अलाव


प्रज्वलित होती आग को निहारते समय अगर आदमी मौन हो कर सोचने की प्रक्रिया में उतरे तो जीवन, उसकी सार्थकता, मरण और मरण के आगे के कई प्रश्न तैरने लगते हैं। उन प्रश्नों और विचारों को सयास पकड़ना और भविष्य के लिये संंजोना एक अभूतपूर्व अनुभव है।

उड़द दल रही है सुग्गी; पर गीत गाना नहीं आता


कीली पर घूमती चकरी पर वह ध्यान रखती है। पांच या छ चक्कर लगने पर वह चकरी के मुंह में एक मुठ्ठी उड़द डालती है। चकरी की घरर घरर की आवाज आती है…

उनकी गांव में मकान बनाने की सोच बन रही है। बसेंगे भी?


अगर ईमानदारी से कहा जाये तो हर व्यक्ति, जो गांव में रीवर्स माइग्रेट होने की सोचता है, उसे कुछ न कुछ मात्रा में नीलकण्ठ बनना ही होता है। पर मैं अगर गांव में आने के नफा-नुक्सान का अपनी प्रवृत्ति के अनुसार आकलन करता हूं; तो अपने निर्णय को सही पाता हूं।

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