कुछ और चलें – गाडरवारा से उदयपुरा


11 अक्तूबर, रात्रि –

दूरियां जल्दी तय कर लेने का लालच (?) है प्रेमसागर को। उन्होने सोचा था कि पच्चीस किलोमीटर के हिसाब से मुकाम रखेंगे। उसी हिसाब से उन्हें गाडरवारा से चल कर सांईखेड़ा तक चलना था। पर दस-इग्यारह बजे तक उन्हें लगा कि काफी दूरी तय कर ली है। इसके अलावा मौसम भी अच्छा है। सांईखेड़ा तो वे तीन बजे तक पंहुच ही जायेंगे। कुछ और चलें तो नर्मदा पार कर उदयपुरा भी पंहुच सकते हैं। वहां भी रुकने का विकल्प है। वहां के लोग भी फोन कर आमंत्रित कर रहे हैं।

और प्रेमसागर ने आगे बढ़ने का निर्णय किया। दो बजे मैंने नेट पर नक्शे में देखा – बड़ी तेजी से प्रेम सागर आगे बढ़ रहे थे। पर सांईखेड़ा में उन्हें देर तक रुके पाया। रुकने वाली जगह पर कोई गूगल मैप में एक मैडीकल स्टोर दिखाई दे रहा था। हो सकता है वहां कोई दवाई लिए हों। वहां से चलने पर उनकी चाल धीमी लगने लगी थी।

नर्मदा किनारे तो बहुत देर तक कोई गतिविधि नहीं नजर आयी। करीब घण्टा भर हुआ। वे नदी के करीब थे, पर नक्शे के स्टेटस के हिसाब से नदी पार नहीं की थी।

वहीं से उनका फोन शाम छ बजे मुझे आया – “भईया जरा देख कर बतायें यहां से अभी कितना दूर है उदयपुरा।”

सवा आठ किलोमीटर है। पर बहुत देर से आपने नदी पार नहीं की। क्या दिक्कत है?”

“पैर में दर्द हो रहा है। मालिश कर रहा हूं। उदयपुरा से फोन कर रहे हैं। आठ किलोमीटर है तो दो घण्टा लगेगा। पन्द्रह मिनट में एक किलोमीटर चलता हूं मैं।” – प्रेमसागर की आवाज में संतोष था। वे आठ बजे तक तो पंहुच ही जायेंगे!

मुझे अपनी दशा सम्पाती की तरह लगी। रामायण का वह गीध और किसी प्रकार से वानरों की सहायता नहीं कर सकता था। उसके पंख जल चुके थे और वह बूढ़ा भी था। खुद जा कर लंका से सीता की सुधि नहीं ला सकता था। वह केवल यह देख सकता था कि लंका कितनी दूर है और उसमें सीता कहां पर हैं। मैं भी केवल यह बता सकता था कि प्रेमसागर का गंतव्य कितना दूर है। यह बता सकता था कि रास्ते में एक और नदी – मच्छवई नदी – और पड़ेगी। पतली सी नदी दिखती है नक्शे में। हो सकता है सूखी हुई हो। और, कोई शॉर्टकट नहीं है जिसे पकड़ा जा सके। नक्शे के हिसाब से सीधा रास्ता है उदयपुरा का। सड़क लगभग कौव्वा-उड़ान के रास्ते के हिसाब से है।

हनूमान (प्रेमसागर) नर्मदा तट पर थे और सम्पाती (मैं) अपने घर, जिला भदोही में। हनूमान के पास अपना भी गैजेट था, अपना जंतर, अपना मोबाइल। उसमें देख सकते थे कि कितनी दूर है उदयपुरा। पर उन्हे मुझ सम्पाती से जानना था! :lol:

अंतत: वे सात साढ़े सात बजे तक छू ही लिये उदयपुरा। नक्शे में कुल चालीस किलोमीटर है यह गाडरवारा से। नक्शे में दिखाई दूरी में आसपास का और चलना जोड़ लें 42-43 किमी चलना हुआ होगा। पच्चीस किमी चलना तय किया पर चले उससे पंद्रह सत्रह किलोमीटर ज्यादा।

दूरी तय करने का लोभ प्रेमसागर में है और उसका कोई तोड़ नहीं है। उसके लिये उनके पास तर्क हैं। … पैर में दर्द इसलिये हुआ कि रास्ते में कोई चाय का दुकान नहीं मिला। चाय न मिले तो कोई बात नहीं, आराम कहीं भी किया जा सकता था पर मेन बात कांवर को ऊंचे जगह पर रखने की है; वह चाय की दुकान पर ही हो पाता है। इसी तरह के और तर्क थे प्रेम सागर के पास। “पैर में दर्द है भईया पर एक ठो टैबलेट खा लेंगे, रात में सोयेंगे तो ठीक हो जायेगा।”

पता नहीं, महादेव कह रहे हैं क्या कि टैबलेट खा बेट्टा, और चला चल?! महादेव हैं मूडी देवाधिदेव। ऐसी प्रेरणा दे सकते हैं। … मैंने प्रेमसागर से तर्क करना बंद कर दिया। कांवर प्रेम सागर की, संकल्प प्रेम सागर का, यात्रा प्रेमसागर की; मैं जबरी उनके पैर के दर्द को ले कर दुबला हो रहा हूं। … तुमसे अपने गठियाग्रस्त पैर के दर्द का इलाज तो होता नहीं और तुम नसीहत देते हो प्रेमसागर को, जीडी! बंद करो अपनी एम्पैथी! मैं चुप हो गया।

वैसे भी, कल नीरज रोहिल्ला ने टिप्पणी की थी –

रीताजी की बात में दम है (पूर्ण सहमति नहीं है अभी), इंजीनियरिंग में कहते हैं 1st order effect, 2nd order and 3rd order etc. उनकी यात्रा का 1st order ध्येय किसी भी प्रकार बाधित न हो, एक सूत भी नहीं, तभी बाकी करेक्शन लगाए जा सकते हैं। :-)

नीरज की फेसबुक पेज पर टिप्पणी

प्रेमसागर का फर्स्ट ऑर्डर ध्येय यात्रा को (जल्दी) सम्पन्न करना है। और वे अपनी क्षमताओं का पूरा दोहन उसके लिये करना चाहते हैं। तब सेकेण्ड ऑर्डर, थर्ड ऑर्डर ध्येय का प्रश्न ही नहीं उठता। पीरियड।

मैं सोचता था कि अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने के लिये प्रेमसागर को ज्यादा ध्यान देना चाहिये पर प्रेमसागर जानते हैं अपनी कुल्हाड़ी की गुणवत्ता। सौ से ज्यादा बार सुल्तानगंज से देवघर कांवर ले कर चल चुके हैं। उन्हें संज्ञान है कि उनकी कुल्हाडी टॉप क्लास है।


सवेरे गाडरवारा से निकल कर प्रेमसागर ने एक दुकान पर चाय पी। चाय सर्व करने वाले का चित्र उन्होने भेजा है। इकहरे बदन का आदमी। कांधे पर एक नेपकिन लिये है और हाथ में चाय का पेपर कप। कुल्हड़ का चलन मध्यप्रदेश में नहीं है। कुम्हार अपनी मिट्टी बारबार उपयोग किये जा सकने वाले उपकरणों को बनाने में करता है एक बार चाय पी कर फैंकने वाले कुल्हड़ में नहीं। वहां गांगेय पीली मिट्टी बहुतायत में नहीं होती। वैसे कुल्हड़ न हो तो पेपर कप अगला उपयुक्त बायो डीग्रेडेबल विकल्प है। यहां उत्तर प्रदेश में तो लोग पैसा बचाने के लिये कुल्हड़ और पत्तल की बजाय प्लास्टिक की ग्लास और थर्मोकोल की प्लेट चलाते हैं जो अंतत: पोखर-ताल-नदी को चौपट करती है। मुझे वह चाय वाला आदमी और वह पेपर कप देख कर अच्छा लगा।

चाय की वह छोटी दुकान नहीं थी, सड़क किनारे का बड़ा रेस्तरां था। शायद गाडरवारा कस्बे के छोर पर ही होगा। साफ सुथरी जगह। बड़ी जगह पर चाय के पैसे भी ज्यादा लगे होंगे। सवेरे सवेरे उसमें प्रेमसागर के अलावा कोई और ग्राहक नजर नहीं आता था उस चित्र में जो प्रेम सागर ने भेजा था।

रास्ता अच्छा था – स्टेट हाईवे है वह। बबूल के पेड़ बहुत थे सड़क किनारे, जैसा प्रेमसागर ने बताया। मौसम भी साथ दे रहा था। धूप असहनीय नहीं थी। प्रेमसागर प्रसन्न थे और सांईखेड़ा में रुकने की बजाय आगे बढ़ जाने की सोचने और उस हिसाब से मुझे तर्क देने लगे थे।

रास्ता अच्छा था – स्टेट हाईवे है वह।

आसपास खेती थी, गन्ना ज्यादा दिखा प्रेमसागर को। नर्मदा घाटी का इलाका है। सतपुड़ा और विंध्य की ऊंचाइयों से झरता पानी इस घाटी में आता होगा, सो पानी पर्याप्त मिल जाता होगा गन्ने की खेती के लिये – यह मेरी अटकल है। अन्यथा पश्चिमी मध्यप्रदेश – मालवा इलाके में जहां मैंने दो दशक गुजारे हैं, गन्ने की खेती की किसान सोच भी नहीं सकता था। “लोग बता रहे थे कि इस नर्मदेय क्षेत्र में जमीन का ये हाल है कि सब तरह की फसल हो जाती है यहां – धान, गेंहू, गन्ना, चना, मक्का …।”

साईंखेडा से 12 किमी पहले, एक हनुमान जी के मंदिर में एक विरक्त साधू के समीप प्रेमसागर कुछ समय बैठे।

रास्ते में, साईंखेडा से 12 किमी पहले, एक हनुमान जी के मंदिर में एक विरक्त साधू के समीप प्रेमसागर कुछ समय बैठे। वे साधू (या सज्जन) सामान्य साधू वाले वेष में नहीं थे। ध्यानमग्न थे। उनके हाथ “आजानुभुज” थे। कृषकाय शरीर। चेहरे पर शांति थी और शरीर की नसें फूली देखी जा सकती थीं। एक टाट पर बैठे थे। व्यक्तित्व आकर्षक था। ऐसे कई लोग, जो तपस्या करते हैं, मिल जाते हैं। उन्हें ढूंढने बहुत दूर नहीं जाना पड़ता। बस आपकी प्रवृत्ति, आपकी ट्यूनिंग वैसी होनी चाहिये। उनसे बात भी हुई प्रेमसागर की। यात्रा की बात सुनी तो महात्मा जी अपनी मोहमाया की बात करने लगे। विरक्त हो गये हैं पर परिवार अभी भी साथ जुड़ा है। मोहमाया छूटती नहीं। प्रेमसागर से उन्हें तुलना करने की जरूरत आन पड़ी। महात्मा जी शायद तुलना-वृत्ति से उबर नहीं सके हैं।

एक चाय की दुकान वाला बहुत स्नेही जीव था। सड़क से प्रेमसागर को बुला कर ले गया और चाय नाश्ता कराया। फलहारी चिवड़ा भी खिलाया। नाम बताया राकेश। एक फोटो भी लिया प्रेमसागर ने चाय वाले का। चित्र में समोसे के साथ तली हुई बड़ी बड़ी हरी मिर्चें रखी हैं। प्रेमसागर का कहना है कि हरी मिर्च खानी चाहिये। उससे पेट खराब नहीं होता और एक भी बीज अगर पेट में है तो बुखार नहीं आता। मेरा हरी मिर्च का अनुभव शून्य है। कभी गलती से एक टुकड़ा खाने में चला जाये तो ढेर सारा पानी पीना पड़ता है और तुरंत उसके एण्टी-डोट की तरह गुड़ की भेली की याद हो आती है। दुनियां दो खेमे में बंटी है – मिर्च भक्त और मिर्च द्रोही! प्रेमसागर और ज्ञानदत्त दो अलग अलग खेमे के हैं! :lol:

चाय की दुकान वाला राकेश

रात साढ़े सात बजे प्रेमसागर उदयपुरा के महेंद्र सिंह राजपूत जी के घर पर पंहुचे। वहां उनका आदर सत्कार हुआ। ठहरने के लिये पास के एक होटल के कमरे की व्यवस्था थी। महेंद्र सिंह जी दो भाई हैं और ज्वाइण्ट फैमिली रहती है। उन दोनो की पुत्रियां और बेटा हैं और चित्र में उनके बुजुर्ग पिताजी भी हैं। थके थे प्रेमसागर, सो टैबलेट खा कर सोये। मुझे कोई चित्र भेजने-बातचीत करने का अनुष्ठान भी अगले दिन सवेरे पूरा हुआ।

कल सवेरे भोर में ही उन्हें बरेली के लिये निकलना है। मध्यप्रदेश का यह बरेली उदयपुरा से 35-37 किमी दूर है। चलने में, आटे के साथ नमक बराबर उससे ज्यादा ही हो जाता है, जो नक्शे में दिखाया जाता है। दूसरे दूरी रास्ते की दुरुहता का मापदण्ड तो होती नहीं। पर दूरी से एक आंकड़ा तो मिलता ही है। आकलन के अनुसार उदयपुरा तक प्रेमसागर 1083 किमी चल चुके हैं। इससे ज्यादा ही चले होंगे, कम नहीं।

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

गाडरवारा, गाकड़, डमरू घाटी और कुम्हार


10 अक्तूबर शाम –

सवेरे प्रेमसागर रेस्ट हाउस के आसपास घूमे। खपरैल के मकान देखे और उनके चित्र लिये। वन विभाग की कॉलोनी की सड़क का चित्र देख कर मुझे अपने रेलवे के दिनों की याद हो आयी। मैं छोटी जगहों में रहा हूं और वहां की रेल कॉलोनी के दृश्य इसी प्रकार के ही होते थे। सवेरे उनमें सैर करने का भी वही आनंद होता था। साफ सड़कें और वृक्ष। वृक्षों से गिरी पत्तियां। उन दृश्यों को तो बहुत याद करता हूं। यहां गांव में भी खुला माहौल है, पर खुली सड़कें और उनके किनारे पेड़ तो नहीं हैं। ऊबड़ खाबड़ सड़क और उसके किनारे गांव वालों के शौच की गंध तो बहुत ही उबकाई लाती है। पर सब कुछ तो जीवन में हर समय नहीं मिल सकता! प्रेमसागर के उन चित्रों को देख कर मैं अतीत में चला गया। वह अतीत, जहां अब जाना नहीं होगा। :-(

गाडरवारा की वन विभाग की कॉलोनी की सड़क

प्रेमसागर की ख्याति-खबर उनके आने के पहले पंहुचने लगी है। गाडरवारा में उनसे मिलने कुछ लोग आये थे। मैंने उनसे पूछा नहीं कि कौन लोग थे। प्रेमसागर भी बाकी चीजें बताते समय शायद उनके बारे में बताना भूल गये। उन्होने यह बताया कि सवेरे सड़क पर झाड़ू लगाती महिला दिखी तो उससे पूछा कि उसकी कोई सहायता कर सकते हैं क्या? महिला ने बताया कि उसने चाय नहीं पी है। उसको को उन्होने पैसे दिये थे चाय पीने के लिये। उस महिला का मरद भी सफाई के काम में था तो दो लोगों की चाय के लिये दिये।

अपने एक उसूल की बात उन्होने प्रसंगवश बताई प्रेमसागर ने – “भईया, वैसे मैं भीख मांगने वालों को भीख नहीं देता। पर वृद्ध और बीमार लोगों को जरूर सहायता करने की कोशिश करता हूं। उसके अलावा जो सार्वजनिक स्थान पर सफाई के काम में लगे मिलते हैं, उनके प्रति हमेशा कुछ न कुछ देने का भाव मन में रहता है। काहे कि यह सफाई का काम कोई करता नहीं। और यह बहुत जरूरी काम है।”

अशोक मेहरा जी गाकड़ भूनते हुये

दोपहर के खाने में मनीष तिवारी के घर पर गाकड़ भर्ता का इंतजाम था। बनाने के काम में अस्थाई कर्मी अशोक मेहरा जी लगे थे। गाकड़ वैसे ही बनता है जैसे यहां उत्तरप्रदेश में बाटी। उसमें शायद सत्तू नहीं भरा रहता। मालवा में आगे यही रूपांतरित हो कर बाफला बन जाता है। बाफला बनाने की प्रक्रिया कुछ अलग है। वहां गोल टिक्कड़ पहले उबाला जाता है फिर कण्डे पर भूना जाता है। मुझे बाटी की बजाय गाकड़ और गाकड़ की बजाय बाफला ज्यादा अच्छा लगता है। बाटी में जो सत्तू झरता है उसे समेटते हुये खाना झंझट का काम लगता है। यह जरूर है कि बाटी की तुलनात्मक बेइज्जती पूर्वांचल-बिहार वालों को कत्तई नहीं रुचेगी। :lol:

दोपहर के खाने में मनीष तिवारी के घर पर गाकड़ भर्ता का इंतजाम था।

फिलहाल प्रेमसागर के गाकड़-भर्ता-दाल-दही आदि के चित्र को देख मन किया कि मनीष का निमंत्रण स्वीकार कर गाडरवारा का चक्कर लगा ही लिया जाये। … सब मानसिक लड्डू फोड़ने वाले ख्याल हैं! :-)

शाम के समय शक्कर नदी के उस पार, पूर्वी किनारे के आगे वे डमरू घाटी गये। यहां गाडरवारा के ही किन्ही भगवान सिंह परिहार जी ने एक बड़े से परिसर में एक मंदिर-कम-टूरिस्ट स्पॉट जैसा बनाया है। सीमेंट या प्लास्टर ऑफ पेरिस की छोटी-बड़ी-विशालकाय मूर्तियां हैं। शिव जी और हनूमान जी की विशालकाय मूर्तियां और शिवलिंग हैं। बतखें हैं। प्राकृतिक दृश्य है। डमरू के आकार की इस घाटी का कोई इतिहास भी है और दो दशक पुराना वर्तमान भी। गाडरवारा से जुड़ा है डमरू घाटी का नाम। मुझे बहुत कुछ लिखा मिला नहीं नेट पर डमरू घाटी की प्राचीनता के बारे में। शायद जो है वह कुछ दशकों की परिकल्पना और दो दशकों का निर्माण है। एक खबर वहां आने वाले चढ़ावे की राशि के बारे में है, जिससे यह पता चलता है कि चढ़ावा खूब आता है – अर्थात श्रद्धालू पर्यटक खूब आते हैं। कुल मिला कर पर्यटन, तफरीह और धार्मिक स्थल का घालमेल सा लगा डमरू घाटी।

वहं के कई चित्र प्रेमसागर ने भेजे हैं। उनमें से जो अच्छे हैं उन्हें मैं यहां स्लाइड-शो के रूप में लगा दे रहा हूं। कुछ अधिक लिखने की बजाय वे चित्र ही कह देंगे कि डमरू घाटी का डमरू कैसे बजना चाहिये।

मैंने कल प्रेमसागर के यह कहने पर कि यहां गाडरवारा में उन्होने खपरैल की छतों वाली कई इमारतें देखी हैं, यह आग्रह किया था कि वे अगले दिन (अर्थात आज) उन स्थानों के चित्र लें और यह भी पता करने की कोशिश करें कि खपरैल बनाने वाले कुम्हार अब भी खपरैल व्यापक तौर पर बनाते हैं या जो है वह पुरानी इमारतें भर ही हैं। कम से कम मैं यहां भदोही में तो पाता हूं कि खपरैल – नरिया-थपुआ – का बनाना कुम्हार लोगों ने बंद ही कर दिया है। लोग सीमेण्ट की ढलईया वाली छतें या एसबेस्टॉस/स्टील की शीट की छतें ही इस्तेमाल करने लगे हैं। मड़ई सरपत, रंहठा, बांस की खपच्ची और अन्य घासफूस के प्रयोग से बनती है। खपरैल तो खतम हो गयी है। यह परिवर्तन कुछ दशकों का है।

खपरैल का घर

गाडरवारा में चूंकि प्रेमसागर आज अपनी यात्रा से अवकाश लिये थे, वे आसपास खपरैल और कुम्हार की तलाश में ही घूमे मनीष तिवारी के साथ, उनकी मोटर साइकिल पर। खपरैल की छतों की इमारतें आकर्षक लगती हैं। कुम्हार भी मिला। उसके पास अब बड़े चक्के वाला हाथ और डण्डी से घुमाने वाला चाक नहीं है। उसका स्थान एक हॉर्सपावर की इण्डक्शन मोटर से चलित चाक ने ले लिया है जिसे बटन दबा कर चलाया जाता है और चाक की स्पीड भी शायद रेग्युलेटर से नियंत्रित की जाती है।

पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस, गाडरवारा

कुम्हार ने बताया कि खपरैल की बिक्री का समय तो मानसून के पहले का था। तभी बन कर वह बिक चुका। अब तो वह घरिया बना रहा था। बहरहाल यह तो पता चला कि खपरैल बनना अभी जारी है।

कुम्हार का बिजली चालित चाक

मेरी पत्नीजी यह सुन देख कर कहती हैं – बेचारे प्रेमसागर! कहां तो द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा में नाक की सीध में, कांवर उठाये कदमताल किये चले जा रहे थे और उसमें रमे हुये थे। तुमने उस शरीफ आदमी को खपरैल देखने और कुम्हार की बस्ती खोजने में लगा दिया! शंकर भगवान तुम पर किचकिचा रहे होंगे। तुम उनका शोषण कर रहे हो ‌‌डिजिटल एक्स्प्लॉइटेशन (Digital Exploitation)! :lol:

मैं कहता हूं – नहीं, ऐसा नहीं है! मैं उनकी यात्रा को एक नयी विमा – नया डायमेंशन देने का प्रयास कर रहा हूं। यह देखना-परखना-सूंघना उनके चरित्र को निखारेगा और उन्हें एक अनूठा कांवरिया बनायेगा। और यह सब करा कौन रहा है? मैं नहीं करा रहा। इस कांवर यात्रा में जो कुछ हो रहा है वह महादेव प्रेरित ही है। सब वे ही कर रहे हैं और वे ही करा रहे हैं।

कुम्हार घरिया बना रहा था।

मेरे समधी रवींद्र पांड़े की मोबाइल की रिंगटोन है – प्रभु आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है। करते तो तुम हो बाबा, मेरा नाम हो रहा है। … सो कर सब महादेव ही रहे हैं! :-)

कल भोर में ही निकल लेंगे प्रेमसागर गाडरवारा से। उनकी योजना सांईखेड़ा तक जाने की है। वह पचीस किमी दूर है। वहां रात में रुकने के दो विकल्प हैं। एक तो किसी सज्जन के घर पर है और दूसरा मंदिर में। प्रेम सागर ने कहा है कि भोर में निकल कर दस बजे तक चलेंगे। फिर जब धूप तेज हो जायेगी तो दोपहर तक कहीं छाया में ठहरेंगे। बाकी यात्रा शाम को पूरी कर मुकाम पर पंहुच जायेंगे। अब वे दिन भर चलने के कारण बीमार होने का जोखिम नहीं लेंगे। कुछ दिनों बाद जब धूप का ताप मंद पड़ जायेगा, तब दिन भर चलने की सोचेंगे।

सांईखेड़ा दूधी नदी के किनारे है। वह नदी भी सतपुड़ा के पहाड़/जंगल से निकलती है और आगे चल कर नर्मदा में मिल जाती है। वैसे ही जैसे शक्कर नदी सतपुड़ा से निकल कर नर्मदा में मिलती है। प्रेम सागर इसी तरह नर्मदा के आसपास चल रहे हैं। अभी नर्मदा के दक्षिणी/बांयी बाजू में हैं। परसों वे बोरास के पास नर्मदा लांघेंगे। वे नर्मदा के परकम्मा वाले होते तो नर्मदा माई को लांघने का काम नहीं करते! पर वे दूसरे मुहीम पर हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा पर!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

गाडरवारा, खपरैल, मनीष तिवारी और नदियां


9 अक्तूबर 21, शाम –

प्रेमसागर सवेरे दस बजे पंहुच गये थे गाडरवारा। रास्ते में शक्कर नदी के चित्र भेजे। नदी में जल कम है, रेत ज्यादा। उथली हैं नदी। इतनी उथली कि मेरे विचार से पैदल पार की जा सकती है। किसी चित्र में कोई डोंगी उसमें नहीं दिखी। नदी का पाट चौड़ा है। बारिश होने पर खूब जल होता होगा और बारिश के मौसम के बाद रेत की नदी होती होगी। पता नहीं सदानीरा रहती है या नहीं। पर नदी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं लगता। शक्कर कभी मीठी रही होंगी, अब मिठास बची नहीं लगती।

गीली रेत में पक्षियों और जानवरों के चलने के निशान साफ देखे जा सकते हैं जबकि फोटो पुल से लिये होंगे प्रेमसागर ने। उनके चित्र समय के साथ बेहतरतर (उत्तरोत्तर बेहतर के लिये गढ़ा शब्द) होते चले जा रहे हैं।

गाडरवारा में शक्कर और सीतारेवा का संगम है। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे जा कर संगम देख आयें। रेस्ट हाउस से तो किलोमीटर भर दूर होगा। नक्शे में शक्कर का पाट चौड़ा लगता है और सीतारेवा छोटी और पतली नदी लगती हैं। शायद चंचल और सुंदर नदी रही हो, तभी नाम में रेवा जुड़ा हो।

रास्ते में शक्कर नदी के चित्र भेजे। नदी में जल कम है, रेत ज्यादा। उथली हैं नदी।

नदियां – चाहे प्रत्यक्ष हों या नक्शे में, मुझे आकर्षित करती हैं। लगता है पूर्वजन्म में मैं मल्लाह रहा होऊंगा। किसी नदी को मैने सताया होगा और उन्होने शाप दिया होगा – जा तू अगले जनम में तैरना भी नहीं जानेगा और पानी में हिलने में तुझे भय लगा करेगा। कुछ वैसा ही है मेरे साथ – नदी को निहारता हूं पर उसमें पैर रखने से भी भय लगता है। लोग कहते हैं कि रोज गंगा जाते हो, उसमें स्नान कितनी बार किये हो? … मैंने शायद ही कभी गंगाजी में डुबकी लगाई हो। पैंतीस साल पहले अपने बब्बा को संगम में स्नान कराने ले गया था; तब लगाई थी उनके साथ। उनकी अंतिम ख्वाहिशों में एक रहा होगा संगम में नहाना। बस वही याद है। नदी के प्रति लगाव, भाव और भय का अजीब मिश्रण है मेरे व्यक्तित्व में।

प्रेमसागर मुझे फोन मिलाते हैं और बात करने के लिये फोन एक वन रक्षक मनीष तिवारी को थमा देते हैं। मनीष 1996 से वन विभाग के कर्मचारी हैं। तब कैजुअल लगे होंगे। सन 2008-09 से नियमित वन रक्षक हैं। यहीं गाडरवारा में पदस्थापना है। सरकारी क्वार्टर मिला है। वे दो भाई हैं। मनीष और उनके छोटे भाई के परिवार साथ रहते हैं उनके सरकारी मकान में। वैसे उन्होने एक प्लॉट ले लिया है गाडरवारा में। “नर्मदा मईया की कृपा रही और आप लोगों का आशीर्वाद रहा तो मकान भी बन ही जायेगा।”

दोनो की पत्नी हैं, उनकी माता जी हैं और दोनो के दो दो बच्चे हैं। मनीष के दो लड़के हैं – आठवीं और चौथी कक्षा में। भाई की दो बेटियां हैं जो अभी छोटी हैं। एक ढाई साल की और दूसरी कुछ महीने की। उनके पास गाय है या नहीं – यह नहीं बताया और मैंने पूछा भी नहीं।

मनीष बताते हैं कि ये नदियां – और कई नदियां हैं जो नर्मदा माई में जा कर मिल जाती हैं – उनके बचपन में सदानीरा हुआ करती थीं। उनके गांव के पास भी उम्मर नदी है जो आगे चल कर दूधी नदी में मिलती है और दूधी मिलती है नर्मदा में। ये सभी नदियां सतपुड़ा की देन हैं। सभी नर्मदा के जल को समृद्ध करने वाली हैं। शक्कर तो वाराह गंगा हैं नर्मदा पुराण में। वाराह भगवान शक्कर नदी के रूप में प्रकट हुये थे, ऐसा विवरण आता है। “एक बार मैं नर्मदा पुराण सुन रहा था पण्डितजी से, तब उन्होने उल्लेख किया था।”

पर अब इन नदियों में गर्मियों में पानी नहीं रहता; रेत ही रहती है। बरसात होना कम हो गयी है। “मेरे गांव के पास भी उम्मर नदी है, उसमें मेरे बचपन में हमेशा पानी होता था, अब केवल बारिश और ठण्ड में ही होता है।”

बालू दोहन का बड़ा खेल चलता है, बड़ा ग़जब का कारोबार है। पूरे मध्य प्रदेश में चल रहा है। एक ट्रॉली जो पहले में हजार से कम की होती थी अब चार पांच हजार की आती है। अब तो सुनते हैं रेत ट्रेन से भी जाने लग गयी है। मनीष तो नर्मदा की ट्रिब्यूटरी नदियों की बात बताये, नर्मदा का खुद का हाल भी बताने वाला कोई मिलेगा कभी। वैसे मनीष बताते हैं कि नर्मदा यहां गडरवारा से अठारह किमी पर हैं और वहां जाना तो महीने में दो चार बार हो ही जाता है। उनमें तो अच्छे से पानी है।

मनीष तिवारी

मनीष अपनी नौकरी से संतुष्ट दिखे। पच्चीस किलोमीटर दूर उनका गांव है। वहं खेत हैं। ट्रेक्टर है। छोटा भाई प्राइवेट में नौकरी करता है और गांव की खेती भी संभालता है। “आपकी दया से एक चार पहिया गाड़ी भी है और गांव तक डामर की सड़क भी है। आने जाने में दिक्कत नहीं है। मैं तो यहीं रहता हूं। भाई गांव आता जाता रहता है। हम दोनो साथ रह कर और हिलमिल कर बढ़िया से संभाल रहे हैं गाडरवारा का काम भी और गांव का काम भी।” – मनीष यह बताते हुये अपना संतोष, प्रसन्नता और मेरे प्रति आदर, सब व्यक्त कर देते हैं। वह बार बार यह जोड़ते हैं – आप भी एक बार गाडरवारा का चक्कर लगाईये न। चित्र में मनीष अपनी सरकारी नौकरी और पास में गांव की खेती की जुगलबंदी तथा भाई के साथ एक साथ रहने के कारण एक अपवर्ड-मोबाइल-क्वासी-रूरल मध्यवर्गीय व्यक्ति लगते हैं। वनरक्षक अगर सामान्यत: इसी प्रकार के होंगे तो उनके जरीये बहुत कुछ बदलाव गांव-समाज में आ रहे होंगे।

पता नहीं मनीष को मुझसे बात कर कैसा लगा; मुझे तो बहुत रस मिला। लगा कि अपनी साइकिल ले कर मैं उससे उनके गांवदेहात में मिलने निकला हूं, गाडरवारा! …. अब लगता है कि तुम ब्लॉग की मजूरी नहीं कर रहे, तुम भी यात्रा कर रहे हो, जीडी! :-)

प्रेमसागर कल गाडरवारा के आगे निकलने के मूड में नहीं हैं। आज उन्हें थोड़ी हरारत थी। पेरासेटामॉल ले कर सोये और दोपहर तीन-चार बजे ही उठे। बता रहे थे कि लगता है ताप है। कल चलने के लिये लक्ष्य है पिपरिया तक जाने का। रास्ता लम्बा है। मैं उनसे कहता हूं कि पचीस तीस किमी से ज्यादा दूर अगला मुकाम नहीं होना चाहिये। भले ही रुकने के लिये कोई असुविधाजनक घर ही मिले। उनकी जरूरतें ही क्या हैं – एक बिस्तर, दो रोटी और सब्जी! वह न भी हो तो सत्तू चिवड़ा, चीनी तो है ही उनकी पोटली में। मुकाम उतनी दूर होना चाहिये जितना सरलता से रास्ता देखते आनंद लेते कटे। कांवर-मैराथन प्रतियोगिता थोड़े जीतनी है।

प्रेमसागर हां हां कह देते हैं पर करते अपने हिसाब से ही हैं। खैर, फिलहाल कल उन्होने निकलना मुल्तवी कर दिया है। जान गये हैं कि शरीर एक दिन का आराम मांगता है।

उन्होने बताया कि यहां गाडरवारा में उन्होने कई इमारतों में छत खपरैल की देखी। पास में पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस भी है, जिसकी इमारत बड़ी है और छत खपरैल की है।

मेरा आसपास देखने का आग्रह-प्रवचन लगता है प्रेमसागर पर असर डाल रहा है। उन्होने बताया कि यहां गाडरवारा में उन्होने कई इमारतों में छत खपरैल की देखी। पास में पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस भी है, जिसकी इमारत बड़ी है और छत खपरैल की है। मैं प्रेमसागर को कहता हूं कि अगर खपरैल की छत व्यापक है तो उसको बनाने वाले – नरिया और थपुआ बनाने वाले – कुम्हार भी आसपास होने चाहियें। मनीष ने बताया कि आस-पास कुम्हार हैं। कल प्रेमसागर और मनीष खपरैल के घरों के चित्र भी लेंगे और कुम्हारों से भी मिलेंगे। … आठ सौ किमी दूर बैठे मुझे आनंद आ रहा है। प्रेमसागर की यात्रा में दूरी नापने के साथ आसपास देखने का आयाम भी जुड़ रहा है। आसपास देखेंगे, फिर उसमें सौंदर्य की अनुभूति करेंगे और सौंदर्य आयेगा तो शिवत्व तो उसमें घुलामिला होगा ही! सत्यम-शिवम-सुंदरम!

प्रेमसागर को ब्लॉग की उपयोगिता समझ आ रही है। वे महसूस करते हैं; कि उनके माध्यम से खपरैल के मकानों के, कुम्हारों के और आसपास के लोगों के चित्र उसमें आयें। “सीतारेवा और शक्कर के संगम को भी कल देख कर आऊंगा” – वे बताते हैं। वे यह भी कहते हैं – “आप मनीष जी के बारे में भी लिखें। उससे वन विभाग के बड़े अधिकारियों और प्रवीण भईया को भी तो पता चले मनीष जी के बारे में कि किसे लोग हैं और कैसी जिंदगी है उनकी”। अब प्रेमसागर अभिव्यक्ति की जरूरत और महत्व के पक्ष को भी समझने लगे हैं – मेरी पत्नीजी कहती हैं कि कहीं भी पंहुचने पर मात्र मंदिर, मूर्तियां और चमत्कार तलाशने वाला व्यक्ति अब खपरैल और कुम्हार भी तलाशने लगा है – यह बहुत गहन बदलाव है व्यक्तित्व का!


अपडेट 10 अक्तूबर, सवेरेपिछली पोस्ट में जिक्र है कौड़िया के राजकुमार जी का। प्रेमसागर का आपात स्थिति में परसों उन्होने अपने घर रात्रि आश्रय और भोजन का इंतजाम किया था। वे कल रात में मिलने मिलने आये। गलती से उनका नाम पोस्ट में राजकुमार रघुवंशी की बजाय राजकुमार यदुवंशी लिखा गया था। उसे सही कर दिया गया है। उन्हें असुविधा हुई, उसका खेद है। इसके लिये उन्हे कौड़िया से गाडरवारा आना पड़ा, यह और गड़बड़ हुआ। प्रेमसागर और मैं दोनो ही भविष्य में लोगों के नामों को ले कर सतर्क रहें – यही सीख मिलती है।

कल राजकुमार रघुवंशी जी को प्रेमसागर के पास गाडरवारा आना पड़ा।
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