कालिका नलटेश्वरी शक्तिपीठ


22 मार्च 23

सैंथिया स्टेशन, जहां लड्डू शाह जी की मौचक लॉज में प्रेमसागर रुके हुये हैं; से कालिका नलटेश्वरी शक्तिपीठ 45 किमी दूर है। उत्तर की ओर। बीरभूम जिले के रामपुरहाट तहसील में। आज प्रेमसागर को वहां जाना था। पैदल उन्होने शक्तिपीठ तक यात्रा की।

वापसी में नलहाटी से ट्रेन पकड़ी। सैंथिया (या सईंथिया) भी जंक्शन है और नलहाटी भी। दोनो पर लगभग सभी ट्रेनें रुकती हैं। एक घण्टा से भी कम समय लगता है ट्रेन यात्रा में।

रास्ते का एक दृश्य

आज रात की बारिश के कारण कहीं कहीं सड़क पर कीचड़ था। चप्पल फंस जा रही थी। पांच सात किलोमीटर सड़क भी टूटी-फूटी मिली। सवेरे जल्दी निकलने के बावजूद दिन भर लग गया नलटेश्वरी माई के स्थान पर पंहुचने में। रास्ते में दो मिलें दिखीं। दोनो कृषि आर्धारित मिलें। थोड़ा बहुत अद्योगिक विकास तो है बीरभूम के इस संथाली इलाके का।

शाम चार बजे वे 500 मीटर दूर थे मंदिर से। पौना घण्टे बाद नलहाटी स्टेशन से वापसी की ट्रेन थी। प्रेमसागर को दर्शन जल्दी करने थे। खैर, “माई की कृपा से” सब अच्छे से हो गया।

“मंदिर एकांत है भईया। साफ सुथरा। मन को अच्छा लगता है वहां। भीड़ भी बहुत ज्यादा नहीं थी। नवरात्रि का प्रारम्भ है तो कुछ तो लोग थे ही। भईया, यहां सती माई का गला गिरा हुआ था। यहां भैरव हैं – योगेश। आप को बता दे रहा हूं, काहे कि बाद में हो सकता है भूल जाऊं।” – प्रेमसागर ने शाम साढ़े चार बजे कहा। मैं हर बार उनसे शक्तिपीठ के भैरव का नाम पूछता हूं और यह भी कि भैरव के दर्शन किये हैं या नहीं। शक्तिपीठ अनेक हैं। कुछ लोगों ने कालांतर में और भी जोड़ लिये हैं। भैरव और उनका मंदिर संलग्न होने से शक्तिपीठ की प्राचीनता का आभास मुझे होता है।

कालिका नलटेश्वरी शक्तिपीठ। स्लाइड शो।

वे दर्शन के तुरंत बाद नलहाटी स्टेशन के लिये निकल लिये। नलहाटी जंक्शन स्टेशन मंदिर से 1300 मीटर की दूरी पर है। किसी वाहन से पंहुचे होंगे वे। ट्रेन शायद कुछ लेट थी, पर ज्यादा नहीं। स्टेशन एक दो तीन चित्र उन्होने भेजे।

बाद में मौचक लॉज लौटने पर प्रेमसागर ने बताया – “सवेरे निकलने के करीब पंद्रह किलोमीटर चलने पर एक चाय दुकान पर मैंने चाय पी। वहां से चल रहा था तो एक छोटी बच्ची दौड़ती आयी थी मेरे पास और इक्यावन रुपये दे कर माता जी को उनकी ओर से चढ़ाने के लिये बोली। उसका फोटो हींच लिया है। आपको भेज दे रहे हैं। बच्ची का नाम है शीनू मण्डल।”

“छोटी बच्ची दौड़ती आयी थी मेरे पास और इक्यावन रुपये माता जी को उनकी ओर से चढ़ाने के लिये दिया था। बच्ची का नाम है शीनू मण्डल।”

किसी भी यात्री-पदयात्री को अपनी ओर से चढ़ाने के लिये पैसा या सामग्री देना प्राचीन परम्परा है। पहले यात्रा कठिन हुआ करती थी। रास्ते निरापद नहीं होते थे। कई कई जगह रास्ते होते भी नहीं थे। जो यात्रा पर जाता था, उसे पूरा गांव और रास्ते के लोग भी विदा करते थे। अपनी ओर से भी कहते थे कि फलानी चीज या फलानी मुद्रा देवता को अर्पित कर देना। नदी में उनकी ओर से भी एक डुबकी लगा लेना। श्रद्धा को पदयात्री के माध्यम से देवता तक पंहुचाना हिंदू धर्म की विशिष्ट परम्परा है। वह बच्ची – शीनू मण्डल – उसी के अनुसार प्रेमसागर को इक्यावन रुपये दे रही थी। उसकी मां-पिताजी ने दिये होंगे वे पैसे। पर बच्ची में एक संस्कार तो डाल रहे थे उसके माता-पिता। जय हो!

शाम वापस लौटने पर मैं नलटेश्वरी माता के विषय में प्रेमसागर से पूछ्ता हूं तो वे गुड्डू मिश्र जी को फोन कर पता करते हैं। किन्ही रामचरण शर्मा जी को माता सपने में आयी थीं, तो उन्होने यहां मंदिर बनवाया। वहां नीम का एक गाछ है। जिसका पत्ता मीठा होता है। झरने पर उठा कर खायें तो कड़वा होता है। गुड्डू मिश्र जी ने नारद जी को स्वप्न में माता के आने और उससे इस पीठ को जोड़ने की बात भी बताई। सनातनी आस्थायें स्वप्न में प्रेरणा मिलना, कुछ नीम के मीठे होने जैसे चमत्कार, किसी महापुरुष के कोई वचन आदि से उत्प्रेरित होती हैं।

शक्तिपीठ चार हों, अठारह हों, इक्यावन हों, बावन-तिरपन-चौंसठ हों या एक सौ आठ। सारा खेल शक्ति-रूपा ईश्वरीय वपु का है। माता माहेश्वरी के अनेकानेक रूप हैं। उनकी कल्पना शरीर के उनके अंगों, उनकी प्रकृति और/या उनकी भौगोलिक स्थिति से होती है। मैं प्रेमसागर की यात्रा के दौरान उन्हें समझने का (असफल) प्रयास करता हूं और जब उलझन होती है तो खीझ के रूप में प्रेमसागर पर उतारता हूं। पर प्रेमसागर पर उसका कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिखता। अगले दिन वे पुन: उसी जोश, उसी श्रद्धा से नयी यात्रा के लिये तैयार दीखते हैं। गूगल मैप पर उनके रात्रि विश्राम स्थल से हिला-चलता उनका आईकॉन बता देता है कि वे भोर में चल दिये हैं।

प्रेमसागर देवी श्रद्धा में मगन-मस्त हैं। मैं प्रेमसागार सिण्ड्रॉम से ग्रस्त हूं। ज्यादा सोचना मन के लिये खतरनाक है। :lol:

कल प्रेमसागर केतुग्राम स्थित श्री बहुला देवी शक्तिपीठ को जायेंगे। अपनी लॉज से फुल्लारा देवी तक बस से और आगे करीब तीस किलोमीटर पैदल। वापस किसी बस या ट्रेन से लौटेंगे।

ॐ मात्रे नम:। हर हर महादेव! मातृशक्ति की जय हो!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

दो शक्तिपीठ – फुल्लारा देवी और कंकालिताला देवी दर्शन


21 मार्च 23

कल प्रेमसागर ने बीरभूम जिले में नंदिकेश्वरी देवी के दर्शन किये थे। उनका नौवां शक्तिपीठ दर्शन। अब वे आगे के शक्तिपीठों की ओर चल रहे हैं।

चैत्र नवरात्रि दो दिन बाद प्रारम्भ होने जा रही है। बंगाल में लोगों के वेष बदलने लगे हैं। लोग लाल धोती और लाल कुरते में नजर आने लगे हैं। प्रेमसागर ने अपना एक जोड़ी लाल कुरता धोती पानी में भिगो कर साफ करने छोड़ दिया है। यात्रा के दौरान वे साबुन का प्रयोग नहीं करते, सो कपड़े साफ करने के लिये मात्र पानी का ही प्रयोग होता है। उनके पास एक दूसरी जोड़ी लाल टी-शर्ट और धोती है। वही पहन कर आज पदयात्रा को निकले।

रुके वे लड्डू शाह के मौचक रेजीडेंशियल लॉज में हैं। यह सैंथिया रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के पास है। वहां से सवेरे पौने छ बजे निकल कर; मयूराक्षी के बगल से दो किलोमीटर चलते हुये अट्टहास के फुल्लारा देवी शक्तिपीठ के लिये दक्षिण की ओर मुड़े। बारिश हुयी है। मौसम में धुंध है। दृश्यता कम है। चित्र साफ नहीं आ रहे।

बारिश हुयी है। मौसम में धुंध है। Slide Show

ताल और कुंये ज्यादा दीख रहे हैं। हर सम्पन्न ग्रामीण के पास एक ताल है। ताल का रखरखाव अच्छा है। ताल सिंचाई और मत्स्य पालन – दोनो के लिये है। जगह जगह धान की बुआई की गतिविधियां चल रही हैं।

चलते चलते प्रेमसागर बताते हैं – “भईया बंगाल भोजन के लिये बहुत सस्ता है। तीन रुपये की चाय है। वही चाय हमारे इलाके में पांच-दस रुपये की है। और क्वालिटी में यह चाय बीस ही होगी, उन्नीस नहीं। रसगुल्ला पांच रुपये में है। जिस साइज का रसगुल्ला हमारे यहां पंद्रह से पच्चीस रुपये का होता है, वह यहां दस रुपये का है। मन होता है फ्रिज की सुविधा हो तो ढेर सारा खरीद कर यहां से ले जाया जाये। मैंने दूध का भाव पता नहीं किया; पर सस्ता ही होगा।”

“आज निकलने के दस पंद्रह किलोमीटर पर अजीब घटना हुई। एक पुलिया पर मैं सुस्ताने बैठा था तो मेरा वेश देख कर दो तीन खेत मजदूर मेरे पास आये। मेरे बारे में पूछने लगे। बताने पर कि मैं लम्बी लम्बी पदयात्रायें कर रहा हूं, उनका भाव बदला। वे कहने लगे कि वे मुसलमान हैं, पर उनके पूर्वज तो हिंदू ही थे। ज्यादा टाइम नहीं हुआ। उनके बाबा 18-20 साल के थे तब धर्म बदला। उनके घर में रामायन-गीता है पर उसके बारे में बोल नहीं पाते। उस सब के बारे में बोलो भी तो धमकी मिलती है। मैं उनका फोटो लेने लगा तो उन्होने मना किया कि बाबा वह मत करिये और हमारे बारे में भूल कर भी कहियेगा नहीं।”

जगह जगह धान की बुआई की गतिविधियां चल रही हैं।

“भईया वे सरल लोग थे। मुझे बताया कि रास्ते की बजाय इस खेत खेत निकलेंगे तो तीन किलोमीटर चलना बच जायेगा। अगर खेत के बीच चलने में अड़चन लगती हो तो कुछ दूर वे साथ चल सकते हैं। उनके मुसलमान होने से मैं असहज था पर उन्होने बहुत अच्छे से बात किया और कोऑपरेट किया।”

इस घटना से मुझे गाजीपुर जिले की प्रेमसागर की कही बात याद आयी। उत्तरप्रदेश के उस जिले से गुजरते हुये प्रेमसागर ने मुझे बताया था कि जब भी वे किसी चाय की दुकान पर बैठते थे तो वहां मुसलमान और समाजवादी पार्टी वाले उनका वेश देख कर मुख्तार अंसारी के खिलाफ की गयी कार्रवाई को ले कर बहुत आक्रोश जताते मिलते थे। वे कई बार प्रेमसागर को उकसा कर प्रतिक्रिया करने को बाध्य भी करते थे। “पर भईया हम तो चुपचाप चाय पी कर पैसा दे कर वहां से चल देते थे। उनसे उलझने की कभी कोशिश नहीं की। हमें तो अपनी यात्रा निर्विघ्न पूरी करनी है। अपने आचरण को मुझे बहुत संयत रखना होता है भईया। कोई भी गलत बात बोलना परेशानी में डाल सकता है। कई बार तो एक शब्द हमारी भाषा में सही होता है पर दूसरे लोग उसका उलटा ही अर्थ लेते हैं।”

फुल्लारा देवी के दृश्य – स्लाइड शो।

दोपहर बारह बजे प्रेमसागर ने पच्चीस किलोमीटर चल कर फुल्लारा मां के दर्शन किये। “भईया छोटी जगह है। साफ सुथरा है। शांति है। बहुत अच्छा लगा वहां। यह जान कर कि मैं पदयात्री हूं, यहां और आगे कनकलिताला में भी पुजारी महराजों ने मेरा तिलक किया और आशीर्वाद के रूप में पीठ पर हाथ रखा। कहा कि सनातन धर्म के लिये यह करते रहो।”

अट्टहास (फुल्लारा) में सती के नींचे का ओठ गिरा था। फुल्लारा का अर्थ है पुष्प की तरह खिलना। यहां विश्वेश भैरव हैं। देवी यहां सभी कामनायें पूरा करती हैं – ऐसा पीठ निर्णय तंत्र में है। पता नहीं प्रेमसागर ने क्या कामना की। मैंने पूछा नहीं उनसे। अगली बार पूछूंगा कि शक्तिपीठों में सिर नवा कर ध्यान करते समय उनके मन में क्या कामना/आशा रहती है।

छोटी शांत जगह है अट्टहास और जंगल का इलाका था। यहां आने पर मन स्वत: अंतर्मुखी हो जाता है। बाहरी शोर खत्म हो जाता है। तभी सुनाई देता होगा माई का अट्टहास और तभी उनका खिलना महसूस होता होगा। मैं गूगल मैप पर लोगों की टिप्पणियाँ पढ़ता हूं, और उनमें कुछ ऐसे ही भाव हैं।

फुल्लारा माता के दर्शन के बाद प्रेमसागर ने पंद्रह बीस मिनट वहां विश्राम किया। मुझे फोन किया। उनके स्वर में उपलब्धि का भाव था। यहां दर्शन पर दस शक्तिपीठ वे सम्पन्न कर चुके। आगे चल कर शाम के पहले वे कंकालिताला माता के भी दर्शन कर लिये। इग्यारहवें शक्तिपीठ के दर्शन हो गये।

कंकालिताला माता के दृश्य। स्लाइड शो।

कंकालिताला में माता का वपु काली का है। वे मानस और मसान – दोनो में निवास करती हैं। यह स्थान बोलपुर में है। शांतिनिकेतन से आठ दस किमी दूर। यहां सती की कमर की अस्थियां गिरी थीं। अस्थियां इतनी जोर से गिरी थीं कि वहां गड्ढा बन गया। जो सरोवर (कुण्ड) के रूप में विद्यमान है। यह कुण्ड ही वास्तव में शक्तिपीठ है। पर इसके पास ही पूजा के लिये पार्वती जी का मंदिर बना है।

स्थान को “कंकाली” कहा जाता है। कंकाल अर्थात शरीर का अस्थि-ढांचा। भक्तों को विश्वास है कि सती की अस्थियां इस कुण्ड में अभी भी विद्यमान हैंं!

कंकालीताला को अन्य मंदिरों की तरह मुगल काल में नष्ट किया गया था। दिल्ली की मुगलिया सरकार के सेनापति काला पहाड़ (जो धर्म परिवर्तन के पहले राजीबलोचन राय था) ने जगन्नाथ पुरी, कामाख्या और कंकालीताला को क्षतिग्रस्त किया था।

कंकालिताला दर्शन के बाद वे रेलवे स्टेशन पर पंहुचे तो ट्रेन पंद्रह मिनट में आने ही वाली थी। जल्दी से टिकट लिया। तीस रुपये का टिकट। उसके बाद एक घण्टे से पहले ही वे सैंथिया जंक्शन के पास मौचक लॉज में आ चुके थे। तेरह चौदह घण्टे की यात्रा, जिसमें वे पैंतालीस किलोमीटर पैदल चले; करने से वे दो शक्तिपीठों के दर्शन सम्पन्न कर पाये। एक दिन में इतनी प्रगति, इतने व्यवस्थित तरीके से शायद ही हो।

दोनो शक्तिपीठों के इतिहास की जानकारी बढ़ा कर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पर उतना शायद ब्लॉग में सम्भव न हो सकेगा। कभी पुस्तक लिखने का नम्बर लगे तो पुनर्लेखन की मेहनत होगी!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

कुलुबंदी से नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ, बीरभूम, बंगाल


20 मार्च 23

झारखण्ड – बंगाल सीमा से नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ 25-26 किलोमीटर पर है। प्रेमसागर अगर वहां चट पट दर्शन कर अगले शक्तिपीठ की ओर निकलने की उतावली न दिखायें और दिन भर शक्तिपीठ का वातावरण समझने-सूंघने में लगायें तो इतनी लंबी लंबी पदयात्रा करने का ध्येय सार्थक हो सकेगा।

इतने दिन बाद भी मैं समझ नहीं पाया कि प्रेमसागर का यात्रा ध्येय क्या है। पदयात्रा ध्येय है या पदयात्रा जल्दी जल्दी पूरा करना ही ध्येय है। पिछली द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा में संकल्प का बंधन था। यात्रा पूरा करना ध्येय था। यह यात्रा तो स्वप्न की प्रेरणा से है। मातृशक्ति ले जा रही हैं यात्रा पर। कहां कहां ले जायेंगी और कैसे ले जायेंगी, माता पर ही छोड़ना चाहिये।

पर मै प्रेमसागर का कोई यात्रा सलाहकार नहीं हूं। बड़े बड़े पण्डित-भक्त लोग उनको गाइड करने वाले हैं। हर विद्वान उन्हें अपने सुझाये तरीके से यात्रा करा रहा है!

खैर, अगर यात्रा ही अपने आप में ध्येय है तो यात्रा को ही उन्हें माता का प्रसाद मान कर उसमें रस लेना चाहिये। पर मेरी सलाह तो खांटी धरम-करम वाली सलाह नहीं है। देखें, वे क्या करते हैं। वैसे आज मेरी सलाह मान कर वे नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के समीप लॉज में ही रुक गये। आज ही आगे बढ़ कर 50-60 किलोमीटर चलने की जल्दी नहीं दिखाई। मंदिर, परिवेश और वातावरण को देखने समझने का प्रयास किया।

आज का दिन वैसे भी उत्फुल्लता का था। रात में बारिश हुई थी। सवेरे सड़कें गीली थीं।

आज का दिन वैसे भी उत्फुल्लता का था। रात में बारिश हुई थी। सवेरे सड़कें गीली थीं। बीरभूम जिले का जंगली इलाका था। बढ़िया लगा चलने में। बीरभूम बंगाल के बर्दवान डिवीजन का उत्तरी-पश्चिमी जिला है। संथाल आदिवासी बहुल। संथाली भाषा में बीर का अर्थ वीर नहीं, जंगल होता है। बीरभूम यानी जंगल की भूमि। अपने नाम को सार्थक करता जिला है। और यह शाक्त श्रद्धा का गढ़ है। कई शक्तिपीठ हैं यहां। अगले सप्ताह भर में प्रेमसागर उन्ही के दर्शन करेंगे।

झारखण्ड के छोटा नागपुर पठार के इलाकों की तरह यहां भी जमीन में कोयला बहुत है। कोयले की खदाने और रेल के वैगनों-रेकों में कोयले का लदान होता है। नंदिकेश्वरी मंदिर के समीप ही रेल का जंक्शन है। सैंथिया जंक्शन।

झारखण्ड-बंगाल की सीमा से पैदल आते हुये प्रेमसागर को कई जगह चूने पत्थर के ढेर नजर आये।

झारखण्ड-बंगाल की सीमा से पैदल आते हुये प्रेमसागर को कई जगह चूने पत्थर के ढेर नजर आये। लाइमस्टोन भी निकलता होगा खदानों से और अगर वह है तो सीमेण्ट बनाने वाले कहां चूकेंगे। उसके लिये दो जरूरी तत्व – चूना और कोयला तो एक ही जगह उपलब्ध है। मैंने जानकारी अभी तलाशी नहीं, पर बीरभूम जिले में ताप विद्युत, सीमेण्ट बनाने और कोयले की खदानों के बारे में काफी जाना जा सकता है।

वैसे बीरभूम जिले की सरकारी वेबसाइट ने (आम तौर पर जैसा होता है) निराश ही किया। विकिपेडिया उससे कहीं बेहतर सोर्स है जानकारी का।

प्रेमसागर ने रास्ते में धान की रुपाई करते किसान-श्रमिक देखे।

जिले की पचहत्तर फीसदी आबादी, बावजूद खनिज सम्पदा के, कृषि पर अवलम्बित है। प्रेमसागर ने रास्ते में धान की रुपाई करते किसान-श्रमिक देखे। लोगों ने बताया कि कोई कोई दो और कोई तीन धान की फसल भी लेता है खेत से। आबादी का दबाव है और खेतों की जोत बड़ी नहीं है। बावजूद इसके कि दशकों यहां साम्यवादी विचारधारा की सरकारें रही हैं, खेती सामुदायिक नहीं, व्यक्तिगत दीखती है।

धान बहुत दीखा प्रेमसागर को रास्ते में। जगह जगह बड़ी बड़ी धान की बोरियां। “एक राइस मिल तो इतनी बड़ी थी, भईया जैसे कोई बहुत बड़ी फेक्टरी हो।” – प्रेमसागर ने बताया।

मयूराक्षी के बगल से चलना हुआ काफी हिस्से में। इस नदी को पार कर सैंथिया स्टेशन के पास नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ पड़ा। “भईया मेन ब्रिज की मरम्मत चल रही थी। एक दूसरे छोटे पुल से आना पड़ा। नदी का पाट बहुत बड़ा है पर पानी बहुत कम है।” – प्रेमसागर ने बताया।

मौचक लॉज और लड्डू शाह जी का धुंधला चित्र। इस लॉज में प्रेमसागर अगले कुछ दिन रुकने की सोच रहे हैं।

नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ, बस अड्डे और सैंथिया जंक्शन के पास ही है मौचक लॉज। मौके की जगह पर। इसके मालिक बनारस में वाराही माता जी के दर्शन की लाइन में प्रेमसागर के आसपास ही खड़े थे। यहां उन्होने प्रेमसागर को पहचान लिया। फिर तो प्रेमसागर को आश्वासन मिल गया कि जितने दिन भी रहना है, वे यहां रह सकते हैं। “कुल चारसौ अस्सी रुपया किराया है दिन भर का और साथ में भोजन चाय भी उपलब्ध हो रही है। बहुत साफ सुथरी और अच्छी जगह है। कहीं से भी ट्रेन या बस से आ कर आसानी से लॉज में पंहुचा जा सकता है।” – प्रेमसागर ने लॉजिस्टिक फायदे गिनाये। लॉज के मालिक लड्डू शाह जी का अच्छा चित्र नहीं ले पाये प्रेमसागर। जो धुंधला और हिला हुआ चित्र खींचा, वही ब्लॉग में लगा दिया है मैंने।

मंदिर परिसर में वृक्ष भी है और उसपर लिपटे मनौती के धागे भी। भक्तिमय वातावरण है वहां। भक्ति है, भय नहीं है।

नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के बारे में कहा जाता है कि यहां सती का हार गिरा था। सती के हार गिरने की कथा मैहर (माई का हार) में भी है। सती क्या एकाधिक हार पहने थीं? कहीं कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। शक्तिपीठ स्त्रोत के अनुसार यहां के भैरव नंदिकेश्वर हैं – नंदी के देव। नंदिनी माता का शाब्दिक अर्थ है ‘जो आनंद की देवी हैं’। और आज प्रेमसागर जाने अनजाने में आनन्दित ही लगे अपनी बातचीत में मुझे। एक बड़ा सा प्रस्तर खण्ड है, गोल सा, जिसपर सिंदूर पुता है कि सब कुछ लाल नजर आता है। देवी का वही प्रतीक है। उसी की पूजा करते हैं भक्त।

[Slide Show] माता पार्वती के उदात्त और प्रेममयी स्वरूप नंदिनी की पूजा का स्थल है नंदिकेश्वरी मंदिर। दीवारों पर माता के विभिन्न रूपों के बड़े सुंदर चित्र उसी तरह सजाये गये हैं, जिस तरह की कल्पना उनकी पुराणों में की गयी है।

मंदिर परिसर में वृक्ष भी है और उसपर लिपटे मनौती के धागे भी। भक्तिमय वातावरण है वहां। भक्ति है, भय नहीं है। माता पार्वती के उदात्त और प्रेममयी स्वरूप नंदिनी की पूजा का स्थल है नंदिकेश्वरी मंदिर। दीवारों पर माता के विभिन्न रूपों के बड़े सुंदर चित्र उसी तरह सजाये गये हैं, जिस तरह की कल्पना उनकी पुराणों में की गयी है।

कल प्रेमसागर अपना सामान यहीं रख कर आसपास के एक दो अन्य शक्तिपीठों की पदयात्रा करेंगे और वहां से किसी वाहन द्वारा वापस लॉज में लौट आयेंगे। “भईया, सामान नहीं रहेगा तो चलना भी तेज तेज हो पायेगा।” – प्रेमसागर ने मुझे अपनी कल की स्ट्रेटेजी बताई। वे ट्रेनों और बसों के समय की जानकारी और किराया भी पता कर चुके हैं।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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