दैनिक दूध के विकल्प की तलाश


दैनिक जरूरतें हैं – आटा, दाल, चावल, सब्जी, दूध। जब इनकी कीमतें बढ़ती हैं तो उनको सस्ता पाने के विकल्प तलाशने में लग जाते हैं हम। यह पोस्ट उसी कवायद पर है।

अमूल ने दूध के रेट बढ़ा दिये हैं। पाउच का दूध अब मुझे 68 रुपये किलो मिल रहा है। हम दो लोग गांव में रहते हैं और हमारी दूध की जरूरत कम है। फिर भी एक किलो रोज लग ही जाता है। बहुत कोशिश करते हैं कि ज्यादा से ज्यादा ग्रीन चाय, बिना दूध वाली पी जाये, पर तब भी दिन में पांच छ बार दूध वाली चाय बनती ही है। कोई न कोई आ जाता है। उन्हें चाय पिलाने के साथ खुद भी पीते हैं। दूध की खपत, जितनी है, कोशिश की पर पाया कि रोकी नहीं जा सकती।

गांव में रहते हुये दूध को ले कर परेशानी?! लोग चट से सलाह देते हैं कि एक गाय पाल लीजिये। जिस आदमी ने जिंदगी भर रेलगाड़ी हाँकी हो, उसे गाय पालने को कहना उपयुक्त सलाह नहीं है। कोई अन्य गाय पाल रहा हो और उसपर ब्लॉग लिखना हो – वह मैं कर सकता हूं। खुद गाय पालना नहीं हो पायेगा। … और चूंकि कोई बहुत बाध्यता नहीं है इसे बतौर व्यवसाय करने की, इस काम में हाथ लगाना उचित नहीं लगता।

मैं अमूल के पाउच का बाजार का विकल्प तलाशने निकला। यहां बाल्टा वाले दूध इकठ्ठा कर उसे स्थानीय लोगों को बेचने और बचे दूध को बनारस बेच कर आने का काम करते थे। मेरे आसपास ही तीन चार दर्जन बाल्टा वाले सक्रिय थे। पर पिछले एक डेढ़ साल में विभिन्न डेयरियों के दूध कलेक्शन सेण्टर खुल गये हैं। उनमें दूध की गुणवत्ता के आधार पर को-ऑपरेटिव से जुड़ने वाले दुधारू पशु पालकों को पेमेण्ट मिलता है। सो, बाल्टा वालों का बिजनेस बंद हो गया है। पाउच के दूध का विकल्प तलाशने के लिये मैंने दूध कलेक्शन सेण्टर का रुख किया। क्या पता सेण्टर वाला अपने क्रय मूल्य में कुछ जोड़ कर मुझे नियमित दूध देने को तैयार हो जाये।

अनुज यादव, अपने अमूल के मिल्क कलेक्शन सेण्टर पर

घर से 800 मीटर दूर अमूल का कलेक्शन सेण्टर है। डेयरी सप्ताहिक आधार पर सेण्टर पर दूध जमा करने वाले सदस्यों को पेमेण्ट करती है। पर पशुपालक दैनिक आधार पर पेमेण्ट चाहते हैं। लिहाजा, कलेक्शन सेण्टर के अनुज यादव ने बताया कि सेण्टर को चलने में दिक्कत आ रही है। ज्यादा लोग नहीं जुड़ पा रहे। उस सेण्टर पर मैंने अनुज से बात की तो वे तैयार हो गये मुझे खुदरा दूध देने को। उन्होने मुझे अमूल की वह लिस्ट भी दिखाई, जिसमें अमूल के रेट लिखे हैं। अमूल दूध के फैट और एसएनएफ प्रतिशत के आधार पर पेमेण्ट करता है को‌-ऑपरेटिव मेम्बर्स को। उस लिस्ट के अनुसार मुझे 6प्रतिशत फैट वाला भैंस का दूध 55 रुपये में मिल जाना चाहिये। कुल मिला कर अमूल के पाउच के रेट से लगभग 20 प्रतिशत की बचत। मुझे लगा कि मैंने दूध के दाम की मंहगाई का हल निकाल लिया है। … आखिर मुझे दूध चाहिये। अमूल का आकर्षक पाउच या पॉश्चराइजेशन की प्रक्रिया का लाभ नहीं। मैं अपने डोलू में दूध ले कर आ सकता हूं और घर लाने पर उसे तुरंत उबाल कर कीटाणुरहित बना सकता हूं। दो घण्टे पहले गाय या भैंस के थन से निकला दूध बेहतर है अगर वह सस्ता मिल सके।

पर वैसा हुआ नहीं। अनुज के पास जब दूध लेने गया तो भैंस का दूध 4.4प्रतिशत फैट वाला था। जरूर किसान ने भैंस को पर्याप्त पौष्टिक चारा नहीं खिलाया था। मुझे वह दूध 45 रुपये प्रति किलो का पड़ा।

अगर डेयरी अच्छा रेट लगा कर दूध खरीद रही है, तो किसानों/ग्वालों को बेहतर पशुपालन की ओर प्रवृत्त होना चाहिये और उन्हें पर्याप्त चूनी-चोकर-चारा-पशु आहार खिलाना चाहिये। वह सोच लोगों में नहीं है। पशुओं को घर का लेफ्ट-ओवर ही मिलता है सामान्यत:। उन्हें अच्छे से पालने और उससे लाभ उठाने की सोच की ओर लोग प्रवृत्त हो रहे हैं? लगता नहीं। :sad:


अनुज की दुकान से आगे चला तो साइकिल की दुकान पर पंक्चर बनवाते समय उमरहा गांव के अनिल शर्मा मिल गये। साइकिल में धीरे धीरे हवा निकल रही थी और चेक करने पर बड़ी मुश्किल से पता चला साइकिल में बहुत महीन पंक्चर था। देर तक इंतजार करने में एक बुलबुला निकलता था पानी में ट्यूब चेक करते समय। अनिल शर्मा अपनी साइकिल बनवाने आये थे और मेरी साइकिल में पंक्चर तलाशते दुकानदार को ध्यान से देख रहे थे। बोले – ई चोर पंचर बड़ा दु:ख देथअ (चोर पंक्चर बहुत दुख देता है। लगता है पंक्चर नहीं है पर बार बार हवा निकल जाती है)।

अनिल ने कहा – चच्चा, ई अमूल वाले के छोडअ। ई सरये अंगरा दर्रत हयें।

चोर पंक्चर – पहली बार यह टर्मिनॉलॉजी सुनी मैंने। अपनी पॉकेट नोटबुक में मैंने यह शब्द लिखा और इसी के साथ अनिल शर्मा से बातचीत प्रारम्भ हो गयी।

यह जानने पर कि मैं दूध के लिये विकल्प तलाश रहा हूं, अनिल ने कहा – चच्चा, ई अमूल वालन के छोडअ। ई सरये अंगरा दर्रत हयें (चाचा, इन अमूल वालों को त्याग दीजिये, ये आप पर अंगारे मसल रहे हैं)।

अनिल के अनुसार मैं तितराही के मोड़ पर मड़ैयाँ डेयरी पर जाऊं – “वह कलेक्शन सेण्टर अपने मिल्क प्रॉसेसिंग प्लांट के लिये दूध खरीदता है और आपको पचपन रुपये किलो दे देगा भैंस का दूध। गाय का चालीस-पैंतालीस रुपये में। बढ़िया शुद्ध दूध।” अनिल खुद अपना गाय का दूध उस डेयरी पर दे कर आ रहे थे।

अनिल ने बताया कि उनके पास चार गायें हैं। गाय पालन के धंधे के इतर हेजिंग के लिये उन्होने मुर्गीपालन भी शुरू किया है। गाय के व्यवसाय में घाटा हो तो मुर्गी से पूरा हो जाये। मोबाइल फोन अनिल के पास नहीं है। उन्होने कहा – “दिन भर काम में निकल जाता है। किसी से बात की फुर्सत कहां है, चच्चा! यह तो आज साइकिल बिगड़ गयी तो यहां आया हूं, वर्ना कहीं आना-जाना भी नहीं होता। घर में पत्नी, दो बच्चें और माता-पिता हैं। सब मेरे काम पर ही निर्भर हैं। काम तो करना ही होता है।”

मैंने तय किया कि मैं अनुज की अमूल डेयरी को भी टटोलूंगा और तितराही वाली मड़ैयाँ डेयरी को भी।


मड़ैयाँ डेयरी के अजय पटेल।

तितराही वाली मड़ैयाँ डेयरी मेरे घर से डेढ़ किमी दूर है। नेशनल हाईवे पर ही उसका बोर्ड दिखता है। मैं वहां गया तो वहां के कर्ताधर्ता अजय पटेल मिले। डेयरी पर बाहर बोर्ड पर समय लिखा है सवेरे 8 से 11 बजे तक। अजय ने मुझे बताया कि वे साढ़े छ बजे आते हैं सेण्टर खोलने। पास के पठखौली गांव में रहते हैं। पच्चीस दिन पहले खुली है उनकी डेयरी। दूध ले कर वे कपसेटी के अपने प्लांट में भेजते हैं। वहां पनीर, छेना, पेड़ा आदि बनाया जाता है। शादी-विवाह में सप्लाई भी होता है और बचा दूध पराग-अमूल आदि व्यवसायिक संस्थानों को बेचा जाता है। कपसेटी में उनकी खुद की जरूरत 10 हजार लीटर की है।

अजय ने अपने सेण्टर पर मुझे फ्रीजर भी दिखाया जिसमें 600 लीटर भैंस और 200लीटर गाय का दूध जमा करने की क्षमता है। एक जेनरेटर भी पास में पड़ा था, बिजली न आने पर शीतक को चालू रखने के लिये। मेरा सोचना है कि इस तरह के कई और कलेक्शन सेण्टर भी होंगे मड़ैय्या डेयरी के।

मैंने अजय को कहा कि एक किलो भैंस का दूध ले कर मैं अजमाना चाहता हूं। पर मेरे पास लेने के लिये बर्तन नहीं है। उसका उपाय अजय ने एक प्लास्टिक की पन्नी में एक किलो दूध मुझे दे कर किया। मैंने पचपन रुपये मोबाइल एप्प के माध्यम से उन्हें दिये। अजय कैश पसंद करते हैं। “कलेक्शन सेण्टर पर दूध देने वालों को कैश ही देना होता है। तो जरूरत कैश की होती है।” – अजय ने कहा।

अनुज और अजय की डेयरी कलेक्शन सेण्टर के दूध घर पर गर्म किये गये। क्रमश: 4.4प्रतिशत और 6.7प्रतिशत फैट के अनुसार ही मलाई दूध में पड़ी। दो दिन की विकल्प तलाश का परिणाम यह हुआ कि दो ठीकठाक विकल्प मुझे मिल गये।

अगर मैंं शहर में रह रहा होता तो ये विकल्प मुझे नहीं मिलते। पर इसका अर्थ यह नहीं कि गांव शहर से बेहतर है। कुछ शहर में अच्छा है, कुछ गांव में। मैं गांव में रहते हुये डिस्टोपिया से यूटोपिया की विभिन्न कल्पनाओं के बीच इधर उधर होता रहता हूं। पर शायद बेहतर यह है कि अपने आसपास के परिदृष्य का परिवर्तन मनोविनोद की भावना के साथ देखा जाये। अनुज, अनिल और अजय – सब से मिला जाये। मैत्री की जाये और जो कुछ हो रहा है, उसमें रस लिया जाये। दूध के विकल्प की तलाश उसी रस लेने का एक जरीया होना चाहिये।

मैं अपनी यह बात अपनी पत्नीजी से कहता हूं तो उनका उत्तर होता है – यही तो मैं तुमसे जिंदगी भर कहती रही। पर तुम्हारे पास तो रेलगाड़ी हाँकने के अलावा कोई सोच थी ही नहीं। यह तो अब कुछ इधर उधर देखने लगे हो! पत्नीजी को तब भी मुझसे कष्ट था, जब मैं घर की समस्याओं की ओर देखता भी नहीं था और अब भी है जब मैंं साइकिल उठा कर आसपास दूध का विकल्प देख रहा हूं। :-)

अगले दिन –

अनुज यादव ने 6.7प्रतिशत फैट वाला दूध मेरे लिये रखा था। मैंने अमूल की कलेक्शन की दर वाली लिस्ट के आधार पर उनसे बात की। उन्हें कहा कि रोज मुझे 6% से अधिक फैट वाला भैंस का दूध दें। मोटे आधार पर तय किया जाये तो पचपन रुपया लीटर की रेट से मुझे देने पर अनुज को 5 प्रतिशत से ज्यादा मिलेगा जब कि बकौल उनके अमूल दो प्रतिशत देता है।

अनुज ने मेरा प्रस्ताव मान लिया है। वे मुझे 6+ प्रतिशत वसा का दूध 55 रुपये किलो की दर से देंगे और महीने के हिसाब से उसका पेमेण्ट लेंगे। मुझे लगा कि इस सौदे से अनुज भी प्रसन्न हैं और मैं भी। हम दोनो के लिये यह विन-विन सिचयुयेशन (win-win situation) है। :-)


तो, यह थी दैनिक दूध के विकल्प की तलाश!


स्वास्थ्य का स्रोत – घर का बगीचा


हम दुखी थे कि इस साल जाने क्यों डेल्हिया के पौधे पनपे नहीं। नवम्बर में सही समय पर उनकी नर्सरी बना दी थी रामसेवक जी ने। पर शायद सर्दी ठीक ठाक नहीं पड़ी। अलग अलग पौध को केवल समय, खाद, पानी ही नहीं चाहिये होता। सही मौसम भी बहुत जरूरी होता है। खेतों में गेंहूं की फसल भी सर्दी कम पड़ने से खतरे में थी, पर दिसम्बर के उत्तरार्ध में पाला पड़ने से सम्भल गयी। वही लाभ शायद डेल्हिया को नहीं मिला।

रामसेवक जी ने बताया कि बनारस में मण्डुआडीह की नर्सरी वाले भी परेशन हैं। उनका डेल्हिया तैयार नहीं हो सका। अब बाहर से उन्होने पौधे मंगाये हैं, जिनमें फूल लगना शुरू हुये हैं। बकौल रामसेवक “बहुत मंहगे बिक रहे हैं” डेल्हिया के पौधे।

नर्सरी से खरीद कर लाया गया डेल्हिया

हम लोगों ने आकलन किया कि कम से कम कितने पौधे खरीदे जायें। रामसेवक जी को उतने लाने को कहा गया। रामसेवक जी सप्ताह में छ दिन बनारस के संस्थानों और बंगलों में काम करते हैं। रविवार को उनका छुट्टी का दिन होता है। उस दिन हमारे घर पर सवेरे कुछ घण्टे बगीचे में देते हैं। एक एक मिनट उनका दक्षता से काम करते बीतता है। रविवार को हमने कहा था उनसे डेल्हिया के पौध लाने को। कल उन्होने बनारस से खरीदा होगा और आज सवेरे वे घर पर आये उन्हें रोपने के लिये।

घर का बगीचा शतायु बना सकता है। इस लिये मुझे भी चित्र खींचने या ब्लॉग पोस्ट लिखने की बजाय दिन में दो घण्टा बगीचे में काम करते व्यतीत करना चाहिये। यह मैं कई बार सोचता हूं। कभी शुरुआत भी करता हूं। पर फिर वह उत्साह सतत कायम नहीं रह पाता। 😦

सवेरे का समय। पेड़ों से छन कर आती गुनगुनी धूप और तेजी से अपने दक्ष हाथों प्लास्टिक के गमलों से निकाल कर क्यारी में रोपते रामसेवक। बहुत अच्छा लग रहा था मुझे देखना। फुर्ती से उन्होने सभी पौधे रोपे। उनको पानी दिया। तब तक मेरी पत्नीजी चाय बना लाई थीं। पी कर उन्होने हम को नमस्कार किया – “चलूं साहब, पैसेंजर आने का समय हो गया है।”

सवेरे का समय। पेड़ों से छन कर आती गुनगुनी धूप और तेजी से अपने दक्ष हाथों प्लास्टिक के गमलों से निकाल कर क्यारी में रोपते रामसेवक। बहुत अच्छा लग रहा था मुझे देखना।

सवेरे की मेमू पैसेंजर प्रयाग सिटी से आती है। मेमू ट्रेन है तो समय पर ही आती है। रामसेवक हमारे बगल में ही रहते हैं। रेलवे स्टेशन भी दो-तीन सौ कदम पर है। पास पास में होने के कारण उन्होने पौधे भी रोप दिये, अपने घर से सामान ले कर फुर्ती से स्टेशन की ओर भी निकल लिये। पचास की उम्र होगी रामसेवक की। पर फुर्ती गजब की है। छोटा शरीर। तितली की तरह की चपलता है उनके काम करने में।

शरीर की तितली सी चपलता का राज बगीचे में काम करना है। यह मुझे समझ आता है। थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि मेरी पत्नीजी घर के पौधों को पानी डाल रही हैं। कण्डाल से एक छोटी प्लास्टिक की बालटी में पानी ले कर वे हर पौधे के पास जाती हैं और उसकी जरूरत अनुसार पानी उनकी जड़ों में उड़ेलती हैं। पानी कण्डाल से लेने, चलने, झुकने आदि में जो व्यायाम है, वह पत्नीजी के स्वास्थ्य को पुष्ट करता है। बगीचे में यह धीमे धीमे किया जाने वाला श्रम उन्हें दीर्घायु बनाने का निमित्त बन सकता है।

बगीचे में समय बिताते रीता पाण्डेय दिन भर में दस हजार से ज्यादा कदम चलती हैं।

बगीचे में समय बिताते रीता पाण्डेय दिन भर में दस हजार से ज्यादा कदम चलती हैं।

घर का बगीचा शतायु बना सकता है। इस लिये मुझे भी चित्र खींचने या ब्लॉग पोस्ट लिखने की बजाय दिन में दो घण्टा बगीचे में काम करते व्यतीत करना चाहिये। यह मैं कई बार सोचता हूं। कभी शुरुआत भी करता हूं। पर फिर वह उत्साह सतत कायम नहीं रह पाता। :sad:

लम्बा जीना है और सार्थक जीना है तो बगीचे की शरण जाना होगा।


प्रेमसागर का कहना है वे अब शक्तिपीठों की पदयात्रा करेंगे


फरवरी 5, 2023 रात्रि –

प्रयाग से माघ मेला क्षेत्र में रुकने के बाद प्रेमसागर आज शाम मेरे घर आये। आज उन्होने माघी पूर्णिमा स्नान किया संगम पर। उसके बाद निकलते निकलते भी शाम चार बज गये। साढ़े छ बजे वे गोपीगंज पास हो रहे थे। आठ बजे मेरे घर पंहुचे।

प्रेमसागर वे सज्जन हैं जिन्होने द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा सम्पन्न की है। उनके साथ करीब तीन हजार किलोमीटर की डिजिटल यात्रा मेरे ब्लॉग ने भी की है। ब्लॉग पर 100 पोस्टें उस यात्रा की हैं।

प्रेमसागर पाण्डेय

शाम के भोजन के समय प्रेमसागर ने बताया कि वे सभी शक्तिपीठों की पदयात्रा करने की सोच रहे हैं। उनका सोचना एक संकल्प सरीखा होता है। इन इक्यावन शक्ति पीठों में कई अन्य देशों में हैं – पाकिस्तान, नेपाल, बांगला देश और श्रीलंका में। मैंने उन्हें सुझाया कि आदिशंकराचार्य ने अठारह शक्तिपीठों की यात्रा की थी भारत में धर्म की पुन: स्थापना/विजय के दौरान। उनको उन्होने महाशक्तिपीठ कहा। उसपर उनका एक स्त्रोत भी है। अच्छा हो कि प्रेमसागर आदिशंकर के उन महाशक्तिपीठोंं की पद यात्रा करें और उस यात्रा के दौरान सहूलियत से आसपास के अन्य शक्तिपीठों की भी यात्रा सम्पन्न करें। यह विचार प्रेमसागर को रुचा प्रतीत होता है।

गुड्डू भईया जी के साथ प्रेमसागर। प्रयागराज के माघमेला क्षेत्र में।

प्रेमसागर ने अन्य लोगों से भी चर्चा की है। वे प्रयाग के गुरूजी (गुड्डू मिश्र, भाई जी का दाल भात परिवार वाले और उनके गुरु के गुरु अवधूत भगवान राम जी) का नाम ले रहे थे, जिनसे वे माघ मेला क्षेत्र में मिल आये हैं। गुड्डू मिश्र नैनी में रहते हैं और प्रयाग में लेटे हनुमानजी के समीप दाल-भात का भण्डारा करते हैं।

प्रेमसागर के अनुसार शाक्त पीठों की यात्रा के अपने नियम हैं। उनमें कांवर ले कर चलने की आवश्यकता नहीं है पर पदयात्री को सिर और दाढ़ी मुंड़ा कर यात्रा करनी होती है। जहां तक हो रक्तवर्ण कपड़े पहनने होते हैं। लाल चंदन, रोली का तिलक लगाते हैं और किसी न किसी मंत्र का जाप करते चलते हैं पदयात्री।

उनका विचार आगामी चैत्र मास में नवरात्रि के दौरान यात्रा प्रारम्भ करने का है।

पिछली द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में वे अकेले निकले थे और उनके पास कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं था। महादेव लोगों को जोड़ते गये और यात्रा का संकल्प सम्पन्न हुआ। इस बार वे ज्यादा पुख्ता जमीन पर हैं। वे डेढ़ दो सौ लोगों के सघन जुड़ाव रखते हैं जो उन्हें इस पदयात्रा में सहायता कर सकते हैं। वे लोग अगर सक्षम नहीं भी होंगे तो अन्य लोगों को जानते होंगे जिनसे माँ जगदम्बा सहयोग करा लेंगी। … जितनी बात हुई, उससे लगा कि प्रेमसागर यात्रा की ज्यादा प्लानिंग के फेर में नहींं हैं। एक दिन यात्रा शुरू कर देंगे और बस वह होती चली जायेगी।

अढ़तालीस साल का यह व्यक्ति मुझे हमेशा अजीब लगता है। अजीब और धुन का पक्का। भगवान महादेव के गोल में ऐसे ही अजीब लोग होते हैं। मैंने प्रेमसागर से ज्यादा किंतु-परंतु वाली बात नहीं की। उसका कोई फायदा नहीं।

मेरे घर भोजन करते प्रेमसागर

अभी प्रेमसागर ने भोजन किया है। हमारे घर पर तो बहुत ही सादा भोजन था। दाल, रोटी, चावल और सब्जी; बस। घर की ऊपर की मंजिल पर कमरे में प्रेमसागर सोने गये हैं। कल उन्हें रींवा जाना है। वहां वे एक गौशाला स्थापित करने जा रहे हैं।

खैर, मुझे उनका शक्तिपीठ पदयात्रा वाली बात ज्यादा रुच रही है। हो सकता है उस यात्रा में कुछ दूर तक मेरा भी जुड़ाव हो, डिजिटल माध्यम से। कितना और कैसे होगा, वह तो भगवान महादेव और माता जगदम्बा ही जानें।

फरवरी 6, 2023 सवेरे –

प्रेमसागर को सवेरे चाय बना कर उनके कमरे में देने गया। पश्चिम में चांद क्षितिज पर थे। कोहरा था पर जमीन से सटा। आसमान साफ था सो चांद दिख रहे थे। सूरज उगने को ही थे तो उषाकाल की रोशनी भी थी। मोहक दृश्य था। अगर प्रेमसागर को चाय देने न निकलना होता तो यह नहीं देख पाता।

पश्चिम में चांद क्षितिज पर थे। कोहरा था पर जमीन से सटा। आसमान साफ था सो चांद दिख रहे थे। मोहक दृश्य था।

सवेरे साढ़े आठ बजे नाश्ता करा कर प्रेमसागर को रवाना किया। मेरा वाहन चालक उन्हें औराई तक छोड़ने गया। वहां से ऑटो पकड़ कर उन्हे गोपीगंज जाना है और गोपीगंज से रींवा। अब, अगर उनकी शक्तिपीठों की यात्रा होती है तो चैत्र मास के नवरात्रि में 22-23 मार्च को सम्भवत: उनसे मिलना हो।

मेरी पत्नीजी ने प्रेमसागर को विदाई की भेंट दी। मैं गले मिला। … अच्छा लगा प्रेमसागर का आना।

सवेरे साढ़े आठ बजे नाश्ता करा कर प्रेमसागर को रवाना किया। मेरा वाहन चालक उन्हें औराई तक छोड़ने गया।

हर हर महादेव!


आदिशंकर विरचित अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र (विकिपेडिया से)

लङ्कायां शङ्करीदेवी कामाक्षी काञ्चिकापुरे ।
प्रद्युम्ने शृङ्खलादेवी चामुण्डी क्रौञ्चपट्टणे ॥ १ ॥
अलम्पुरे जोगुलाम्बा श्रीशैले भ्रमराम्बिका ।
कोल्हापुरे महालक्ष्मी मुहुर्ये एकवीरिका ॥ २ ॥
उज्जयिन्यां महाकाली पीठिकायां पुरुहूतिका ।
ओढ्यायां गिरिजादेवी माणिक्या दक्षवाटिके ॥ ३ ॥
हरिक्षेत्रे कामरूपी प्रयागे माधवेश्वरी ।
ज्वालायां वैष्णवीदेवी गया माङ्गल्यगौरिका ॥ ४ ॥
वारणाश्यां विशालाक्षी काश्मीरेतु सरस्वती ।
अष्टादश सुपीठानि योगिनामपि दुर्लभम् ॥ ५ ॥
सायङ्काले पठेन्नित्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । सर्वरोगहरं दिव्यं सर्वसम्पत्करं शुभम् ॥ ६ ॥


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