सोनू से सौदा – गड़ौली धाम


जब घर से सवेरे निकला तो डिस्टोपियन (dystopian – मनहूसियत वाले) विचार मन में चल रहे थे। कुछ भी सकारात्मक नहीं दिखता गांव में। दिनों दिन ईंट भट्ठे बढ़ रहे हैं। बालू और मिट्टी का वैध-अवैध खनन बढ़ रहा है। वातावरण में धूल ज्यादा होती है। सवेरे घूमना उतना मन प्रसन्न नहीं करता। भगवानपुर और करहर के बीच सिवान वाली जमीन जहां घर नहीं, खेत भर हैं; में सड़क नहीं है। वहां दिन पर दिन खेतों की मेड़, जिसपर साइकिल गुजारनी होती है, लोग अपनी छुद्र लोभ वृत्ति के कारण पतली करते जा रहे हैं। हर साल चार छ इंच मेड़ कभी इस खेत वाला कभी दूसरे खेत वाला काट देता है। यह मेड़ काटने की छुद्र सोच ही इस इलाके की दरिद्रता का कारण है और उसका प्रतीक भी।

करहर में एक महुआ के पेड़ के नीचे भीड़ ने मेरा डिस्टोपियन विचार बदला। … इस समय वहां आपस में बांटा जा रहा था सामुहिक रूप से बीना हुआ महुआ।

पर करहर में एक महुआ के पेड़ के नीचे भीड़ ने मेरा डिस्टोपियन विचार बदला। वहां महिलायें, बच्चे और पुरुष भी सवेरे से महुआ बीनते हैं। इस समय वहां आपस में बांटा जा रहा था सामुहिक रूप से बीना हुआ महुआ। सामुहिक काम – भले ही महुआ जैसी छोटी चीज का हो – अगर इस इलाके में किया जा सकता है तो सम्भावना है कि ये ही लोग सामुहिक तौर पर खेती, पशुपालन, दुग्ध-व्यवसाय आदि अनेकानेक कार्य कर सकते हैं। यह विचार मेरे मन में कौंध गया। सब कुछ नेगेटिव या चिरकुट नहीं है। लोगों को अगर सिखाया, बताया और लाभ का अहसास कराया जाये तो “एक धन एक बराबर इग्यारह – 1+1=11” बनाने की आदत विकसित हो सकती है। खेत की मेड़ को काट कर पतला करने की आदत के विपरीत!

गड़ौली धाम के गौपालन के सोशियो-इकॉनॉमिक प्रयोग की सफलता इस सामुदायिक सोच पर ही पल्लवित हो सकती है। यही बात मन में दोहराता हुआ मैं करहर-गड़ौली-अगियाबीर होता हुआ गड़ौली धाम पंहुचा।

सुनील ओझा जी का जहां बैठक लगता है, वहां आज खसखस के पर्दे टांगे हुये थे। दिन में जब इन पर्दों पर पानी दंवारा जाता होगा तो बहुत ठण्डी हवा उनसे गुजर कर उस बैठक को शीतल करती होगी। वैशाख और जेठ की तपती गर्मी के लिये तो बहुत शानदार इंतजाम हो गया है।

ओझा जी वहां नहीं थे। संदीप सिंह दिखे। उन्होने बताया कि कल रात नौ दस बजे बाबूजी बनारस गये। दीदी (ओझा जी कि बिटिया) साथ थीं। सुनील ओझा जी का जहां बैठक लगता है, वहां आज खसखस के पर्दे टांगे हुये थे। दिन में जब इन पर्दों पर पानी दंवारा जाता होगा तो बहुत ठण्डी हवा उनसे गुजर कर उस बैठक को शीतल करती होगी। वैशाख और जेठ की तपती गर्मी के लिये तो बहुत शानदार इंतजाम हो गया है। … मेरे ख्याल से अब संध्या जी (ओझा जी की बिटिया) को अपने पिता को यहां रात गुजारने के लिये छोड़ने में दिक्कत नहीं होनी चाहिये।

सगड़ी चलाता बलराम आया। सगड़ी पर दूध के दो कैन लदे थे। पीछे पीछे एक दो आदमी। मैंने बलराम का सगड़ी रोकते चित्र लिया तो पीछे से, सगड़ी से कूद, एक छोटे कद के नौजवान ने आगे आ कर कहा – एक फोटो मेरा भी लीजिये न! बड़ी फुर्ती से एक बच्चे की तरह वह उछल कर सगड़ी की साइकिल पर बैठ गया।

सगड़ी चलाता बलराम आया। सगड़ी पर दूध के दो कैन लदे थे।

उस नौजवान का नाम है सोनू। सोनू नाम तो सुनील ओझा जी का दिया है। वैसे वह शादाब है। मेरठ, जहां से यहां की एक दर्जन साहीवाल गायें आई हैं, वहीं के किसी गांव का है सोनू। गायों की देखभाल करने में दक्ष है। बहुत वाचाल है सोनू। अपने से ही बताता जाता है। आपको प्रश्न करने की कम ही जरूरत होती है। “मैं गाय की सेवा का सब काम कर लेता हूं। सवेरे चार बजे उठता हूं। दिन के बारह बजे तक काम ही काम रहता है। शाम को फिर गायों के काम में लगना होता है। गाय ही नहीं, मैं घोड़ा भी पाल सकता हूं। उसकी देख रेख, उसकी सवारी – सब आता है मुझे। यही नहीं, चिनाई (ईंट से दीवार बनाना – ब्रिकलेयर) का काम भी मुझे आता है।” – सोनू बताता ही जाता है।

फोटो खिचाता सोनू। पीछे गमछाधारी बलराम है।

अब वह तेईस साल का है। उसकी बीवी उससे एक साल उम्र में बड़ी है। “मैं तीसरी तक पढ़ा हूं और मेरी बीवी हाईस्कूल तक। शादी हुई तो वह उन्नीस साल की थी और मैं अठारह का। एक साल बड़ी है तो कोई बात नहीं। बूढा होने पर मैं बड़ा हो जाऊंगा और वह छोटी। एक बच्चा है हमारा। तेरह महीने का। उसका नाम हम दोनो ने मिल कर रखा है – अबूजर। अबूजर मुहम्मद।”

“अबूजर का क्या मतलब होता है?” – मैंने पूछा। उसे अर्थ नहीं मालुम था। यही बताया कि ये नाम होता है लोगों का। मैंने तुरंत इण्टरनेट पर सर्च किया। अबू-जार हजरत मुहम्मद के एक साथी/अनुयायी/साहबी का नाम था। मैंने उसे बताया कि मोहम्मद साहब के साथी का नाम है तो सोनू ने संतोष जताया कि उसकी बीबी और उसने एक अच्छा ही नाम रखा था। “बीबी और बच्चे को देखने मैं गांव आता जाता रहूंगा।” सोनू ने जोड़ा।

सोनू, संदीप और बलराम बड़ी फुर्ती से दूध के कैन का वजन लेते हैं और तापक्रम भी नोट करते हैं।

सोनू, संदीप और बलराम बड़ी फुर्ती से दूध के कैन का वजन लेते हैं और तापक्रम भी नोट करते हैं। सोनू एक कॉपी में आंकड़े दर्ज करता है। दोनो डिब्बों को जोड़ कर 60-62 किलो निकलता है दूध। “शाम को भी इसी के आसपास होता है। थोड़ा कम भी हो सकता है।”

संदीप चाय बनाते हैं। एक सिरेमिक कप में चाय मुझे थमाते हैं। बाकी लोग पेपर कप में चाय लेते हैं। मेरे लिये कुर्सी कमरे के दरवाजे के पास रखी जाती है। वहां हवा अच्छी आती है। सोनू बात करता जाता है। “सारे दूध को गर्म कर क्रीम निकाल कर घी बनाया जाता है। बचा सेप्रेटा बाल्टा-वाला (बिल्ला नाम का आदमी) ले जाता है।”

“अच्छा?! मेरे काम का तो सेपरेटा ही है। मेरी उम्र में घी की ज्यादा जरूरत नहीं। देसी गाय का सेपरेटा दूध ही बढ़िया है। बिल्ला के बेचे जाने वाले दूध में से मुझे दे सकते हो? बिल्ला से कुछ ज्यादा रेट लगा लो।” मैंने पूछा।

बलराम और संदीप का कहना है कि सारा दूध बिल्ला को देना तय हुआ है। वे उसमें बदलाव नहीं कर सकते। सोनू मुझसे पूछता है – “आपको कितना चाहिये?” मेरे एक किलो बताने पर वह मायूस होता है – बस?

“और क्या भाई। मैं और मेरी पत्नी को कुल मिला कर एक किलो ही तो चाहिये।” मेरे यह कहने पर वह टेनटेटिव सा होता है। फिर सोच कर बोला – चलो, आप रोज रोज आते हो, आपको दे दूंगा।

बलराम और संदीप कर्मचारी जैसा व्यवहार करते हैं पर सोनू, तीसरी दर्जा पास, छटपट (स्मार्ट) है। वह निर्णय लेने का ‘जोखिम’ उठाता है। वह कौतूहल भी रखता है। पर्याप्त। मुझसे मेरे बारे में, मेरे खींचे चित्रों के बारे में, मेरे लिखने के बारे में सवाल करता है। लगता वह बालक ही है पर मेरे ख्याल से गड़ौली धाम की गौशाला के लिये वह एसेट है। बावजूद इसके कि वह अपनी पत्नी-बच्चे से मिलने बार बार अपने गांव आता-जाता रहेगा; ओझाजी को इस बंदे को स्थाई रूप से अपने यहाँ रखना चाहिये।

सोनू मोबाइल दिखाता है। स्मार्टफोन। सेमसंग का। बताया कि दीदी (संध्या जी) ने दिया है। “वो मेरा मोबाइल टूट गया था न, तो दीदी ने मुझे यह दिया।” ओझाजी कि बिटिया अगर सैमसंग का टचस्क्रीन वाला फोन दे सकती हैं तो सोनू को एसेट समझती ही होंगी।

और शायद ऐसा ही वे सोचते भी हों। सोनू मोबाइल दिखाता है। स्मार्टफोन। सेमसंग का। बताया कि दीदी (संध्या जी) ने दिया है। “वो मेरा मोबाइल टूट गया था न, तो दीदी ने मुझे यह दिया।” ओझाजी कि बिटिया अगर सैमसंग का टचस्क्रीन वाला फोन दे सकती हैं तो सोनू को एसेट समझती ही होंगी।

मैं उसकी निर्णय लेने की क्षमता की सीमा परखने के लिये एक और सवाल करता हूं – “वैसे मुझे सेप्रेटा की बजाय एक किलो क्रीमवाला दूध दे सकते हो? क्या भाव दोगे?”

इस सवाल पर सोनू, संदीप और बलराम – तीनों समवेत स्वर में मना कर देते हैं। यह उनकी क्षमता के बाहर का निर्णय है। क्रीम वाले दूध की बिक्री तो नहीं हो सकती। उसके लिये तो बाबूजी को ही पूछ्ना होगा।

“तो आप लोग पूछ कर कल मुझे बता देना।” मेरे यह कहने पर तीनो किनारा करते हैं। ओझा जी से इस प्रकार की बातचीत शायद उस तरह की पॉलिसी विषयक बात हो जो फैक्टरी का जेनीटर फैक्टरी के चीफ एग्जीक्यूटिव से करने की सोच भी नहीं सकता। पर संदीप सिंह मुझे एक रास्ता सुझाते हैं – “आप हमसे क्यूं पूछते हैं। आप तो बाबूजी से सीधे बात कर सकते हैं। आप ही जब मिलेंगे तो पूछ लीजियेगा।”

एक कप चाय के साथ सोनू, संदीप और बलराम के साथ इस प्रकार की स्मॉल-टॉक। इसके लिये 12-14 किलोमीटर साइकिल चलाना खलता नहीं, अच्छा ही लगता है। मेरे मन का डिस्टोपियन भाव, अस्थाई रूप से ही सही, कुछ दूर तो होता है। इस प्रकार यहां नियमित आना मेरे डिस्टोपिया को पूरी तरह, समूल, निकाल सकेगा? यह देखा जाना बाकी है। मन में “उपारा बेंट” होने का भाव कहीं गहरे बैठ गया है। :-)

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गड़ौली धाम, सगड़ी और सुनील भाई


पत्नीजी ने कहा – “रोज रोज गड़ौली निकल जाते हो, ये मोनोटोनी ठीक नहीं। और भी जगहें हैंं जाने, घूमने, देखने और लिखने की। जब कुछ बिना किसी तय मुद्दे के चल रहे हो तो और जगह भी जाओ।” बात उनकी ठीक भी थी। रोज रोज वहां पंहुच जाना; सुनील ओझा जी को तख्त पर बैठे हाथ पैर गरदन हिलाते व्यायाम करते देखना; इधर उधर घूमना, आधा घण्टा सुनील भाई से बातचीत और बलराम की चाय – यह एक रुटीन ही न बन जाये। … वहां के लोग यह न सोचने लगेंं कि इस ‘उपारा बेंट’ को करने धरने को तो है नहीं, रोज रोज चला आता है! :-D

पर फिर भी साइकिल गड़ौली धाम की तरफ मुड़ गयी आज भी।

उपारा बेंट

उपारा बेंट आज मेरे लेक्सिकॉन में जुड़ा नया शब्द है। गड़ौली धाम के पास एक अधेड़ आदमी साइकिल पर जा रहा था। वह किसी से बात कर रहा था – “हम कहां जाब, हम त उपारा बेंट हई (मैं और कहां जाऊंगा, मैं तो उपारा बेंट हूं। जब तक मालताल (पैसा) हो, तब तक बम्बई रहो, दिल्ली रहो, जहां मन आये रहो। जब मात-ताल झर्र तो अपने घरे में घुसरो (लौट आओ)।”

उपारा बेंट गोरुआर (पशु शाला) का वह खूंटा है जिसे पुराना होने पर उखाड़ कर अटाले में रख दिया जाता है। उस कबाड़ से कोई जरूरत कहीं होने पर उसे निकाल कर लगा दिया जाता है। उसका नियमित कोई उपयोग नहीं। ताश के पत्तों में जो स्थान जोकर का है – जिसे कोई अन्य पत्ता न होने पर उपयोग कर लिया जाये; वही उपारा बेंट है गांवदेहात की भाषा में। रोज रोज जाने पर लोग उपारा बेंट समझने लगेंगे! :-)

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गड़ौली धाम में

आज सुनील जी नहीं थे। सतीश ने बताया – “कल देर रात दीदी उन्हें ले गयीं। आज रामनवमी को कुछ कार्यक्रम होगा, पर बारह बजे तक ही आयेंगे, शायद।” सतीश को गंगा किनारे स्नान कर महादेव के अभिषेक के लिये बाल्टी भर गंगाजल लाना था। वे निकल लिये। अकेला मैं एक तख्ते पर लेटा कुछ देर – सरपत की बनी छत ताकते हुये। विनायक प्रणाम कर गये। यह नौजवान खुला नहीं है। दूरी बना कर रखता है। शैलेश ने फोन कर कहा – “भईया विनायक को बताते रहा करिये। बहुत अच्छा लड़का है। यहीं रहेगा।” शैलेश, विनायक, सुनील भाई ओझा – इन सब के बावजूद मन में उपारा बेंट का भाव आता है तो शायद मुझमें ही कोई डिजाइन डिफेक्ट है!

नदी किनारे का वह शमी का वृक्ष जिसके आसपास हम दम्पति ने दिये जलाये थे; बहुत नीक लगता है। उसको समग्रता से देखने पर गंगाजी का पूरा विस्तार दीखता है।

मैं आसपास घूम कर देखता हूं। नदी किनारे का वह शमी का वृक्ष जिसके आसपास हम दम्पति ने दिये जलाये थे; बहुत नीक लगता है। उसको समग्रता से देखने पर गंगाजी का पूरा विस्तार दीखता है। अब रामनवमी आ गयी; पर ध्यान से जगह देखने पर एक दिया जो हमने दीपावली को जलाया था, वहां पास में रखा दिखा। अच्छा लगा कि हम अभी भी वहां हैं।

शमी के तने में एक आर पार दीखने वाला कोटर है। उससे गंगा जी का जल साफ दीखता है। मैंने उसके सामने कुशा इधर उधर कर चित्र लिया।

शमी के तने में एक आर पार दीखने वाला कोटर है। उससे गंगा जी का जल साफ दीखता है। मैंने उसके सामने कुशा इधर उधर कर चित्र लिया।

कुटिया के पास नयी सगड़ी दिखी। हीरालाल ने बताया कि चार रोज पहले आई थी कछवाँ से। “बाबू जी चलावत रहें। बहुत मस्त फोटो आई रही। आपऊ देखे होब्यअ। (बाबूजी – सुनील भाई चला रहे थे। बहुत शानदार फोटो आई थी। आपने भी देखी होगी।)”

मैने देखी नहीं थी। कहने पर विनायक ने मेरे पास भेजी। उसपर डेटलाइन है 6 अप्रेल रात पौने नौ बजे की। रात में बिना तैयारी के चित्र लिये जाने के कारण चित्र में धुंधलापन है। मोबाइल हाथ की बजाय ट्राइपॉड पर रखा होता तो क्लियर आता। मैंने उसे जस का तस प्रस्तुत करने की बजाय पेण्टिंग प्रभाव देना उचित समझा।

कुटिया के पास नयी सगड़ी दिखी। हीरालाल ने बताया कि चार रोज पहले आई थी कछवाँ से। “बाबू जी चलावत रहें। बहुत मस्त फोटो आई रही। (बाबूजी – सुनील भाई चला रहे थे। बहुत शानदार फोटो आई थी।)”

छियासठ प्लस के बाबूजी; रात पौने नौ बजे मौज मजे से साइकिल ठेला चला रहे हैं। साथ में तीन चार चेला लोग उन्हें साधने खड़े हैं। इस दृष्य की कल्पना ही मजेदार है। चित्र तो है ही। … मैं आगे की कल्पना करता हूं। सुनील भाई यहीं गड़ौली धाम में रहते हुये जीवन का सैंकड़ा पार करें और उस दिन भी सगड़ी पर इसी तरह चित्र खिंचायें। :-)

पता नहीं, सगड़ी खींचते सुनील ओझा जी का यह चित्र उनकी बिटिया ने देखा है या नहीं। वह तो अपने पिता को उम्र और ढेरों दवाईयों से पीड़ित मानती है। उनको तो सुनील भाई का यह एडवेंचरिज्म अच्छा थोड़े लगेगा?!

आज गड़ौली धाम में ज्यादा देर नहीं रहा। वैसे भी, जल्दी लौटना चाहता था। घर पर नौ दिवसीय मानसपाठ सम्पन्न करना था। उसके बाद बारह बजे रामलला का बर्थडे मनाना था। पत्नीजी ने गुड़ के हलवे का केक बनाया था। साथ में पूरी तरकारी सिंवई। आज रविवार था तो घर में काम करने वाले और भी लोग रोक रखे थे मेम साहब ने।

बकौल सतीश गड़ौली धाम में तो कुछ कार्यक्रम होगा ही नवरात्रि समापन पर। कल पता चलेगा वहां क्या हुआ। आज इतना ही।

जै श्री राम। हर हर महादेव।

गड़ौली धाम में गंगा किनारे शमी के वृक्ष की उखमज के जालों से गुंथी एक टहनी। ये वह चीजें हैं जो मुझे आकर्षित करती हैं, और वहां ले जाती हैं।

रामनवमी – सीता जी क्या बनाती रही होंगी राम जी के बर्थडे पर?


चौदह साल का वनवास। अंत वाले का तो कह नहीं सकते, पर तेरह रामनवमियाँ तो ठीकठाक बिताई होंगी सीताजी ने राम-लक्ष्मण जी के साथ। यूं तो यूपोरियन आदमी जन्मदिन टाइप आधुनिक चोंचले में ज्यादा यकीन नहीं करता, पर सीताजी राम जी के जन्मदिन पर कुछ तो विशेष बनाती ही रही होंगी?

इस पुस्तक में उल्लेख आता है – चौदह साल में इग्यारह साल, इग्यारह महीने और इग्यारह दिन तो राम जी चित्रकूट में रहे।

चौदह साल में इग्यारह साल, इग्यारह महीने और इग्यारह दिन तो राम जी चित्रकूट में रहे। उसके बाद पंचवटी – नासिक को निकल गये थे। उसके बाद खर-दूषण-त्रिशिरा-सूपर्नखा-रावण आदि से जूझना हुआ होगा।

मोटे हिसाब से 11-12 जन्मदिन चित्रकूट में पड़े होंगे।

आज अष्टमी है। आठ दिन व्रत-फलाहार पर निकाले हैं मेरी पत्नीजी और मैंने। हम में चर्चा हुई है कि कल, रामनवमी के दिन क्या भोजन बनेगा। पत्नीजी का विचार था कि दुकान से मिठाई ली जाये। मेरा मत था कि जैसे सीताजी जंगल में बनाती रही होंगी कुछ वैसा बनना चाहिये। उनके समय में चित्रकूट के वन में कोई दुकान थोड़े होगी बर्फी खरीदने के लिये!

जंगल में क्या होता रहा होगा? मैं गड़ौली धाम जाते, अपनी सवेरे की साइकिल सैर के दौरान यह सोच रहा था। सोचते हुये अगियाबीर की महुआरी से गुजरा। टपकते महुआ की गंध और जमीन पर बिछे महुआ के फूल दिखे। चैत्र मास, रामनवमी और टपकता महुआ – यह तो ऋतुओं का आदिकालीन कॉम्बिनेशन रहा होगा। और चित्रकूट में राम जी की कुटी के आसपास महुआ के वृक्ष तो रहे ही होंगे (यद्यपि तुलसी बाबा ने महुआ जैसे देशज-लौकिक वृक्ष को काव्य में जगह नहीं दी)। महुआ का दोना पत्तल वनवासी बना कर देते ही रहे होंगे सीता माता को। वे ही उनके थाली कटोरा होते होंगे।

महुआ का वृक्ष। अब फूल लगभग टपक चुके हैं। पेड़ अब फलों से भर रहा है।
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Gadauli Dham गड़ौली धाम

मेरी ट्यूबलाइट जली। रामनवमी के समय सीता जी को सबसे सुलभ तो टपकता महुआ ही होता होगा। महुआ के रस से बना ठोकवा। वही मीठा व्यंजन हुआ करता होगा राम जी के बर्थडे पर! … साइकिल चलाते अपनी कल्पना से मुझे रोमांच हुआ। अगियाबीर की गड़रिया बस्ती की बड़ी महुआरी में महुआ बीनती महिला के पास मैं रुका। बात शुरू उसने ही की – महुआ अब खतम हो रहा है।

अगियाबीर की गड़रिया बस्ती की बड़ी महुआरी में महुआ बीनती महिला के पास मैं रुका।

मैंने उससे पूछा – इस महुआ का, इसी हाल में, बिना सुखाये क्या व्यंजन बन सकता है?

उसने मुझे बताया कि इन फूलोंंको गार (निचोड़) कर उनका रस उबाल लिया जाता है। उबलते रस में मुच्छी (आटे की गोल गोल पूरी हुई लोई) डाल कर देर तक गरम की जाती है। उससे हलवा बनता है।

गड़ौली धाम पंहुच कर वहां की महुआरी में महुआ बीनते बच्चों से मैंने पूछा – महुआ से क्या बन सकता है? उनके साथ एक बड़ा आदमी भी वहां था। शायद बच्चों का अभिभावक। उसने बताया कि फूल को खोल कर उसमें से पुंकेसर अलग कर दिये जाते हैं और रसीले फूल को बिना पानी डाले पका कर फूलोंं का हलवा बनता है। फूलों का रस पूरी तरह सुखाने पर बनता है यह हलवा।

गड़ौली धाम तक की साइकिल सैर में मुझे महुआ का हलुआ बनाने की दो रेसिपी तो मिल गयीं। सीता जी को ये तो मालुम होंगी ही। इसके अलावा, सीता माई तो पाकशास्त्र में सिद्धहस्त रही ही होंगी। उन्हें तो और भी बहुत आता होगा। आज के जमाने में वे होतीं तो उनका पाकशास्त्र का एक शानदार यूट्यूब चैनल जरूर होता। राम जी के वनवास के खर्च की सारी फण्डिंग उसी से हो जाती! :-D

घर पर मैंने पत्नीजी को यह रेसिपीज बताई तो उन्होने कोई दिलचस्पी न दिखाई। “देखो, अगर तुम्हें मिठाई नहीं खरीदनी तो घर पर आटे और गुड़ का हलवा बन जायेगा। पर महुआ जैसी बेकार की चीज का नाम न लो। मेरी अम्माजी (सास) को महुआ बिल्कुल पसंद नहीं था। वे ललही छठ का व्रत इसलिये नहीं करती थीं कि उसमें महुआ चढ़ाया जाता है।” – पत्नीजी ने मेरा आज का सारा अन्वेषण खारिज कर दिया। उनकी सोच में महुआ विपन्नता की निशानी है। उनके घर में कभी इस्तेमाल नहीं हुआ। “तुम जबरी गंवई, एथनिक बनने के चक्कर में महुआ महुआ करते रहते हो। यह कोई खाने की चीज नहीं है।” – उन्होने मेरी सोच पर फुलस्टॉप लगा दिया।

महुआ का हलवा नहीं बनेगा रामनवमी पर। बस। पीरियड।

खैर, मेरी पत्नीजी एक तरफ। चैत्र का महीना, रामनवमी, वातावरण में महुआ की गंध, टपकता महुआ और बीनती पूरी गांवदेहात की आबादी। मुझे पूरा यकीन है सीताजी, चित्रकूट के वनवास में 12 रामनवमियों पर महुआ का हलुआ जरूर बनाया होगा। और राम जी को बहुत पसंद रहा होगा वह मुच्छी वाला महुआ का हलवा। यह अलग बात है कि इसका जिक्र बाबा तुलसीदास ने रामचरित मानस में नहीं किया। उस मामले में अधूरा है मानस।

गड़ौली धाम जाते अगियाबीर की महुआरी में बिछाई कथरियों पर टपकता महुआ।

आजकल नवरात्रि में हम पति-पत्नी फलाहार पर हैं और नित्य बारी बारी से अपना अंश देते हुये रामचरितमानस का 9 दिवसीय पाठ कर रहे हैं। ये नौ दिन राममय हैं। पर जैसा ऊपर माता सीता के यूट्यूब चैनल की कल्पना है – यह पठन भक्त-भगवान के द्वैत भाव युक्त भले है पर उसमें सख्यभाव भी खूब है। तुलसी का काव्य अद्भुत है; पर जब तब हम उनके साथ भी चुटकी लेते रहते हैं। … उनकी पत्नी ने उनको जो लथेरा, उसके कारण बाबा (माता सीता के अलावा) किसी भी नारी को हीन बताने का मौका नहीं गंवाते। बाबा आज होते तो हमें अपनी लाठी से मार मार कर बाहर निकाल देते या बहुत प्रिय पात्र मान लेते – कहा नहीं जा सकता। पर बाबा के सीधे साट प्रशंसक के खांचे में हम न बैठ पाते।

माता सीता के यूट्यूब चैनल की कल्पना को ले कर सारी भगत मण्डली मुझे ट्रॉल करती जम कर। शायद करे भी। पर आज के जमाने में जो सूपर्नखीय सेलिब्रिटी लोग यूट्यूब-इंस्टाग्राम-फेसबुक के डोपेमाइन न्यूरोट्रांसमिटर उद्दीपन के बिजनेस में लगे हैं; उनके विकल्प की कल्पना होनी ही चाहिये। कचरा अच्छाई से कहीं ज्यादा है इन माध्यमों पर। कलियुग में ईश्वर का अवतार अगर होगा तो इन माध्यमों को आसुरिक उद्दीपन से मुक्त करने के लिये होगा। और यह उद्दीपन इतना विकराल होता जा रहा है कि भगवान को, मातृशक्ति के साथ “अंसन सहित लीन अवतारा” जैसा ही करना होगा।

नया युग है, नये यंत्र हैं, नये असुर हैं और अवतार भी नये रूप में ही होंगे। … नये बाबा तुलसीदास भी होंगे और नये रामचरित मानस भी।… हम जैसे नये काकभुशुण्डि भी होंगे। अपनी कर्कश कांव कांव में रामकथा कहते हुये।

जै जै सियाराम!


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