गुक्खल


“अपनी माँ को उठा कर गिरनार की 10099 सीढ़ियाँ चढ़ कर जूनागढ़ में हो आया हूं। माँ को सुदामापुरी द्वारका, बेट द्वारका आदि दिखा लाया था।” – गुक्खल अपनी यात्राओं के बारे में बताते हैं।

श्री मंगल आश्रम से जसदाण और आगे


हम दोनो की सोच में यह एक मूलभूत अंतर है। उनकी खराब अनुभवों को याद रखने की आदत है ही नहीं। झटक कर आगे चलने की है। पर मैं उसे याद ही नहीं रखता, वह याद मुझे बराबर सालती रहती है – अपने को कोसती रहती है।

सरवा से हिंगोळगढ़ अभयारण्य के आगे


प्रेमसागर के पास भी सर्दी के हिसाब से अपना इंतजाम नहीं है। उन्होने सर्दी का समय किसी “पीपल के नीचे या मंदिर में” बिना सुविधा के गुजारने का ड्राई रन नहीं किया है – ऐसा लगता है। अब वे तय कर रहे हैं कि एक भेड़ियहवा कम्बल और इनर-लोअर खरीदेंगे। बारिश हो गयी है। सर्दी बढ़ेगी ही।

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