आष्टा से दौलतपुर – जुते खेत और पगला बाबा


20 अक्तूबर 21, रात्रि –

कल प्रेमसागर ने कहा था कि खेतों में फसल कट चुकी है और अगली फसल के लिये खेत जोते जा रहे हैं। कहीं कहीं उन्होने हल-बैल भी काम पर लगे देखे। मैंने उन्हें कहा था कि कल (यानी आज) वे खेतों के चित्र खींचे, और अगर सम्भव हो तो थोड़ा खेत में जा कर हल-बैल का चित्र भी लें। हल बैल तो नहीं, जुते खेत का एक चित्र प्रेमसागर ने भेजा है। (प्रेमसागर मुझे इतनी बार लिखना पड़ता है कि सोचता हूं उनके लिये कोई छोटा नाम लिखा करूं। उससे मुझे की-बोर्ड पर कुछ कम मेहनत करनी होगी। आलसी ज्ञानदत्त को वह अच्छा लगेगा। सो आगे मैं प्रेमसागर को कभी कभी प्रेम ही लिखूंगा।)

जुते खेत का एक चित्र

मैं चित्र ध्यान से देखता हूं। यहां पूर्वांचल के खेत से अंतर समझ आता है। पहली बात तो खेत की जोत की है। इतने बड़े खेत यहां शायद ही किसी के पास हों। दूसरे, जहां भी नजर जाती है वहां या तो जमीन है, पेड़ हैं और खेत हैं। कोई मकान, कोई बसावट नहीं। कम से कम लैण्डस्केप मोड में लिये चित्र में तो नहीं। यहां तो इतने बड़े फ्रेम में दो या तीन गांव तो नजर आते ही! मालवा में जमीन पर जनसंख्या का दबाव यहां बनारस-प्रयाग इलाके से कहीं कम है। यहां लोग अगर मेहनती हैं (और वे मेहनती हैं) तो अच्छे से खेती कर सकते हैं। सोयाबीन, अंगूर और यहां तक कि स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था मैंने किसानों को। यह जरूर है कि मेरी जानकारी दो दशक पुरानी है। पर काली मिट्टी और कम पानी वाली जमीन से विविध प्रकार की फसलें लेते थे किसान। सोया खली के लदान के लिये तो इतनी रेल रेकों की मांग हुआ करती थी कि हमारी नाक में दम रहा करता था। मेरा घर दुआर अगर पूर्वांचल में नहीं होता तो रिटायरमेण्ट के बाद इंदौर या उज्जैन से तीस चालीस किलोमीटर की दूरी पर जमीन ले कर बस गया होता। देवास के पास दौलतपुर, जहां आज शाम प्रेम पंहुचे हैं, एक सही-साट जगह होती। … पर ये होता, वो होता कहने से कुछ बनता नहीं! :-(

पार्वती नदी

आष्टा पार्वती नदी के किनारे बसा है। प्रेमसागर ने सवेरे निकलते ही पार्वती के तीन चार चित्र भेजे। नदी में पानी ठीकठाक है। नदी यहीं पठार से ही किसी स्थान से निकलती है और आगे जा कर कालीसिंध में मिल जाती हैं। उसके बाद कालीसिंध (शायद) चम्बल में। आष्टा में एक शिव मंदिर है नदी किनारे जो बरसात के मौसम में पानी में डूब जाया करता था – ऐसा मैने विकीपेडिया पर पढ़ा। विकीपेडिया अपडेट नहीं किया गया है। (भारतीय इस काम को बहुत गम्भीरता से नहीं लेते। :-( ) वहां डेमोग्राफी के आंकड़े अभी भी 2001 जनगणना वाले ही हैं। अब बारिश उतनी होती है, कि मंदिर जलमग्न हो जाये? यह विकीपेडिया से पता नहीं चलता। प्रेम के पास उतना समय आष्टा में था नहीं कि यह सब पूछ-पछोर सकें। एक कांवर यात्री को बहुत ज्यादा इधर उधर के काम थमाये नहीं जा सकते! :-)

पार्वती नदी का दूसरे कोण से लिया चित्र

चित्रों में नदी किनारे बसावट और मंदिर वैसे ही हैं जैसे किसी नदी किनारे बसे कस्बे में होते हैं। पार्वती के पानी को देख कर – पानी खूब है और साफ है – लगता है कि रिहायश बनाने के लिये आष्टा भी बुरी जगह नहीं होती। पांड़े, मिसिर, तेवारी, ठाकुर, पटेल, पाटीदार यहां भी वैसे ही और उतने मिलेंगे जितना पूर्वांचल में मिलते हैं। यहां बसने पर यह जरूर होता कि मेरी भाषा में अवधी छौंक की बजाय मालवी पुट रहता। मैं ‘है’ को ‘हे’ बोलने लगता! :-)

प्रेमसागर का मालवा से गुजरना मुझे यादों के अतीत में ले जा रहा है। उस इलाके में मैंने जीवन के बेहतरीन 17 साल गुजारे हैं। तब रेलवे की नौकरी के तनाव थे। अब तनाव रहित वहां जीना हो, जब एक साइकिल हो घूमने के लिये, तो क्या आनंद आये। कोई सज्जन हैं उस इलाके के गांव के जो आगामी सर्दियों में अपने घर मुझे महीना भर रखने को झेल सकें?! हेल्लो, कोई सुन रहे हैं! :-)

रास्ते में प्रेम को दो और नदियां मिलीं। छोटी नदियां।

रास्ते में प्रेम को दो और नदियां मिलीं। छोटी नदियां। मैंने मैप में तलाशा तो इस तरह की कई नदियों को पठार से निकलते और घूम घाम कर एक दूसरे में और अंतत: पार्वती या कालीसिंध में मिलते पाया। करीब 40-50 किमी लम्बी होगी इन नदियों की स्वतंत्र यात्रा। पर उसी में कितना सौंदर्य और कितना जीवन-अवलम्ब प्रदान करती हैं ये। बारिश कम होने लगेगी और ये नदियां सूखेंगी तो कितना गड़बड़ होगा प्रकृति और मानव के लिये। पर असल बात यह है कि तुम नकारात्मक क्यों सोचते हो ज्ञानदत्त?

एक नदी पर रपट (चेक डैम) बना था।

एक नदी पर रपट (चेक डैम) बना था। उससे नीचे गिरता जल झरने का आनंद दे रहा था।

एक जगह एक बैलगाड़ी का सुंदर चित्र लिया प्रेमसागार ने। गाड़ीवान ने खाली बैलगाड़ी सड़क किनारे पार्क कर रखी थी। पास में ही उसका बैल बंधा था। बैलगाड़ी, बैल और हल से जुताई मालवा में वास्तविकता है। यहां पूर्वांचल में तो बहुत खोजने पर कहीं हल दिखता है और बैलगाड़ी तो पिछले छ साल में यहां रहते कभी देखी नहीं। हड़हड़ाते हुये दैत्य के बच्चे (ट्रेक्टर-ट्रॉली) मुझे हर मिनट दिखते हैं। उनको देख कर लगता है कि गांव में बस कर गलती कर दी। बिग मिस्टेक!

एक जगह एक बैलगाड़ी का सुंदर चित्र लिया प्रेमसागार ने।
पगला बाबा से भेंट

करीब पंद्रह किलोमीटर चले होंगे प्रेम तो पगला बाबा से मुलाकात हुई। पगला बाबा के आश्रम जनकपुर (नेपाल) और सिमरिया (बेगूसराय) में हैं। सिमरिया में जल चढ़ाने के ध्येय से जाते प्रेम उनसे उनके आश्रम में मिल चुके हैं। दो दिन उस आश्रम में रहे थे। आज वे चार लेन की सड़क में बीच के डिवाइडर पर कांवर लिये चल रहे थे तो विपरीत दिशा से आती गाड़ी में पगला बाबा गुजरे। प्रेमसागर ने तो उन्हे नहीं देखा, पर बाबा ने चीन्ह लिया। ग़ाड़ी रोक कर प्रेमसागर से बातचीत की। उनके संकल्प की यात्रा पर उन्हें आशीर्वाद दिया, लेकिन आगाह भी किया – यात्रा में सावधान रहना है। उसके जोखिम बहुत हैं। सौ में से पचानवे कांवर यात्री अपनी यात्रा बीच में छोड़ कर लौटते हैं। अधिकतर दुर्घटना का शिकार होते हैं। रास्ते में लोगों से मिलते जुलते चलना है। लोग अपनी समस्याओं पर बहुत बार सहायता मांगते दिखेंगे। उनको नाराज नहीं करना है। समझा बुझा कर, कुछ दे कर अपनी यात्रा जारी रखनी है। नाराज लोग अनिष्ट कर सकते हैं। यात्रा में विघ्न डाल सकते हैं।

प्रेम ने बताया कि बाबा नब्बे साल के होंगे पर लगते पचास के हैं। “मेन बात है भईया कि वे अन्न ग्रहण नहीं करते। फल आदि से काम चलाते हैं। सिहोर में भव्य रामजानकी मंदिर बनवाये हैं। वहीं यज्ञ है तीन दिन का। उसी के लिये जाने की जल्दी में थे। इसलिये हड़बड़ी में मैं उनका फोटो नहीं ले पाया। उन्होने कहा कि मैं जब नासिक (त्र्यम्बकेश्वर) पंहुचूंगा तब वे मुझसे मिलेंगे और बातचीत करेंगे।”

पगला बाबा, चित्र अमर उजाला से।

पगला बाबा पर मुझे पिछले कुम्भ की रिपोर्टिंग का अमर उजाला का यह लेख मिला। चित्र भी उसी लेख से लिया गया है। लेख में लिखा है कि पगला बाबा कहते अपने को पगला हैं, पर बातें बुद्धिमत्ता की करते हैं। वे अपने आप को सीता माता का पागल (मंदबुद्धि) पुत्र कहते हैं। “उनके मुताबिक मां अपने मंदबुद्धि बच्चे को सबसे ज्यादा स्नेह करती है। वही स्नेह माता जानकी से मिलता है।” पगला बाबा का वास्तविक नाम जगतानंद दास है।

दौलतपुर वन विभाग के विश्रामालय में प्रेमसागर छ बजे शाम तक पंहुच गये। सूर्यास्त भारत के पश्चिमी भाग में कुछ देर से ही होता है। इसलिये तब अंधेरा नहीं हुआ होगा। मेरे हिसाब से यह दिन की सही पदयात्रा रही। सवेरे समय से निकलना। रास्ते को देखते चलना। पगला बाबा से मुलाकात और सांझ ढलने के पहले मुकाम पर पंहुच जाना – बहुत बढ़िया चले प्रेमसागर! ऐसे ही चला करो, दिनो दिन। तब तुम पर खीझ भी नहीं होगी। प्रेम पर प्रेम बना रहेगा। उखड़ने का कारण नहीं मिलेगा।

कल प्रेमसागर, प्रवीण दुबे जी के निर्देश पर आसपास वन देखेंगे। एक दिन विश्राम रहेगा दौलतपुर में। सो रेस्टहाउस, वन और वन विभाग के लोगों के बारे में कल लिखा जायेगा।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर


प्रेमसागर – सिहोर होते हुये आष्टा


19 अक्तूबर 21, रात्रि –

नर्सरी (रोपनी) जहां रुके थे प्रेमसागर और जिसे स्थान बताते थे – धुन (डीएचयूएन); वहां से आज करीब 56 किलोमीटर चले। सवेरे सवा छ बजे रवाना हुये होंगे। जब आष्टा पंहुचे तो रात के सवा आठ बज गये थे।

प्रेमसागर में सामान्य यूपोरियन आदमी की तरह हाँकने की प्रवृत्ति नहीं है जो तीन करता है और तेरह बताता है; अन्यथा वे इस दूरी को बड़े आराम से पचहत्तर किलोमीटर बताते और यह कहते कि सवेरे चार बजे निकले और रात बारह बजे पंहुचे। … लेकिन तब भी, प्रेमसागर की स्पष्टवादिता के बावजूद भी, मुझे प्रेमसागर से कष्ट है। मैंने उन्हे कहा भी – देखो, मैं अगर तुम्हारे साथ यात्रा कर रहा होता; और यह बड़ा अगर है; तो हमारी ज्यादा दिन निभती नहीं।

उनकी यात्रा में बहुत प्लानिंग नहीं है। फलाने ने कह दिया, ढिकाने ने रास्ता बता दिया तो तय कर लेते हैं चलने निकलने का। मैं यह कत्तई नहीं करता। कत्तई नहीं। जब से गूगल वाली मेहरारू गूगल मैप में बोल कर रास्ता बताने लगी है, मैं उसकी ज्यादा सुनता हूं। भले ही वह अमरीकन लहजे में जगहों के नाम को रगड़ देती है। भले ही वह मोहन सराय को “मोहंसर्रे” बोलती है, पर बहुत से लफाड़िया लोगों से बेहतर बताती है।

इसके अलावा, यह मालूम होने पर भी कि दिन भर में 55-60 किमी चलना है, प्रेमसागर यात्रा पर निकलने के दस किलोमीटर बाद ही शर्मा जी (वन विभाग के डिप्टी साहेब) के घर पर सामाजिकता निभाने के लिये डेढ़ दो घण्टा व्यतीत करते हैं – यह मैं कत्तई नहीं करता। ज्यादा होता तो उनके दरवाजे से या एक कप चाय पी कर दण्ड-प्रणाम कर आगे निकल लिया होता। प्रेमसागर जी के साथ तो वहां आदर सत्कार, तिलक टीका, फोटो सेशन और दण्ड-प्रणाम सब हुआ। सामाजिकता निभाना भी जरूरी है। पर तब, उसके लिये समय का एडवांस एलॉकेशन होना चाहिये। तब आपको छप्पन किलोमीटर नापने का लालच (?) नहीं करना चाहिये।

शर्मा जी, सीहोर के डिप्टी साहेब के घर पर। जीपीएफ चित्र।

मैं विशुद्ध गंवई आदमी बन गया हूं। सूर्यास्त तक अपने मुकाम पर पंहुच जाना मेरे लिये अलंघनीय नियम है। रात आठ नौ बजे तक चलना अपने लिये स्वीकार्य नहीं। प्रेमसागर निशाचर की तरह चलें तो चलें – और इस बात पर उनसे दूसरे तीसरे दिन ही झगड़ा हो जाता। :lol:

खैर, ईश्वर की कृपा है कि मैं प्रेमसागर के साथ यात्रा नहीं कर रहा। लेकिन डिजिटल यात्रा करने की भी अपनी सनक है, अपने जुनून हैं। उसके भी अपने खिचखिच हैं। नेटवर्क कई बार इस या उस छोर पर बंद हो जाता है। पोजीशन अपडेट नहीं होती, कई बार घण्टे घण्टे भर प्रेमसागर एक ही जगह धरना दिये दिखते हैं। और एक घण्टे बाद एक बड़ी छलांग लगा कर कहीं पंहुचे नजर आते हैं। दूसरे, बहुत झिकझिक करने के बाद भी प्रेमसागर अपनी लोकेशन गूगल मैप पर सीधे बहत्तर घण्टे के लिये शेयर नहीं कर पाये। वे आठ घण्टे के लिये टेलीग्राम या ह्वाट्सएप्प पर शेयर करते हैं और उसे आगे आठ घण्टे के लिये बढ़ाना कई बार भूल जाते हैं। और उसमें उनको दोष नहीं दिया जा सकता। सड़क नापते आदमी को यह ध्यान रखना कठिन होता होगा।

भैया कल की आप की सारी प्लानिंग फिक्स निश्चित हैं जैसे आप कितने बजे उठेंगे, बटोही भ्रमण कब तक होगा, चाय नाश्ता भोजन इत्यादि, फिर भी क्या आप निश्चिंत हैं?…वही अवघड़राम का कुछ भी निश्चित नही फिर भी वो निश्चिंत हैं, यही फर्क हैं भैया ट्रेवलॉग में और यात्रा में🙏🙏

गिरीश सिंह की पोस्ट पर महत्वपूर्ण टिप्पणी। ट्विटर पर।

मैं अपनी पत्नीजी से अपनी प्रेमसागरीय-झुंझलाहट व्यक्त करता हूं तो पत्नीजी प्रेमसागर के बचाव में बोलती हैं – “उस बेचारे की जान लोगे क्या? इतना सब तो कर रहा है। फोटो खींच रहा है। लोकेशन शेयर कर रहा है। चुपचाप सिर झुका कर चलता था, अब तुम्हारे कहे पर खेत, किसान, हल बैल, नदी ताल को देख कर वर्णन कर रहा है। … तुम्हें तो जो मिलता है उसको अपने तरीके से चलाना चाहते हो। अपनी अपेक्षायें उसपर लाद देते हो। तभी तुम सामजिक प्राणी नहीं बन पाये। ये तो मैं ही हूं जो तुमसे निभा सकी हूं।”

हर भारतीय महिला यह सोचती है – यकीन करती है – कि वह न होती तो उसका मरद बिलाला घूमता। बहुत दुर्गति होती उसकी! रीता पाण्डेय कोई अपवाद नहीं हैं। :-)

खैर. प्रेमसागर की कांवर यात्रा पर लौटा जाये। आज रास्ते में उन्हें कई जैन मंदिर या स्थान मिले। इस इलाके में जैन सम्प्रदाय का बहुत प्रभाव है। एक स्थान पर उन्होने बहुत आग्रह किया प्रेमसागर को भोजन करने का। वह मना करने पर उन्होने उनकी जेब में कुछ रकम रख दी – कि जब वे भोजन करना चाहें, उससे कर सकें।

खेत खाली थे। मानसून की फसल कट चुकी थी। खेतों में हल चल रहा था। कई जगह उन्हें बैलों का प्रयोग दिखा हल चलाने में। सोयाबीन की खेती के बारे में मैंने उन्हे कहा कि आगे उसके बारे में जानकारी लें। और आगे अगर हल-बैल दिखे तो चित्र लेने का प्रयास करें, भले ही उसके लिये थोड़ा सड़क से हट कर खेत में जाना पड़े।

रास्ते में एक पतली सी नदी मिली। वह आगे जा कर पार्वती नदी में मिलती होगी। नक्शे में देखने पर संगम स्थल का नाम ही प्रयाग संगम दिखा। संगम और प्रयाग पर्याय जैसे बन गये हैं।

घनश्याम पांड़े, आष्टा के डिप्टी साहेब।

छप्पन किलोमीटर चल चुकने के बाद आष्टा में घनश्याम पांड़े, डिप्टी साहब के यहां प्रेमसागर के रुकने का इंतजाम हुआ। यह बताते हुये प्रेमसागर की आवाज में थकान नहीं थी। इतना चलने और दिनों दिन चलते रहने की ऊर्जा कहां से आती है उनमें? उनके भोजन, व्यायाम और मनन-ध्यान अनुशासन पर, उनके फेमस होने पर शायद कई लोग पूछें। फिलहाल किसी दिन मैं ही पूछूंगा कि कितना अश्वगंधा, कितना बबूल का गोंद और इसी तरह की अन्य औषधियां वे इस्तेमाल करते हैं। पढ़ने वालों को शायद उसमें काम की बातें पता चलें।

अगले दिन प्रेमसागर को दौलतपुर के लिये निकलना है – यह देवास के रास्ते में आष्टा से 34 किलोमीटर आगे पड़ता है। तीन दिन बाद उन्हें उज्जैन पंहुच जाना चाहिये। वह उनका एक मुख्य मुकाम होगा। उनके संकल्प का दूसरा शिवलिंग दर्शन!

चरैवेति, चरैवेति!

हर हर महादेव!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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भोपाल के आगे निकले प्रेमसागर


18 अक्तूबर 21, रात्रि –

प्रेमसागर सवेरे चार बजे भोपाल यात्री निवास में तैयार हो कर बैठे थे, पर बारिश होती रही। मैंने उनसे सवेरे की बातचीत का कर्मकाण्ड सात बजे के आसपास किया तो लगा कि शायद आज निकलना न हो पाये। वैसे भी आष्टा – जहां उनका तय मुकाम था, उनके अनुसार 50-56 किलोमीटर और मेरे गूगल मैप अध्ययन के अनुसार 87 किलोमीटर दूर था। अगर 56 किमी भी मान लिया जाये तो भी अब निकल कर पंहुच पाना संदिग्ध था। मैंने सोच लिया कि आज उनका भोपाल प्रस्थान लिखा नहीं है। पर शायद प्रेमसागर के संकल्प की दृढ़ता को आंकने में एक बार फिर चूक की मैंने। करीब 8-9 के बीच बारिश थमी होगी और वे निकल लिये। मैंने शाम के वार्ता कर्मकाण्ड के समय उनसे पूछा – आज निकल नहीं पाये?

“नहीं भईया। हम तो निकल लिये थे। आपको लाईव लोकेशन भी भेजे थे ह्वाट्सएप्प पर। हम तो मोटामोटी 30-35 किलोमीटर चल कर यहां आ गये हैं। कोई जगह है – धुन, डी एच यू एन। यहां वन विभाग की छोटी रोपनी (नर्सरी) है। यहां इंदर सिंह परिहार, तेज सिंह राजपूत और चतर सिंह जी मिले हैं। अभी अभी ही पंहुचा हूं। मैं उनके फोटो अभी आपको भेजता हूं।” – प्रेमसागर ने उत्तर दिया।

“यहां इंदर सिंह परिहार, तेज सिंह राजपूत और चतर सिंह जी मिले हैं।”

मैंने इस भाव में कि दिन में कोई चित्र आदि प्रेमसागर ने टेलीग्राम पर ठेला नहीं, सोचा था कि आज यात्रा नहीं हुई। ह्वाट्सएप्प सामान्यत: मैं देखता नहीं, पर मैंने ही प्रेमसागर को कहा था कि लोकेशन वे ह्वाट्सएप्प पर ही शेयर किया करें। वह देखा नहीं और मुगालते में रहा। लेकिन प्रेमसागर, नक्शे के अनुसार 28 किलोमीटर खींच ही लिये थे आज!

यह स्थान – धुन – नक्शे पर दिखा नहीं मुझे। अगला नाम दिखता था पचांवा। पचांवा सिहोर से अगला स्टेशन हुआ करता है भोपाल की ओर। सन 2003 और उसके पहले दशकों तक मैं रतलाम रेल मण्डल का ट्रेन परिचालन संभालता था और यह इलाका – ये स्टेशन मेरे अपने हुआ करते थे। मैंने नक्शे को ध्यान से देखा। सिहोर, पचांवा, फंदा, बकनिया भंवरी, बैरागढ़ – सब स्टेशन दिखे। मैं अपने फ्लैश बैक में चला गया। पर यह यात्रा विवरण उस फ्लैश-बैक का नहीं है; यह तो प्रेमसागर की कांवर यात्रा का है।

मैंने प्रेमसागर का धुन रोपनी के कमरे का चित्र देखा। साधारण 12′ गुणा 12′ फिट का कमरा। एक रस्सी बांध कर कपड़ा लटकाया गया है। एक सरकारी टाइप अलमारी। छाता और कील से टंगा एक झोला! प्रेमसागार को सत्तर अस्सी किलोमीटर चल कर कोई बड़ी जगह तलाशने की बजाय 35-40 किमी पर ऐसी छोटी जगहें चुननी चाहियें। वहां लोगों के पास साधन विपन्नता होगी पर भाव सम्पन्नता कहीं ज्यादा होगी और वह साधन हीनता की असुविधा को ओवर कम्पनसेट कर देगी!

रास्ते के चित्रों में भोपाल का ताल दिखता है।

रास्ते के चित्रों में भोपाल का ताल दिखता है। बैरागढ़ के समीप का लोकेशन होगा। चित्रों में अगर प्रेमसागर लोकेशन टैग कर दिया करें तो शायद चित्र की डीटेल्स में दिख जाये। पर पता नहीं टेलीग्राम/ह्वाट्सएप्प उन टैग्स को बनाये रखते हैं कि नहीं। यह तो तकनीकी विद्वान ही बता सकते हैं। भोपाल के ताल को अपनी अनगिनत यात्राओं में मैंने ट्रेन के इंजन से या कैरिज की खिड़की से निहारा होगा! उस जमाने में मेरे पास फोटो लेने के गैजेट्स नहीं होते थे अन्यथा टनों चित्र होते मेरे पास उसके! अब केवल स्मृतियां हैं।

प्रेमसागर ने बताया कि एक वृद्ध मिले थे। पांवों से लाचार। सत्तर से ऊपर उम्र होगी। उनके एक पैर में झुनझुनी रहती थी। अशक्त होने के कारण बेटा और पतोहू ने भी उनको उपेक्षित कर दिया था। अपना भोजन भी खुद बनाते थे। प्रेमसागर को देख कर उनसे कुछ उपाय मांगने लगे। यह कहने पर कि वे कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, माने नहीं। उनकी आंखों में आंसू थे। अंतत: प्रेमसागर ने उन्हें श्रद्धा के डोमेन का उपाय बताया – “आप शिवजी के प्रति पूरी श्रद्धा रख कर त्रयोदशी की रात में पास के किसी शिवाला के शिवलिंग पर बेलपत्र रखें और उसको घर ला कर चबा कर खा जायें। कुछ दिन करें। अश्वगंधा का प्रयोग करें…”

“भईया, मैं और क्या उपाय बताता? वे मान ही नहीं रहे थे। लोगों को डांट कर, झिड़क कर तो चला नहीं जा सकता। इन्ही प्रकार के उपायों का सहारा लेना होता है।” प्रेम सागर ने कहा। पर वैसे देखा जाये तो प्रेमसागर खुद उदाहरण हैं चमत्कार के। और वे खुद एक संकल्प के अनुसार चले जा रहे हैं इतनी बड़ी यात्रा पर!

वे खुद एक संकल्प के अनुसार चले जा रहे हैं इतनी बड़ी यात्रा पर!
कितनी बड़ी है द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा?

संकल्प बहुत बड़ा है, यह सभी सोचते हैं। पर कितना बड़ा है? कितनी लम्बी है यह यात्रा? मैं गूगल मैप का सहारा लेता हूं। प्रयाग से भोपाल के आगे तक प्रेमसागर ने 1276 किलोमीटर पैदल चलना पूरा किया है। नक्शे पर भोपाल से मैं निम्न स्थानों को ट्रेस करता हूं –

कांवर यात्रा पथ किलोमीटर
प्रयाग – वाराणसी – अमरकण्टक – जबलपुर – भोपाल (Shiva1)1243
भोपाल – उज्जैन – ॐकारेश्वर – नासिक (त्र्यम्बकेश्वर) – भीमाशंकर – घृश्नेश्वर – सोमनाथ – नागेश्वर – केदारनाथ (Shiva2)4105
केदारनाथ – देवघर (बैजनाथ) – श्रीशैलम (मल्लिकार्जुन) – रामेश्वरम (Shiva3)4074
कुल योग 9422
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा

यात्रा के उक्त तीनों खण्डों के गूगल मैप्स के स्क्रीनशॉट नीचे स्लाइड-शो में हैं।

प्रेमसागर

मैंने उक्त गणना में गूगल मैप की दूरी में 7 प्रतिशत और जोड़ा है जो सामान्यत: लास्ट माइल कनेक्टिविटी में अतिरिक्त चलना हो ही जाता है। इसके अलावा यह भी सम्भव है कि जिस क्रम में यात्रा की परिकल्पना मैंने की है, वह सही पथ न हो। श्रीशैलम और रामेश्वरम की यात्रा इटारसी-नागपुर होते हुये (लगभग) दक्षिणापथ से की जानी उचित होगी या झारखण्ड-ओडिसा-आंध्र-तेलंगाना के मार्ग से; उसपर विचार किया जा सकता है। किसी परिवर्तन से दूरी में घट-बढ़ हो ही जायेगी। पर अनुमानत: यात्रा 9-10 हजार किलोमीटर की होगी।

कुल मिला कर लगभग 10 हजार किलोमीटर के आसपास यह द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा बनती है। उसका एक बटा आठवां हिस्सा (12-15 प्रतिशत) अभी तक सम्पन्न हो चुका है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इससे यह विश्वास पुख्ता हुआ है कि प्रेमसागर यात्रा सम्पन्न करने में सक्षम हैं।

पर यह अभी है सम्पूर्ण यात्रा का एक छोटा भाग ही। आगे बहुत से लोगों का; अनेक प्रकार के संसाधनों और शुभकामनाओं का; और आर्थिक रूप से योगदान का भी; सहयोग आवश्यक होगा। जिस प्रकार से अब तक महादेव ने (विलक्षण रूप से) प्रेमसागर पर कृपा की है; उसी तरह आगे भी सहायता करते रहेंगे। जिस रफ्तार से अभी यात्रा चली है, उससे लगभग 350-400 दिन लगने चाहियें पूरी यात्रा सम्पन्न होने में। जैसा शुरुआत में प्रेमसागर ने मुझे कहा था – वे इससे ज्यादा समय के लिये अपने को तैयार कर चले हैं पर सोचते हैं कि उससे कहीं कम समय में वे यात्रा सम्पन्न कर लेंगे।

19 अक्तूबर 21, सवेरे –

सवेरे का वार्ता-कर्मकाण्ड साढ़े छ बजे किया। प्रेमसागर उस समय निकले ही थे आष्टा के लिये। दो तीन किलोमीटर चले होंगे। रोपनी के वन कर्मी साथ साथ चल रहे थे उन्हें विदा करने के लिये। “इनसे कह रहा हूं लौट जाने के लिये पर भईया मान ही नहीं रहे।”

और वे लोग उन्हें सिहोर तक छोड़ कर गये। सिहोर उनकी रोपनी से 10 किलोमीटर की दूरी पर है।

सिहोर तक छोड़ कर गये वे लोग। सिहोर के इस चित्र में तेज सिंह प्रेमसागर का पिट्ठू उठाये हुये।

कल रात मैंने लिखा था – वहां लोगों के पास साधन विपन्नता होगी पर भाव सम्पन्नता कहीं ज्यादा होगी और वह साधन हीनता की असुविधा को ओवर कम्पनसेट कर देगी! और मुझे लगता है कि वन कर्मियों ने उनको छोड़ने साथ चलने के भाव से वह सिद्ध ही कर दिया!

मैंने प्रेमसागर को कहा कि इस क्षेत्र में हनुमान जी कम भेरू बाबा ढेरों मिलेंगे सड़क किनारे। उनके चित्र लें। तरह तरह के नामों के उपसर्ग वाले भेरू मिलेंगे। यह इलाका ही शैव गढ़ रहा है। प्रेमसागर अपने इलाके में चल रहे हैं।

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर


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