बड़वाह


31 अक्तूबर 21 रात्रि –

ॐकारेश्वर से बड़वाह पंहुचने में ज्यादा समय नहीं लगा और तब प्रेमसागर को बताया गया कि यहीं रुकना है। “पहले पता होता तो कल ॐकारेश्वर में जल चढ़ाने के बाद कल ही यहां पंहुच गया होता।” – प्रेमसागर ने मुझे बताया। यह चूक इसी कारण से हुई कि आपकी यात्रा कोई और नियोजित कर रहा है और आपका उससे सम्प्रेषण भी बराबर नहीं होता। पर इसे चूक भी कहा जाये या नहीं? प्रेमसागर तेज रफ्तार से कांवर यात्रा कर रहे हैं और उन्हें कुछ समय अपनी अनवाइण्डिंग के लिये व्यतीत करना चाहिये। आज वह अवसर मिल गया। यह अलग बात है कि बड़वाह के पहले उन्हे लूट लिया गया था, पर बड़वाह रुकने और आराम करने के लिये अच्छी जगह है।

बड़वाह भ्रमण के दौरान एक ब्लाइण्ड टर्न का चित्र प्रेमसागर ने भेजा।

वैसे वह लूट वाला हादसा कोई क्षति नहीं पंहुचाया प्रेमसागर को, सिवाय मानसिक कष्ट के। पर उस कष्ट को कमतर कैसे आंका जा सकता है? मैं होता तो शायद यात्रा (कम से कम अस्थायी रूप से) स्थगित या खत्म कर देता। प्रेमसागर को यात्रा नियोजन में भले ही कम अंक दिये जायें, उनके संकल्प और ध्येय पर अडिग रहने में तो ए++ ग्रेड मिलेगी!

प्रेमसागर के पैरों में चक्र है। सो अनवाइण्डिंग के दौरान भी बड़वाह के कई दर्शनीय स्थानों को देख आये। नर्मदा किनारे बसा बड़वाह एक नगरपालिका है, गांव नहीं। उसके आसपास चोरल और एक दो अन्य नदियां नक्शे में दिखती हैं। कई पौराणिक स्थल हैं इस नगरपालिका सीमा में और आसपास। कई चित्र प्रेमसागर ने बड़वाह भ्रमण के मेरे पास भेजे हैं।

इस ब्लॉग के पाठक शैलेंद्र पण्डित इसी स्थान के हैं। वे अपना दु:ख व्यक्त करते हैं कि प्रेमसागर उनके पैत्रिक घर के पास से गुजर रहे हैं, और वे उनका स्वागत नहीं कर सकते।

शैलेंद्र पण्डित (दांये) अपने माता पिता (अशोक और शीला पण्डित), पत्नी प्रिया और बेटी ग्रीषा के साथ। वैष्णो देवी यात्रा के दौरान लिया चित्र।

शैलेंद्र से मुझे इस यात्रा विवरण लिखने में बहुत सहायता मिली है। उनके महत्वपूर्ण इनपुट्स थे नर्मदा के हरसुद बांध बनने के बाद के स्वरूप पर। उनका प्रयोग मैं नहीं कर पाया। मैंने प्रेमसागर को यह कहा है कि बांध बन जाने के बाद नर्मदा के जलराशि में आये परिवर्तन को यात्रा में मिलने वाले चालीस साल से ज्यादा उम्र के लोगों से पूछें। हो सकता है जैसे गंगा आज अत्यधिक दोहन के कारण आईसीयू में हैं, नर्मदा भी अपना सौंदर्य खो चुकी हों, या खो रही हों।…. शैलेंद्र और उन जैसे कई लोग हैं जिनके योगदान को मुझे स्वीकार करना चाहिये। वह मैं समय समय पर याद करने और लिखने का प्रयास करूंगा।

प्रेमसागर के बड़वाह भ्रमण के चित्रों में दो नाम मुख्य रूप से स्पष्ट होते हैं – च्यवन ऋषि और महोदरी माता। च्यवन ऋषि को ले कर एक कथा एक बड़े से पट्ट पर लिखी है, जिसका चित्र प्रेमसागर ने भेजा –

च्यवन गौड़ ब्राह्मण समाज; जो च्यवन ऋषि से अपनी उत्पत्ति मानता होगा; ने यह शोध और सेवा समिति बनाई है। यह समिति महाभारत के वन पर्व की कथा को उधृत करते हुये यह पट्ट लिखती है। महाभारत में व्यास और सूतों के युग के बाद, जब वह ग्रंथ ब्राह्मणों के हाथ लगा तो उसमें ब्राह्मण वर्ग की महिमा बखानते हुये बहुत कुछ जोड़ा गया। ऋषि च्यवन का आख्यान भी उसी युग का प्रभाव हो सकता है। फिलहाल, एक निरीह सी राजकन्या सुकन्या को दीमक की बाम्बी में तपस्या करते ऋषि की आंखे फोड़ देने पर उसके पिता द्वारा ऋषि की सेवा में छोड़ देने का पितृसत्तात्मक समाज का असंवेदनशील कृत्य रुचता नहीं। और फिर ऋषि का युवक के रूप में रूपांतरण मुझे पौराणिक काल की इंसटेण्ट कर्म फल वाली कथाओं जैसा लगता है। उन कथाओं में गलत काम का तुरत नतीजा वाली ढेरों कथायें हैं। वे मुझे बहुत प्रभावित नहीं करतीं, पर हिदू समाज मेधा और श्रद्धा के विभिन्न स्तरों पर आज भी है। बहुत से लोगों को ये कथायें बहुत अपील करती हैं। हम लोग तो इंस्टेण्ट कॉफी और इंस्टेण्ट नूडल्स में ही मगन हो जाते हैं; पौराणिक हिंदुत्व इंस्टेण्ट कर्मफल से अंटा पड़ा है।… मुझे अपने धर्म में गूढ़ तत्व तो मात्र प्रस्थान-त्रय ग्रंथों (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता) में दिखता है जो निचोड़ है। बाकी जो है, उसे हर व्यक्ति को स्वादानुसार लेना चाहिये। च्यवन ऋषि जैसे रहे हों, उनका च्यवनप्राश तो आज डाबर, झाण्डू, बाबा रामदेव आदि अनेकानेक को समृद्ध बना चुका है। भविष्य में च्यवनप्राश का शर्कराहीन वैरियेण्ट भी च्यवन ऋषि का नाम उज्ज्वल किये रहेगा। उनके बड़वाह के तपोस्थल पर एक कुण्ड का चित्र भी प्रेमसागर ने भेजा है, जिसके बारे में किंवदंति है कि उसका जल नेत्र-व्याधियों को हरने में समर्थ है। वह जल इस समय तो साफ नहीं दिखता। कभी उसमें औषधीय तत्व रहे होंगे। या अब भी हों, शैलेन्द्र पण्डित बता सकते हैं।

वन विभाग के रेस्ट हाउस में प्रेमसागर को भगवान जी केवट मिले। वे सेवा निवृत्त हो चुके हैं पर तीन साल से विभागीय सेवा पर ही हैं। पास के दो तीन किलोमीटर दूर गांव के रहने वाले हैं पर अपना सारा समय वन विभाग के रेस्ट हाउस को ही देते हैं। उनकी बहुत उपयोगिता होगी, तभी एक्स्टेंशन पर हैं और विभाग उन्हें छोड़ना नहीं चाहता।

वन विभाग के रेस्ट हाउस में प्रेमसागर को भगवान जी केवट मिले। वे सेवा निवृत्त हो चुके हैं पर तीन साल से विभागीय सेवा पर ही हैं।

ऊफ्फ! मेरा विभाग भी मुझे बहुत उम्दा मानता था। मेरे रिटायरमेण्ट के समय जो प्रशस्तिगायन हुआ था, उसे सच माना जाये तो मुझे आजीवन उसी पद पर बने रखा जाना चाहिये था। पर रिटायरमेण्ट से पहले ही मेरे पद पर बैठने को कई अधिकारी आतुर थे! …. भ्गवान जी केवट के पद से किसी को कोई ईर्ष्या नहीं होगी और उनकी कार्यकुशलता वास्तव में उत्तमोत्तम होगी। मैं उनको शुभकामनायें देता हूं। काहे कि, प्रेमसागर उनके आतिथ्य से गदगद महसूस कर रहे थे।

कल सवेरे प्रेमसागर माहेश्वर की यात्रा पर आगे बढ़ेंगे। उसका विवरण अगली पोस्ट में।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

ॐकारेश्वर जल अर्पण और बड़वाह


30 अक्तूबर 21, रात्रि –

सवेरे प्रेमसागर ने अनेक चित्र भेजे नर्मदा माई के विहंगम दृश्य के। शायद वन विभाग का रेस्ट हाउस ऊंचाई पर है या पास में कोई एसा स्थान है जहां से यह विस्तार दिखाई देता है। या यह उनको नये मिले मोबाइल के कैमरे का प्रभाव हो सकता है। चित्र में रंग और सूक्ष्मका भी स्पष्ट अंकन बेहतर है। यह कुछ वैसे ही है जैसे कुछ अनहोनी (प्रेमसागर से हुआ कल का हादसा) होने पर अचानक आंखों की दृष्टि बेहतर हो गयी हो। सवेरे नर्मदा के जो चित्र भेजे हैं उनमें नर्मदा के दूसरे तट पर बसावट, मंदिर आदि दिखते हैं। ॐकारेश्वर मंदिर उस तट पर है। एक पुल के माध्यम से उस पार जाया जाता है। मैं जब वहां दो दशक पहले गया था तो उसकी हल्की स्मृति है।

नर्मदा तट, ॐकारेश्वर

ज्योतिर्लिंग की स्थिति और वहां के आसपास के दृश्य बहुत धुंधले हैं यादों में। पर इतना जरूर याद है कि सब स्थान बहुत खुला खुला नहीं था। सीढ़ियां चढ़ने या मंदिर में दर्शन करने में संकरेपन और पुरतनता का भाव जरूर था। बहुत कुछ वैसा ही जैसा विंध्याचल के मंदिर में होता है। नर्मदा किनारे शंकर जी का वास करना तो समझ में आता है, पर संकरी जगहों पर, फिसलन वाले रास्ते और सीढ़ियों के बीच स्थान बना कर रहना क्यूं रहना चाहते हैं वे? बनारस या प्रयाग में शिवकुटी – जहां उनके आसपास रहने वाले लोगों ने अपने घरों में शिवजी की पिण्डी घेर कर मंदिर को आत्मसात कर लिया है – वहां भी शिवजी के साथ यही कुछ हुआ दिखता है।

ॐकारेश्वर – हमारे सभी देवस्थानों का मोदीफिकेशन होना चाहिये जैसे बनारस में विश्वेश्वर मंदिर का हो रहा है

हमारे सभी देवस्थानों का मोदीफिकेशन होना चाहिये जैसे बनारस में विश्वेश्वर मंदिर का हो रहा है और जहां अब मंदिर की वह छ्टा दिख रही है, जो ज्ञानवापी मस्जिद अतिक्रमण के बाद कभी नहीं दिखी। पर अतिक्रमण मात्र मुस्लिम आक्रांताओं के द्वारा ही नहीं हुये हैं, लोगों ने अपने को बसाने के लिये मंदिरों का अपने छुद्र लाभ के लिये अतिक्रमण किया है। और अब कोई भी परिवर्तन, कोई भी सौंदर्यीकरण को वे धर्म के नाम पर ही रोकने का प्रयास करते हैं।

मंदिर परिसर का एक दृश्य

खैर, जो “मोदीफिकेशन” वाराणसी में गंगाजी से विश्वेश्वर मंदिर के कॉरीडोर का हो रहा है, वैसा ही कुछ अन्य महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों का भी हो तब आनंद आये। उसमें ॐकारेश्वर भी एक हो। मां नर्मदा में जो भव्यता है, उससे ॐकारेश्वर मंदिर के प्रवेश में तालमेल दिखता ही नहीं। अण्ट-शंट बैरीकेड, पोस्टर और बेतरतीब प्रवेश। ममलेश्वर महादेव कहां किचिर पिचिर तरीके से रहते हैं। यह मोदीफिकेशन – परिवर्तन जरूरी है। और यह परिवर्तन तभी हो सकता है जब किसी प्राइम मूवर में विराट दृष्टि हो। नरेंद्र दामोदर दास मोदी में वह विराटता परिलक्षित होती है।

मंदिर परिसर में पण्डित दुर्गेश तारे और प्रेमसागर। नेपथ्य में ज्योतिर्लिंग है।

प्रेमसागर ने आज अमरकण्टक का जल ॐकारेश्वर महादेव को चढ़ाया। साथ में दुर्गेश पण्डिज्जी थे। दुर्गेश तारे जी। उनकी फेसबुक पोस्ट मेरी बिटिया ने मुझे भेजी। दुर्गेश गुरूजी उनके यहां फुसरो-बोकारो में भी पैठ रखते हैं। प्रेमसागर ने बताया कि बड़े भव्य तरीके से मंत्रोच्चार के साथ दुर्गेश पण्डित जी ने जल चढ़वाया। दिव्य अनुभूति हुई प्रेमसागर को! जिस प्रकार से दुर्गेश जी की प्रशंसा की, उसके अनुसार कभी उनसे मिलना चाहूंगा। धर्म के मुद्दे पर नहीं, व्यक्ति के रूप में, मैत्री के लिये!

यहां ज्योतिर्लिंग पर जल अर्पण के साथ प्रेमसागर ने आंकड़े में 25 प्रतिशत यात्रा-ध्येय सम्पन्न कर लिया है। बारह में से तीन ज्योतिर्लिंग उन्होने पदयात्रा में देख लिये हैं। प्रिय-अप्रिय (लगभग प्रिय ही) अनुभव उन्हें हुये हैं। आगे भी सकुशल यात्रा सम्पन्न होगी, उसकी सम्भावना बलवती हो गयी है – मेरे जैसे शंकालू प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के मन में भी यह लग गया है कि प्रेमसागर श्रद्धा के पाले में सीरियस प्लेयर हैं। यह, बावजूद इसके कि मैं हर कदम पर उनसे असंतुष्टि का भाव रखता हूं और उनकी कमियों पर कुढ़ता रहता हूं। वे कांवर यात्रा के मिशन पर हैं और मैं लेखन की कुढ़न पर हूं। दोनो अपने अपने प्रकार से सीरियस प्लेयर हैं! :lol:

दिनेश गौड़ प्रेमसागर को दर्शन कराने ले गये थे।

जल अर्पण के अलावा कुछ खास काम नहीं किया प्रेमसागर ने। वन विभाग के दिनेश गौड़ उनके साथ गये थे मंदिर। उनका ध्यान रखने वाले दिनेश ही हैं ॐकारेश्वर में। कोई चुनाव चल रहे थे वहां और बाकी सभी कर्मचारी चुनाव ड्यूटी पर थे। दिनेश भी थोड़ी देर ही उनके साथ घूम सके।

31 अक्तूबर 21, सवेरे –

मोरटक्का की ओर से नर्मदा पुल

प्रेमसागर सूर्योदय के बाद माहेश्वर के लिये निकले। मैंने आठ-साढ़े आठ बजे उनसे बात की तो वे मोरटक्का पंहुचे थे। दिनेश गौड़ उन्हें छोड़ने आये थे और वे वापस जा चुके थे। माहेश्वर ॐकारेश्वर से 77 किलोमीटर दूर है। मैंने प्रेमसागर से कल भी पूछा था और आज सवेरे भी कि उनका अगला पड़ाव कहां होगा। पर प्रेमसागर को वह मालुम नहीं था। “एसडीओ साहब को फोन कर पता करता हूं।” उनका उत्तर था। पदयात्री किसी और के नियोजन और किसी और के निर्देशन पर यात्रा करे; वह भी छोटी मोटी नहीं, भारत भ्रमण की; यह अनिश्चय अटपटा लगता है। पूरी तरह असहज करने वाला। प्रेमसागर कहते हैं कि वे मनोविज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं और लोगों का मनोरथ समझने का पूरा प्रयास करते हैं। अगर ऐसा है, तो उन्हें समझ आना चाहिये कि यह अनिश्चित प्रकार की यात्रा और लोगों की बैसाखी से चलना मुझे रुचता नहीं। अगर वे गूगल मैप देखने में दक्ष नहीं हैं, और मैं जानता हूं कि वे उसका प्रयोग करते ही नहीं; तो उनके पास अच्छे और विस्तृत मैप कागज पर होने चाहियें। मुझे नहीं लगता कि वे भी उनके पास हैं। उनकी यात्रा के लिये मैं इतनी दूर बैठा अपना बहुत सा समय एटलस और गूगल मैप देखने में लगाता हूं। मुझे डिजिटल या मानसिक यात्रा के लिये वह सब करना होता है। पर प्रेमसागर वास्तविक यात्री हो कर भी वह सब नहीं करते। :sad:

मेरे पास केवल मेरी पत्नीजी हैं अपनी भावना-खीझ-कुढ़न व्यक्त करने के लिये। पर वह जब भी करता हूं, वे प्रेमसागर के पक्ष में आ जाती हैं – “वह बहुत कुछ सीख गया है। बहुत कुछ कर रहा है। तुम्हारे इतना सब कहे के अनुसार अपनी प्रवृत्ति से अलग करने-सीखने की पूरी कोशिश कर रहा है। खुद तुम एक किलोमीटर नहीं चल सकते। वह नदी-पहाड़ लांघ कर नंगे पैर चले जा रहा है तो उसमें हमेशा गलतियां निकालते रहते हो। जिंदगी भर हर किसी को अपने जैसा मान कर उससे डिमाण्ड करते रहे; अब उस गरीब को पकड़ लिया है तुमने पेरने के लिये।”

बड़वाह रेस्ट हाउस परिसर का बगीचा

प्रेमसागर आज इग्यारह बजे तक बड़वाह पंहुचे और एसडीओ साहब ने कहा कि यहां उन्हे रुकना है। कल रवाना होंगे माहेश्वर के लिये। माहेश्वर 52 किमी दूर है। आज की यात्रा 16 किमी की रही। कायदे से बड़वाह एक सही मुकाम नहीं बनता। पर जो बना, सो बना।

हर हर महादेव।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
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प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

प्रेमसागर के साथ लूट, ॐकारेश्वर से पहले


29 अक्तूबर 21, रात्रि –

किसी हादसे की आशंका प्रेमसागर को शुरूआत में ही रही थी। वे मुझसे अमरकण्टक के बाद वन में छिनैती की आशंका व्यक्त कर रहे थे। मैंने सहायता के लिये प्रवीण दुबे जी से कहा। उन्होने केवल उसका ही नहीं आगे यात्रा का मुकम्मल इन्तजाम कर दिया था। और सब सही चल रहा था, पर कल हादसा हो ही गया।

कुल 9 लोग थे। तीन मोटरसाइकिल पर। प्रेमसागर के अनुसार 18-20 साल की उम्र के रहे होंगे। दो गेरुआ पहने थे, बाकी पेण्ट-शर्ट। बड़वाह के चार पांच किलोमीटर पहले अकेले चल रहे प्रेमसागर को रोका। पूछा कि पास में क्या है? कुछ गांजा-वांजा है? प्रेमसागर ने बताया कि वे साधारण कांवर यात्री हैं। नशा के नाम पर उन्हें सिर्फ चाय पीने का व्यसन है। पर वे लोग कहने से माने नहीं। प्रेम सागर का पिट्ठू (पीछे टांगने का बैग) ले कर पूरी तरह तलाशा। उसमें कपड़े के अलावा कुल जमा डेढ़ सौ रुपये थे। प्रेमसागर के अनुसार “उनकी निगाह बड़ी रकम पर थी; डेढ़ सौ को उन्होने छुद्र रकम माना होगा”। फिर उनके शरीर की तलाशी ली। उसमें कुछ नहीं मिला। उनका मोबाइल नया था; उसे ले लिया। सिम कार्ड वहीं निकाल कर फैंक दिये। धमकी अलग दिये कि किसी को रास्ते में बताया तो मार डालेंगे। तलाशी लेना, धमकी देना – यह सब जघन्य कृत्य इस घटना को छिनैती नहीं, लूट – Robbery की श्रेणी में ला देता है।

“भईया, हम बोले कि जो कुछ है, वह मेरा नहीं है। आपका है तो आप ले लीजिये। उन्होने मोबाइल ही कीमती समझा और ले कर चलते बने। बहुत देर तक तो मैं संज्ञा-शून्य रहा। उन लोगों ने कुछ और सामान नहीं लिया था तो सब संभाल कर आगे चलने लगा। शायद किसी ट्रक वाले सज्जन ने यह लूट देखी होगी। आगे बस्ती में उसकी सूचना दी होगी। तो कुछ देर बाद एक सज्जन मोटर साइकिल पर आये। अच्छे छ फुट के रहे होंगे। गोरा रंग। उन्होने पूछा कि आपके साथ लूट का हादसा हुआ है? चलिये थाने पर रिपोर्ट लिखाइये। पर मैंने उन्हें मना कर दिया। भईया पुलीस के पास जाता तो वह तहकीकात में बार बार बुलाती और मेरी कांवर यात्रा तो खण्डित हो ही जाती। दूसरे, मुझे बहुत सहायता की उम्मीद तो थी नहीं।”

इसके पहले चाय की दुकान पर प्रेमसागर रुके थे। वहां से दोपहर डेढ़ बजे उनका मेरे पास एक फोन आया था। बता रहे थे – “भईया, जो कपड़े का जूता दो दिन पहले इंदौर में लिया था, और जिसका इस्तेमाल मैंने नहीं किया था; वह आज एक गरीब वृद्ध को दे दिया। बेचारे के पास चप्पल थी जो घिस गयी थी। उसकी स्ट्रेप टूटी थी तो रस्सी बांध रखी थी। वो बता रहे थे कि उन्हें पेंशन मिलती है, पर सारे पैसे बेटा छीन कर शराब पी जाता है। मैं और कुछ नहीं दे सकता था तो वह जूता ही दे दिया। उनके नाप का निकला जूता। और मेरा क्या; मेरी तो आदत बिना चप्पल-जूता चलने की है। लेना भी होगा तो बाद में ले लूंगा।” उसके बाद मुझसे अंतरंग के रूप में अपने किये पर मेरी मुहर लगाने की अपेक्षा कर रहे थे – “भईया ठीक किया न मैने?”

वे सज्जन जो प्रेमसागर से पुलीस में रिपोर्ट लिखाने की बात कह रहे थे; प्रेमसागर को अपने साथ आगे एक मोबाइल की दुकान पर ले कर गये। शायद वह बड़वाह में रही होगी दुकान। वहां उन्होने प्रेमसागर को बारह हजार का रेडमी का नया फोन खरीद कर दिया। प्रेमसागर उनसे उनका नाम पूछने लगे और उनका एक चित्र लेना चाहते थे। पर उन सज्जन ने मना कर दिया। नाम भी नहीं बताया और चित्र भी न लेने को कहा। बोले – “आप इसे गुप्तदान ही मान कर चलिये।”

“भईया मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा कि महादेव क्या कर रहे हैं और क्या करा रहे हैं। उन लुटेरों से मेरी तलाशी हो गयी। मोबाइल ले लिया। किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी भी मिली और उसके बाद सज्जन मिले जो पहले वाले से बेहतर नया मोबाइल मुझे दिलाये। पहले वाला 12 (मेगा) पिक्सल का और 32 या 16 जीबी का था। यह फोन तो 64 पिक्सल का है और 64जीबी का है। और जो सज्जन मुझे दिलाये, उनका चिन्ह भी मेरे पास नहीं है। मुझे लगता है कि वे आये थे लुटेरों से मारपीट करने, निपटने के लिये।”

सिम तो उन लुटेरों ने फैक दिये थे। वे प्रेमसागर ने उठा लिये थे। नये मोबाइल में पहले अपने सभी पासवर्ड बदले। मोबाइल के फंक्शन समझने में समय लगाया। यह भी तय किया कि आपात स्थिति के लिये एक सिम खरीद कर अपना फीचर फोन भी पास में रखा करेंगे। रास्ते में उन्होने अपना लोकेशन मुझे पुन: भेजना प्रारम्भ किया।

रात में उन्होने कहा – “भईया मैंने पासवर्ड वगैरह बदल दिये हैं। पर यह लिख दीजियेगा कि मोबाइल अपहृत हो गया है उसके मिसयूज से मेरे सम्पर्क वाले सावधान रहें। क्या पता उसमें लोगों के कॉण्टेक्ट नम्बर मौजूद हों।”

प्रेमसागर से मेरी लूट के पहले बात हुई थी डेढ़ बजे पर लोकेशन अपडेट नहीं हो रही थी। अंतिम अपडेट पौने इग्यारह बजे का था। मैंने सोचा था कि शायद जंगल के कारण नेटवर्क खराब होने से लोकेशन नहीं मिल रही थी। पर दोपहर दो-तीन बजे यह हादसा हो गया होगा, यह कल्पना में भी नहीं था!

शाम लोकेशन मिलने लगी तो वे मोरटक्का (ॐकारेश्वर रोड) से गुजर रहे थे। सवा छ बजे वन विभाग के रेस्टहाउस पंहुचे होंगे। उसके बाद रात आठ बजे जब उन्होने मुझे फोन किया तब दिन की इस घटना का पता चला।


सवेरे चोरल से निकले तो बहुत प्रसन्न रहे होंगे। निकले थोड़ा देर से। सूर्योदय के बाद। जंगल में अंधेरे में निकलना उचित नहीं समझा होगा। उनसे पौने 9 बजे बात हुई। एक स्थान पर वे चाय की दुकान पर ऊंचे स्थान पर अपनी कांवर रख रहे थे चाय पीने के लिये। उसके पहले निकलते हुये रेस्ट हाउस और मुख्त्यारा-बलवाड़ा स्टेशन के पहले लेवल क्रासिंग के चित्र भेजे थे।

मुख्त्यारा-बलवाड़ा स्टेशन के पहले लेवल क्रासिंग का चित्र

एक जगह उन्हें बड़ा ताल दिखा था। उसमें कमलिनी भी खिली थी। … प्रकृति का आनंद लेते चल रहे थे प्रेमसागर। आगे अनिष्ट की किसी भी सम्भावना से अनभिज्ञ और बेखबर।

पौने इग्यारह बजे प्रेमसागर के एक बैलगाड़ी हाँकते हुये अपना चित्र भी खिंचाया था और उसे भेज कर तुरंत मुझे फोन कर बताया भी। … प्रसन्नता इतनी थी कि मुझसे रीयल-टाइम आदान प्रदान कर रहे थे वे।

पौने इग्यारह बजे प्रेमसागर के एक बैलगाड़ी हाँकते हुये अपना चित्र भी खिंचाया था

दोपहर डेढ़ बजे जब प्रेमसागर ने बताया था कि उन्होने अपने नये जूते उस विपन्न वृद्ध को दे दिये थे, और उसपर मुझसे अपनी सहमति की मुहर मांगी थी; तो मन में मुझे प्रेमसागर पर क्रोध ही आया था। उनकी दान देने की वृत्ति पर नहीं – पैसा प्रेमसागर का और दान प्रेमसागर का। उससे मुझे क्या आपत्ति?! बल्कि अच्छा ही था वह विपन्न वृद्ध पर द्रवित होना। पर कांवर यात्रा में चप्पत-जूते के प्रति जो झिझक का भाव प्रेमसागर त्याग नहीं पा रहे वह क्रोधित करता है।

मेरे विचार से यह कांवर यात्रा विलक्षण है और इसके नियम प्रेमसागर को ही तय करने हैं – उन जड़बुद्धि मूर्खों को नहीं जो घर में बैठ कर पौराणिक ज्ञान बघारते हैं। वे दो कौड़ी के लोग हैं। मैं उन्हें ठेंगे पर रखने का हिमायती हूं, पर प्रेमसागर “लोग क्या कहेंगे” की सोच से उबर नहीं पा रहे। इस सोच से मेरी तनिक भी सहमति नहीं है। मैं इस बारे में विस्तार से कहना चाहता हूं, पर आज की पोस्ट तो मूलत: लूट के हादसे पर है। इसलिये उस सब की चर्चा – यह यात्रा किस स्वरूप में (मेरे अनुसार) होनी चाहिये; फिर कभी करूंगा।

कल सवेरे प्रेमसागर ॐकारेशवर ज्योतिर्लिंग को जल चढ़ाने जायेंगे। इस पावन कृत्य के साथ उनकी यात्रा का चौथाई भाग सम्पन्न होगा! आज एक तरह से अनूठा दिन था। कल दूसरी तरह से विलक्षण दिन होगा।

जंगल-घाटी में चोरल का रेस्ट हाउस

हर हर महादेव!

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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
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प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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