राम सेवक के बागवानी टिप्स



राम सेवक मेरे पड़ोस में रहते हैं। गांव से बनारस जाते आते हैं। आजकल ट्रेनें नहीं चल रही हैं। बस का किराया ज्यादा है और शहर में आस पास जाने आने के लिये वाहन चाहिये, इस कारण से साइकिल से ही बनारस जाना हो रहा है। पचास किलोमीटर एक तरफ का साइकिल चला कर जाना और शाम को वापस पचास किलोमीटर चला कर गांव आना सम्भव नहीं, इसलिये शहर में एक कमरा किराये पर ले रखा है रुकने के लिये और सप्ताहांत में ही गांव वापस आते हैं।

राम सेवक

राम सेवक; जिनका कहना है कि माता-पिता ने उनका नाम ही सेवा करने के लिये रखा है; बनारस में माली का काम करते हैं। कई बंगलों में समय बांध रखा है। समय के अनुसार लोग पेमेण्ट करते हैं। कहीं हजार, कहीं दो हजार, कहीं चार हजार।

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पुच्चू


पुच्चू मेरे साले साहब का भृत्य है। वह किशोरावस्था में था, तभी उनके संस्थान आभा ट्रेवल्स में बतौर लोडर आया था। अब उसकी उम्र चालीस पार हो चुकी है और उनके ऑफिस या घर पर काम करने वाला विश्वस्त व्यक्ति है। निहायत ईमानदार है। कभी बाजार से सामान लाने के लिये दिये हुये पैसे कम पड़ जायें तो अपनी जेब से खर्च कर सामान लाने और अपने मुंह से उसकी कीमत न मांगने वाला आदमी है पुच्चू। 

पुच्चू

पुच्चू बहुत सफाई पसंद है। घर में काम करता है तो हर चीज साफ करने में समय गुजारता है। सफाई पसंदी उसमें जुनून के स्तर पर है। मेरी सास जी, जब जिंदा थीं, का खाना किचन में रखा हुआ था। उन्होने इस लिये रखा था कि कुछ समय बाद मन होने पर भोजन करेंगीं। इस बीच पुच्चू जी किचन की सफाई करते करते उनका खाना भी डस्टबिन में डाल आये। सफाई रगड़ रगड़ कर करता है पुच्चू – भले ही ब्रश या पोछा बहुत जल्दी तारतार हो जाये।  

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चिड़िया का घोंसला बनाम आदमी का घर


सुबह की चाय पौने छ बजे बरामदे में रख दी गयी। एक ट्रे में चाय का थर्मस और चार कप। साथ में बिस्कुट का एक डिब्बा। यह चाय हमारा सवेरे का रुटीन होता है। बरामदे से उगता सूरज और उसके साथ प्रकृति कि गतिविधियां देखी जाती हैं।

चिड़िया घर से झांकती रॉबिन

पर उस रोज लगा कि कुछ खालीपन है। रॉबिन पक्षी के जोड़े ने हमारे लटकाये चिड़िया-घर में घोंसला बनाया था। उसमें उसके नवजात बच्चे आवाज किया करते थे। रॉबिन दम्पति घोंसले में तेजी से आते जाते थे और बच्चों के लिये खाना लाते थे। उस दिन लगा कि घोंसले में सन्नाटा है।

एक दिन पहले तक रॉबिन की आवाजाही इतनी ज्यादा थी कि उनपर बरबस ध्यान चला जाता था। चिड़िया घर में झांक कर देखने पर उसके बच्चे बड़े दिख रहे थे। पिछली साल भी ऐसा ही था; पर एक दिन बच्चे झांकते हुये नीचे फर्श पर टपक कर मर गये थे। उनके मर जाने से कई दिन हम सब का मन बड़ा उदास रहा था। ऐसा लग रहा था कि आगे शायद कोई चिड़िया इसमें घरोंदा बनायेगी ही नहीं। पर इस साल दोबारा उसके आने से हमारी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा!

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