दौलतपुर से देवास


प्रेमसागर ने देवास के उत्तरी भाग में यात्रा की। आष्टा (जो सिहोर जिले में आता है और देवास के साथ जिसकी सीमा पार्वती नदी तय करती हैं) से चल कर वे दौलतपुर पंहुचे थे। दौलतपुर सतपुड़ा अभयारण्य से सिहोर-देवास-इंदौर की ओर बाघ के विचरण क्षेत्र का एक हिस्सा है जो अब टूट रहा है, छीज रहा है। दौलतपुर से सवेरे पांच बजे के आसपास पश्चिम दिशा में चल कर वे आठ बजे तक सोनकच्छ में थे।

सोनकच्छ एक मंझले आकार का कस्बा है जो शहर बनने की ओर अग्रसर है। यहां जैन समुदाय की अच्छी खासी उपस्थिति है और प्रेम को यहं जैन मंदिरों और स्कूलों के दर्शन हुये चलते चलते। इसके पश्चिम में कालीसिंध नदी है। जिसका एक चित्र प्रेमसागर ने भेजा है। कालीसिंध पार्वती से बड़ी नदी है; पर उसका चित्र बहुत सुंदर नहीं है। जल काफी दिखता है पर जल की गुणवत्ता यूं ही नजर आती है। हो सकता है चित्र अच्छा न आया हो। पर कालीसिंध देख कर मुझे उत्फुल्लता नहीं हुई।

कालीसिंध पार्वती से बड़ी नदी है; पर उसका चित्र बहुत सुंदर नहीं है। जल काफी दिखता है पर जल की गुणवत्ता यूं ही नजर आती है। हो सकता है चित्र अच्छा न आया हो।

सवेरे जब मैंने उनके साथ प्रात बातचीत का कर्मकाण्ड सम्पन्न किया तो वे सोनकच्छ से गुजर चुके थे और कालीसिंध के चित्र ले चुके थे। मुझे लगा कि शायद प्रेम ने ही चित्र अच्छा न लिया हो नदी का; पर जब गूगल नक्शे पर खंगाला तो उससे भी बदसूरत चित्र दिखे नदी के। किसी भी नदी – ताल या मशहूर जगह वाले लोगों को अब यह देखना चाहिये कि उनकी इण्टरनेट पर उपस्थिति कितनी अच्छी या खराब बन रही है। लोग अपना फेसबुक पेज और इंस्टाग्राम तो चमकाते हैं पर उनकी तहसील या नदी नेट पर लीद रही है – इसकी फिक्र नहीं करते। इतना बढ़िया नाम है सोनकच्छ। पर मैं वहां जाना-रुकना नहीं चाहूंगा। :-(

आज 40-42 किलोमीटर की पदयात्रा प्रेमसागर ने बड़ी तेजी से सम्पन्न की। उनके मूवमेण्ट को ले कर मुझे आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता थी। दोपहर तीन बजे के बाद अपना लोकेशन शेयर करने की अवधि बढ़ाना भूल गये वे, पर तब तक वे देवास के 12-14 किमी के आसपास आ चुके थे। शाम पांच बजे वे देवास में थे। रास्ते में दो तीन नदियां और मिली उन्हें। पर आज नदियों को ले कर मन में (कालीसिंध को देख कर) मायूसी है।

रास्ते में दो तीन नदियां और मिली उन्हें। पर आज नदियों को ले कर मन में (कालीसिंध को देख कर) मायूसी है।

देवास का उत्तरी भाग पठार है, जिसकी हल्की ढलान उत्तर दिशा की ओर है। दक्षिण में विंध्य की पहाड़ियाँ हैं और उनके परे नर्मदा जो देवास की खरगौन-खण्डवा-हरदा जिलों के साथ सीमा बनाती हैं। ये नदियां – और छोटी बड़ी आधा दर्जन भर होंगी देवास और आष्टा के बीच – सारी विंध्य की गोद से निकली हैं। सब उत्तरमुखी हैं। सब एक दूसरे में मिल कर अंतत: कालीसिंध और पार्वती में, फिर चम्बल में और उसके बाद यमुना में मिलती हैं। यमुना प्रयाग में गंगा बन जाती है। इस प्रकार नदियों की कनेक्टिविटी की सोची जाये तो देश एक है, संस्कृति एक है, हम एक हैं का भाव प्रबलता से आता है। … प्रेमसागर यह यात्रा न कर रहे होते और मैं उन्हे डिजिटली पछियाये न चल रहा होता तो यह भाव मन में आता भी नहीं। :-)

वैसे भी, मैकल-अमरकण्टक से जल उठा कर चलते भाई बहन – नर्मदा और शोणभद्र – नर्मदेय क्षेत्र को गांगेय क्षेत्र से जोड़ते तो हैं ही! यह जुड़ाव मालूम तो था पर उसका गहरे से अहसास प्रेमसागर की यात्रा ही करा रही है। अभी आगे ज्योतिर्लिंग की कांवर यात्रा पूरे देश को जिस प्रकार मानसिक रूप से जोड़ेगी; वह अभूतपूर्व होगा। आशा करें कि प्रेमसागर से यह तालमेल बना रहे।

देवास से तीन चार किलोमीटर पहले राजकुमार जी मिले।

देवास से तीन चार किलोमीटर पहले राजकुमार जी मिले। दौलतपुर के किसी वन रक्षक जी ने उन्हे प्रेमसागर के बारे में सूचना दे रखी थी। बड़ी देर से वे सड़क किनारे इंतजार कर रहे थे। जोगिया कुरता पहने और कांवर लटकाये प्रेमसागर को पहचानना कोई कठिन काम नहीं। उन्होने देखा, रोक कर प्रेमसागर को बढ़िया जलेबी का नाश्ता कराया। और विदा करते समय प्रेमसागर को पांच सौ एक रुपया भी दिया! प्रेमसागर की सरलता अभी भी वैसे ही बरकरार है। बल्कि अपनी प्रसन्नता या मान का कोई और भाव, व्यक्त करने में वे मुझसे और भी सहज हो गये हैं। उन्होने यह घटना मुझे चहक कर बताई – “मेन बात है भईया कि हम किसी से कुछ मांगते नहीं। कभी किसी से कोई अपेक्षा से देखा-बोला नहीं। पर महादेव मेरा काम चलाये जा रहे हैं।”

काम चलाये जा रहे हैं? अरे बहुत मौज है। बढ़िया जलेबी का नाश्ता और ऊपर से 501 रुपया! मन होता है मैं भी एक जोड़ी जोगिया रंग का कुरता सिलवा लूं। जींस का पैण्ट पहनने की बजाय घर में पड़ी सफेद धोतियों को लुंगी की तरह बांधना शुरू कर दूं। आखिर कोई तो शुरुआत कर देगा जलेबी का नाश्ता और पांचसौ एक रुपये की दक्षिणा देना। … मैं अपनी यह सोच प्रेमसागर को बताता हूं तो वे हंसते हुये कहते हैं – “यहीं से खरीद कर भिजवा दूं क्या भईया कुरता?”

अच्छा लगा! यह रुक्ष कांवर यात्री मुझसे हास्य और विनोद का आदान-प्रदान करने की ओर खुला तो सही! आपसी सम्बंधों की बहुत सी बर्फ हम तोड़ चुके हैं। कई बार प्रेमसागर मुझसे झिड़की खा कर भी बुरा नहीं माने हैं। मेरी नसीहतें भले ही न मानी हों पूरी तरह; पर अवज्ञा का भाव कभी नहीं था। और अब यह हंसी ठिठोली – महादेव सही रूपांतरण कर रहे हैं अपने चेले का!

देवास के पहले पड़ा एक मंदिर

देवास के पहले एक शिव मंदिर में प्रेमसागर मत्था टेके होंगे। वहां भेरू बाबा भी थे और शिव जी का परिवार भी। मुझे मंदिर अच्छा लगा!

देवास में वन अधिकारियों के साथ प्रेमसागर

देवास में चामुण्डा माता का मंदिर है पहाड़ी पर। मुझे तो, जब मैंं वहां रेल अधिकारी था तब चेला लोग एक जीप में ऊपर तक ले गये थे। वर्ना मैं मंदिर तक जाता नहीं। प्रेमसागर भी नहीं जा पाये। बयालीस किलोमीटर यात्रा की थकान के बाद पहाड़ी चढ़ने की हिम्मत नहीं बंधी। दूर से ही मां चामुण्डा को प्रणाम किया।

वह मंदिर पहाड़ी पर है। देवी का वास है। शायद देवी-वास से ही शहर/जगह का नाम देवास पड़ा है। देवास मेरी स्मृति में औसत सा शहर है। बेतरतीब किचिर पिचिर है। अब शायद बदल गया हो। उसका रेलवे स्टेशन और यार्ड मेरी नौकरी के शुरुआती दिनों में सबसे निम्न स्तर की इण्टरलॉकिंग और सिगलनिंग वाला इकहरी लाइन का दुखदाई स्टेशन हुआ करता था। और उसके परिचालन ने बहुत तनाव दिये हैं। बहुत नींद की गोलियां खिलाई हैं। वहां का स्टाफ और सोया खली लदान करने वाले लोग अलबत्ता बहुत अच्छे थे। कुलमिला कर देवास एक बार फिर देखना तो चाहूंगा मैं। काफी बदल गया होगा। वहां करेंसी नोट छपते हैं भारत की जरूरतों के लिये। अपनी शुरुआती नौकरी में उनका वीपीयू में काफी लदान कराया है मैंने। बैंक नोट प्रेस भी देखा है। अब शायद डिजिटल ट्रांजेक्शन के युग में बी.एन.पी. का पुराना जलवा काम हो गया होगा। … दो दशक बाद वह सब देखना बनता है! पर क्या क्या बनता है और उसमें से क्या साकार होगा पण्डित ज्ञानदत्त! आप छियासठ साल के हैं अब! :-)

देवास में विश्राम करते प्रेमसागर

कल प्रेमसागर उज्जैन के लिये रवाना होंगे।

हर हर महादेव। जय महाकाल!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर


दौलतपुर के जंगल का भ्रमण


21 अक्तूबर 21, रात्रि –

प्रेमसागर दौलतपुर में रुके तो दिन भर कमर सीधी करने में नहीं लगाये। मैं होता तो दिन भर सोने में व्यतीत करता। इसके अलावा कोई ‘भगत’ अगर पैर मींजने की श्रद्धा रखता तो उसे सेवा का पूरा अवसर देता। पर प्रेमसागर दिन में यात्रा नहीं किये तो जंगल देखने में लगाये। कहा जाता है कि फलाने आदमी के पैर में चक्र है। अर्थात वह चलता ही रहता है। हो सकता है प्रेम की पैर की उंगलियों और अंगूठे में चक्र (स्पाइरल) बना हो। वे आराम से बैठ ही न सकते हों! पैर में चक्र है, तभी वे मेरी तरह ओवर-वेट नहीं हैं। मेरा बी.एम.आई. 27 है। उनका तो 22-23 से ज्यादा नहीं होगा। (वास्तव में वह 22.4 है। वजन 63 किलो और ऊंचाई पांच फीट छ इंच।)

प्रेमसागर का शरीर अनुपात में है – बी.एम.आई. 22.4 है। चित्र दौलतपुर के जंगल का है।

वनकर्मी – अनिल लूनिया और अनारसिंह जी ने बातचीत में मुझे बताया कि दौलतपुर का वन 25 वर्ग किलोमीटर में है। वे विविधता के बारे में पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। प्रेमसागर ने बताया कि किसिम किसिम के वृक्ष हैं पर मूलत: तो सागौन ही है। वह विभाग ने लगाये भी सागौन ही हैं। कंटीली बाड़ लगा कर। पर सागौन की मोनोकल्चर जीव-जंतुओं के लिये उतनी सहायक नहीं। वनकर्मियों के अनुसार वहां हिरन, बनैले सुअर, नीलगाय और तेंदुआ हैं। तेंदुआ तो आये दिन रेस्ट हाउस के आसपास आ जाता है रात में। एक रात तो सड़क पर चल रहे वाहन वाले ने शोर मचाया तो पास के एक रेस्तरां के सीसीटीवी कैमरे को ध्यान से देखने पर तेंदुआ दिखा। अन्यथा वह पैर के निशान या पालतू जीवों के शिकार से पहचान में आता है।

दौलतपुर का वन

वन कर्मियों से बात कर यह तो लगा कि वन की बजाय आबादी की ओर रात में तेंदुआ के आने का कारण जंगल में भोजन पर्याप्त न मिल पाना होना चाहिये। कई बार उनके शावक शिकार के लिये बस्ती की बकरी आदि का शिकार करने आ जाते हैं। उन्होने बताया कि दौलतपुर के जंगल में 4-6 तेंदुये होने का अनुमान है।

वन कर्मी – अनिल लूनिया, अनार सिन्ह, हेमराज आदि दौलतपुर में रहते नहीं। उनके गांव आसपास हैं और वे मोटर साइकिल से यहां आते जाते हैं। अनिल देवास में रहते हैं। बाकी दोनो के गांव 5-10 किमी दूर हैं। अनारसिन्ह के पास 10 बीघा जमीन है और भाई मिस्त्री का काम करते हैं। वे गेंहू, चना, सोयाबीन, लाल तुअर, उडद आदि की खेती करते हैं। मटर की खेती नहीं करते। खेत खुला होने से मटर नीलगाय और बहेतू जानवर खा जाते हैं।

आष्टा और दौलतपुर के वन कर्मी

इन वन कर्मियों ने प्रेमसागर की बहुत सेवा की है। उनके रुकने के दोनो दिन वे अपने घर रात में नहीं गये। प्रेमसागर ने बताया कि दौलतपुर आते समय वे चार किलोमीटर पहले ही उनकी अगवानी में सड़क पर खड़े थे। लगता है प्रेमसागर की ख्याति प्रेमसागर के आगमन से पहले ही लोगों तक पंहुचने लगी है।

वन की प्रकृति के बारे में जो इनपुट्स मुझे लूनिया जी और अनारसिन्ह ने दिये, उससे मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी। भारत में यह बड़ी दिक्कत है – पुस्तकें, ट्रेवलॉग और जानकारियां उतनी नहीं जितनी होनी चाहियें। लोगों ने लिखा ही नहीं है। एक दूर दराज के गांव में बैठे मेरे पास या तो इण्टरनेट पर देखने की सुविधा है या अमेजन पर पुस्तकें देखने खरीदने की। दोनो में बहुत जानकारी नहीं मिलती और समय भी (उसे खोजने में) खूब लगता है। संयोग से प्रवीण चंद्र दुबे जी का फोन आ गया। वे मध्यप्रदेश वन विभाग के शीर्षस्थ पद से सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। उनसे बातचीत में बहुत उपयोगी जानकारी मिली।

प्रवीण चंद्र दुबे जी से बातचीत – संवेदनशील (रिटायर्ड) वन अधिकारी के दु:ख –

मसलन वन अधिकारी भी जंगल के वृक्षों में 5-10 को पहचानते हैं। शेष को सतकटा (Miscellaneous) बता कर छुट्टी पा जाते हैं। यह तो वैसा ही हुआ कि घरनी को घर की चिंता ही नहीं है। महिला अपने एक दो बच्चों को नाम ले कर बुलाये और बाकी को “वगैरह – मिसलेनियस या सतकटा” कह कर निपटा दे तो उस परिवार का भगवान ही मालिक।

प्रवीण जी से प्रेमसागर की यात्रा की बातचीत तो हुई ही (वे भी दिन में एक दो बार प्रेम सागर से उनकी यात्रा के बारे में उनसे बातचीत करते हैं।), उनसे आसपास के वनों पर भी मैंने पूछा। प्रवीण जी ने बताया कि होशंगाबाद के पास टाइगर रिजर्व से रातापानी (रातापानी टाइगर रिजर्व, ओबेदुल्लागंज, रायसेन जिला) के रास्ते खेवनी (खेवनी वाइल्ड लाइफ सेंक्च्युरी, सिहोर-देवास) और इंदौर तक का एक पुराना बाघ के मूवमेण्ट का कॉरीडोर रहा है। पर खेती का दबाव बढ़ने और जंगल के कम होते जाने से यह कॉरीडोर टूटता गया है। एनटीसीए (नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी) का फोकस भी इस बात पर है कि बाघों की जीनेटिक डाइवर्सिटी के लिये इस कॉरीडोर को मजबूत किया जाये। अन्यथा बाघों का छोटे छोटे “द्वीपों” में सिमट जाने से उनकी संख्या एक स्थान पर बढेगी और वे आबादी पर हमला करने के लिये मजबूर हो जायेंगे।

प्रवीण चंद्र दुबे, निरीक्षण पर। पुराना चित्र सम्भवत: भोपाल के एसडीओ तरुण कौरव ने प्रेमसागर को दिया।

प्रवीण जी ने बताया कि इंदैर के चोरल के जंगलों में उन्होने बाघों के विचरण को पाया था। उनके अनुसार इंदौर खण्ड में पांच बाघ चिन्हित किये गये थे। नर्मदा के क्षेत्र में – हरदा-बैतूल-खण्डवा में बाघों की अच्छी खासी उपस्थिति है। पर कॉरीडोर/जंगल के नाम पर छोटे छोटे क्षेत्र बचे हैं – पहाड़ियों पर जो खेत में नहीं बदल पाये। जंगल की प्रकृति को ले कर भी मध्यप्रदेश में चिंता है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इण्डिया के अनुसार मध्यप्रदेश के 50 प्रतिशत वन डीग्रेड हो चुके हैं। वनों की बायोडाइवर्सिटी का तो यह हाल है कि 30 प्रतिशत वृक्ष-प्रजातियां समाप्त होने के खतरे में हैं। सिवारुक तो अब (पचास साल पहले की तुलना में) एक प्रतिशत ही बचे होंगे। दहिमन करीब दस प्रतिशत ही शेष हैं।

प्रवीण जी के अनुसार वन प्रबंधन की सोच ब्रिटिश काल से लकड़ी केंद्रित रही है। स्थानीय गिरिजनों और उनके जंगल के साथ परस्पर आदान प्रदान पर कोई फोकस ही नहीं होता। मसलन वन अधिकारी भी जंगल के वृक्षों में 5-10 को पहचानते हैं। शेष को सतकटा (Miscellaneous) बता कर छुट्टी पा जाते हैं। यह तो वैसा ही हुआ कि घरनी को घर की चिंता ही नहीं है। महिला अपने एक दो बच्चों को नाम ले कर बुलाये और बाकी को “वगैरह – मिसलेनियस या सतकटा” कह कर निपटा दे तो उस परिवार का भगवान ही मालिक।

प्रवीण जी अनेक वृक्षों के नाम बताते हैं – बीजा, चिरौंजी, शीशम, अंजन … ये सब खतम होने के कगार पर हैं। देशज भाषा में कहें तो जंगल खोखला हो रहा है। उसका बुढ़ापा है। नये पौधे जो लगाये जाते हैं उन्हें चरागाह की किल्लत की दशा में पशु चर जाते हैं। एक वन चौकीदार हटा तो वे पौधे भी तेजी से नष्ट हो जाते हैं। वन में नया कुछ बन ही नहीं रहा।

प्रवीण जी संवेदना रखते हैं वन के प्रति। उनका पोस्ट डॉक्टरल शोध का विषय भी है – Tribals and Forest Conservation. प्रेमसागर की द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा का 50-60 भाग वनों से हो कर गुजरेगा। अगर ब्लॉग पर यात्रा विवरण की गुणवत्ता का ध्यान मुझे रखना है तो प्रवीण जी से निरंतर सम्पर्क रखना होगा।

कभी कभी लगता है कि मेरी “यात्रा-विवरण लेखन” की यात्रा भी कम दुरुह नहीं! वह अवश्य है कि मुझे “धूप-घाम-पानी-पत्थर” नहीं सहने हैं। पर यात्रा मुझे भी निखार ही देगी!

वर्षों तक वन में घूम-घूम,

बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,

सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,

पांडव आये कुछ और निखर।

– दिनकर

कल (22 अक्तूबर को) प्रेमसागर दौलतपुर से देवास के लिये चलेंगे। दौलतपुर से सीधे पश्चिम में है देवास। कल देवास यात्रा की चर्चा होगी। उसमें क्या होगा, मुझे भी नहीं अंदाज! यह भी एक तरह की डिजिटल-घुमक्कडी ही है।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर


प्रणाम; आपका स्वागत नहीं है!


इस साल जलवृष्टि काफी हुई। गांव की नीची जमीन, जिसमें सड़क भी आती है, जलमग्न हो गयी। और अभी तक है – जब अक्तूबर का चौथा सप्ताह आने को है। कुआर खत्म हो गया। विजयदशमी जा चुकी। दीपावली आसन्न है। पर बारिश जब तब हो जा रही है और सड़क पानी में डूबी है।

सड़क ही नहीं, गांव की महुआरी पानी में है। उसमें मछलियां पल रही हैं। उसके पीछे पोखरी है जिसको ले कर यू.एन.ओ. लेवल की राजनीति चल रही है। मामला शायद इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में चल रहा है। वहां तारीख पर तारीख पड़ रही हैं।

आगे तीस कदम पर देखा तो वह पगडण्डी बैरियर लगा कर अवरुद्ध कर दी है।

मैं जलमग्न सड़क से बचने के लिये घरों के सामने से गुजरता था अपनी साइकिल ले कर। लोग मिलते थे और नमस्कार-पैलगी होता था। कोई दिक्कत नहीं थी। आज भी जब निकला तो उस नौजवान ने कहा – प्रणाम फूफा जी! साइकिल चलाते हुये मैंने उत्तर भी दिया। पर आगे तीस कदम पर देखा तो वह पगडण्डी बैरियर लगा कर अवरुद्ध कर दी है। सवेरे सवेरे का शांत, निर्मल मन गिनगिना गया।

वह नौजवान प्रणाम करते समय कह सकता था कि रास्ता आगे हमने बंद कर दिया है। आप सड़क से जाने का कष्ट करें। या यह भी कर सकता था कि मेरे साथ आता और बांस उठा कर मुझे निकल जाने देता। वह सज्जनता का तत्व सामान्यत: लोगों में नहीं है। परनिंदा और दूसरे की तकलीफ में जो आनंद है, वही “आहा ग्राम्य जीवन!” है।

और गांवों में, अन्य जातियों में यह खुरपेंची प्रवृत्ति नहीं दिखती। इस गांव में बभनौटी में यह प्रवृत्ति प्रचुर है। लोग सामने पड़ने पर मुंह फेर लेते हैं कि कहीं प्रणाम नमस्कार न करना पड़े। और यह नौजवान पीढ़ी का ही चरित्र नहीं है। अधेड़ों और वृद्धों में भी वही व्यवहार-दरिद्रता दिखती है। मामला जीन्स में घुस गया है।

वापसी में मैं जलमग्न सड़क से हो कर गुजरा। टूटी-फूटी जलमग्न सड़क ने सहर्ष स्वागत किया। साइकिल का पैडल मारते समय भी मेरे पद धोये केवट की तरह।

खराब लगता है। आज सवेरे का भ्रमण की निर्मलता और सम-भाव गड्ढे में चला गया। वापसी में मैं जलमग्न सड़क से हो कर गुजरा। टूटी-फूटी जलमग्न सड़क ने सहर्ष स्वागत किया। साइकिल का पैडल मारते समय मेरे पद धोये केवट की तरह। भगवान राम को केवट के प्रति जो स्नेह भाव आया होगा, वही मुझे जल में डूबी सड़क के प्रति आया। तुम कहां कोल-भिल्ल-निषाद का संग छोड़ बभनौटी की ओर रुख करते हो, ज्ञानदत्त!

यह ऊबड़खाबड़ सड़क; यह सवेरे सवेरे “गुडनाइट सर” का जोर से जयकारा लगाते भगवान दास पासवान “मुसई” का हंसता मुस्कराता चेहरा; सड़क किनारे निपटती छोटी बच्ची का जोर से अभिवदन करना – “बब्बा पालागी”; का आनंद लो। कहां इन बभनों के फेर में अपनी मानसिक शांति बरबाद करते हो!

आज इसपर लिखने का मन हो आया तो सोचा कि पहले इसको ब्लॉग पर डाला जाये। प्रेमसागर पर दैनिक पोस्ट शाम को शिफ्ट की जाये। :lol:


Design a site like this with WordPress.com
Get started