भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
मैं राजनीति में सामान्य से कम दिलचस्पी रखता हूं। कई बार मुझे खबरें पता ही नहीं होती – वे खबरें जो आम चर्चा में होती हैं। और जब कोई मुझे टोकता है – यह टोकना अब उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है – तब एक बारगी लगता है कि मुझे इतनी जल्दी और इतनी गहराई से वानप्रस्थ में नहीं जाना चाहिये। पर अंतत: मेरा उदासीन मन हावी हो जाता है।
लेकिन वह मन महाराष्ट्र के सत्तापलट जून के तीसरे पीरियड में अचानक पलट गया। बीस-इक्कीस जून से मुम्बई-सूरत-गुवाहाटी-गोवा और पुन: मुम्बई की हलचल काफी हद तक टेलीवीजन पर देखी। टेलीवीजन का रिमोट जो मैं सामान्यत: छूता नहीं था, दिन में काफी समय मेरे हाथ में रहा।
चीजें रोचक थीं। शिवसेना की कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी से बेमेल अघाड़ी कभी भी ठीक नहीं लगी थी मुझे और यह अवसर था कि वह ‘अश्लील’ प्रयोग खत्म होने की सम्भावना बन रही थी। एक आम नागरिक की तरह मैंने घटनाक्रम को रीयल टाइम ट्रैक किया।
यहां उत्तर प्रदेश में भी कुछ वैसा ही है। सवर्ण वोट को टेकेन फॉर ग्राण्टेड मानने की सोच है भाजपा स्टेटेजी-नियंताओं में। अपने इलाके में पिछले पांच छ साल से देख रहा हूं कि सांसद-विधायक के लिये कोई भी लैम्प-पोस्ट खड़ा कर देते हैं और यह मान कर ही चलते हैं कि भाजपा का सवर्ण वोट तो मिलेगा ही।
पर अंतिम दिन – कल शाम/रात जो ड्रामा हुआ; वह जमा नहीं। यह तो साफ लगा कि जो जोड़ तोड़ हो रही थी, उसमें फड़नवीस को पूरी तरह लूप में नहीं रखा गया था। फड़नवीस को दिल्ली दरबार द्वारा मना कर शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा का ‘अचम्भा’ जग जाहिर करना मजेदार लगा। पर उसके बाद नड्डा-अमित शाह का बेचारे फड़नवीस को कोंच-ठेल कर उपमुख्यमंत्री पद के लिये मनाना जमा नहीं। यह लग गया कि पूरी कवायद में फड़नवीस को मोहरे की तरह भाजपा ने प्रयोग किया है।
मराठा वोट बैंक साधना, ठाकरे और शरद पवार को ठिकाने लगाना – यह सब ठीक है। और जिस तरह से बेमेल अघाड़ी बना कर ढाई साल से जनता के मेण्डेट का मजाक बन रहा था; यह करना उचित ही था। पर मराठा वोटबैंंक साधने के लिये फड़नवीस को दरकिनार करना सही नहीं है। फड़नवीस को लूप में रखना था…
असल में भाजपा के साथ यही दिक्कत है। कुछ वर्गों को वह अपना बंधुआ मान कर चलती है। यह तो सही है कि महाराष्ट्र में बाभन तीन परसेण्ट ही हैं और वहां वोट बैंक के रूप में मराठा/ओबीसी को फड़नवीस के ऊपर तरजीह दिये जाने को भाजपा मास्टरस्ट्रोक मान कर चल सकती है। पर बांभन को बंधुआ मानना खराब तो लगता ही है।
यहां उत्तर प्रदेश में भी कुछ वैसा ही है। सवर्ण वोट को टेकेन फॉर ग्राण्टेड मानने की सोच है भाजपा स्टेटेजी-नियंताओं में। अपने इलाके में पिछले पांच छ साल से देख रहा हूं कि सांसद-विधायक के लिये कोई भी लैम्प-पोस्ट खड़ा कर देते हैं और यह मान कर ही चलते हैं कि भाजपा का सवर्ण वोट तो मिलेगा ही। सो खड़ा करते हैं केवट-पासी-ओबीसी या कोई अन्य जाति का खम्भा। उसे उसकी बिरादरी के अलावा कोई जानता नहीं और उस लैम्पपोस्ट को अपनी बिरादरी के अलावा किसी को देखने की जरूरत ही नहीं। बाभन ठाकुर भेड़ें है, जो साल दर साल चुनाव में कमल पर ठप्पा मारने की मजबूरी रखते हैं। मैं भी, थर्ड-क्लास उम्मीदवार के बावजूद मोदी के नाम पर वोट देता आया हूं और वह उम्मीदवार जीतने के बाद (उसके पहले भी) कभी दिखा नहीं। और स्थानीय स्तर पर; जहां जीते उम्मीदवार की प्रो-एक्टिविटी की जरूरत होती है; कोई काम होता ही नहीं। :sad:
भेड़ों को साधने की सोच वाली राजनीति अंतत: समाज के भले के लिये नहीं होती, वह मीडियॉक्रिटी को बढ़ावा देती है। पहले की सरकारें एक धर्म के तुष्टीकरण का खेल खेलती रहीं। भाजपा अगर वर्गपोषण की राजनीति पर चली तो उसमें और अन्य में क्या फर्क होगा?
खैर, आगे देखें कि क्या कुछ होता है महाराष्ट्र की या देश की राजनीति में।
गांव, जहाँ जीवन अब भी (कमोबेश) कृषि आर्धारित है; मौसम बहुत मायने रखता है। आज भी यहां मौसम के एप्प के हिसाब से नहीं, नक्षत्र के हिसाब से मृगशिरा या देशज भाषा में ‘मिरघिसिरा’ तपता है। ग्रामीण जीवन में चांद्र मास, नक्षत्र, राशि, तारे (सुकुआ, सप्तर्षि, ध्रुव आदि) अपनी पैठ अभी भी बनाये हैं। यूट्यूब और ह्वाट्सएप्प के युग में भी! घाघ और भड्डरी की कहावतें कोट करने वाले अभी भी हैं – उनकी संख्या भले कुछ कम हुई हो। वैसे तो लगता है कि क्लाइमेट चेंज के युग में उनकी लोकोक्तियों का नया रूप भी बनना चाहिये।
जून 15 2022 –
इस साल तपन कुछ ज्यादा ही चली है। अभी तापक्रम 44-45 डिग्री सेल्सियस बना हुआ है। आद्रता भी है। उसके कारण 44 डिग्री का प्रभाव 49 डिग्री होता है। ऐसे में भी कल पुन्नवासी (पूर्णिमा) को अगियाबीर के दो मित्र – गुन्नीलाल और प्रेमनारायण जी – सवेरे विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिये निकले थे। एक कप चाय मेरे यहां पीते हुये गये। इतनी तपन में भी, जब पूरा वायुमण्डल झऊंस रहा है, लोग मातृशक्ति के प्रतिश्रद्धा रखते हुये अस्सी किलोमीटर मोटर साइकिल चलाते पंहुचते हैं। गजब श्रद्धा, गजब लोग। विंध्यवासिनी माँ से शायद बारिश की मांग करने गये होंगे। मां जब बारिश भेज देंगी तो खेती बहेतू जानवरों और घणरोजों से बचाने के लिये फिर एक चक्कर लगायेंगे माता के दरबार मेंं। मौसम, उद्यम, श्रद्धा और भग्वत्कृपा – सब साथ साथ चलते हैं यूपोरियन गांव में!
अभी तापक्रम 44-45 डिग्री सेल्सियस बना हुआ है। आद्रता भी है। उसके कारण 44 डिग्री का प्रभाव 49 डिग्री होता है। ऐसे में भी कल पुन्नवासी को अगियाबीर के दो मित्र – गुन्नीलाल और प्रेमनारायण जी – सवेरे विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिये निकले थे। एक कप चाय मेरे यहां पीते हुये गये।
गुन्नीलाल जी ने लौट कर बताया कि वहां विंध्याचल में बहुत भीड़ थी। विंध्यवासिनी कॉरीडोर का काम चल रहा है तो बहुत अव्यवस्था भी थी। वहां उन्होने कुछ भोजन-जलपान नहीं किया। पण्डा जी ने अपने फ्रिज से एक बोतल पानी पिलाया। कलेवा बंधाई बीस रुपया दिया उन्हें। दर्शन किये जैसे तैसे और लौट पड़े। वापसी में टेढ़वा पर पेड़ा खाये सौ सौ ग्राम। हनुमान जी के मंदिर में कथा चल रही थी, वह दस मिनट सुनी। घर आ गये। बकौल गुन्नी पांड़े; लोग दूर दूर से कष्ट सह कर त्रिवेणी स्नान करने, विंध्यवासिनी और बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आते हैं। वे लोग तो तीन घण्टे और सौ ग्राम टेढ़वा के पेड़ा खा कर दर्शन कर लिये। …. यह श्रद्धा होती है। पैंतालीस डिग्री के तापक्रम पर भी चैतन्य श्रद्धा!
इस श्रद्धा का पांच परसेंट भी मुझमें आ जाये!
जून 18 2022 –
मृगशिरा नक्षत्र लगा हुआ है। बाईस जून तक है पंचांग के हिसाब से। उसके बाद तेईस जून से आर्द्रा। तेईस के पहले ही एक दो शॉवर गिरने चाहियें। कब तक भूंजेंगे भगवान भास्कर। वे जो भांति भंति के भयंकर नरक बताये हैं हमारे पुराणोंं में – जिनमें शरीर को ग्रिल किया जाता है या जलते तेल में डाला जाता है – वे भयंकर नरक वैसे ही होते होंगे जैसा इस समय शरीर-मन-प्राण सह रहे हैं। रोज सुबह दोपहर शाम मोबाइल पर वेदर चैनल एप्प खोल कर देखा जा रहा है कि तापक्रम कुछ कम बता रहा है और/या बारिश के दो चार छींटों की भविष्यवाणी बन रही है या नहीं। अभी तक तो मायूसी ही हाथ लगी है।
एक परिवार जन लपेटा पाइप लगा रहा है बेहन की सिंचाई के लिये। उसके दिन तो बेहन और लपेटा पाइप में लिपटे हैं। उसके लिये यही विन्ध्यवासिनी हैं और यही टेढ़वा का पेड़ा!
मैं तो वेदर चैनल और तापक्रम के चक्कर में पड़ा हूंं, पर किसान अपने काम पर लग गया है। उसको कोई पगार या पेंशन तो मिलती नहीं। उसे तो खरीफ की फसल की तैयारी करनी ही है। मेरे घर के बगल में मेजर साहब का अधियरा धान के बेहन के लिये नर्सरी बना चुका है। उसके परिवार का एक नौजवान लपेटा पाइप लगा रहा है बेहन की सिंचाई के लिये। उसके दिन तो बेहन और लपेटा पाइप में लिपटे हैं। उसके लिये यही विन्ध्यवासिनी हैं और यही टेढ़वा का पेड़ा!
वह नौजवान लपेटा पाइप खोलते हुये मुझे सलाह देता है कि मैं भी एक ट्यूब-वेल बिठा दूं। बैठे बैठे पानी बेंच कर कमाऊं। उसके खेत तक नाली बनवा दूं, जिससे उसे भी आराम हो। लपेटा पाइप खोलने, लगाने का झंझट भी न हो।
धान की नर्सरी बनाने का उपक्रम।
“एक ट्यूब-वेल कितने में लगता है?” मेरे यह पूछ्ने पर वह ब्लैंक लुक देता है। उसे रुपया कौड़ी का हिसाब नहीं मालुम। जैसे मुझे भी धान के बेहन का खेत-पानी का हिसाब नहीं मालुम। हम सभी का दूसरे के काम का आकलन नहीं आता। पर हम सभी अपनी अज्ञानता में विशेषज्ञ बने घूम रहे हैं। वह तो फिर भी खाने भर को धान उपजा लेगा; मैं तो सिवाय ब्लॉग पोस्ट लेखन के और कुछ नहीं कर सकता!
खड़ंजा बनना प्रकृति से संस्कृति की ओर कदम है। और जब उस खडंजे के बीच, ईंटों के सांसर में, घास उगने लगती है तो संस्कृति का पुन: प्रकृति करण होने लगता है। संस्कृति और प्रकृति के बीच का सामंजस्य, माधुर्य ही गांव का प्लस प्वॉइण्ट है।
जून 23 22 –
मुझे गांव में रहते छ साल हो गये। अब कुछ दिन बाद आने वाला मानसून यहां का सातवां होगा। पहले मानसून में अनजाने मौसम और क्रियाकलाप की सनसनी भी थी और हम उसके लिये तैयार भी नहीं थे। हमेशा यह आशंका रहती थी कि कब कोई सांप घर में घुस कर किसी कोने में बैठा मिलेगा। घर के बाहर चलने के लिये रास्ते भी नहीं थे। पैर कीचड़ में सन जाते थे। वह साल अनुभव और कठिनाई का समांग मिश्रण रहा। उत्तरोत्तर हम मौसम परिवर्तन के अभ्यस्त होते गये। अब भी मानसून आने पर जीवन अस्तव्यस्त होता है, पर उसमें आश्चर्य के तत्व कम ही होते हैं। और जब आश्चर्य नहीं होता तो एक स्तर पर उसकी पूर्व तैयारी भी हो जाती है।
आश्चर्य और पूर्व तैयारी? कुछ ज्यादा तैयारी सम्भव ही नहीं है। यह गांव है, अरण्य तो नहीं पर अरण्य के तत्व तो हैं ही। मेढ़क आ गये मौसम की पहली बरसात के बाद। और बारिश भी क्या झमाझम थी। रात इग्यारह बजे हम शयन कक्ष से निकल कर अपने पोर्टिको में बैठे। पानी की फुहार कभी दक्षिण से उत्तर को थी और कभी उत्तर से दक्षिण को। छ्त के नीचे रह कर भी पूरा भीग गये हम। फिर ठण्ड कम करने को एक एक ग्लास दूध और स्नेक्स का सहारा लिया। रात बारह बजे पानी और हवा की आवाज के बीच झूमते पेड़ों को निहारना और बीच बीच में मेढ़क की आवाज सुनना एक अनूठा ही अनुभव है।
मेढ़क निकले तो सांप कहां पीछे रहेंगे? अगले दिन एक असाढ़िया सांप मेरे पैर के पीछे से निकल गया। सरसराता। मैंने तो देखा तब जब मित्र गुन्नीलाल पांड़े जी ने मुझे आगाह किया। बड़ा था। दो मीटर का। मोटा भी। अंदाज न हो तो उसकी कद काठी देख कर आदमी भय से जड़वत हो जाये। … ऐसे अनुभव शहर में नहीं ही मिलते। मुझे रेल के जीवन में कम ही मिले ऐसे अनुभव। उस हिसाब से नौकरी के चालीस साल पर पोस्ट रिटायरमेण्ट के छ साल भारी हैं।
जून 26 2022 –
निरुद्देष्य साइकिल चलाना अच्छा लगता है जब गर्मी और उमस के बाद बारिश के पहले की ठण्डक भरी सुबह हो। कल मैं गया एक दूसरे गांव की ओर। बसंतापुर को एक खड़ंजा जाता है। उसपर कुछ दूर बाद कच्ची सड़क है – या पगडण्डी। देखा उसपर म-नरेगा का काम चल रहा है। राधेश्याम पाल काम करा रहे थे। कुल छबीस लोग काम पर थे। सड़कों का बनना प्रगति है। खड़ंजा बनना प्रकृति से संस्कृति की ओर कदम है। और जब उस खडंजे के बीच, ईंटों के सांसर में, घास उगने लगती है तो संस्कृति का पुन: प्रकृति करण होने लगता है। संस्कृति और प्रकृति के बीच का सामंजस्य, माधुर्य ही गांव का प्लस प्वॉइण्ट है। अन्यथा नये जमाने की विकृतियां तो घेर-दबोच ही रही हैं।
बसंतापुर को एक खड़ंजा जाता है। उसपर कुछ दूर बाद कच्ची सड़क है – या पगडण्डी। देखा उसपर म-नरेगा का काम चल रहा है। राधेश्याम पाल काम करा रहे थे। कुल छबीस लोग काम पर थे।
बारिश में बसंतापुर जाने का रास्ता पुख्ता हो जायेगा! चौमासा कहता है हम अपने घर में दुबके रहें। म-नरेगा की सड़क जोड़ने की जद्दोजहद में लगी है। यह कशमकश ही जीवन है। मानसिक हलचल उसी उद्वेलन का दस्तावेजीकरण होना चाहिये। नहीं?
कल पीटर हिग्स की बायोग्राफी के बारे में मानसिक हलचल थी। लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर, गॉड पार्टीकल या पीटर हिग्स के बारे में लोगों को ज्यादा जिज्ञासा नहीं। उसकी बजाय गीतांजलि श्री की टूम्ब ऑफ सैण्ड पर बहुत चर्चा होती है। यद्यपि रेत समाधि और हिग्स बोसॉन – दोनो ही पढ़ने-समझने में कष्ट देते हैं। रेत समाधि तो पल्ले पड़ी नहीं। हो सकता है अनुवाद पढ़ने में समझ आये। पर हिंदी की किताब अंग्रेजी में पढ़ना कितना सही होगा?
मेरा विचार है कि बुकर या मेगसेसे पुरस्कार एक गिरोह के लोगों का उपक्रम है जो अपनी गोल के लोगों को प्रोमोट करता है। केजरीवाल, संदीप पाण्डेय, अरुंधति राय या अब गीतांजलि श्री उसी गोल के जीव हैं। हो सकता है मैं गलत होऊं। पर ‘मानसिक हलचल’ जो है सो है।
आज मन हुआ कि उन आसपास के चरित्रों को समेटा जाये, जो पिछले कुछ दिनों में मुझे दिखे।
इस्लाम
इस्लाम नाम का फकीर दिखा जो गांव की सड़क पर अकबकाया सा खड़ा था। वह तय नहीं कर पा रहा था कि किधर जाये। गांव में मैंने मुसलमान कम ही देखे हैं। दूर ईंटवा की मस्जिद से कभी कभी रात में अजान सुनाई पड़ती है। वहां गरीब तबके के मुसलमानों की बस्ती है। इसके अलावा गांव में कुछ नट परिवार रहते हैं जो मुसलमान बन जरूर गये हैं पर हैं वे जन जातीय। इस्लाम को मानते हुये कोई लक्षण उनमें नजर नहीं आते।
इस्लाम, फकीर
यह बंदा तो फकीर लग रहा था। बूढ़ा। दाढ़ी-मूछ और भौहें भी सफेद। तहमद पहने और सिर पर जालीदार टोपी वाला। बताया कि वह अंधा है। फिर भी मुझे लगा कि उसे आंख से थोड़ा बहुत दीखता होगा। उसके हाव भाव पूरे अंधे की तरह के नहीं थे। उसके हाथ में एक अजीब सी मुड़ी बांस की लाठी थी। कांधे पर भिक्षा रखने के लिये झोला। उसने बताया कि वह माधोसिन्ह का रहने वाला है। उसकी पत्नी भी साथ है। शायद रेलवे स्टेशन के आसपास कहीं बैठी हो। वह भोजन के जुगाड़ में निकला है। मैंने उसे दस रुपये दिये। पास में मुझसे बात करने रुके रवींद्रनाथ जी ने भी दस रुपये दिये। बीस रुपये में उनके भोजन का तो नहीं, नाश्ते का इंतजाम हो ही सकता था।
उसने अपना नाम बताया – इस्लाम। इस्लाम को बीस रुपये की भिक्षा मिल गयी और हमें यह संतोष कि बिना जाति-धर्म का भेद किये हमने दान दिया।
शिवशंकर दुबे
शिवशंकर दुबे
टिल्लू की दुकान के सामने मजमा लगा रखा था शिवशंकर दुबे ने। वे उमरहाँ के हैं। बातूनी। गंगा स्नान करने जाते हैं। रोज नहीं; कभी कभी नागा हो जाता है। मुझे देख अनवरत बोलने लगे। उनके गले से उलटे जनेऊ की तरह एक छोटी सी पीतल की शीशी लटकी थी। बताया कि उनके पिताजी की देन है। वे चार धाम की यात्रा करते समय इसे साथ ले गये थे और इसी में गंगोत्री का जल लाये थे। पिता की चिन्हारी के रूप में बंटवारे में यह उन्होने चुनी।
साथ में गंगा स्नान को विभूति नारायण उपाध्याय जा रहे थे। उन्होने मुझे बताया कि शिवशंकर नास्तिक है। घोर। नास्तिक पर गंगा स्नान को जाते हैं? अजीब लगा। मैं शिवशंकार से पूछ्ना चाहता था, पर शिवशंकर तो सिंगल ट्रैक आदमी हैं। वे अपनी ही कहते रहे। उनसे जान छुड़ाना कठिन हो गया! :lol:
टिल्लू की दुकान के सामने बतकही। दांये विभूति नारायण उपाध्याय, बीच में शिवशंकर दुबे और बांये टिल्लू।
धर्मेंद्र सिंह
बुलंदशहर के धर्मेंद्र सिंह कल औराई में एक कदम्ब के पेड़ के नीचे, अपना मोमजामा बिछाये बैठे दिखे। एक डोलू से निकाल कर दूध पी रहे थे। तीन चार दिन में वे दण्डवत यात्रा करते हुये 10 किमी की दूरी तय कार सके हैं। वे चंदौली से बुलंदशहर की दण्डवत पदयात्रा कर रहे हैं। मेरे द्वारा लिखी गयी पोस्ट के कारण वे प्रसन्न थे। उन्होने बताया कि वह उन्होने अपने फेसबुक पर शेयर भी कर दी है।
धर्मेंद्र सिंह कल औराई में एक कदम्ब के पेड़ के नीचे, अपना मोमजामा बिछाये बैठे दिखे। एक डोलू से निकाल कर दूध पी रहे थे।
कम चल पाने के बारे में उनका कहना था कि बारिश हो गयी। कल वे बारिश में भीग भी गये। आज रात में दस इग्यारह बजे आगे निकलने का विचार है – “सारी रात दण्डवत चलूंगा आज रात।”
धर्मेंद्र की टोन पश्चिमी उत्तर प्रदेश वाली है। पर वे उतने ही आत्मीय लगे, जितने यहां के लोग! पता नहीं आगे कभी उनसे सम्पर्क होगा या नहीं। वैसे जुनूनी व्यक्ति मुझे बहुत अच्छे लगते हैं।