भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
टुन्नू पण्डित – शैलेंद्र दुबे – मेरे साले साहब हैं। उन्हीं के चक्कर में पड़ कर हम गांव में अपना घरबार शिफ्टिया लिये रिटायरमेण्ट के बाद। कभी कभी सवेरे की चाय पर आ जाते हैं। वह बहुत कम होता है – ज्यादातर उनके चेला लोग सवेरे से उन्हें घेर लेते हैं। आजकल जिल्ला भाजपा के पदाधिकारी वगैरह बनवा रहे हैं। भलण्टियर की तैनाती का रोड-मैप बन रहा है। उसमें बहुत समय लगता है उनका।
शैलेंद्र दुबे कभी कभी सवेरे चाय पर आ जाते हैंं।
आज चाय पर आये सवेरे। प्रेमसागर जी का हालचाल पूछ रहे थे। वे भी मेरी पोस्टें खंगाल लेते हैं। बात प्रेमसागर जी से हट कर भाजपा के स्टार प्रचारक राहुल गांधी जी पर आ गयी। आज कोई वीडियो चल रहा है जिसमें राहुल जी कहते हैं – “बापू के आसपास चार पांच महिलायें रहती थीं, मोहन भागवत जी के पास किसी महिला को देखा है?”
गदगद थे वे राहुल जी से। बोले कि मोहन भागवत जी माथा पकड़ कर बैठ गये होंगे। खाकी पैण्ट वालों के बीच महिला कहां से लायेंगे बेचारे। … जब तक राहुल जी हैं, तब तक भाजपा अजेय है!
“अब देख लीजिये बहनों का बड़ा रोल है आदि काल से। हिरण्यकश्यपु के लिये होलिका, रावण के लिये सूपर्णखा, कंस के लिये पूतना और राहुल जी के लिये प्रियंका … ये सब उनकी सहायता के लिये आयी थीं। और उनके बण्टाधारीकरण में उनका कितना महान योगदान है। वे न होतीं तो भारतवर्ष का नक्शा ही अलग होता।” – शैलेंद्र जब फार्म में आ गये तो उस दौरान यह प्रवचन दिये। पता नहीं यह उनका ओरीजिनल था या ह्वाट्सैप विश्वविद्यालय की किसी थीसिस का अंश। पर सामान्यत: वे ओरीजिनल कण्टेण्ट ही ज्यादा देते हैं!
इसको सुन कर मैं निरीह कभी उनकी ओर और कभी अपनी पत्नीजी (उनकी बड़ी बहन) की ओर देखने लगा! :lol:
मैं निरीह कभी उनकी ओर और कभी अपनी पत्नीजी (उनकी बड़ी बहन) की ओर देखने लगा! :lol:
शैलेंद्र आउटस्टेण्डिंग व्यक्ति हैं। उनमें राजनीति कि समझ खूब है। बहुत से ऐसे कोण, जिनकी आप कल्पना नहीं कर सकते, उस आधार पर देखने का नया नजरिया देते हैं। बाकी साले साहब हैं और उम्र में मुझसे दस साल छोटे तो ‘घर की मुरगी दाल बराबर’ समझने वाला मामला है; वर्ना इस इलाके में उनकी अहमियत जबरदस्त है। उनका पोलिटिकल डिस्कोर्स जानदार होता है। बस वह भाजपा और संघ के पक्ष में घनघोर बायस्ड रहता है। उन लोगों को कष्ट हो सकता है जिनको दक्षिणपंथ के नाम से कब्ज हो जाती हो; पर मेरे जैसे के लिये उनके साथ घण्टा दो घण्टा बिताना बहुत रोचक होता है।
मेरा रोल उस समय भाजपा और जोगी सरकार की गलतियां कमियां निकालना होता है, जिससे टुन्नू पण्डित फॉर्म में बने रहें और अपना राजनैतिक डिस्कोर्स देने में कृपणता न करने लगें। यह सब मेरा डेविल्स एडवोकेट वाला रोल होता है। सामान्यत: … और जो डिस्कशन होता है उसे पॉडकास्ट कर दिया जाये तो तीन तालियों की टक्कर की चीज बने। उसे सुन कर पाणिनि पण्डित तो लजा जायें। शायद हाजमोला तलाशने लगें। अभी तो धर्म और ईश्वर की परिकल्पना करने वालों पर अपनी मधुर आवाज में गरिया कर निकल लेते हैं, तब देखें कि कौन पार पाता है – कार्ल मास्क या बाबा विश्वनाथ! काशीनाथ सिंह भी देशज ‘पारिवारिक सम्बंधों वाले सम्बोधनों’ के नवीन प्रयोग के लिये कागज कलम तलाशने लगें – नोट्स लेने के लिये। :lol:
वैसे असल तीन ताल तो वाम और दक्षिण की जुगलबंदी से ही बन सकता है। शालीन और जोरदार जुगलबंदी से।
हफ्ते में एक रोज तीन ताल आता है। हफ्ते में कम से कम एक रोज टुन्नू पण्डित आने चाहियें सवेरे चाय पर! जय हो!
आज नया स्मार्टफोन मिल जाने से उनकी नोकिया के बूढ़े, चार इंच के स्मार्ट(?) फोन के धुंधले चित्र से निजात मिली। उन चित्रों को मुझे बहुत एडिट करना पड़ता था…
सुधीर पाण्डेय
कल सुधीर जी के सौजन्य से प्रेमसागर जी को अपनी यात्रा सुगम और सुप्रसारित करने हेतु एक नया स्मार्टफोन मिल गया। सुधीर जी ने ही कुछ दिन पहले उन्हें एक फीचर फोन और पावरबैंक खरीदवाया था। उससे उनकी फोन की बैटरी डिस्चार्ज होने की समस्या हल हो गयी थी।
आज नया स्मार्टफोन मिल जाने से उनकी नोकिया के बूढ़े, चार इंच के स्मार्ट(?) फोन के धुंधले चित्र से निजात मिली। उन चित्रों को मुझे बहुत एडिट करना पड़ता था और तब भी धुंधलापन दूर न होने के कारण उनका पेण्टिंग टाइप संस्करण बनाना होता था। अब वह नहीं करना होगा।
सुधीर जी को प्रेम सागर धन्यवाद दे ही रहे होंगे; मैं भी धन्यवाद देता हूं – दिल के कोर से!
प्रेम सागर पाण्डेय, छाता वाले की दुकान खुलने की प्रतीक्षा करते हुये।
आज सवेरे प्रेमसागर जी, बावजूद इसके कि बारिश जारी है, निकल लिये हैं अनूपपुर के लिये। सात किलोमीटर चल लिये थे जब सात-आठ के बीच उनका फोन आया। बारिश शुरू हो गयी थी। एक छाता वाले की दुकान के बाहर बैठे थे और दुकान खुलने का इंतजार कर रहे थे।
कल दिनेश कुमार शुक्ल जी ने फेसबुक पर टिप्पणी की थी – “रास्ते मे रेनकोट थोड़ा-बहुत ही बचत करेगा। भीगने से बचें। शुभयात्रा। हर हर महादेव।”
मैंने भी दिनेश जी की एडवाइजरी अपनी ओर से प्रेमसागर जी को दे दी। निकल तो वे लिये ही हैं। पर छाते का प्रयोग यात्रा के लिये नहीं, हल्की बारिश से बचने और कोई ठिकाना देखने-खोजने के लिये ही करेंं। छाता केवल सिर ही बचायेगा, पूरा शरीर तो भीगता रहेगा। और किसी पेड़ के नीचे शरण न लें।
खैर, प्रेमसागर जी का नया फोन आ गया है तो मुझमें भी उनके बारे में लिखने का उत्साह रहेगा। हर हर महादेव!
अपने चलने के अनुशासन के बारे में प्रेमसागर बताते हैं कि घूमने की आदत उनकी पुरानी है, पर घूमना बढ़ा दिल की बीमारी से उबरने के बाद। मुझे कहते हैं – “मेन बात ये हुआ भईया कि उसके बाद भगवान पर मेरा विश्वास काफी बढ़ गया।”
प्रेम सागर सोलह साल के थे, जब उनकी माता मरणासन्न थीं। उनके पिता जी ने उनके बचने की आशा छोड़ कर उनके लिये लकड़ी आदि का इंतजाम कर लिया था। पड़ोस की एक महिला के कहने पर माँ के बचने के लिये उन्होने द्वादश-ज्योतिर्लिंग की कांवर अर्पण का संकल्प लिया। अपनी माँ के लिये उन्होने अपनी उम्र सोलह की बजाय अठारह बताते हुये अपना रक्त भी दिया। मां बच गयीं। और उसके बाद 28-29 साल और जी कर गयीं।
प्रेम सागर बताते हैं कि सोलह वर्ष की अवस्था में उन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग पदयात्रा के संकल्प की विराटता का आभास नहीं था। यह भी नहीं लगता था कि वैसा कुछ वे कर पायेंगे भी। समय बीतता गया; संकल्प शेष रहा। “अनजाने में लिये संकल्प के प्रति जिज्ञासा बढ़ती गयी।”
प्रेम सागर द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा के बारे में योजना तो आज से आठ नौ साल पहले बनाना शुरू कर दिये थे। उस समय उन्होने सोच लिया था कि बेटी की शादी हो जाये और बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जायें, तब वे यह यात्रा करने में देर नहीं करेंगे।
पर सब कुछ उनकी योजना के अनुसार नहीं हुआ। छ साल पहले उनका हृदय रोग उभरा। उनके ब्लॉकेज देखते हुये, संजय गांधी पी.जी.आई. में बाईपास सर्जरी ही एक मात्र निदान बताया गया। खर्चा करीब 5-6 लाख का अंदाज बैठा। प्रेम सागर के सामने अपनी बिटिया के विवाह की प्राथमिकता थी। उनके अनुसार अगर छ लाख इलाज पर खर्च हो जाता तो बिटिया का विवाह न हो पाता। उनका सौभाग्य था – और एक चमत्कार कि उन्हें लखनऊ के अस्पताल में कार्डियॉलॉजी के डाक्टर साहब मिल गये। उनकी कृपा से उनके सारे टेस्ट बिना पैसा खर्च किये हो गये। डाक्टर साहब ने उन्हें दवा भी मुफ्त में दी और जीवन का अनुशासन बताया। अंकुरित अन्न खाने को कहा और धीरे धीरे अपना पैदल चलना बढ़ाने को बोला। वह अनुशासन प्रेमसागर ने बड़ी कड़ाई से पालन किया। छ सात महीने बाद हुई जांच में पता चला कि उनका ब्लॉकेज मामूली बचा है। उसके बाद तीन महीने और बीते। फिर टेस्ट कराने पर डाक्टर साहब ने कहा कि जो 5-10 पर्सेण्ट ब्लॉकेज बचा है वह तो कोई खास बात नहीं है। वे अपनी सामान्य जिंदगी जी सकते हैं। बीमार होते समय तुरंत बाईपास सर्जरी का मामला था और प्रेमसागर छ मीटर भी चल नहीं पाते थे; पर इस अलग प्रकार से हुये इलाज से एक चमत्कार ही हुआ। प्रेमसागर ठीक हो गये। उससे उनका पैदल चलने का अनुशासन बन गया। वह समय के साथ प्रबलतर होता गया।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
वे उन डाक्टर साहब से उसके बाद मिलने का प्रयास किये। लखनऊ के अस्पताल में तीन बार गये पर वे डाक्टर साहब – ओम प्रकाश पाण्डेय जी – मिले ही नहीं। अस्पताल वालों से पता चला कि वे बाहर से विजटिंग डाक्टर के तौर पर आते थे पर फिर वे कहां गये, उनका पता कोई नहीं बता पाया। … प्रेम सागर के लिये वे शंकर जी की कृपा उनपर बरसाने आये और उसके बाद उनका पता नहीं चला!
अपने चलने के अनुशासन के बारे में प्रेमसागर बताते हैं कि घूमने की आदत उनकी पुरानी है, पर घूमना बढ़ा दिल की बीमारी से उबरने के बाद। मुझे कहते हैं – “मेन बात ये हुआ भईया कि उसके बाद भगवान पर मेरा विश्वास काफी बढ़ गया।”
सुल्तानगंज से देवघर
उनकी बिटिया की शादी में बहुत अड़चनें आ रही थीं। परिवार के लोगों का भी सहयोग नहीं मिल रहा था। तब उन्होने संकल्प लिया 101 बार बैजनाथधाम में जल चढ़ाने का। वे सप्ताह के काम के दिन जमशेदपुर में नौकरी करते। फिर शनिवार को ट्रेन पकड़ कर सुल्तानगंज जा कर रविवार की सुबह गंगाजल लेते और पैदल देवघर आ कर सोमवार को 12-1 बजे तक बैजनाथ जी को जल अर्पित करते। यह एक सौ एक बार किया। उसके बाद “सलामी” भी किया दो बार दण्ड भी किया। दण्ड में कांवर रास्ता लेट लेट कर तय किया जाता है। वह और भी कठिन कार्य है। वहां सुल्तानगंज से देवघर का रास्ता 105 किलोमीटर का है। एक दिन में तय करते थे। “पर मेन बात है कि रास्ता कच्चा है इसलिये चलने में दिक्कत नहीं होता था। पैदल चलने के लिये रास्ता जितना कच्चा हो, उतना बेहतर है।”
बैजनाथ धाम देवघर
प्रेम सागर बताते हैं कि जब यह 101 कांवर संकल्प लिया और देवघर के बैजनाथधाम में जल चढ़ाना प्रारम्भ किया तो आशातीत दैवीय परिवर्तन हुआ। बिटिया की शादी सहजता से हो गयी। संकल्प की कसौटी पर खरे उतरे प्रेम सागर!
उनकी माता, जो उनकी सोलह वर्ष की अवस्था में ही जाने वाली थीं; लम्बा जी कर आज से तीन साल पहले देह छोड़ी। उनका क्रियाकर्म भी उन्होने और अन्य दो भाइयों के सहयोग से सम्पन्न हुआ। बड़ा बेटा 21 साल का है और छोटा अठारह का। दोनो काम में लग गये हैं। बड़ा बेटा कहता है कि अभी तीन चार साल काम करने के बाद विवाह की सोचेगा। छोटे की शादी तो उसके बाद होनी है। अब सैंतालीस साल के हैं प्रेम सागर। उन्हें लगा कि यही उचित समय है सोलह वर्ष की उम्र में लिये संकल्प के लिये निकल लेने का। इसके बाद तो दम खम उतार पर होगा। तब के लिये उस संकल्प को स्थगित करना सही नहीं होगा।
और इस कारण से निकल लिये हैं प्रेम सागर! चलते चले जा रहे हैंं। मैं प्रेम सागार जी से कुछ सवाल पूछता हूं।
“आपको यकीन है कि यह द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा पूरी कर लेंगे?”
“हण्ड्रेड टेन परसेण्ट यकीन है भईया। यकीन अपने पर नहीं, महादेव पर है। अपना क्या कहा जा सकता है? अगले क्षण सांस खत्म हो जाये। मेरा क्या गारण्टी है भईया, गारण्टी तो उनका है!”
“आप चले जा रहे हैं, पर कभी यह विचार नहीं आता कि इसमें असफल भी हो सकते हैं?” – मैं यकीन वाले सवाल को दूसरे तरह से पूछता हूं।
“असफलता का भय तो कभी भी मन में नहीं आया। नेगेटिविटी अगर मन में आयी तो समझो आदमी गया। तब वह चल ही नहीं पायेगा।” – प्रेम सागर वाजिब कारण बताते हैं अपने सफल होने के अटूट विश्वास का।
“अकेले चल रहे हैं। यह नहीं लगता कि एक ग्रुप होता, लोग साथ होते आपस में सहायता के लिये?” – मैं पूछता हूं।
“एक बात बतायें भईया कि काहे अकेले चलते हैं। साथ में कोई हो तो बातचीत में कभी दूसरे पर क्रोध या ईर्ष्या उठेगा ही। एक बार ईर्ष्या, क्रोध, गुस्सा आया तो सारी तपस्या मिट्टी में मिला देगा। अकेले चल कर अपने को उससे बचाता हूं मैं।”
महादेव पर अटूट श्रद्धा, संकल्प की कसौटी पर खुद को कसने का आत्मानुशासन और चमत्कारों पर यकीन – इसी के सहारे प्रेमसागर चलते चले जा रहे हैं। चरैवेति! चरैवेति!!!
अकेले तीर्थ यात्रा
Photo by cottonbro on Pexels.com
15 सितम्बर 2021:
शहडोल में तेज बारिश हो रही है। इसलिये आज प्रेमसागर आगे अनूपपुर-अमरकण्टक के लिये प्रस्थान नहीं कर सके। बोल रहे थे कि आज एक रेनकोट खरीदने की सोच रहे हैं।
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