भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
लालचंद। उम्र सत्तर साल। “चालीस पचास बरिस से गंगा स्नान करत हई (40-50 साल से नित्य गंगा स्नान कर रहा हूं)।” – वह कहता है। ईंटवाँ का घाट बहुत गहरा है। करार के समतल से करीब चार मंजिला मकान जितने नीचे हैं गंगाजी। घुमावदार कच्चा रास्ता, एक खोह की बगल से निकलता हुआ। लोगों ने अपनी सुविधा के लिये सीढ़ियां सी बना ली हैं मिट्टी खोद कर; पर निरंतर प्रयोग करने से सीढ़ियां फिर रैम्प जैसी हो जाती हैं। घुटनों में तकलीफ वाले को नीचे उतरना कष्टप्रद होता है और उम्रदराज के लिये वापसी में ऊंचाई चढ़ना।
लालचंद के साथ दोनो तकलीफें हैं। फिर भी वह नित्य गंगा स्नान करता है। मैं गंगा के जल तक नहीं उतरता। बीच में खड़ा हो कर लोगों को नहाते देखता हूं। नंगे बच्चे, गमछा पहने पुरुष और साड़ी पहने महिलायें। करीब दो दर्जन लोग नहा रहे हैं। सब आनंद और आल्हाद से भरे आवाजें कर रहे हैं। ईंटवाँ घाट अच्छा है – सिवाय उसके काफी गहरा होने के। … नहाने के बाद लालचंद लाठी के सहारे चढ़ाई चढ़ता लौटता दीखता है। मेहनत लगती है ऊंचाई चढ़ने में। वह हरे राम, हरे कृष्ण कहता चढ़ता आ रहा है, मानो यह कहने से ऊर्जा मिलती हो।
नहाने के बाद लालचंद लाठी के सहारे चढ़ाई चढ़ता लौटता दीखता है।
वह एक तौलिया पहने है। हाथ में कचारा हुआ कपड़ा और कांधे पर लुंगी। घर से एक लाठी और तौलिया भर ले कर आता होगा गंगा स्नान के लिये। बाकी, नहाने-सुखाने और कपड़ा कचारने का काम तो गंगा किनारे होता है। उसके पैरों में चप्पल भी नहीं है। इसी गांव – ईंटवाँ का निवासी है तो थोड़ी दूर आने जाने के लिये चप्पल की भी क्या जरूरत? मेरे सामने से वह चलता चला जाता है। कराह वाली आवाज में हरे राम कहता हुआ। थोड़ा आगे चल कर वह कांधे पर रखी लुंगी खोल कर अपने सिर पर कर लेता है। सूरज की गर्मी से भी बचत होती है और लुंगी सूखती भी है। आगे घर पंहुचते पंहुचते लुंगी शायद सूख जाये और शायद वह पहन भी ले।… क्या गजब मिनिमलिस्ट जीवन है।
मेरे सामने से वह चलता चला जाता है। कराह वाली आवाज में हरे राम कहता हुआ। थोड़ा आगे चल कर वह कांधे पर रखी लुंगी खोल कर अपने सिर पर कर लेता है। सूरज की गर्मी से भी बचत होती है और लुंगी सूखती भी है। आगे घर पंहुचते पंहुचते लुंगी शायद सूख जाये और शायद वह पहन भी ले।
मैं तेज कदम चलता हुआ उसके बगल में आ कर उससे बातचीत करने की चेष्ठा करता हूं। वह अपना नाम और उम्र बताता है। चालीस पचास साल से गंगा स्नान की बात करता है। उसकी पत्नी तीज त्यौहार या किसी खास मौके पर ही आती है नहाने। “उतरने चढ़ने में तकलीफ होती है।” पर वह अपने घुटने की तकलीफ के बावजूद रोज आता है।
जवानी में वह दो तीन साल पंजाब (?) नौकरी किया। कागज बनाने वाली कम्पनी में। वहां सब तरह का कागज बनता था – सिवाय नोट और फोटो छापने के कागज के। वह बार बार नाम पंजाब का लेता है पर बताता है कि जगह सहारनपुर थी। उसके बाद कुछ-कुछ महीने वह ग्वालियर, अहमदाबाद, बम्बई, पूना आदि जगहों पर भी नौकरी किया। बाहर रहना जमा नहीं तो वापस आ कर चालीस साल कालीन बुनने का काम किया। महीन से महीन और मोटा से मोटा कालीन बुना। जब शुरू किया था, तब दस रुपया रोज मिलता था। “अब तो चार सौ रुपया मिलता है”। बहुत अंतर आ गया है। काम में भी और काम की मजदूरी में भी।
लालचंद, गांव ईंटवाँ
एक लड़की थी लालचंद की। शादी हो गयी है। अब वह और उसकी पत्नी भर हैं। “जिंदगी कट रही है” – वह कहता है और आगे चल देता है। फिर कुछ चल कर रुक कर बताता है – एक गैया रही, तब दूध की तकलीफ नहीं थी। अब दूध तो नहीं मिलता पर आधा बीघा खेती है सो खाने की तकलीफ नहीं है। दो लोगों का गुजारा हो जाता है।
सत्तर की उम्र, पति पत्नी। पहनने को एक बनियान और लुंगी। खाने के लिये दस बिस्सा खेती। आस्था के लिये घर के बगल में गंगा माई। और क्या चाहिये जीने के लिये? … मैं लालचंद के जीवन के ‘संतोष और सुख’ को नापने का प्रयास करता हूं। पर क्या होगा? लालचंद जैसा निश्चिंत जीवन जी पाना क्या मेरे लिये सम्भव होगा?
सुख और प्रसन्नता के पोथे पढ़ने की कवायद मैं करता हूं। दीर्घजीवन के सूत्रों पर कई किताबें कई बार खरीदी और पढ़ी हैं। पर शायद असल सूत्र तो गंगा किनारे, निरुद्द्येश्य घूमने और लालचंद जैसे लोगों को देखने, बोलने बतियाने में ही मिलेंगे। वही करो जीडी तुम।
आज घूमते हुये देर हो गयी है। नौ बजे तक घर पंहुच जाया करता था। दस बजने को हैं। धूप तेज हो गयी है। बोतल का पानी भी खत्म हो गया है। पत्नीजी फोन पर जल्दी घर लौटने को कह रही हैं। मैं साइकिल तेज चलाता हूं घर लौटने को। पर मन में लालचंद का गंगास्नान वाला जीवन घूमता है!
सब अलग अलग हो गये हैं, पर मेरा कुटुम्ब कुल मिला कर ढाई-तीन सौ लोगों का होगा। या ज्यादा ही बड़ा होगा। सुकुलपुर, तहसील मेजा, प्रयागराज का पुश्तैनी घर तो खण्डहर हो कर गिरा दिया गया है पर उसकी जगह नया बना नहीं। लोग आसपास इधर उधर बस गये हैं। कुछ लोग गांव में ही बना लिये हैं अपने मकान। कुछ प्रयागराज, मिर्जापुर, दिल्ली आदि में हैं। एक शाखा काण्डला चली गयी है और एक पुणे। पर लोग अब भी जुड़े हैं। यदाकदा मिल लेते हैं आपस में। और अब ह्वात्सएप्प है, वीडियो कालिंग है, फेसबुक है। लोगों के पास बोलने को कुछ नहीं होता तो गुड मॉर्निग, जै श्री राम, जै मातादी टाइप स्टेटस और कुछ इधर उधर के फार्वर्ड किये चित्र, वीडियो तो होते ही हैं।
वही सम्बंध हैं, फोन और सोशल मीडिया के माध्यम से; और वही आत्मीय जुड़ाव का तरीका रह गया है। बहुत से परिवारों-कुटुम्बों का वही जुडाव जरीया होगा। यही नियो-नॉर्मल लाइफ है।
उस दिन अखिलेश और उनके छोटे भाई रजनीश ने कहा कि रजनीश की बिटिया का विवाह होना है बाईस अप्रेल को। तिलक 17 अप्रेल को है टेला गांव में। टेला मेरे गांव से पचास किलोमीटर की दूरी पर। वहां जाने में, सिवाय वैशाख की गर्मी के, ज्यादा असुविधा नहीं है। तीन चार घण्टे का समय निकालना है। मैंने कहा कि मैं टेला पंहुचूंगा। रजनीश ने मुझे टेला के आयोजन स्थल – लाल चंद्र मिश्र जी के घर – का गूगल मैप पर लोकेशन प्रेषित कर दिया।
अपने घर से निकल कर नेशनल हाईवे पकड़ जंगीगंज तक की यात्रा उस फिर टेला के लिये किसी स्थान धनतुलसी होते हुये ग्रामीण सड़क पर चलना। कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई। दिक्कत केवल लाल चंद्र जी के घर पंहुचने में हुई। गूगल वाली महिला ने घर की जीपीएस लोकेशन के अनुसार एक पगडण्डी नुमा सड़क पर कार घुसवा दी। केवल झोपड़ियां थीं वहां। एक दो पक्के घर भी जो थे, वे प्रधानमंत्री आवास योजना के पैसे से बने नजर आ रहे थे। पगडण्डी भी इतनी खराब थी कि मेरी छोटी कार लगा कि कहीं पलट न जाये। रोक कर एक महिला से लालचंद्र जी के घर का रास्ता पूछा तो उसने हाथ से दिखा कर करीब दो-तीन सौ मीटर दूर घर दिखाया। पर वहां जाने के लिये रास्ता था नहीं साइकिल या पैदल जाया जा सकता था। गूगल वाली महिला सन्न मार गयी थी। उसके अनुसार (शायद) गूगल का काम खत्म हो गया था।
जहां पंहुचे थे, वहां कार मोड़ने की भी जगह नहीं थी। अभिमन्यु या अंगद की सी दशा। बैकट्रेक करना कठिन काम। गुलाब (मेरे ड्राइवर साहब) ने किसी तरह मेरी साबुनदानी नुमा कार -ऑल्टो के-10 – बैक की। उसके बाद लालचंद्र मिश्र जी का घर कम से कम पांच लोगों से पूछते हुये नियत घर पर पंहुचे।
मिश्र जी के अहाता में घुसते ही तेज आवाज में लाउडस्पीकर पर गायन सुनाई पड़ा – रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे। यह कोई रिकार्ड नहीं बज रहा था। बाकायदा आरकेस्ट्रा का इंतजाम था। मंच पर म्यूजिकल तामझाम के साथ एक खुले केश वाली महिला हाथ में माइक थामे, फुल कॉन्फीडेंस में गा रही थी।
जीपीएस पर, गूगल पर और गूगल वाली महिला – गूगलाइन – पर यकीन तो करना चाहिये पर नुक्कड़ पर यूंही समय गुजारते, इंदारा पर पानी खींचते या मचिया पर बैठे गपियाते लोगों के ईको-सिस्टम की अनदेखी कर नहीं। लास्ट माइल कनेक्टिविटी में गूगलाइन भाग खड़ी होती हैं। काम गांवदेहात के लोग ही आते हैं – “इहई खड़ंजा पकड़े चला जा। ओकरे बाद पीपर के पेड़े के बगलियां से जायअ। अनुपम क घर पूंछि लेह्यअ…” पता नहीं गूगलाइन कब यह भाषा बोलना सीखेगी। गूगलाइन और गांवगिरांव की गोमतिया जब एक जैसे तरीके से और एक जैसी टोन में निर्देश देने में सक्षम होंगी, तभी भारत में आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस सफल माना जायेगा। :lol:
आश्चर्य और शॉक अभी और भी मिलने थे। मिश्र जी के अहाता में घुसते ही तेज आवाज में लाउडस्पीकर पर गायन सुनाई पड़ा – रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे। यह कोई रिकार्ड नहीं बज रहा था। बाकायदा आरकेस्ट्रा का इंतजाम था। मंच पर म्यूजिकल तामझाम के साथ एक खुले केश वाली महिला हाथ में माइक थामे, फुल कॉन्फीडेंस में गा रही थी। बहुत कुछ वह अंदाज जैसा मनोरंजन वाले टीवी चैनलों पर नयी प्रतिभायें दिखाती हों। मुझे अपनी पत्नीजी का ऑफ्ट-रिपीटेड कहना याद हो आया – “मेरे बब्बा होते तो यह सब देख कर गोली मार देते!”
घर के अहाते के खुले में नाश्ता, बातचीत, पैलगी-आशीर्वाद का दौर पूरा हुआ
बब्बा को गये तीन दशक हो गये हैं। दो पीढ़ियाँ जन्म ले चुकी हैं उनके बाद। गांवदेहात बहुत तेजी से बदल रहा है। पर तब भी; इतनी मशक्कत कर अगर गंगा किनारे के इस गांव टेला में न आया होता तो यह अनुभव कहां पाता?! अपने घर से जिसे निकलने में कष्ट हो, उसे 50 किमी दूर किसी जगह जाना हो तो वह मशक्कत ही तो है?!
आंगन में बांस, हल, मूसल, चकरी आदि शुभकार्य के प्रतीक जमा थे। पण्डित लोग जम गये थे। बांयी ओर ओसारे में महिलायें तैनात थींं कि पण्डित मंत्रोच्चार टर्राना शुरू करेंं तो उनकी गारी का गायन प्रारम्भ हो। पूरी तरह एथेनिक वातावरण।
घर के अहाते के खुले में नाश्ता, बातचीत, पैलगी-आशीर्वाद का दौर पूरा हुआ और उसके बाद तिलक लगने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। लालचंद्र मिश्र जी के घर के आंगन में सब पंहुचे। आंगन मीडियम साइज का था। उसके गच्चे पर स्टील की पट्टियां लगीं थी। कोई उससे नीचे नहीं गिर सकता था और पूरी छत का उपयोग भी हो सकता था। नीचे आंगन में बांस, हल, मूसल, चकरी आदि शुभकार्य के प्रतीक जमा थे। पण्डित लोग जम गये थे। बांयी ओर ओसारे में महिलायें तैनात थींं कि पण्डित मंत्रोच्चार टर्राना शुरू करेंं तो उनकी गारी का गायन प्रारम्भ हो। पूरी तरह एथेनिक वातावरण। हजार साल पहले भी कमोबेश यही सीन हुआ करता रहा होगा। थोड़ा बदलाव यह था कि हर कोई अपने मोबाइल थामे कैमरामैन का रोल अदा कर रहा था। और फ्लैश वाले, कैमरा लटकाये भी कई थे – चारपांच रहे होंगे। डिजिटल युग में फोटो खींचना, वीडियो बनाना बांये हाथ का खेल हो गया है। एक दशक में लोग मूवी बनाने में भी सिद्धहस्थ हो जायेंगे। घर घर वीडियोग्राफी होगी और लेखक लोग किताब लिखने की बजाय गांवदेहात के तिलक, शादी, तेरही आदि की फिल्मोग्राफी के स्क्रिप्ट बेंंचा करेंगे।
विनोद मुझे टोकते हैं – “देखो, अब असली माल-ताल दिया जा रहा है, अब फोटो लीजिये। बैठे बैठे फोटो नहीं आयेगा, तन्नी खड़े हो कर लेना पड़ेगा।” मैं देखता हूं कि एक साथ चारों ईवेंट फोटो/वीडियोग्राफर “माल-ताल” पर ही फोकस किये हैं। फ्लैश वाले भी उसी पर फ्लैश चमकाये जा रहे हैं। शादी गौण है, लड़का-लड़की गौण हैं। असली सत्य ‘माल-ताल’ है। यही ब्रह्म विद्या है, यही ब्रह्मज्ञान है! :-D
एक फोटोग्राफर को मैं कोई काम का जंतु लगा हूँगा, सो वह मेरा चित्र खींचने आ गया। उसके उलट, मैंने उसका चित्र खींचने के लिये मोबाइल सेट किया तो वह लजा गया। फोटो खींचने वाले का ही फोटो खींचना बड़ा रोचक कृत्य है। बंदा किस तरह से अपनी एक आंख बंद करता है; उसके मुंह की पेशियां किस तरह से सिकुड़ती हैं – यह ठीक से रिकॉर्ड करना एक बढ़िया चित्र बन सकता है। पर मुझमें वह कला नहीं और रात आसन्न थी, तो रोशनी का भी सहारा नहीं था। फिर भी चित्र लिया तो सही।
फोटो खींचने वाले का ही फोटो खींचना बड़ा रोचक कृत्य है। बंदा किस तरह से अपनी एक आंख बंद करता है; उसके मुंह की पेशियां किस तरह से सिकुड़ती हैं – यह ठीक से रिकॉर्ड करना एक बढ़िया चित्र बन सकता है।
तिलक कितना चढ़ा? यह मुख्य चर्चा होती है। सब कुछ सबके सामने खोल कर रखा, दिखाया जाता है। मेरे पास बैठे, मेरे गांव सुकुलपुर के विनोद मुझे टोकते हैं – “देखो, अब असली माल-ताल दिया जा रहा है, अब फोटो लीजिये। बैठे बैठे फोटो नहीं आयेगा, तन्नी खड़े हो कर लेना पड़ेगा।” मैं देखता हूं कि एक साथ चारों ईवेंट फोटो/वीडियोग्राफर “माल-ताल” पर ही फोकस किये हैं। फ्लैश वाले भी उसी पर फ्लैश चमकाये जा रहे हैं। शादी गौण है, लड़का-लड़की गौण हैं। असली सत्य ‘माल-ताल’ है। यही ब्रह्म विद्या है, यही ब्रह्मज्ञान है! :-D
तिलक संस्कार पर कल एक स्टेटस भेजा था मैंने। उसपर एक टिप्पणी सटीक थी तिलक के बदलते स्वरूप पर। तिलक कितना वही है और कितना बदला है समय के साथ –
पहले टीका फलदान के बजाय टका-बीड़ा होता था एक रुपये का सिक्का और पान। फिर टीका फलदान आया वर पक्ष के पूरे कुटुंब के कपड़े, लड़की और उससे छोटे भाई-बहनों के कपड़े। अब रोका सगाई रिंग सेरेमनी होने लगी करण जौहर की कृपा से और शादी जैसा तामझाम संगीत डीजे दिखावा दिखावा और सिर्फ दिखावा
तिलक अनुष्ठान सम्पन्न होने पर भोजन पर टूटा गया। भोजन व्यवस्था उम्दा थी। ज्यादा खा नहीं पाया। मेरे ड्राइवर साहब ने बताया – “गुलाबजामुन थी, गाजर का हलवा भी और ऊपर से आईसक्रीम। हम त तिन्नो खाये।” खैर, मैंने दोसा खा कर ही संतोष किया। जब जठराग्नि प्रबल थी, तब तिलक जैसे समारोह के लिये समय नहीं था। अब जब नापतोल कर भोजन करना होता है तो गुलाबजामुन, गाजर का हलवा और आईसक्रीम सब की बात ललचाती भर है। भाग्य में तो स्वल्पाहार और रात में बिना भूले ईसबगोल का सेवन ही है।
घर आ कर ब्ल्यू-जोंस वाली साइट पर Life Expectancy Test का दो साल बाद रिपीट करता हूं। उसके अनुसार मेरी लाइफ एक्स्पेण्टेन्सी डेढ़ साल बढ़ गयी है। अगर मैं अपनी “आदतें” सुधार लूं तो तेरह साल और जी सकता हूं।
सो अब जिंदगी तिलकही अटेण्ड करने, भोजन पर लगाम रखने और “आदतें” सुधारने में ही लगानी है। वही कर रहा हूं। आपको भी देर सबेर वही करना होगा! :-)
मेरी पत्नीजी का बार बार कहना है कि गड़ौली धाम तक गर्मी के मौसम में 12-14 किलोमीटर साइकिल चलाना अपने साथ ज्यादती है। सप्ताह में कभी कभी जाना तो ठीक है पर रोज रोज उधर निकल लेने की बजाय और भी कुछ है जो देखना, लिखना चाहिये। मैं भी सोचता हूं कि विषयांतर होना ही चाहिये।
क्या किया जाये, कटका स्टेशन की चाय की चट्टी थाम ली जाये? प्रयागराज के सिविल लाइंस के कॉफी हाउस की याद होती है। हम – मेरे वरिष्ठ उपेंद्र कुमार सिंह जी और मैं – वहां अपने रेल परिचालन के बोझ से हल्का होने के लिये यदा कदा दफ्तर छोड़ चुपचाप निकल जाया करते थे। आधा एक घण्टा व्यतीत कर लौटने पर कुछ हल्कापन महसूस होता ही था। अब उपेंद्र जी का साथ नहीं है। यूं देखें तो गांव में पत्नीजी के अलावा किसी का भी साथ नहीं है। यहां कॉफी हाउस तो मिल ही नहीं सकता। पर रेलवे स्टेशन के आसपास चाय की दुकानें जरूर हैं, जहां कुछ समय गुजारा जा सकता है।
उन्नीस सौ पचास के दशक में प्रयाग के कॉफी हाउस में साम्यवादी (प्रगतिवादी) और रचनात्मक (परिमल के नाम से जाना जाता समूह) लेखक/कवि जुटा करते थे। मेरे ब्लॉग पर हेमेंद्र सक्सेना जी के संस्मरणों में उनका उल्लेख है। वैसा गांव में तो सम्भव है ही नहीं; लेशमात्र भी नहीं। किसी गरिष्ठ विषय पर अगर मैं लोगों को कुछ बोलने बतियाने की कोशिश करूं तो वे बड़ी जल्दी मुझसे कट लेंगे। पर उनके पास बैठ कर उनके बारे में, गांवगिरांव के बारे में बतियाना-जानना भी एक अलग तरह का संतृप्त करने वाला अनुभव हो सकता है। और असल में वही अनुभव प्रगतिवादी या परिमल समूह के साहित्यकारों को भी मानसिक खाद-पानी-धूप देता रहा होगा। रिटायरमेण्ट के शुरुआती महीनों में मैंने वह शुरू भी किया था, पर फिर कुछ अनचाहे कारणों से वह जारी न रह सका। अब वह पुन: किया जा सकता है। चाय की चट्टी थामी जा सकती है।
चाय की चट्टी (या उस जैसे अड्डे) निठल्ले आदमी को भी ‘मानसिक हलचल’ के लिये गतिमान बना सकते हैं! :-)
आज वह किया। सवेरे देखा तो कटका स्टेशन रोड पर एक नयी चाय की दुकान आ गयी है। दुकान पर पालथी मारे एक सांवला सा नौजवान, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये विराजमान है।
आज वह किया। कई महीनों बाद कटका स्टेशन की ओर निकला। देखा कि स्टेशन रोड पर एक नयी चाय की दुकान आ गयी है। दुकान पर पालथी मारे एक सांवला सा नौजवान, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये विराजमान है। भट्टी दहक रही है। पर्याप्त मात्रा में जलेबी छन चुकी है और समोसे तलने का भी तीन चौथाई काम पूरा हो चुका है। तीन चार ग्राहक बैठे हैं। दुकान वैसी नहीं थी, जैसी आधे अधूरे मन और संसाधनों के साथ खोली जाती है और कुछ समय बाद बंद हो जाती है।
यह चट्टी, बतौर अड्डा, थामने के लिये मुकम्मल जान पड़ी!
पता चला कि नौजवान का नाम मनोज कुमार है। वह स्कूल टीचर बनने के लिये तैयारी कर रहा है पर साथ ही जीविका के लिये चाय-नाश्ते की दुकान भी खोल ली है। दुकान सवेरे पांच बजे खुल जाती है। जब मैं पंहुचा तो साढ़े सात बज रहे थे। समोसे का साइज सामान्य से बड़ा लग रहा था। गरम छनता समोसा टैम्प्ट कर रहा था। पर मैंने समोसे पर जोर नहीं मारा। मनोज से पूछा कि चाय पिला सकते हैं? बिना शक्कर।
बहुत जल्दी ही, दुकान पर उपलब्ध दूध और अदरख का प्रयोग कर बनाई गयी चाय। एक कुल्हड़ में चाय छान कर थमा दी गयी।
और बहुत जल्दी ही, दुकान पर उपलब्ध दूध और अदरख का प्रयोग कर बनाई गयी चाय। एक कुल्हड़ में चाय छान कर थमा दी गयी। बाकी बची चाय थर्मस में भर कर रख दी गयी। बनाने की स्पीड अच्छी थी; सर्विस अच्छी थी। मुझे बैठने के लिये बेंच भी मनोज के पिताजी ने अपने गमछे से साफ की। यानी, पर्याप्त आदर दिया बैठने के लिये।
मनोज के पिताजी ने बताया कि वे मेरे साले साहब को वर्षों से दूध सप्लाई करते रहे हैं। अभी भी करते हैं। विनोद सवेरे पांच बजे दुकान खोलते हैं। उनका कहना था कि अगर मैं पांच बजे भी घूमने निकलूं तो यहां इस अड्डे पर चाय मुझे मिल सकेगी। पांच बजे से जलेबी, लौंगलता और उसके बाद समोसा बनाने का काम धाम होता है। समोसा खाने के लिये थर्मोकोल के दोने में ‘मटर का छोला’ भी उपलब्ध होता है। आमतौर पर आसपास के लोगों का नाश्ता एक या दो समोसा-छोला और एक टुकड़ा जलेबी होता है। चाय के ग्राहक कम होते हैं। समोसा और जलेबी लोग खरीद कर घर पर नाश्ता करने के लिये ले जाते हैं।
मनोज का समोसा चार रुपये का है और जलेबी पच्चीस रुपया पाव। मैंने स्वाद परखने के लिये कुछ समोसे खरीदे। घर आ कर चखने पर और लोगों को तो अच्छे लगे, मुझे नहीं। उसमें लहसुन के पेस्ट का प्रयोग हुआ था। नॉन-लहसुन-प्याजेटेरियन व्यक्ति को लहसुन की थोड़ी सी भी मात्रा कष्ट देती है। :-D
गांव के रोड साइड रेलवे स्टेशन की बजरिया की चाय की दुकान। मुझे किसी महानगरीय कॉफी शॉप की अनुभूति का नोश्टाल्जिया ले कर नहीं ही चलना चाहिये। मनोज के पिताजी के गमछे से साफ की गयी बेंच या टाट बिछाई दुकान की मुंडेर बैठने के लिये पर्याप्त है। सामने ही अदरक कूट कर चाय बनाने और कुल्हड़ में छान कर परोसने का अपना अपना नोश्टाल्जिया है।
पांच सात ब्लॉग पोस्टें मनोज की चाय की चट्टी के नाम पर हो ही जायेंगी। पता चला कि मनोज सपाई है। इसी बहाने कभी न कभी भाजपा-सपा की राजनीति पर भी कुछ कहने लिखने को मिल जायेगा। और गांवदेहात के भांति भांति के ग्राहक आते हैं; उनकी अपने अपने स्तर की, अपने अपने कंसर्न की बातें होती हैं। वह सब भी देखना, समझना, लिखना हो सकेगा।
चाय का कुल्हड़
मेरी जेब में पैसे नहीं हैं। मोबाइल-स्मार्टफोन युग में सवेरे सैर को निकलते समय घड़ी पहनने और जेब में पैसे ले कर चलने की आदत खत्म हो गयी है। खैर, मनोज की दुकान पर भीम-एप्प का एक क्यू-आर कोड का स्टिकर दिख गया। उससे पेमेण्ट किया। पता चला कि वह खाता सामने के किसी “त्रिपाठी इलेक्ट्रिकल” दुकान वाले सज्जन का है। मनोज का अपना खाता न होने के कारण उनका क्यूआर कोड लगा लिया है, जिससे मेरे जैसे किसी ग्राहक को भी सामान खरीदने, पैसा देने में दिक्कत न हो और कोई ग्राहक इस आधार पर न टूट जाये। मनोज की ग्राहकी थामने की यह जुगत भी अच्छी लगी मुझे।
अब आगे भी, कल सवेरे से मनोज की चाय की चट्टी पर! :-)