर्म (या बकौल उनके कुकुर छिनौती) के साथ साथ आत्मविश्लेषण और स्वाध्याय में कितना जुटे रहे, उससे ही सूत्र मिलेंगे।

वे न केवल सफल व्यक्ति हैं, वरन सरलता और विनम्रता में सीढ़ी की बहुत ऊंची पायदान पर हैं। बहुत कुछ सीख सकता हूं मैं उनसे।

राजेश पाण्डेय, सूर्यमणि जी के भृत्य

लगभग एक घण्टा मैं और मेरी पत्नीजी उनके साथ रहे उनके दफ्तर में। इस बीच उनके भृत्य राजेश पाण्डे और उनके भतीजे प्रशांत उनके पास आये। राजेश एक बनियान नुमा टीशर्ट में थे। चाय-नाश्ता कराने पर मैं उनका चित्र लेने लगा तो राजेश को डपट कर सूर्यमणि जी ने साफ कमीज पहन कर आने को कहा। पतले दुबले राजेश का चित्र तो मैंने कमीज में ही खींचा। प्रशांत जी को तो मैं पहले से जानता हूं। उनके बारे में सूर्यमणि जी की परिचयात्मक टिप्पणी थी – “ये मेरे अर्जुन हैं!”

प्रशांत तिवारी जी के बारे में सूर्यमणि जी की परिचयात्मक टिप्पणी थी – ये मेरे अर्जुन हैं!

उनके चेम्बर में मेरी पत्नीजी और मैं उनसे डेढ़ साल बाद मिले थे। घण्टे भर उनके साथ बैठने के बाद उनसे विदा ली तो वे खड़े हो कर बोले – “आगे अब डेढ़ साल नहीं, दो तीन महीने के अंतराल में मुलाकात होनी चाहिये।” अपने कमर में बैल्ट बंधे होने के कारण उनके चलने फिरने में दिक्कत होगी, इसलिए उन्होने प्रशांत जी को कहा कि वे हमें सी-ऑफ कर आयें।

पुराने कारखाने के उनके दफ्तर के बाहर कार्पेट लाने, उतारने, बिछाने, निरीक्षण करने और समेटने की गतिविधि में 10-15 लोग लगे थे। पूरे कारखाने में बहुत से लोग होंगे। उनके अस्पताल (जो डेढ़ किलोमीटर पर है) में भी बहुत से लोग हैं और विविध गतिविधियां। इस सब के बीच इनका मालिक कहता है कि बहुत अकेलापन लगता है। और फिर वह काम में तल्लीन हो जाता है। कौन मोटिव पावर है जिसके आधार पर यह हो रहा है?!

यक्ष प्रश्न है यह। उत्तर तलाशो जीडी इसका। न मिले तो दो-तीन महीने बाद अगली मुलाकात का इंतजार करो!