किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।
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चाय की चट्टी, मोही और माधुरी
खुद ही छोटा बच्चा। चार साल का होगा। अभाव में पलता। पर कुछ भी मिलने पर अपनी छोटी बहन को देने की बात पहले मन में आयी उसके। कौन सिखाता है यह संस्कार। यह स्नेह।
जंगर चोरई नहींं करता मैं – रामसेवक
वे अपने हिसाब से बनारस से खरीद लाते हैं फूलों के पौधे, गमले या अन्य उपकरण। मेरी पत्नीजी उनके साथ लगी रहती हैं। पौधों, वृक्षों को पानी देना, धूप में रखना या बचाना आदि नियमित करती हैं। मेरी पोती चिन्ना पांड़े भी रामसेवक अंकल से पूछने के लिये अपने सवाल तैयार रखती है।
