उमरहाँ के राकेश मिसिर जी


राकेश जी को छोड़ने के लिये मैं घर के गेट तक गया। उनके जाते हुये मन में विचार आया कि घर में किसी के आने पर उन्हें चाय परोसी जाये तो (लौंग-इलायची भले हो न हो) साथ में तश्तरी में एक चुनौटी और सुरती होनी ही चाहिये।

खुले आसमान तले निपटान


अगले पच्चीस साल में भारत विकसित देश बन जायेगा। तब भी लोग प्लास्टिक की बोतल ले कर दिशा-मैदान के लिये जाते-आते दिख जायेंगे। शर्त लगाई जा सकती है!

सुमित पाण्डेय, फर्नीचर निर्माता


सुमित ने मुझे एक छोटी चौकी उपहार स्वरूप बना कर दी है। मेरे मन माफिक। उसका प्रयोग मैं बिस्तर पर बैठ लिखने-पढ़ने के लिये करता हूं।
व्यक्ति की जिस चीज में आसक्ति हो और कोई वह उपहार स्वरूप दे दे तो उस व्यक्ति को कभी भूलता नहीं वह।

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