बेंजामिन फ्रेंकलिन और शब्दों की मितव्ययता


सम्भव है आप में से कई लोगों ने बेंजामिन फ्रेंकलिन का जॉन थॉम्प्सन द हैटर वाला किस्सा सुना हो. जहां पर कम शब्दों मे कहने की बात आती है, वहां इसका उल्लेख बड़ा सशक्त हो जाता है. अमेरिकी डिक्लेरेशन ऑफ इण्डिपेंडेंस के ड्राफ्ट पर बहस चल रही थी. थॉमस जैफर्सन के ड्राफ्ट पर लोग बदलावोंContinue reading “बेंजामिन फ्रेंकलिन और शब्दों की मितव्ययता”

प. विष्णुकांत शास्त्री से क्या सीख सकते हैं चिठेरे?


पण्डित विष्णुकांत शास्त्री (1929-2005) को मैं बतौर आर.एस.एस. के सक्रिय सम्बद्ध व्यक्ति, पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष, भाजपा के उपाध्यक्ष अथवा उत्तरप्रदेश/उत्तराखण्ड के राज्यपाल के रूप में नहीं वरन एक लेखक के रूप में याद कर रहा हूं. और उस रूप में अच्छे ब्लॉगर के लिये एक सबक है – जो मैं बताना चाहता हूं.Continue reading “प. विष्णुकांत शास्त्री से क्या सीख सकते हैं चिठेरे?”

विक्तोर फ्रेंकल का आशावाद और जीवन के अर्थ की खोज


जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणाContinue reading “विक्तोर फ्रेंकल का आशावाद और जीवन के अर्थ की खोज”

हिन्दी ब्लॉगरी में नॉन-कंट्रोवर्शियल बनने के 10 तरीके


झगड़ा-टण्टा बेकार है. देर सबेर सबको यह बोध-ज्ञान होता है. संजय जी रोज ब्लॉग परखने चले आते हैं, लिखते हैं कि लिखेंगे नहीं. फलाने जी का लिखा उनका भी मान लिया जाये. काकेश कहते हैं कि वे तो निहायत निरीह प्राणी हैं फिर भी उन्हे राइट-लेफ़्ट झगड़े में घसीट लिया गया. लिहाजा वे कहीं भीContinue reading “हिन्दी ब्लॉगरी में नॉन-कंट्रोवर्शियल बनने के 10 तरीके”

ढेरों कैम्प, ढेरों रूहें और बर्बरीक


बर्बरीक फिर मौजूद था. वह नहीं, केवल उसका सिर. सिर एक पहाड़ी पर बैठा सामने के मैदान पर चौकस नजर रखे था. ढेरों रूहों के शरणार्थी कैम्प, ढेरों रूहें/प्रेत/पिशाच, यातना/शोक/नैराश्य/वैराग्य/क्षोभ, मानवता के दमन और इंसानियत की ऊंचाइयों की पराकाष्ठा – सब का स्थान और समय के विस्तार में बहुत बड़ा कैनवास सामने था. हर धर्म-जाति-वर्ग;Continue reading “ढेरों कैम्प, ढेरों रूहें और बर्बरीक”

अफसरी के ठाठ और आचरण नियमों की फांस


कल मैने अपनी मजबूरी व्यक्त की थी कि मै‍ ब्लॉग पर एक सीमा तक लिख सकता हूं, उसके आगे बोलने के लिये मुझे अपने रिटायरमेण्ट तक रुकना पड़ेगा. बहुत से लोगों ने टिप्पणियों में कहा कि वे मेरे डिस्क्लोजर के लिये मेरे रिटायरमेण्ट का इंतजार नहीं कर सकते. वैसे मुझे कोई मुगालता नहीं है –Continue reading “अफसरी के ठाठ और आचरण नियमों की फांस”