कंकी से अलीगंज


20 अप्रेल 2023

आज दिन भर चलने का गूगल फिट का जो स्क्रीनशॉट भेजा है प्रेमसागर ने, उसके अनुसार दिन भर में 58,881 कदम चले हैं। पैदल 43.22 किलोमीटर की दूरी तय की है। यह तब है, जब मौसम उत्तरोत्तर गर्म होता जा रहा है। गर्मी ज्यादा होने के कारण उनकी चलने की स्ट्रेटेजी बदली है। सवेरे जितना दूरी बनता है, नाप लेते हैं। उसके बाद दिन में कहीं विश्राम करते हैं। दो घण्टा नींद भी निकाल लेते हैं। उसके बाद नहा कर तरोताजा हो एक कप चाय ले कर शाम की पदयात्रा शिफ्ट में निकल लेते हैं। “कल से भईया थोड़ा और जल्दी निकल लूंगा। काहे कि सवेरे जितना चला जाये, वही ठीक है।” – उन्होने कहा।

अभी रात के पड़ाव पर पंहुचने में रात के आठ नौ बज जा रहे हैं।

सवेरे जहां से चले; वह जगह – कंकी – बंगाल में है। और रात में जहां पंहुचे – अलीगंज – वह भी बंगाल में है। दिन में बंगाल से बिहार और फिर बिहार से बंगाल में आना-जाना रहा। यह इलाका सीमांत बिहार और उत्तर बंगाल का है। लोग हिंदी भी समझ लेते हैं और बंगला भी बोलते हैं। सम्प्रेषण की कोई समस्या नहीं प्रेमसागर को ग्रामीण अंचल में भी; जो उन्हें बर्दवान, हुगली, हावड़ा और मिदनापुर में आयी थी और जिसके कारण उन्हें रात में रुकने का स्थान भी नहीं मिला करता था। उस बंगाल से इस बंगाल में बहुत अंतर है। इस्लामिक कट्टरता के दर्शन नहीं हुये। उसके उलट हिंदू और मुसलमान अलग अलग टोले में नहीं, एक साथ रहते हैं।

“खेती में भईया मक्का ज्यादा दिख रहा है।” – यह प्रेमसागर का कहना ज्यादातर होता है। इक्का दुक्का इण्डस्ट्री भी हैं। पर ज्यादा नहीं।

“खेती में भईया मक्का ज्यादा दिख रहा है।”

दिन में आराम करने के लिये एक कैबिन मैन (?) जी का आवास मिला। उनका नाम बताया है – सर्वेश सरन। कौन सा स्टेशन या केबिन था, वह प्रेमसागर ने नोट नहीं किया। उनके भेजे चित्र भी मैंने ध्यान से देखे पर उनमें स्टेशन का नाम नहीं दिखता।

कटिहार मण्डल के इसी क्षेत्र में गैसल स्टेशन पड़ता है, जिसके बारे में मैंने बहुत सुना, पढ़ा है। वहां अगस्त 1999 में भीषण ट्रेन हादसा हुआ था। सिगनल की खराबी और फिर यातायात स्टाफ की चूकों के कारण एक ही ट्रैक पर दो फुल स्पीड की सवारी गाड़ियां टकराई थीं। तीन सौ लोग मरे थे। हम लोगों ने उस दुर्घटना की कमिश्नर रेलवे सेफ्टी की इंक्वाइरी को गहरे से फॉलो किया था। पूरे देश भर में रेलवे संस्थानों में उसपर चर्चा, सेफ्टी ड्राइव, सेमिनार आदि हुये थे।

अभी के भेजे चित्रों को देखने से वहां कैबिन पर पैनल इण्टरलॉकिंग व्यवस्था दीखती है। पूर्व सीमांत रेलवे के इस खण्ड पर सिगनलिंग में सुधार है। गैसल एक्सीडेण्ट के जमाने की चूक होने की सम्भावना खत्म हो गयी है।

वैसे ह्वट्सएप्प मैसेज में प्रेमसागर ने दोपहर विश्राम का स्थान पंजीपारा लिखा है। सड़क के पास रेल लाइन ट्रेस करने पर पंजीपारा रेलवे स्टेशन दीखता है। हो न हो, वह स्टेशन पंजीपारा ही रहा होगा। गैसल उसके आगे से आगे वाला स्टेशन है।

Sarvesh Saran Cabin Man
सर्वेश सरन रेलवे कैबिन में।

प्रेमसागर वहां दो तीन घण्टा रुके, सोये और नहा कर निकले। पर इतने में भी वे स्टेशन का नाम नोट नहीं किये। वे अपनी नोटबुक का प्रयोग करते प्रतीत नहीं होते। … मुझे उनपर कोफ्त हुई। पर मैं उनकी प्रकृति बदल नहीं पाया हूं। लोगों और स्थानों के नाम सुनना, समझना और ठीक ठीक हिज्जों के साथ याद रखना या नोट करना वे सीख नहीं सके। फिर भी महादेव की कृपा से भारत भ्रमण कर लिये हैं। यह विलक्षण ही है!

शाम के समय उनका फोन आता है। उन्हें अलीगंज तक पंहुचना है। वहां कोई काली माई की भक्त महिला ने रात में रुकने का इंतजाम किया है। थोड़ा पेशोपेश में लगते हैं महिला के नाम से। कहा – “अब कहां इंतजाम है वह तो जाने पर ही पता चलेगा। घर पर इंतजाम है या मंदिर में। बताये हैं कि उनके घर के बगल में मंदिर भी है।”

रात में पता चलता है कि वे अधेड़ विधवा हैं। उनका परिवार उनके साथ है। तीन पुत्रियां हैं। साल दो साल पहले उनके पति का निधन हुआ है। शिवजी, काली मां और कृष्ण जी की भक्ति में समय गुजारती हैं। नाम है जुतिका कुण्डू। घर पर उन्होने भोजन करने का अनुरोध किया पर “हम देखे भईया कि बंगाली होने के कारन उनके यहां मछली बनता है। मैंने उनसे कहा कि अगर दूध हो तो दे दें। नहीं तो मैं बाजार से ले आऊंगा। पर उन्होने दूध, केला, चिऊड़ा का प्रबंध किया। खाने में वह अच्छा लगा। … आगे तो भईया आसाम में भी हमें बताया कि लोग मछली-मीट खाने वाले हैं। महादेव जैसे इंतजाम करेंगे, चला जायेगा।”

सवेरे कंकी में दीपक सरकार, दोपहर में रेलवे के सर्वेश सरन और रात में काली भक्त जुतिका कुण्डू! इन सब की सहायता मिल रही है जाने किस विधान से!

महादेव के भरोसे ही तो चल रहे हैं प्रेमसागर। जीजीविषा है, संकल्प है, पर महादेव की सहायता के चमत्कार भी बहुत हैं। फटक गिरधारी, एक सोटा और एक पिट्ठू ले कर यात्रा पर निकल लिये हैं और सब इंतजाम हुये जा रहा है! यह मिरेकल ही तो है!

सवेरे कंकी में दीपक सरकार, दोपहर में रेलवे के सर्वेश सरन और रात में काली भक्त जुतिका कुण्डू! इन सब की सहायता मिल रही है जाने किस विधान से! वह भी ऐसे पदयात्री को जो कंकी को कई बार कनिका बोले; महानंदा को अलकनंदा से कंफ्यूज किये और देर शाम तक सही सही नहीं बता पाये कि उनका पड़ाव जहां होगा वह जगह अलीगंज है! और मजे की बात है कि उनकी जोड़ी मुझ जैसे से बनी है जो हर चीज की डीटेल्स बहुत बारीकी से, चिमटी से छील छील कर जानना चाहता है। न पता चलने पर खीझता है! जो खुद बिना पूरी योजना बनाये घर के बाहर एक कदम नहीं रखता! :lol:

राम मिलाये जोड़ी! :-)

इक्कीस फरवरी को मैहर दर्शन के बारे में पहली पदयात्रा पोस्ट थी प्रेमसागर – मैहर दर्शन के साथ शक्तिपीठों की पदयात्रा प्रारम्भ । उस बात को आज दो महीने हो गये। पैंतालीस ब्लॉग पोस्टें बन गयीं यात्रा पर। … मैं थकान महसूस कर रहा हूं, पर प्रेमसागर उसी ऊर्जा से; घायल होने के बावजूद; रोज 40-50 किमी चल ले रहे हैं। कुल 1709 किमी चले हैं। अर्थात 23 लाख 28 हजार कदम! और, असली बात, अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा अच्छा विवरण भी दे रहे हैं। मुझे मौका नहीं दे रहे कि मैं अपने को असंपृक्त कर लूं उनके इस पदयात्रा अभियान से।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

मूरत यादव और मिश्री पाल के साथ गपशप


आज सवेरे मड़ैयाँ डेयरी के कलेक्शन सेण्टर पर मूरत यादव और मिश्री पाल पहले से मौजूद थे। बेंच पर बैठे थे। मुझे देख कर मिश्री पाल ने पीछे से कुर्सी निकाली और रखने के लिये जगह बनाई।

मैं बैठा तो मूरत यादव ने कहा – “आज बीस भेड़ी बियानी हईं मिस्री पाल के।”

मिश्री पाल ने पीछे से कुर्सी निकाली और रखने के लिये जगह बनाई।

गड़रिये की बीस भेडों ने बच्चे जने हों, यह बड़ी खबर है। उतनी बड़ी कि टीसीएस अपने शेयर पर मोटा डिविडेण्ड एनाउंस करे! मैंने मिश्री पाल को बधाई दी और मिठाई की मांग की। बधाई उन्होने सहर्ष स्वीकार की और मिठाई की बात पर अपने को डक किया – आपको मिठाई की क्या कमी है? इसी डेयरी से तो ले ही जाते हैं मलाई पेड़ा!

साधारण और सरल ग्रामीण। घुमा फिरा कर मुझसे पूछते हैं – कितने लोगों को नौकरी दिया होगा अपनी रेल सेवा के दौरान?

बताने पर कि तीन चार को बंगलो पीयून रखा था पूरी नौकरी भर में; वे कहते हैं कि आपसे पहले मिले होते तो जिनगी तर गयी होती! तब भेंड़ी-गाय-भैस थोड़े पालनी पड़ती।

मिश्री पाल मुझे गाय पालने की सलाह देते हैं। मूरत यादव कहते हैं – इस खटरम में मत पड़ियेगा। आपके पास पैसा है। यहीं से दूध लेते जाइये और आराम से रहिये।

मूरत यादव (बांये) और मिश्री पाल।

मैं – “और पैसा जब खतम हो जायेगा तब?”

मिश्री पाल – “कभी नहीं होगा। आपकी जिनगी भी लम्बी चलेगी। साइकिल चला कर रियाज करते हैं आप। जिनगी भी लम्बी होगी और पईसा भी रहेगा।”

मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया – “ज्योतिषी लगते हो पाल! हांथ देखना आता है?”

मिश्री पाल संकुचित हो गये। “कहां, हम अपनी गाय-भेड़ पाल लेंं, वही बहुत है।” एक गाय है और दो सौ भेड़ें। गाय का चार सेर दूध ले कर आये हैं वे कलेक्शन सेण्टर पर। मैंने पूछा – कभी भेड़ का दूध तो नहीं ले आते यहां देने को?

भेड़ का दूध नाम आने पर मिश्री पाल एक कथा सुनाने लगे। “हम अपनी भेड़ेंं बैठाये थे फलाने जी के खेत में। एस्सो साहब (एस.ओ. – थानेदार) गुजर रहे थे। अपनी गाड़ी रोक कर मेरे पास आये और अलग ले जा कर बोले – मेरा काम है जो तुम ही कर सकते हो। … हम तो सकते में आ गये साहब कि एस्सो साहब के साथ कौन गुस्ताखी हो गयी।”

थानेदार जी ने मिश्री पाल से भेड़ के दूध का मट्ठा पिलाने की फरमाइश की। “जब मैंने उनसे पूछा कि आप कौन यादव हैं तो वे बोले कि सोनभद्र के ठाकुर हैं और वहां गड़रियों से बहुत बार भेड़ के दूध का मट्ठा पिया है। उनका फोन नम्बर मैंने लिया। अगले दिन माठा तैयार होने पर उन्हें फोन किया – आपके लिये माठा तैयार है साहब। और आधे घंटे में वे मेरे पास आ गये। भेड़ी का माठा पी कर बहुत खुश हुये मुझ पर!”

मैंने जोड़ा – “अब देख लो! आपकी तो थानेदार साहब से यारी दोस्ती हो गयी है! बड़े मनई आप हैं कि मैं?”

तब तक पिण्टू ने मुझसे कहा – आज यह भैंस का दूध 8.9% फैट का है। लेंगे आप?

सेण्टर पर अब तक का अधिकतम फैट कण्टेण्ट मुझे 8% मिला है। आज उससे भी बेहतर है। मैं बढ़े दाम पर दूध खरीद कर घर को निकल लेता हूं। … वहां पांच सात मिनट बैठना और ग्रामीण लोगों से बतकही, गपशप सवेरे के लिये री-फ्रेशिंग होती है। गांव में न रहता तो ऐसे लोगों से मिलना बोलना बैठना होता ही नहीं। यहां भी अभिजात्य लोग कहां साइकिल चलाते और भैंस-गाय-भेड़ पालने वालों से बोलते बतियाते हैं? वे यहां रह कर भी बहुत कुछ मिस करते हैं। जिंदगी भर वे जो न जान पाये वह मुझे साइकिल चलाने और किसी भी व्यक्ति से मिल-बैठ बात करने से मिल जा रहा है।

सौभाग्य है न यह?! और यह जीवन मैने अपनी च्वाइस से चुना है!

इस गपशप के लिये कल मैंने एक शब्द सुना – बतौलेबाजी। उक्त पोस्ट में जो बातचीत है वह क्या कहा जायेगी – गपशप या बतौलेबाजी?! :lol:


डगरुआ से कंकी, महानंदा पार करते हुये


19 अप्रेल 2023

पूर्णिया से किशनगंज होते सिलीगुड़ी की ओर बढ़ना है प्रेमसागर को। इलाका कोसी, गंगा और महानंदा के डूब का है। पूर्णिया-सिलीगुड़ी नेशनल हाईवे ही सबसे ऊंची जगह होती है। फणीश्वर नाथ रेणु अपने घर परती भूमि की बात करते हैं जहां कभी बाढ़ नहीं आती। वह इलाका तो पूर्णिया से फोरबिसगंज की ओर है। इस तरफ तो साल के चार महीने दलदल ही रहती है।

दीपक यदुवंशी (बायें से तीसरे, अपनी माँ के बगल में खड़े) और उनके परिवार के साथ प्रेमसागर

डगरुआ से निकल कर कई छोटी बड़ी नदियां मिलीं प्रेमसागर को। किसी में पानी था, किसी में नहीं। पर सावन के बाद सब जगह पानी पानी होता है। डगरुआ के दस किमी आगे दीपक जी के यहां चाय नाश्ता मिला प्रेमसागर को। “मनोज भईया खबर किये थे दीपक जी को। दीपक यदुवंशी।” प्रेमसागर ने बताया।

उनके परिवार का चित्र भी भेजा प्रेमसागर ने। दीपक की अम्माजी खड़ी हैं चित्र में और उनके दादा जी बैठे हैं प्रेमसागर के बगल में। प्रेमसागर ने कई बार दोहराया – दादा जी सेंच्यूरी मार चुके हैं। उनका गांव है बकहरिया। नेशनल हाईवे के बगल में ही है। पूरा गांव बाढ़ में डूब जाता है। कमर भर पानी आ जाता है। जिनके मकान ऊंचे बने हैं वे अपने घर का नीचे का हिस्सा खाली कर छत पर चले जाते हैं। बाकी, जिनके पास कच्चे मकान हैं, वे सड़क पर डेरा जमाते हैं। सड़क सबसे ऊंची जगह है पूरे इलाके में।

दीपक जी के घर का चित्र भी भेजा प्रेमसागर ने। घर शायद बन रहा है और उसकी कुर्सी (घर का जमीन से लेवल) काफी ऊंचा है। पानी थोड़ा बहुत आये तो भी डूबने वाला नहीं।

साल के चार महीने डूब, विस्थापन और सब कुछ ठप्प होना झेलने पर भी लोगों में कितनी जीवंतता है! उस जगह से साढ़े छ सौ किमी दूर रहता मैं कल्पना ही कर सकता हूं। यहां भी भदईं गंगा विकराल हो जाती हैं। पर पानी सात दस दिन में घट जाता है। वहां तो गंगा, कोसी, महानंदा और नेपाल से निकलती अनेक छोटी बड़ी नदियां पानी ठेल देती हैं इस इलाके में। पानी जीवन भी देता है और जानलेवा भी होता है।

दीपक जी के घर का चित्र भी भेजा प्रेमसागर ने। घर शायद बन रहा है और उसकी कुर्सी (घर का जमीन से लेवल) काफी ऊंचा है। पानी थोड़ा बहुत आये तो भी डूबने वाला नहीं।

ये लोग, दीपक, सत्यम, अमरदीप, झूनी सिंह आदि प्रेमसागर के इतने सहायक कैसे हैं? मैं समझ नहीं पाता। आपदा मेंं जीना शायद आदमी को आदमी बनाता है।

और यह सहायता भाव केवल बाभन, ठाकुर, यादव, इस जाति या उस जाति या फिर हिंदू होने का परिणाम नहीं है।

प्रेमसागर बताते हैं – “भईया, एक आश्चर्यजनक बात पता चली। यहां मुसलमान काफी हैं। पर सब के घर आसपास हैं। कोई हिंदू-मुस्लिम टोला अलग अलग नहीं है। राम नवमी को जब जुलूस निकलता है तो मुसलमान लोग जगह जगह टेबल लगा कर शर्बत, पानी, फल आदि देते हैं जुलूस वालों को। दीपक भाई बताते हैं कि इस बार पांच सात जगह स्टाल लगाये थे वे लोग। उनके यहां कोई शादी-प्रयोजन होता है तो हिंदू कारीगर (हलवाई) बुला कर उसी से भोजन बनवा कर दो दिन पहले हिंदू लोगों को भोज देते हैं, फिर अपना समारोह करते हैं। पूरे सत्रह किलोमीटर तक यह बेल्ट है और लोग ऐसे ही व्यवहार करते हैं।”

देश नफरत और अविश्वास में जल रहा है और यहां भाईचारे के द्वीप बन गये हैं बाढ़ के इस सीमांत बिहार में। प्रेमसागर अगर यात्रा न कर रहे होते और कोई और बताता तो मैं उसे शंका की दृष्टि से देखता!

मुस्लिम सज्जन जिन्होने पानी पिलाया।

“गर्मी बहुत थी भईया। मैं पसीने से लथपथ चल रहा था। दूर से ही एक दुकानदार ने देखा और आधा किलोमीटर पैदल चल कर एक पानी की बोतल का कर मुझे दिये। सीलबंद पानी की बोतल। कहा, आप पहले पानी पीजिये। वो सज्जन मुसलमान थे। उनका कोई सड़क किनारे भोजनालय था। कुछ देर मुझे अपने यहां बैठ आराम करने को कहा। उन्होने कहा कि रामनवमी के समय वे जुलूस को पानी पिलाते हैं। बोले कि उनका धरम नफरत का नहीं है। सेवा सिखाता है। देश में लोग गलत रास्ते जा रहे हैं, पर हम अपनी परम्परा बचा कर रखे हुये हैं। बाकी जगह भी लोग यह समझ लें कि सबको साथ रहना है तो हमारे लिये जो घृणा होती जा रही है, वह न हो।”

“वे तो नाम बताने या फोटो खिंचाने को तैयार नहीं थे। मैंने तो अपने से खींच लिया। उनका कहना था कि उनका धरम अपनी फोटो खिंचवाने में यकीन नहीं रखता।”

मनोज यादव जी ने खबर कर दी थी कि प्रेमसागर हाईवे से जा रहे हैं। बिजई यादव जी ने उन्हें फोन कर कहा कि गर्मी बहुत है, दिन में उनके यहां विश्राम करें। शाम के समय आगे निकलें। बिजई जी के यहां जाल जलपान भी मिला और विश्राम भी। “भईया, वहां सो गया मैं। शाम पांच बजे निकला। फिर चलते हुये रात पौने नौ बजे कंकी पंहुचा।”

झुलसाने वाली गर्मी के दिन कुल बयालीस किलोमीटर की दूरी पार की प्रेमसागर ने। वह भी उस दशा में जब पैर में दुर्घटना से चोट लगी हुई है! गजब जीवट का पदयात्री है यह व्यक्ति!

रास्ते में महानंदा नदी पार की।

रास्ते में महानंदा नदी पार की। “बहुत बड़ी नदी है भईया। पानी दो भाग में हो गया है। बीच में रेत का टापू बन गया है। उसमें लोग खेती भी कर रहे हैं।”

नक्शे के हिसाब से महानंदा पार करने के बाद प्रेमसागर बिहार से बंगाल में प्रवेश किये। वैसे आगे बिहार-बंगाल में आना जाना लगा रहेगा। नेशनल हाईवे वैसा ही है। महानंदा नदी भी कई बार मिलेंगी उन्हें। अगला शक्तिपीठ भी महानंदा किनारे है।

उस लड़की ने नाम बताया – सीमा। उसका भी एक यू-ट्यूब चैनल है। बीस-बाईस हजार फालोवर हैं। चार सौ के लगभग वीडियो।

बीच में एक जगह एक लड़की ने हाथ दे कर उन्हें रोका। उसने बताया कि वह उनकी यात्रा के बारे में ब्लॉग पढ़ती है। उनकी यात्रा फॉलो कर रही है। उसे अंदाज था कि प्रेमसागर उसके पास से गुजरेंगे। स्मार्ट लड़की है वह। मैं फिर चमत्कृत होता हूं कि सीमांत बिहार में भी दसवीं में पढ़ रही लड़की इतनी जानकारी रख सकती है। बिहार की जीजीविषा और इण्टरनेट विस्तार का परिणाम है यह। उस लड़की ने नाम बताया – सीमा। उसका भी एक यू-ट्यूब चैनल है। बीस-बाईस हजार फालोवर हैं। चार सौ के लगभग वीडियो। उनमें वह फिल्मी तर्ज के गानों पर वह नृत्य करती है। बैकग्राउण्ड में सीमांत बिहार का ग्रामीण इलाका दीखता है। … गजब बदलाव हो रहा है दूर दराज के इलाकों में भी!

उसके चैनल का लिंक है – https://www.youtube.com/@JYOTIDANCETUBE

रात में दीपक सरकार जी के यहां इंतजाम कराया है मनोज यादव जी ने। कंकी में उनकी चाय और जलपान की दुकान है। प्रेमसागर ने बताया कि बहुत सज्जन आदमी हैं सरकार जी।

आगे की यात्रा अगले दिन। प्रेमसागर थक नहीं रहे। लिखते हुये मैं जरूर थक जा रहा हूं! :lol:

ॐ मात्रे नम:! हर हर महादेव!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

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