गांव में बदलता जल प्रबंधन का दृश्य


बहुत सारे हैण्डपम्प लगे हैं गांव में। यह गांगेय क्षेत्र है और भूगर्भ के जल की समस्या नहीं। लगभग हर जगह पानी मिल जाता है बोर करने पर। गांव की आबादी को पानी मिलने की बहुत समस्या नहीं है। समस्यायें अगर हैं; और बहुत हैं; तो मानव की संकुचित प्रवृत्ति के कारण हैं।

सात साल पहले मैं रेल सेवा से रिटायर हो कर गांव में आया, तब बहुत सारे हैण्डपम्प लग रहे थे। सरकारी स्कीम के अंतर्गत चांपाकल बांट रहे थे ग्रामप्रधान लोग। जिसके दरवाजे पर चांपाकल लग गया, मानो उसी का हो गया। उससे वह परिवार अपने पड़ोसी को भी पानी नहीं लेने देता था। दशकों पहले गांव में चार पांच कुयें थे। उसमें (जातिगत आधार पर ही सही) सब को पानी लेने की छूट थी। किसी को जल लेने से रोकना पाप माना जाता था। पर चांपाकल संस्कृति ने पड़ोसी पड़ोसी के बीच वैमनस्य बोना प्रारम्भ कर दिया।

इस समय मेरे पड़ोस में एक व्यक्ति ने नया घर बनाया है। उसके पड़ोस में तीन चार हैण्डपम्प हैं। पर वह परिवार टुन्नू पण्डित (मेरे साले साहब) के अहाते में पानी लेने आता है। उनके अहाते में हैण्ड पम्प भी है और ट्यूब-वेल भी। ट्यूबवेल की हौदी में हमेशा पानी रहता है। हौदी या हैण्डपम्प से पानी लेते पड़ोस का यह नया परिवार जब तब दीखता है। घर के ज्यादातर छोटे बच्चों के जिम्मे पानी ढोना है।

टुन्नू पण्डित का अहाता बस कहने भर को अहाता है। वहां कोई भी निर्बाध आ-जा सकता है। चारदीवारी में जो गेट की जगह है, वहां आजतक कोई दरवाजा/गेट लगा ही नहीं। इसलिये इस नये पड़ोसी को यहां से पानी लेने से कोई रोकता नहीं। आसपास के गांव वाले, बच्चे और पशु आते जाते हैं मानो वह उनके घर का एनेक्सी हो!

बच्चा ट्यूबवेल की हौदी ने पानी निकाल रहा था। बाल्टी उसकी क्षमता से कुछ ज्यादा बड़ी थी।

उस दिन मैंने देखा – पास के घर का एक बच्चा ट्यूबवेल की हौदी ने पानी निकाल रहा था। बाल्टी उसकी क्षमता से कुछ ज्यादा बड़ी थी। थोड़ी दूर तो वह उठा कर ले गया, फिर उसके जोड़ीदार ने साथ दिया और वे दोनो मिल कर आगे बाल्टी ले गये। लगभग 50-60 कदम पर उनका घर है।

अब सरकार कहती है कि हर घर तक नल से पानी की सप्लाई होगी। फिलहाल तो ये बच्चे बीस-पच्चीस मीटर पानी उठा कर ले कर जाते दीखते ही हैं। कहीं कहीं इससे ज्यादा भी दूरी होती होगी। अगर गांव के लोग सरकार के दिये चांपाकल को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति न मानें और किसी को भी अपने घर के बाहर के चांपाकल से बिना हील-हुज्जत पानी लेने दें तो यह दूरी घट कर दस कदम पर आ सकती है। उत्तर प्रदेश के गांवों में आबादी सघन है और सरकार की दी गयी सार्वजनिक सेवायें बहुत हैं। समस्या गांव वालों की संकुचित प्रवृत्ति ही है।


भगवानपुर में पानी की टंकी बनाने के लिये भी एक जगह चार दीवारी घेरे जाते देखा।

और सरकार घर घर नल से जल पंहुचाने को ले कर गम्भीर भी नजर आती है। अभी उस दिन मैंने भगवानपुर (पास के गांव) में पाइप रखे देखे। लोगों ने बताया कि गांव में ही पानी की टंकी बन रही है जिससे आसपास के दो तीन गांवों को घर घर नल से जल मिलेगा। ये पाइप उसी के लिये आये हैं। कई अन्य स्थानों पर कम व्यास के पाइप भी मैंने गिरे देखे। पानी की टंकी बनाने के लिये भी एक जगह ग्रामसभा की जमीन पर चार दीवारी घेरे जाते देखा। कुल मिला कर घर घर नल से जल के लिये काम तेजी से हो रहा है।

भगवानपुर में रखे पानी की सप्लाई के लिये पाइप

साइकिल से घूमते हुये तीन किमी दूर लसमणा गांव के पास ईंट के खड़ंजा के रास्ते का डामर वाली सड़क में रूपांतरण और उसके किनारे पानी की पाइप बिछाने का काम होते पाया। अच्छी, चौड़ी सड़क बन रही है। उसके साइड में खाई खोद कर पाइप डालने वाले भी काम कर रहे हैं। सवेरे आठ बजे से रात आठ बजे तक उनका काम होता है। ग्रामसभा की एक जगह पर पाइप के बण्डल मुझे नजर आये। कुछ ट्रेक्टर और अन्य वाहन भी थे। एक ट्रेक्टर में खाई खोदने की मशीन – ट्रेंचर – का अटैचमेण्ट भी दिखा। दो लोग उस ट्रेंचर के दांते ठीक कर रहे थे और तीसरा आदमी नीम की दातुन कर रहा था। उन लोगों में से दो तो स्थानीय थे, एक दातुन करने वाला सोनभद्र से आया है। बारह घण्टे की शिफ्ट में वे ट्रेंचर से खाई खोद कर सड़क के किनारे जल निगम के पाइप बिछा रहे हैं।

वे पाइप बिछाने वाले ठेकेदार के आदमी थे। उन्हेंं यह नहीं मालुम कि पानी का बोरवेल और ओवरहेड स्टोरेज टैंक कहां बनेगा। पर यह जरूर है कि उनपर अपना काम खत्म करने का दबाव है।

एक जगह राख थी, जिसमें एक पिल्ला अंगड़ाई ले रहा था। लगता है कि वे लोग यहीं मशीनों के साथ रहते हैं रात में और अपना भोजन भी खुद बनाते हैं। शायद बाटी-दाल आदि।

बनती हुई सड़क की गुणवत्ता और चौड़ाई ठीकठाक थी। पूरी सड़क करीब दो ढाई किलोमीटर की होगी। आधी बन चुकी थी। दो गांवों के बीच में एक मुस्लिम बस्ती पड़ती है। आठ दस घर हैं उनके। वहां भी सड़क और पानी की पाइप पंहुच रही थी। ग्रामीण सुविधाओं में कोई धर्म का भेदभाव तो है नहीं! कोई पण्डितजी मुसलमान बस्ती से गुजरती पाइपलाइन के पानी को अशुद्ध हुआ तो बोलेंगे नहीं! बिना किसी पूर्वाग्रह के नल से जल का स्वागत होगा। जाति-धर्म के बैरियर यूं टूटेंगे! :-)

दो गांवों के बीच में एक मुस्लिम बस्ती पड़ती है। आठ दस घर हैं उनके। वहां भी सड़क और पानी की पाइप पंहुच रही थी। ग्रामीण सुविधाओं में कोई धर्म का भेदभाव तो है नहीं!

सड़क और पाइप से जल अगले लोक सभा चुनाव के पहले तो कार्यरत हो ही जायेंगे। इस तरह के कई अन्य काम भी अगले साल चुनाव तक पूरे होंगे। शायद इण्टरनेट कनेक्टिविटी बेहतर हो जाये। बिजली की उपलब्धता समाजवादी शासन से कहीं बेहतर हो ही गयी है। कुल मिला कर अगले चुनाव में इन सब के बल पर फ्रण्ट-फुट पर खेलेगी शासन करती पार्टी और सरकार का विरोध करता विपक्ष किसी को अपनी आलोचना से अपने पक्ष में नहीं कर पायेगा।

घर घर नल से जल और बेहतर सड़क-बिजली से बहुत फर्क पड़ेगा जनता के सोचने में। सारा खेल परसेप्शन का ही तो है।


दैनिक दूध के विकल्प की तलाश


दैनिक जरूरतें हैं – आटा, दाल, चावल, सब्जी, दूध। जब इनकी कीमतें बढ़ती हैं तो उनको सस्ता पाने के विकल्प तलाशने में लग जाते हैं हम। यह पोस्ट उसी कवायद पर है।

अमूल ने दूध के रेट बढ़ा दिये हैं। पाउच का दूध अब मुझे 68 रुपये किलो मिल रहा है। हम दो लोग गांव में रहते हैं और हमारी दूध की जरूरत कम है। फिर भी एक किलो रोज लग ही जाता है। बहुत कोशिश करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा ग्रीन चाय, बिना दूध वाली पी जाये, पर तब भी दिन में पांच छ बार दूध वाली चाय बनती ही है। कोई न कोई आ जाता है। उन्हें चाय पिलाने के साथ खुद भी पीते हैं। दूध की खपत, जितनी है, कोशिश की पर पाया कि रोकी नहीं जा सकती।

गांव में रहते हुये दूध को ले कर परेशानी?! लोग चट से सलाह देते हैं कि एक गाय पाल लीजिये। जिस आदमी ने जिंदगी भर रेलगाड़ी हाँकी हो, उसे गाय पालने को कहना उपयुक्त सलाह नहीं है। कोई अन्य गाय पाल रहा हो और उसपर ब्लॉग लिखना हो – वह मैं कर सकता हूं। खुद गाय पालना नहीं हो पायेगा। … और चूंकि कोई बहुत बाध्यता नहीं है इसे बतौर व्यवसाय करने की, इस काम में हाथ लगाना उचित नहीं लगता।

मैं अमूल के पाउच का बाजार का विकल्प तलाशने निकला। यहां बाल्टा वाले दूध इकठ्ठा कर उसे स्थानीय लोगों को बेचने और बचे दूध को बनारस बेच कर आने का काम करते थे। मेरे आसपास ही तीन चार दर्जन बाल्टा वाले सक्रिय थे। पर पिछले एक डेढ़ साल में विभिन्न डेयरियों के दूध कलेक्शन सेण्टर खुल गये हैं। उनमें दूध की गुणवत्ता के आधार पर को-ऑपरेटिव से जुड़ने वाले दुधारू पशु पालकों को पेमेण्ट मिलता है। सो, बाल्टा वालों का बिजनेस बंद हो गया है। पाउच के दूध का विकल्प तलाशने के लिये मैंने दूध कलेक्शन सेण्टर का रुख किया। क्या पता सेण्टर वाला अपने क्रय मूल्य में कुछ जोड़ कर मुझे नियमित दूध देने को तैयार हो जाये।

अनुज यादव, अपने अमूल के मिल्क कलेक्शन सेण्टर पर

घर से 800 मीटर दूर अमूल का कलेक्शन सेण्टर है। डेयरी सप्ताहिक आधार पर सेण्टर पर दूध जमा करने वाले सदस्यों को पेमेण्ट करती है। पर पशुपालक दैनिक आधार पर पेमेण्ट चाहते हैं। लिहाजा, कलेक्शन सेण्टर के अनुज यादव ने बताया कि सेण्टर को चलने में दिक्कत आ रही है। ज्यादा लोग नहीं जुड़ पा रहे। उस सेण्टर पर मैंने अनुज से बात की तो वे तैयार हो गये मुझे खुदरा दूध देने को। उन्होने मुझे अमूल की वह लिस्ट भी दिखाई, जिसमें अमूल के रेट लिखे हैं। अमूल दूध के फैट और एसएनएफ प्रतिशत के आधार पर पेमेण्ट करता है को‌-ऑपरेटिव मेम्बर्स को। उस लिस्ट के अनुसार मुझे 6प्रतिशत फैट वाला भैंस का दूध 55 रुपये में मिल जाना चाहिये। कुल मिला कर अमूल के पाउच के रेट से लगभग 20 प्रतिशत की बचत। मुझे लगा कि मैंने दूध के दाम की मंहगाई का हल निकाल लिया है। … आखिर मुझे दूध चाहिये। अमूल का आकर्षक पाउच या पॉश्चराइजेशन की प्रक्रिया का लाभ नहीं। मैं अपने डोलू में दूध ले कर आ सकता हूं और घर लाने पर उसे तुरंत उबाल कर कीटाणुरहित बना सकता हूं। दो घण्टे पहले गाय या भैंस के थन से निकला दूध बेहतर है अगर वह सस्ता मिल सके।

पर वैसा हुआ नहीं। अनुज के पास जब दूध लेने गया तो भैंस का दूध 4.4प्रतिशत फैट वाला था। जरूर किसान ने भैंस को पर्याप्त पौष्टिक चारा नहीं खिलाया था। मुझे वह दूध 45 रुपये प्रति किलो का पड़ा।

अगर डेयरी अच्छा रेट लगा कर दूध खरीद रही है, तो किसानों/ग्वालों को बेहतर पशुपालन की ओर प्रवृत्त होना चाहिये और उन्हें पर्याप्त चूनी-चोकर-चारा-पशु आहार खिलाना चाहिये। वह सोच लोगों में नहीं है। पशुओं को घर का लेफ्ट-ओवर ही मिलता है सामान्यत:। उन्हें अच्छे से पालने और उससे लाभ उठाने की सोच की ओर लोग प्रवृत्त हो रहे हैं? लगता नहीं। :sad:


अनुज की दुकान से आगे चला तो साइकिल की दुकान पर पंक्चर बनवाते समय उमरहा गांव के अनिल शर्मा मिल गये। साइकिल में धीरे धीरे हवा निकल रही थी और चेक करने पर बड़ी मुश्किल से पता चला साइकिल में बहुत महीन पंक्चर था। देर तक इंतजार करने में एक बुलबुला निकलता था पानी में ट्यूब चेक करते समय। अनिल शर्मा अपनी साइकिल बनवाने आये थे और मेरी साइकिल में पंक्चर तलाशते दुकानदार को ध्यान से देख रहे थे। बोले – ई चोर पंचर बड़ा दु:ख देथअ (चोर पंक्चर बहुत दुख देता है। लगता है पंक्चर नहीं है पर बार बार हवा निकल जाती है)।

अनिल ने कहा – चच्चा, ई अमूल वाले के छोडअ। ई सरये अंगरा दर्रत हयें।

चोर पंक्चर – पहली बार यह टर्मिनॉलॉजी सुनी मैंने। अपनी पॉकेट नोटबुक में मैंने यह शब्द लिखा और इसी के साथ अनिल शर्मा से बातचीत प्रारम्भ हो गयी।

यह जानने पर कि मैं दूध के लिये विकल्प तलाश रहा हूं, अनिल ने कहा – चच्चा, ई अमूल वालन के छोडअ। ई सरये अंगरा दर्रत हयें (चाचा, इन अमूल वालों को त्याग दीजिये, ये आप पर अंगारे मसल रहे हैं)।

अनिल के अनुसार मैं तितराही के मोड़ पर मड़ैयाँ डेयरी पर जाऊं – “वह कलेक्शन सेण्टर अपने मिल्क प्रॉसेसिंग प्लांट के लिये दूध खरीदता है और आपको पचपन रुपये किलो दे देगा भैंस का दूध। गाय का चालीस-पैंतालीस रुपये में। बढ़िया शुद्ध दूध।” अनिल खुद अपना गाय का दूध उस डेयरी पर दे कर आ रहे थे।

अनिल ने बताया कि उनके पास चार गायें हैं। गाय पालन के धंधे के इतर हेजिंग के लिये उन्होने मुर्गीपालन भी शुरू किया है। गाय के व्यवसाय में घाटा हो तो मुर्गी से पूरा हो जाये। मोबाइल फोन अनिल के पास नहीं है। उन्होने कहा – “दिन भर काम में निकल जाता है। किसी से बात की फुर्सत कहां है, चच्चा! यह तो आज साइकिल बिगड़ गयी तो यहां आया हूं, वर्ना कहीं आना-जाना भी नहीं होता। घर में पत्नी, दो बच्चें और माता-पिता हैं। सब मेरे काम पर ही निर्भर हैं। काम तो करना ही होता है।”

मैंने तय किया कि मैं अनुज की अमूल डेयरी को भी टटोलूंगा और तितराही वाली मड़ैयाँ डेयरी को भी।


मड़ैयाँ डेयरी के अजय पटेल।

तितराही वाली मड़ैयाँ डेयरी मेरे घर से डेढ़ किमी दूर है। नेशनल हाईवे पर ही उसका बोर्ड दिखता है। मैं वहां गया तो वहां के कर्ताधर्ता अजय पटेल मिले। डेयरी पर बाहर बोर्ड पर समय लिखा है सवेरे 8 से 11 बजे तक। अजय ने मुझे बताया कि वे साढ़े छ बजे आते हैं सेण्टर खोलने। पास के पठखौली गांव में रहते हैं। पच्चीस दिन पहले खुली है उनकी डेयरी। दूध ले कर वे कपसेटी के अपने प्लांट में भेजते हैं। वहां पनीर, छेना, पेड़ा आदि बनाया जाता है। शादी-विवाह में सप्लाई भी होता है और बचा दूध पराग-अमूल आदि व्यवसायिक संस्थानों को बेचा जाता है। कपसेटी में उनकी खुद की जरूरत 10 हजार लीटर की है।

अजय ने अपने सेण्टर पर मुझे फ्रीजर भी दिखाया जिसमें 600 लीटर भैंस और 200लीटर गाय का दूध जमा करने की क्षमता है। एक जेनरेटर भी पास में पड़ा था, बिजली न आने पर शीतक को चालू रखने के लिये। मेरा सोचना है कि इस तरह के कई और कलेक्शन सेण्टर भी होंगे मड़ैय्या डेयरी के।

मैंने अजय को कहा कि एक किलो भैंस का दूध ले कर मैं अजमाना चाहता हूं। पर मेरे पास लेने के लिये बर्तन नहीं है। उसका उपाय अजय ने एक प्लास्टिक की पन्नी में एक किलो दूध मुझे दे कर किया। मैंने पचपन रुपये मोबाइल एप्प के माध्यम से उन्हें दिये। अजय कैश पसंद करते हैं। “कलेक्शन सेण्टर पर दूध देने वालों को कैश ही देना होता है। तो जरूरत कैश की होती है।” – अजय ने कहा।

अनुज और अजय की डेयरी कलेक्शन सेण्टर के दूध घर पर गर्म किये गये। क्रमश: 4.4प्रतिशत और 6.7प्रतिशत फैट के अनुसार ही मलाई दूध में पड़ी। दो दिन की विकल्प तलाश का परिणाम यह हुआ कि दो ठीकठाक विकल्प मुझे मिल गये।

अगर मैंं शहर में रह रहा होता तो ये विकल्प मुझे नहीं मिलते। पर इसका अर्थ यह नहीं कि गांव शहर से बेहतर है। कुछ शहर में अच्छा है, कुछ गांव में। मैं गांव में रहते हुये डिस्टोपिया से यूटोपिया की विभिन्न कल्पनाओं के बीच इधर उधर होता रहता हूं। पर शायद बेहतर यह है कि अपने आसपास के परिदृष्य का परिवर्तन मनोविनोद की भावना के साथ देखा जाये। अनुज, अनिल और अजय – सब से मिला जाये। मैत्री की जाये और जो कुछ हो रहा है, उसमें रस लिया जाये। दूध के विकल्प की तलाश उसी रस लेने का एक जरीया होना चाहिये।

मैं अपनी यह बात अपनी पत्नीजी से कहता हूं तो उनका उत्तर होता है – यही तो मैं तुमसे जिंदगी भर कहती रही। पर तुम्हारे पास तो रेलगाड़ी हाँकने के अलावा कोई सोच थी ही नहीं। यह तो अब कुछ इधर उधर देखने लगे हो! पत्नीजी को तब भी मुझसे कष्ट था, जब मैं घर की समस्याओं की ओर देखता भी नहीं था और अब भी है जब मैंं साइकिल उठा कर आसपास दूध का विकल्प देख रहा हूं। :-)

अगले दिन –

अनुज यादव ने 6.7प्रतिशत फैट वाला दूध मेरे लिये रखा था। मैंने अमूल की कलेक्शन की दर वाली लिस्ट के आधार पर उनसे बात की। उन्हें कहा कि रोज मुझे 6% से अधिक फैट वाला भैंस का दूध दें। मोटे आधार पर तय किया जाये तो पचपन रुपया लीटर की रेट से मुझे देने पर अनुज को 5 प्रतिशत से ज्यादा मिलेगा जब कि बकौल उनके अमूल दो प्रतिशत देता है।

अनुज ने मेरा प्रस्ताव मान लिया है। वे मुझे 6+ प्रतिशत वसा का दूध 55 रुपये किलो की दर से देंगे और महीने के हिसाब से उसका पेमेण्ट लेंगे। मुझे लगा कि इस सौदे से अनुज भी प्रसन्न हैं और मैं भी। हम दोनो के लिये यह विन-विन सिचयुयेशन (win-win situation) है। :-)


तो, यह थी दैनिक दूध के विकल्प की तलाश!


स्वास्थ्य का स्रोत – घर का बगीचा


हम दुखी थे कि इस साल जाने क्यों डेल्हिया के पौधे पनपे नहीं। नवम्बर में सही समय पर उनकी नर्सरी बना दी थी रामसेवक जी ने। पर शायद सर्दी ठीक ठाक नहीं पड़ी। अलग अलग पौध को केवल समय, खाद, पानी ही नहीं चाहिये होता। सही मौसम भी बहुत जरूरी होता है। खेतों में गेंहूं की फसल भी सर्दी कम पड़ने से खतरे में थी, पर दिसम्बर के उत्तरार्ध में पाला पड़ने से सम्भल गयी। वही लाभ शायद डेल्हिया को नहीं मिला।

रामसेवक जी ने बताया कि बनारस में मण्डुआडीह की नर्सरी वाले भी परेशन हैं। उनका डेल्हिया तैयार नहीं हो सका। अब बाहर से उन्होने पौधे मंगाये हैं, जिनमें फूल लगना शुरू हुये हैं। बकौल रामसेवक “बहुत मंहगे बिक रहे हैं” डेल्हिया के पौधे।

नर्सरी से खरीद कर लाया गया डेल्हिया

हम लोगों ने आकलन किया कि कम से कम कितने पौधे खरीदे जायें। रामसेवक जी को उतने लाने को कहा गया। रामसेवक जी सप्ताह में छ दिन बनारस के संस्थानों और बंगलों में काम करते हैं। रविवार को उनका छुट्टी का दिन होता है। उस दिन हमारे घर पर सवेरे कुछ घण्टे बगीचे में देते हैं। एक एक मिनट उनका दक्षता से काम करते बीतता है। रविवार को हमने कहा था उनसे डेल्हिया के पौध लाने को। कल उन्होने बनारस से खरीदा होगा और आज सवेरे वे घर पर आये उन्हें रोपने के लिये।

घर का बगीचा शतायु बना सकता है। इस लिये मुझे भी चित्र खींचने या ब्लॉग पोस्ट लिखने की बजाय दिन में दो घण्टा बगीचे में काम करते व्यतीत करना चाहिये। यह मैं कई बार सोचता हूं। कभी शुरुआत भी करता हूं। पर फिर वह उत्साह सतत कायम नहीं रह पाता। 😦

सवेरे का समय। पेड़ों से छन कर आती गुनगुनी धूप और तेजी से अपने दक्ष हाथों प्लास्टिक के गमलों से निकाल कर क्यारी में रोपते रामसेवक। बहुत अच्छा लग रहा था मुझे देखना। फुर्ती से उन्होने सभी पौधे रोपे। उनको पानी दिया। तब तक मेरी पत्नीजी चाय बना लाई थीं। पी कर उन्होने हम को नमस्कार किया – “चलूं साहब, पैसेंजर आने का समय हो गया है।”

सवेरे का समय। पेड़ों से छन कर आती गुनगुनी धूप और तेजी से अपने दक्ष हाथों प्लास्टिक के गमलों से निकाल कर क्यारी में रोपते रामसेवक। बहुत अच्छा लग रहा था मुझे देखना।

सवेरे की मेमू पैसेंजर प्रयाग सिटी से आती है। मेमू ट्रेन है तो समय पर ही आती है। रामसेवक हमारे बगल में ही रहते हैं। रेलवे स्टेशन भी दो-तीन सौ कदम पर है। पास पास में होने के कारण उन्होने पौधे भी रोप दिये, अपने घर से सामान ले कर फुर्ती से स्टेशन की ओर भी निकल लिये। पचास की उम्र होगी रामसेवक की। पर फुर्ती गजब की है। छोटा शरीर। तितली की तरह की चपलता है उनके काम करने में।

शरीर की तितली सी चपलता का राज बगीचे में काम करना है। यह मुझे समझ आता है। थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि मेरी पत्नीजी घर के पौधों को पानी डाल रही हैं। कण्डाल से एक छोटी प्लास्टिक की बालटी में पानी ले कर वे हर पौधे के पास जाती हैं और उसकी जरूरत अनुसार पानी उनकी जड़ों में उड़ेलती हैं। पानी कण्डाल से लेने, चलने, झुकने आदि में जो व्यायाम है, वह पत्नीजी के स्वास्थ्य को पुष्ट करता है। बगीचे में यह धीमे धीमे किया जाने वाला श्रम उन्हें दीर्घायु बनाने का निमित्त बन सकता है।

बगीचे में समय बिताते रीता पाण्डेय दिन भर में दस हजार से ज्यादा कदम चलती हैं।

बगीचे में समय बिताते रीता पाण्डेय दिन भर में दस हजार से ज्यादा कदम चलती हैं।

घर का बगीचा शतायु बना सकता है। इस लिये मुझे भी चित्र खींचने या ब्लॉग पोस्ट लिखने की बजाय दिन में दो घण्टा बगीचे में काम करते व्यतीत करना चाहिये। यह मैं कई बार सोचता हूं। कभी शुरुआत भी करता हूं। पर फिर वह उत्साह सतत कायम नहीं रह पाता। :sad:

लम्बा जीना है और सार्थक जीना है तो बगीचे की शरण जाना होगा।


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