जिस बात ने मेरा ध्यान खींचा, वह एक तीर लगा कर महिला शौचालय दिखाया जाना। इस यूपोरियन पितृसत्तात्मक समाज में इस तरह की चीज अजूबा टाइप है। स्त्रियों को लम्बी दूरी तक यात्रा में ब्लैडर भरा होने पर भी, अपने को रोकना पड़ता है।
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पाणिनि जी के कहे पर अवधी में लिखइ क परयोग
एक साध मन में जरूर जिंदा रही कि अवधी में, आपन बोली में पांच सात मिनिट बोलि सकी। बकिया, हमार पत्नी जी ई परयोग के बहुतइ खिलाफ हइन। ओनकर बिस्वास बा कि हमार अवधी कौनौं लाया नाहीं बा।
बरसात में सुग्गी की सुबह
सुग्गी बहुत वाचाल है। कहती जाती है – “जीजी, बहुत काम है। मरने की फुर्सत नहीं है।” पर फिर भी रुक कर बातें खूब करती है। कई बार तो बातें खत्म कर जाने लगती है तब कुछ और याद आ जाने पर वापस लौट कर बताने-बतियाने लगती है।
