हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 3)


सन 1948 का समय… राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और लालच ने कुटिलता का वातावरण बना दिया था और औसत दर्जे की सोच ने उत्कृष्टता को कोहनिया कर अपना स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया था।

हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 2)


अन्तत: ब्रिटिश राज पर पर्दा गिर गया। हम सभी नेहरू की मशहूर “tryst with destiny” वाला भाषण नहीं सुन पाये, चूंकि हम सब के पास रेडियो सेट नहीं थे। हम सब खुश थे, पर उस खुशी का गर्मजोशी से इजहार नहीं कर रहे थे।

हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 1)


सन 1944 में इलाहाबाद “पूर्व के ऑक्सफोर्ड” के नाम से जाना जाता था। दो किलोमीटर के दायरे में विश्वविद्यालय सीनेट हॉल, म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, आनन्द भवन और पब्लिक लाइब्रेरी स्थित थे। कहा जाता था कि अगर एक ढेला यहां फेंका जाये तो किसी न किसी महान हस्ती पर गिरेगा।

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