टेला में तिलक


सब अलग अलग हो गये हैं, पर मेरा कुटुम्ब कुल मिला कर ढाई-तीन सौ लोगों का होगा। या ज्यादा ही बड़ा होगा। सुकुलपुर, तहसील मेजा, प्रयागराज का पुश्तैनी घर तो खण्डहर हो कर गिरा दिया गया है पर उसकी जगह नया बना नहीं। लोग आसपास इधर उधर बस गये हैं। कुछ लोग गांव में ही बना लिये हैं अपने मकान। कुछ प्रयागराज, मिर्जापुर, दिल्ली आदि में हैं। एक शाखा काण्डला चली गयी है और एक पुणे। पर लोग अब भी जुड़े हैं। यदाकदा मिल लेते हैं आपस में। और अब ह्वात्सएप्प है, वीडियो कालिंग है, फेसबुक है। लोगों के पास बोलने को कुछ नहीं होता तो गुड मॉर्निग, जै श्री राम, जै मातादी टाइप स्टेटस और कुछ इधर उधर के फार्वर्ड किये चित्र, वीडियो तो होते ही हैं।

वही सम्बंध हैं, फोन और सोशल मीडिया के माध्यम से; और वही आत्मीय जुड़ाव का तरीका रह गया है। बहुत से परिवारों-कुटुम्बों का वही जुडाव जरीया होगा। यही नियो-नॉर्मल लाइफ है।

उस दिन अखिलेश और उनके छोटे भाई रजनीश ने कहा कि रजनीश की बिटिया का विवाह होना है बाईस अप्रेल को। तिलक 17 अप्रेल को है टेला गांव में। टेला मेरे गांव से पचास किलोमीटर की दूरी पर। वहां जाने में, सिवाय वैशाख की गर्मी के, ज्यादा असुविधा नहीं है। तीन चार घण्टे का समय निकालना है। मैंने कहा कि मैं टेला पंहुचूंगा। रजनीश ने मुझे टेला के आयोजन स्थल – लाल चंद्र मिश्र जी के घर – का गूगल मैप पर लोकेशन प्रेषित कर दिया।

अपने घर से निकल कर नेशनल हाईवे पकड़ जंगीगंज तक की यात्रा उस फिर टेला के लिये किसी स्थान धनतुलसी होते हुये ग्रामीण सड़क पर चलना। कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई। दिक्कत केवल लाल चंद्र जी के घर पंहुचने में हुई। गूगल वाली महिला ने घर की जीपीएस लोकेशन के अनुसार एक पगडण्डी नुमा सड़क पर कार घुसवा दी। केवल झोपड़ियां थीं वहां। एक दो पक्के घर भी जो थे, वे प्रधानमंत्री आवास योजना के पैसे से बने नजर आ रहे थे। पगडण्डी भी इतनी खराब थी कि मेरी छोटी कार लगा कि कहीं पलट न जाये। रोक कर एक महिला से लालचंद्र जी के घर का रास्ता पूछा तो उसने हाथ से दिखा कर करीब दो-तीन सौ मीटर दूर घर दिखाया। पर वहां जाने के लिये रास्ता था नहीं साइकिल या पैदल जाया जा सकता था। गूगल वाली महिला सन्न मार गयी थी। उसके अनुसार (शायद) गूगल का काम खत्म हो गया था।

जहां पंहुचे थे, वहां कार मोड़ने की भी जगह नहीं थी। अभिमन्यु या अंगद की सी दशा। बैकट्रेक करना कठिन काम। गुलाब (मेरे ड्राइवर साहब) ने किसी तरह मेरी साबुनदानी नुमा कार -ऑल्टो के-10 – बैक की। उसके बाद लालचंद्र मिश्र जी का घर कम से कम पांच लोगों से पूछते हुये नियत घर पर पंहुचे।

मिश्र जी के अहाता में घुसते ही तेज आवाज में लाउडस्पीकर पर गायन सुनाई पड़ा – रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे। यह कोई रिकार्ड नहीं बज रहा था। बाकायदा आरकेस्ट्रा का इंतजाम था। मंच पर म्यूजिकल तामझाम के साथ एक खुले केश वाली महिला हाथ में माइक थामे, फुल कॉन्फीडेंस में गा रही थी।

जीपीएस पर, गूगल पर और गूगल वाली महिला – गूगलाइन – पर यकीन तो करना चाहिये पर नुक्कड़ पर यूंही समय गुजारते, इंदारा पर पानी खींचते या मचिया पर बैठे गपियाते लोगों के ईको-सिस्टम की अनदेखी कर नहीं। लास्ट माइल कनेक्टिविटी में गूगलाइन भाग खड़ी होती हैं। काम गांवदेहात के लोग ही आते हैं – “इहई खड़ंजा पकड़े चला जा। ओकरे बाद पीपर के पेड़े के बगलियां से जायअ। अनुपम क घर पूंछि लेह्यअ…” पता नहीं गूगलाइन कब यह भाषा बोलना सीखेगी। गूगलाइन और गांवगिरांव की गोमतिया जब एक जैसे तरीके से और एक जैसी टोन में निर्देश देने में सक्षम होंगी, तभी भारत में आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस सफल माना जायेगा। :lol:

आश्चर्य और शॉक अभी और भी मिलने थे। मिश्र जी के अहाता में घुसते ही तेज आवाज में लाउडस्पीकर पर गायन सुनाई पड़ा – रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे। यह कोई रिकार्ड नहीं बज रहा था। बाकायदा आरकेस्ट्रा का इंतजाम था। मंच पर म्यूजिकल तामझाम के साथ एक खुले केश वाली महिला हाथ में माइक थामे, फुल कॉन्फीडेंस में गा रही थी। बहुत कुछ वह अंदाज जैसा मनोरंजन वाले टीवी चैनलों पर नयी प्रतिभायें दिखाती हों। मुझे अपनी पत्नीजी का ऑफ्ट-रिपीटेड कहना याद हो आया – “मेरे बब्बा होते तो यह सब देख कर गोली मार देते!”

घर के अहाते के खुले में नाश्ता, बातचीत, पैलगी-आशीर्वाद का दौर पूरा हुआ

बब्बा को गये तीन दशक हो गये हैं। दो पीढ़ियाँ जन्म ले चुकी हैं उनके बाद। गांवदेहात बहुत तेजी से बदल रहा है। पर तब भी; इतनी मशक्कत कर अगर गंगा किनारे के इस गांव टेला में न आया होता तो यह अनुभव कहां पाता?! अपने घर से जिसे निकलने में कष्ट हो, उसे 50 किमी दूर किसी जगह जाना हो तो वह मशक्कत ही तो है?!

आंगन में बांस, हल, मूसल, चकरी आदि शुभकार्य के प्रतीक जमा थे। पण्डित लोग जम गये थे। बांयी ओर ओसारे में महिलायें तैनात थींं कि पण्डित मंत्रोच्चार टर्राना शुरू करेंं तो उनकी गारी का गायन प्रारम्भ हो। पूरी तरह एथेनिक वातावरण।

घर के अहाते के खुले में नाश्ता, बातचीत, पैलगी-आशीर्वाद का दौर पूरा हुआ और उसके बाद तिलक लगने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। लालचंद्र मिश्र जी के घर के आंगन में सब पंहुचे। आंगन मीडियम साइज का था। उसके गच्चे पर स्टील की पट्टियां लगीं थी। कोई उससे नीचे नहीं गिर सकता था और पूरी छत का उपयोग भी हो सकता था। नीचे आंगन में बांस, हल, मूसल, चकरी आदि शुभकार्य के प्रतीक जमा थे। पण्डित लोग जम गये थे। बांयी ओर ओसारे में महिलायें तैनात थींं कि पण्डित मंत्रोच्चार टर्राना शुरू करेंं तो उनकी गारी का गायन प्रारम्भ हो। पूरी तरह एथेनिक वातावरण। हजार साल पहले भी कमोबेश यही सीन हुआ करता रहा होगा। थोड़ा बदलाव यह था कि हर कोई अपने मोबाइल थामे कैमरामैन का रोल अदा कर रहा था। और फ्लैश वाले, कैमरा लटकाये भी कई थे – चारपांच रहे होंगे। डिजिटल युग में फोटो खींचना, वीडियो बनाना बांये हाथ का खेल हो गया है। एक दशक में लोग मूवी बनाने में भी सिद्धहस्थ हो जायेंगे। घर घर वीडियोग्राफी होगी और लेखक लोग किताब लिखने की बजाय गांवदेहात के तिलक, शादी, तेरही आदि की फिल्मोग्राफी के स्क्रिप्ट बेंंचा करेंगे।

विनोद मुझे टोकते हैं – “देखो, अब असली माल-ताल दिया जा रहा है, अब फोटो लीजिये। बैठे बैठे फोटो नहीं आयेगा, तन्नी खड़े हो कर लेना पड़ेगा।” मैं देखता हूं कि एक साथ चारों ईवेंट फोटो/वीडियोग्राफर “माल-ताल” पर ही फोकस किये हैं। फ्लैश वाले भी उसी पर फ्लैश चमकाये जा रहे हैं। शादी गौण है, लड़का-लड़की गौण हैं। असली सत्य ‘माल-ताल’ है। यही ब्रह्म विद्या है, यही ब्रह्मज्ञान है! :-D

एक फोटोग्राफर को मैं कोई काम का जंतु लगा हूँगा, सो वह मेरा चित्र खींचने आ गया। उसके उलट, मैंने उसका चित्र खींचने के लिये मोबाइल सेट किया तो वह लजा गया। फोटो खींचने वाले का ही फोटो खींचना बड़ा रोचक कृत्य है। बंदा किस तरह से अपनी एक आंख बंद करता है; उसके मुंह की पेशियां किस तरह से सिकुड़ती हैं – यह ठीक से रिकॉर्ड करना एक बढ़िया चित्र बन सकता है। पर मुझमें वह कला नहीं और रात आसन्न थी, तो रोशनी का भी सहारा नहीं था। फिर भी चित्र लिया तो सही।

तिलक कितना चढ़ा? यह मुख्य चर्चा होती है। सब कुछ सबके सामने खोल कर रखा, दिखाया जाता है। मेरे पास बैठे, मेरे गांव सुकुलपुर के विनोद मुझे टोकते हैं – “देखो, अब असली माल-ताल दिया जा रहा है, अब फोटो लीजिये। बैठे बैठे फोटो नहीं आयेगा, तन्नी खड़े हो कर लेना पड़ेगा।” मैं देखता हूं कि एक साथ चारों ईवेंट फोटो/वीडियोग्राफर “माल-ताल” पर ही फोकस किये हैं। फ्लैश वाले भी उसी पर फ्लैश चमकाये जा रहे हैं। शादी गौण है, लड़का-लड़की गौण हैं। असली सत्य ‘माल-ताल’ है। यही ब्रह्म विद्या है, यही ब्रह्मज्ञान है! :-D

तिलक संस्कार पर कल एक स्टेटस भेजा था मैंने। उसपर एक टिप्पणी सटीक थी तिलक के बदलते स्वरूप पर। तिलक कितना वही है और कितना बदला है समय के साथ –

तिलक का बदलाव – ट्विटर पर टिप्पणी

तिलक अनुष्ठान सम्पन्न होने पर भोजन पर टूटा गया। भोजन व्यवस्था उम्दा थी। ज्यादा खा नहीं पाया। मेरे ड्राइवर साहब ने बताया – “गुलाबजामुन थी, गाजर का हलवा भी और ऊपर से आईसक्रीम। हम त तिन्नो खाये।” खैर, मैंने दोसा खा कर ही संतोष किया। जब जठराग्नि प्रबल थी, तब तिलक जैसे समारोह के लिये समय नहीं था। अब जब नापतोल कर भोजन करना होता है तो गुलाबजामुन, गाजर का हलवा और आईसक्रीम सब की बात ललचाती भर है। भाग्य में तो स्वल्पाहार और रात में बिना भूले ईसबगोल का सेवन ही है।

घर आ कर ब्ल्यू-जोंस वाली साइट पर Life Expectancy Test का दो साल बाद रिपीट करता हूं। उसके अनुसार मेरी लाइफ एक्स्पेण्टेन्सी डेढ़ साल बढ़ गयी है। अगर मैं अपनी “आदतें” सुधार लूं तो तेरह साल और जी सकता हूं।

सो अब जिंदगी तिलकही अटेण्ड करने, भोजन पर लगाम रखने और “आदतें” सुधारने में ही लगानी है। वही कर रहा हूं। आपको भी देर सबेर वही करना होगा! :-)


मुझे चाय की चट्टी थामनी चाहिये


मेरी पत्नीजी का बार बार कहना है कि गड़ौली धाम तक गर्मी के मौसम में 12-14 किलोमीटर साइकिल चलाना अपने साथ ज्यादती है। सप्ताह में कभी कभी जाना तो ठीक है पर रोज रोज उधर निकल लेने की बजाय और भी कुछ है जो देखना, लिखना चाहिये। मैं भी सोचता हूं कि विषयांतर होना ही चाहिये।

क्या किया जाये, कटका स्टेशन की चाय की चट्टी थाम ली जाये? प्रयागराज के सिविल लाइंस के कॉफी हाउस की याद होती है। हम – मेरे वरिष्ठ उपेंद्र कुमार सिंह जी और मैं – वहां अपने रेल परिचालन के बोझ से हल्का होने के लिये यदा कदा दफ्तर छोड़ चुपचाप निकल जाया करते थे। आधा एक घण्टा व्यतीत कर लौटने पर कुछ हल्कापन महसूस होता ही था। अब उपेंद्र जी का साथ नहीं है। यूं देखें तो गांव में पत्नीजी के अलावा किसी का भी साथ नहीं है। यहां कॉफी हाउस तो मिल ही नहीं सकता। पर रेलवे स्टेशन के आसपास चाय की दुकानें जरूर हैं, जहां कुछ समय गुजारा जा सकता है।

उन्नीस सौ पचास के दशक में प्रयाग के कॉफी हाउस में साम्यवादी (प्रगतिवादी) और रचनात्मक (परिमल के नाम से जाना जाता समूह) लेखक/कवि जुटा करते थे। मेरे ब्लॉग पर हेमेंद्र सक्सेना जी के संस्मरणों में उनका उल्लेख है। वैसा गांव में तो सम्भव है ही नहीं; लेशमात्र भी नहीं। किसी गरिष्ठ विषय पर अगर मैं लोगों को कुछ बोलने बतियाने की कोशिश करूं तो वे बड़ी जल्दी मुझसे कट लेंगे। पर उनके पास बैठ कर उनके बारे में, गांवगिरांव के बारे में बतियाना-जानना भी एक अलग तरह का संतृप्त करने वाला अनुभव हो सकता है। और असल में वही अनुभव प्रगतिवादी या परिमल समूह के साहित्यकारों को भी मानसिक खाद-पानी-धूप देता रहा होगा। रिटायरमेण्ट के शुरुआती महीनों में मैंने वह शुरू भी किया था, पर फिर कुछ अनचाहे कारणों से वह जारी न रह सका। अब वह पुन: किया जा सकता है। चाय की चट्टी थामी जा सकती है।

चाय की चट्टी (या उस जैसे अड्डे) निठल्ले आदमी को भी ‘मानसिक हलचल’ के लिये गतिमान बना सकते हैं! :-)

आज वह किया। सवेरे देखा तो कटका स्टेशन रोड पर एक नयी चाय की दुकान आ गयी है। दुकान पर पालथी मारे एक सांवला सा नौजवान, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये विराजमान है।

आज वह किया। कई महीनों बाद कटका स्टेशन की ओर निकला। देखा कि स्टेशन रोड पर एक नयी चाय की दुकान आ गयी है। दुकान पर पालथी मारे एक सांवला सा नौजवान, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये विराजमान है। भट्टी दहक रही है। पर्याप्त मात्रा में जलेबी छन चुकी है और समोसे तलने का भी तीन चौथाई काम पूरा हो चुका है। तीन चार ग्राहक बैठे हैं। दुकान वैसी नहीं थी, जैसी आधे अधूरे मन और संसाधनों के साथ खोली जाती है और कुछ समय बाद बंद हो जाती है।

यह चट्टी, बतौर अड्डा, थामने के लिये मुकम्मल जान पड़ी!

पता चला कि नौजवान का नाम मनोज कुमार है। वह स्कूल टीचर बनने के लिये तैयारी कर रहा है पर साथ ही जीविका के लिये चाय-नाश्ते की दुकान भी खोल ली है। दुकान सवेरे पांच बजे खुल जाती है। जब मैं पंहुचा तो साढ़े सात बज रहे थे। समोसे का साइज सामान्य से बड़ा लग रहा था। गरम छनता समोसा टैम्प्ट कर रहा था। पर मैंने समोसे पर जोर नहीं मारा। मनोज से पूछा कि चाय पिला सकते हैं? बिना शक्कर।

बहुत जल्दी ही, दुकान पर उपलब्ध दूध और अदरख का प्रयोग कर बनाई गयी चाय। एक कुल्हड़ में चाय छान कर थमा दी गयी।

और बहुत जल्दी ही, दुकान पर उपलब्ध दूध और अदरख का प्रयोग कर बनाई गयी चाय। एक कुल्हड़ में चाय छान कर थमा दी गयी। बाकी बची चाय थर्मस में भर कर रख दी गयी। बनाने की स्पीड अच्छी थी; सर्विस अच्छी थी। मुझे बैठने के लिये बेंच भी मनोज के पिताजी ने अपने गमछे से साफ की। यानी, पर्याप्त आदर दिया बैठने के लिये।

मनोज के पिताजी ने बताया कि वे मेरे साले साहब को वर्षों से दूध सप्लाई करते रहे हैं। अभी भी करते हैं। विनोद सवेरे पांच बजे दुकान खोलते हैं। उनका कहना था कि अगर मैं पांच बजे भी घूमने निकलूं तो यहां इस अड्डे पर चाय मुझे मिल सकेगी। पांच बजे से जलेबी, लौंगलता और उसके बाद समोसा बनाने का काम धाम होता है। समोसा खाने के लिये थर्मोकोल के दोने में ‘मटर का छोला’ भी उपलब्ध होता है। आमतौर पर आसपास के लोगों का नाश्ता एक या दो समोसा-छोला और एक टुकड़ा जलेबी होता है। चाय के ग्राहक कम होते हैं। समोसा और जलेबी लोग खरीद कर घर पर नाश्ता करने के लिये ले जाते हैं।

मनोज का समोसा चार रुपये का है और जलेबी पच्चीस रुपया पाव। मैंने स्वाद परखने के लिये कुछ समोसे खरीदे। घर आ कर चखने पर और लोगों को तो अच्छे लगे, मुझे नहीं। उसमें लहसुन के पेस्ट का प्रयोग हुआ था। नॉन-लहसुन-प्याजेटेरियन व्यक्ति को लहसुन की थोड़ी सी भी मात्रा कष्ट देती है। :-D

गांव के रोड साइड रेलवे स्टेशन की बजरिया की चाय की दुकान। मुझे किसी महानगरीय कॉफी शॉप की अनुभूति का नोश्टाल्जिया ले कर नहीं ही चलना चाहिये। मनोज के पिताजी के गमछे से साफ की गयी बेंच या टाट बिछाई दुकान की मुंडेर बैठने के लिये पर्याप्त है। सामने ही अदरक कूट कर चाय बनाने और कुल्हड़ में छान कर परोसने का अपना अपना नोश्टाल्जिया है।

पांच सात ब्लॉग पोस्टें मनोज की चाय की चट्टी के नाम पर हो ही जायेंगी। पता चला कि मनोज सपाई है। इसी बहाने कभी न कभी भाजपा-सपा की राजनीति पर भी कुछ कहने लिखने को मिल जायेगा। और गांवदेहात के भांति भांति के ग्राहक आते हैं; उनकी अपने अपने स्तर की, अपने अपने कंसर्न की बातें होती हैं। वह सब भी देखना, समझना, लिखना हो सकेगा।

चाय का कुल्हड़

मेरी जेब में पैसे नहीं हैं। मोबाइल-स्मार्टफोन युग में सवेरे सैर को निकलते समय घड़ी पहनने और जेब में पैसे ले कर चलने की आदत खत्म हो गयी है। खैर, मनोज की दुकान पर भीम-एप्प का एक क्यू-आर कोड का स्टिकर दिख गया। उससे पेमेण्ट किया। पता चला कि वह खाता सामने के किसी “त्रिपाठी इलेक्ट्रिकल” दुकान वाले सज्जन का है। मनोज का अपना खाता न होने के कारण उनका क्यूआर कोड लगा लिया है, जिससे मेरे जैसे किसी ग्राहक को भी सामान खरीदने, पैसा देने में दिक्कत न हो और कोई ग्राहक इस आधार पर न टूट जाये। मनोज की ग्राहकी थामने की यह जुगत भी अच्छी लगी मुझे।

अब आगे भी, कल सवेरे से मनोज की चाय की चट्टी पर! :-)


सोनू से सौदा – गड़ौली धाम


जब घर से सवेरे निकला तो डिस्टोपियन (dystopian – मनहूसियत वाले) विचार मन में चल रहे थे। कुछ भी सकारात्मक नहीं दिखता गांव में। दिनों दिन ईंट भट्ठे बढ़ रहे हैं। बालू और मिट्टी का वैध-अवैध खनन बढ़ रहा है। वातावरण में धूल ज्यादा होती है। सवेरे घूमना उतना मन प्रसन्न नहीं करता। भगवानपुर और करहर के बीच सिवान वाली जमीन जहां घर नहीं, खेत भर हैं; में सड़क नहीं है। वहां दिन पर दिन खेतों की मेड़, जिसपर साइकिल गुजारनी होती है, लोग अपनी छुद्र लोभ वृत्ति के कारण पतली करते जा रहे हैं। हर साल चार छ इंच मेड़ कभी इस खेत वाला कभी दूसरे खेत वाला काट देता है। यह मेड़ काटने की छुद्र सोच ही इस इलाके की दरिद्रता का कारण है और उसका प्रतीक भी।

करहर में एक महुआ के पेड़ के नीचे भीड़ ने मेरा डिस्टोपियन विचार बदला। … इस समय वहां आपस में बांटा जा रहा था सामुहिक रूप से बीना हुआ महुआ।

पर करहर में एक महुआ के पेड़ के नीचे भीड़ ने मेरा डिस्टोपियन विचार बदला। वहां महिलायें, बच्चे और पुरुष भी सवेरे से महुआ बीनते हैं। इस समय वहां आपस में बांटा जा रहा था सामुहिक रूप से बीना हुआ महुआ। सामुहिक काम – भले ही महुआ जैसी छोटी चीज का हो – अगर इस इलाके में किया जा सकता है तो सम्भावना है कि ये ही लोग सामुहिक तौर पर खेती, पशुपालन, दुग्ध-व्यवसाय आदि अनेकानेक कार्य कर सकते हैं। यह विचार मेरे मन में कौंध गया। सब कुछ नेगेटिव या चिरकुट नहीं है। लोगों को अगर सिखाया, बताया और लाभ का अहसास कराया जाये तो “एक धन एक बराबर इग्यारह – 1+1=11” बनाने की आदत विकसित हो सकती है। खेत की मेड़ को काट कर पतला करने की आदत के विपरीत!

गड़ौली धाम के गौपालन के सोशियो-इकॉनॉमिक प्रयोग की सफलता इस सामुदायिक सोच पर ही पल्लवित हो सकती है। यही बात मन में दोहराता हुआ मैं करहर-गड़ौली-अगियाबीर होता हुआ गड़ौली धाम पंहुचा।

सुनील ओझा जी का जहां बैठक लगता है, वहां आज खसखस के पर्दे टांगे हुये थे। दिन में जब इन पर्दों पर पानी दंवारा जाता होगा तो बहुत ठण्डी हवा उनसे गुजर कर उस बैठक को शीतल करती होगी। वैशाख और जेठ की तपती गर्मी के लिये तो बहुत शानदार इंतजाम हो गया है।

ओझा जी वहां नहीं थे। संदीप सिंह दिखे। उन्होने बताया कि कल रात नौ दस बजे बाबूजी बनारस गये। दीदी (ओझा जी कि बिटिया) साथ थीं। सुनील ओझा जी का जहां बैठक लगता है, वहां आज खसखस के पर्दे टांगे हुये थे। दिन में जब इन पर्दों पर पानी दंवारा जाता होगा तो बहुत ठण्डी हवा उनसे गुजर कर उस बैठक को शीतल करती होगी। वैशाख और जेठ की तपती गर्मी के लिये तो बहुत शानदार इंतजाम हो गया है। … मेरे ख्याल से अब संध्या जी (ओझा जी की बिटिया) को अपने पिता को यहां रात गुजारने के लिये छोड़ने में दिक्कत नहीं होनी चाहिये।

सगड़ी चलाता बलराम आया। सगड़ी पर दूध के दो कैन लदे थे। पीछे पीछे एक दो आदमी। मैंने बलराम का सगड़ी रोकते चित्र लिया तो पीछे से, सगड़ी से कूद, एक छोटे कद के नौजवान ने आगे आ कर कहा – एक फोटो मेरा भी लीजिये न! बड़ी फुर्ती से एक बच्चे की तरह वह उछल कर सगड़ी की साइकिल पर बैठ गया।

सगड़ी चलाता बलराम आया। सगड़ी पर दूध के दो कैन लदे थे।

उस नौजवान का नाम है सोनू। सोनू नाम तो सुनील ओझा जी का दिया है। वैसे वह शादाब है। मेरठ, जहां से यहां की एक दर्जन साहीवाल गायें आई हैं, वहीं के किसी गांव का है सोनू। गायों की देखभाल करने में दक्ष है। बहुत वाचाल है सोनू। अपने से ही बताता जाता है। आपको प्रश्न करने की कम ही जरूरत होती है। “मैं गाय की सेवा का सब काम कर लेता हूं। सवेरे चार बजे उठता हूं। दिन के बारह बजे तक काम ही काम रहता है। शाम को फिर गायों के काम में लगना होता है। गाय ही नहीं, मैं घोड़ा भी पाल सकता हूं। उसकी देख रेख, उसकी सवारी – सब आता है मुझे। यही नहीं, चिनाई (ईंट से दीवार बनाना – ब्रिकलेयर) का काम भी मुझे आता है।” – सोनू बताता ही जाता है।

फोटो खिचाता सोनू। पीछे गमछाधारी बलराम है।

अब वह तेईस साल का है। उसकी बीवी उससे एक साल उम्र में बड़ी है। “मैं तीसरी तक पढ़ा हूं और मेरी बीवी हाईस्कूल तक। शादी हुई तो वह उन्नीस साल की थी और मैं अठारह का। एक साल बड़ी है तो कोई बात नहीं। बूढा होने पर मैं बड़ा हो जाऊंगा और वह छोटी। एक बच्चा है हमारा। तेरह महीने का। उसका नाम हम दोनो ने मिल कर रखा है – अबूजर। अबूजर मुहम्मद।”

“अबूजर का क्या मतलब होता है?” – मैंने पूछा। उसे अर्थ नहीं मालुम था। यही बताया कि ये नाम होता है लोगों का। मैंने तुरंत इण्टरनेट पर सर्च किया। अबू-जार हजरत मुहम्मद के एक साथी/अनुयायी/साहबी का नाम था। मैंने उसे बताया कि मोहम्मद साहब के साथी का नाम है तो सोनू ने संतोष जताया कि उसकी बीबी और उसने एक अच्छा ही नाम रखा था। “बीबी और बच्चे को देखने मैं गांव आता जाता रहूंगा।” सोनू ने जोड़ा।

सोनू, संदीप और बलराम बड़ी फुर्ती से दूध के कैन का वजन लेते हैं और तापक्रम भी नोट करते हैं।

सोनू, संदीप और बलराम बड़ी फुर्ती से दूध के कैन का वजन लेते हैं और तापक्रम भी नोट करते हैं। सोनू एक कॉपी में आंकड़े दर्ज करता है। दोनो डिब्बों को जोड़ कर 60-62 किलो निकलता है दूध। “शाम को भी इसी के आसपास होता है। थोड़ा कम भी हो सकता है।”

संदीप चाय बनाते हैं। एक सिरेमिक कप में चाय मुझे थमाते हैं। बाकी लोग पेपर कप में चाय लेते हैं। मेरे लिये कुर्सी कमरे के दरवाजे के पास रखी जाती है। वहां हवा अच्छी आती है। सोनू बात करता जाता है। “सारे दूध को गर्म कर क्रीम निकाल कर घी बनाया जाता है। बचा सेप्रेटा बाल्टा-वाला (बिल्ला नाम का आदमी) ले जाता है।”

“अच्छा?! मेरे काम का तो सेपरेटा ही है। मेरी उम्र में घी की ज्यादा जरूरत नहीं। देसी गाय का सेपरेटा दूध ही बढ़िया है। बिल्ला के बेचे जाने वाले दूध में से मुझे दे सकते हो? बिल्ला से कुछ ज्यादा रेट लगा लो।” मैंने पूछा।

बलराम और संदीप का कहना है कि सारा दूध बिल्ला को देना तय हुआ है। वे उसमें बदलाव नहीं कर सकते। सोनू मुझसे पूछता है – “आपको कितना चाहिये?” मेरे एक किलो बताने पर वह मायूस होता है – बस?

“और क्या भाई। मैं और मेरी पत्नी को कुल मिला कर एक किलो ही तो चाहिये।” मेरे यह कहने पर वह टेनटेटिव सा होता है। फिर सोच कर बोला – चलो, आप रोज रोज आते हो, आपको दे दूंगा।

बलराम और संदीप कर्मचारी जैसा व्यवहार करते हैं पर सोनू, तीसरी दर्जा पास, छटपट (स्मार्ट) है। वह निर्णय लेने का ‘जोखिम’ उठाता है। वह कौतूहल भी रखता है। पर्याप्त। मुझसे मेरे बारे में, मेरे खींचे चित्रों के बारे में, मेरे लिखने के बारे में सवाल करता है। लगता वह बालक ही है पर मेरे ख्याल से गड़ौली धाम की गौशाला के लिये वह एसेट है। बावजूद इसके कि वह अपनी पत्नी-बच्चे से मिलने बार बार अपने गांव आता-जाता रहेगा; ओझाजी को इस बंदे को स्थाई रूप से अपने यहाँ रखना चाहिये।

सोनू मोबाइल दिखाता है। स्मार्टफोन। सेमसंग का। बताया कि दीदी (संध्या जी) ने दिया है। “वो मेरा मोबाइल टूट गया था न, तो दीदी ने मुझे यह दिया।” ओझाजी कि बिटिया अगर सैमसंग का टचस्क्रीन वाला फोन दे सकती हैं तो सोनू को एसेट समझती ही होंगी।

और शायद ऐसा ही वे सोचते भी हों। सोनू मोबाइल दिखाता है। स्मार्टफोन। सेमसंग का। बताया कि दीदी (संध्या जी) ने दिया है। “वो मेरा मोबाइल टूट गया था न, तो दीदी ने मुझे यह दिया।” ओझाजी कि बिटिया अगर सैमसंग का टचस्क्रीन वाला फोन दे सकती हैं तो सोनू को एसेट समझती ही होंगी।

मैं उसकी निर्णय लेने की क्षमता की सीमा परखने के लिये एक और सवाल करता हूं – “वैसे मुझे सेप्रेटा की बजाय एक किलो क्रीमवाला दूध दे सकते हो? क्या भाव दोगे?”

इस सवाल पर सोनू, संदीप और बलराम – तीनों समवेत स्वर में मना कर देते हैं। यह उनकी क्षमता के बाहर का निर्णय है। क्रीम वाले दूध की बिक्री तो नहीं हो सकती। उसके लिये तो बाबूजी को ही पूछ्ना होगा।

“तो आप लोग पूछ कर कल मुझे बता देना।” मेरे यह कहने पर तीनो किनारा करते हैं। ओझा जी से इस प्रकार की बातचीत शायद उस तरह की पॉलिसी विषयक बात हो जो फैक्टरी का जेनीटर फैक्टरी के चीफ एग्जीक्यूटिव से करने की सोच भी नहीं सकता। पर संदीप सिंह मुझे एक रास्ता सुझाते हैं – “आप हमसे क्यूं पूछते हैं। आप तो बाबूजी से सीधे बात कर सकते हैं। आप ही जब मिलेंगे तो पूछ लीजियेगा।”

एक कप चाय के साथ सोनू, संदीप और बलराम के साथ इस प्रकार की स्मॉल-टॉक। इसके लिये 12-14 किलोमीटर साइकिल चलाना खलता नहीं, अच्छा ही लगता है। मेरे मन का डिस्टोपियन भाव, अस्थाई रूप से ही सही, कुछ दूर तो होता है। इस प्रकार यहां नियमित आना मेरे डिस्टोपिया को पूरी तरह, समूल, निकाल सकेगा? यह देखा जाना बाकी है। मन में “उपारा बेंट” होने का भाव कहीं गहरे बैठ गया है। :-)

कृपया गड़ौली धाम के बारे में “मानसिक हलचल” ब्लॉग पर पोस्टों की सूची के लिये “गड़ौली धाम” पेज पर जायें।
Gadauli Dham गड़ौली धाम

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