रेणु की “एक आदिम रात्रि की महक” से उभरी रेल यादें


उसी दौरान मैं माही नदी के किनारे बहुत घूमा। उसके दृष्य अभी भी याद हैं। माही नदी में एक बरसाती नदी “लाड़की” आ कर मिलती थी। मेरे मन में यह भी साध बाकी रही कि चल कर लाड़की का उद्गम स्थल देखूं।

मेरी रेलवे की यादों को कुरेदती फिल्म भुवन शोम


मैं अपने तनाव, शरीर और मन की उपेक्षा और रोज रोज की चिख चिख से अपने को असम्पृक्त नहीं कर सका। अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता।

दूसरी पारी की शुरुआत – पहला दिन


मजेदार बात यह रही कि मेरे फोन नम्बर पर दो तीन अधिकारियों-कर्मचारियों के फोन भी आये। वे मुझे माल गाड़ी की रनिंग पोजीशन बता रहे थे। मैं तो रेलवे को छोड़ रहा था, पर वे मुझे छोड़ना नहीं चाह रहे थे।

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