भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
हम लोग पिताजी को लेकर पुनः अस्पताल (Surya Trauma Center and Hospital) में हैं. छ दिन हुए जब वे यहां से डिस्चार्ज हुए थे. कल उन्हें रूटीन चेक अप के लिए लाए. हालत अच्छी तो नहीं थी. लगभग सेमी – कोमा (यह शायद नॉन तकनीकी शब्द है) की दशा.
चेक अप में उन्हें पुनः संक्रमण ग्रस्त पाया गया. डाक्टर साहब ने कहा कि उम्र और संभावना के चलते दो विकल्प हैं. ओरल दवायें घर पर देते हुए चलाना या पुनः अस्पताल में रखना. दोनों दशा में मिरेकल (miracle) की अपेक्षा करना निहित है. हम ने अस्पताल की शरण बेहतर समझी.
एमरजेंसी वार्ड में दो-तीन रेजिडेंट डाक्टर हैं. पिछले बार से उनके चेहरे पहचान में हैं. उनसे बातचीत बहुत ज्यादा नहीं हुई थी. पर उनकी दक्षता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता (commitment) प्रभावित करती थी.
कल उनमें से एक, आलोक जी से मैंने यूं ही पूछ लिया – आप लोग इस जगह इतनी लंबी ड्यूटी करते हैं. तरह-तरह के मरीज और उनके तरह-तरह की व्याधियों और तकलीफ़ों से पाला पड़ता है. इस दशा में अपना सेंस ऑफ ह्यूमर कायम रख पाते हैं?
आलोक जी ने बहुत सोच कर उत्तर दिया – “लोगों की दशा असर तो करती है (कम से कम मेरी) सोच पर. कई बार लगता है कि (इतने कष्टों के साथ) जिंदगी है किस लिए? अपने को मरीजों की दशा में रख कर भी विचार आते हैं…”
फिर जो आलोक जी ने कहा, वह मोटे तौर पर जिंदगी के बड़े ध्येय, और अपनी लीगेसी (legacy, अपनी थाती) की बात लगती है. बोले – “लगता है, कुछ ऐसा करें जो लोगों की खुशी में बढ़ोतरी करे.”
वे अपने को लोगों की खुशी के लिए लगाने की बात कहते हैं. यह बड़ी नोबल और पवित्र सोच है. सामन्यतः लोग इस स्तर पर नहीं सोचते, बोलते, बतियाते.
कुछ समय बाद अपने-आप वे मेरे पास आ कर बोले -” आप शायद जानना चाहें शिव ब्रत लाल बर्मन जी (1860-1939) के बारे में. यहां से 22 किलोमीटर दूर उनका स्थान है. उन्होंने भी इसी प्रकार के विषयों पर लिखा, कहा है.”
वहीं एमरजेंसी वार्ड में खड़े खड़े मैंने शिव व्रत लाल जी को सर्च किया. पाया कि राधा स्वामी सम्प्रदाय के संत थे वे. महर्षि जी के नाम से विख्यात. उनकी अनेक पुस्तकों की लिस्ट है विकीपीडिया पर.
नेट पर उपलब्ध सामग्री के अनुसार शिव व्रत लाल वर्मन जी ने ऐसे विषयों पर लगभग 3000 किताबें/पुस्तिकायें लिखी हैं. राधा स्वामी मत के वे वेदव्यास के रूप में विख्यात हैं. इसी इलाके (भदोही) के व्यक्ति थे वे.
डा. आलोक जी से बात होने पर लगा कि जैसा श्मशान वैराग्य होता है, उसी तरह एक वैराग्य एमरजेंसी वार्ड का भी होता है. सेंसिटिव लोग (और डाक्टर भी) उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते.
अस्पताल का गहन चिकित्सा कक्ष – कभी आप वहाँ जाएं किसी मरीज की तीमारदारी में – तो कुछ समय के लिए उस वैराग्य को देखने, सूंघने और महसूस करने का प्रयास कीजिएगा. व्यक्तित्व को कुछ बेहतर ही बनाएगा वह. आलोक जी से यह छोटी सी बातचीत आश्चर्य जनक भी लगी और अच्छी भी!
डा. आलोक, इमर्जेंसी वार्ड में मेरे पिताजी को पुनः भर्ती करते समय
इस व्यक्ति को रोज लोटन गुरू के घर के सामने की गड़ही के पास फेंके पॉलीथिन की पन्नियां बीनते देखता हूं. उसके बाद हाईवे के पास मिडिल स्कूल की बगल में बैठे हुए. उनके थैलों में भरी पॉलीथिन से लगता है कि और स्थानों पर भी बीनते होंगे वे चिन्दियां.
नाम पूछने पर बताया हरिशंकर मिश्र, गांव बारी पुर. उसके बाद जोड़ा शिवधारी.
बारी पुर बगल वाला गांव है. उनके उत्तर देने पर यकीन हुआ कि वे विक्षिप्त नहीं, समान्य हैं.
उम्र बताई बहत्तर साल. मैंने कहा – देखने में उतने लगते नहीं! हरिशंकर बोले – आपकी समझ का फ़ेर होगा. है बहत्तर ही.
पोलीथीन जो थैलों में है, उसका क्या करेंगे? यह पूछने पर विषय से इतर उत्तर देते हैं हरिशंकर. “दुल्ही पुर में खेत हैं.” शायद यह चाहते हैं कि मैं उनकी माली हालत खराब न समझूँ.
और पूछने पर बताया कि यहां से दुल्ही पुर जाएंगे, अपने खेत पर.
मैं आधा घण्टा बाद वापस लौटता हूँ तो उन्हें फिर कूड़े के ढेर से चिन्दियां बीनते पाता हूँ.
घर लौट कर अपने वाहन चालक अशोक से उन सज्जन के बारे में पूछने पर अशोक ने बताया कि ये बारी पुर के हैं. बैंक से लोन लिया था. उसको न चुकाने के लिए पगलई की नौटंकी करते हैं. घर से परिवार ने अर्ध परित्यक्त कर दिया है. “अस पगलई करिहीं त अउर का होये?”
पता नहीं सच क्या है. पर उनकी उम्र, वेश और उनके व्यक्तित्व (जो नजर आता है) के अनुसार उन्हें पोलीथीन बीनने वाला तो नहीं होना चाहिये. घर परिवार और समाज को बहत्तर साल के आदमी की कुछ तो देख भाल करनी चाहिए.
भारत में – जहां कुटुम्ब व्यवस्था जिंदा है, हरिशंकर जैसा उदाहरण असहज करता है. लगता है कि वह व्यवस्था चरमरा रही है. और उसके विकल्प में कुछ भी खड़ा नहीं हो रहा. आदमी अपने अकेले के वृद्धावस्था काटने की प्लानिंग तो करता ही नहीं.
थॉमस स्टेनली और विलियम देन्को की पुस्तक है – द मिलियनेयर नेक्स्ट डोर (The Millionaire Next Door). अमेरिका के करोड़पति लोगों के बारे में पुस्तक. अमेरिका सबसे ज्यादा मिलियनेयर बनाने वाला देश है. वहां ज्यादातर लोग चांदी के चम्मच के साथ पैदा होने की बदौलत नहीं, अपनी कर्मठता के बूते मिलियनेयर बनते हैं.
यह पढ़ने योग्य पुस्तक है. यद्यपि 1996 में लिखी/छपी है पर धनी लोगों का समाज-विज्ञान के दृष्टिकोण से अध्ययन करने के लिए आज भी प्रासंगिक है.
Blinkist में The Millionaire Next Door के पुस्तक संक्षेप का पहला पेज
भारत में ऐसे सेल्फ मेड “धनी” लोगों की संख्या कम है. बहुत कम. और जैसा सुनने में आता है, लोग मेहनत की बजाय तिकड़म पर ज्यादा यकीन करते हैं. नेतागिरी – नौकरशाही – अपराध के दांवपेंच (नेक्सस) से पैसा कमाने वाले लोग और उनकी धन-पशुता के किस्से बहुत हैं. पर वे उत्कृष्टता की चाह रखने वाले लोगों के लिए रोल मॉडल तो हो नहीं सकते.
अतः ऐसा अध्ययन – विशेष रूप से ग्रामीण या कस्बाई वातावरण से उठे और नैतिक आधार पर सफल हुए लोगों के बारे में अध्ययन; भारत में तो नहीं हुआ दिखता.
मेरे पास नैतिक मूल्यों पर खरे, एक “भारतीय मल्टी मिलियनेयर नेक्स्ट डोर” से मिलने का अवसर था. सूर्या ट्रॉमा सेंटर में मेरे पिताजी भर्ती थे और वहां से दो किलोमीटर दूर उगापुर नामक गांव में रहते हैं श्री सूर्यमणि तिवारी. वहीं उनका गलीचा उद्योग का कारखाना है. सवेरे नौ बजे तिवारी जी से मिलना तय हुआ. मेरी पत्नीजी और मैं वहां गए. प्रशांत, जिन्हें सूर्य मणि जी विश्वस्त और पुत्रवत मानते हैं, हमें अस्पताल से ले उनके पास पंहुचे.
मोटे तौर पर समझ आई हमें कालीन बनाने की प्रक्रिया, पर गहराई से सभी गतिविधियां जानने के लिए तो कई बार देखना समझना पड़ेगा. वेब सर्च में मुझे बहुत बढ़िया जानकारी नहीं मिली. इसलिए समझने के लिए उगापुर या उसी प्रकार के अन्य उपक्रमों के चक्कर लगाने होंगे. शायद कुछ पुस्तकें भी खंगालनी पडें.
शिव जी के मंदिर में यह बड़ा रोचक यंत्र था. एक DC मोटर से चलता घंटी और नगाड़े का युग्म. पंडित जी शिव स्तोत्र गा रहे थे और स्विच से चालू किए इस यंत्र से घंटी नगाड़ा बजने लगे!
पहले प्रशांत जी ने सूर्या उपक्रम के कारखाना परिसर में हनुमान जी और शिव जी के मंदिर के दर्शन कराए. पुजारी जी ने मेरे मस्तक पर तिलक त्रिपुण्ड लगाया. उसके बाद हमने कारखाने की विविध गतिविधियों का अवलोकन किया. प्रशांत जी ने हम; कार्पेट बनाने की प्रॉसेस से पर्याप्त अनभिज्ञ; दोनों को बड़े धैर्य से सब समझाया.
ऊन से कार्पेट बुनने का धागा बनाने का संयंत्र. तकनीकी नाम मैंने नोट नहीं किया. 🙁
पूरे भ्रमण में जो हिस्सा मुझे ज्यादा रुचा वह था सूर्या कार्पेट्स का कॉफी टेबल बुक साईज के लगभग 1000 पेज का आकर्षक डिजाइन केटलॉग. इस फर्म (Surya Inc.) द्वारा बनाए और बेचे जाने वाले विविध होम और ऑफिस डेकोर के आइटम इसमें वर्णित हैं. प्रशांत जी ने बताया कि हर छ महीने पर इस केटलॉग का नया संस्करण आ जाता है. डिजाइन की एक भारतीय और एक अमेरिकी टीमें परस्पर तालमेल से काम करती हैं. यहाँ वह टीम ऊपर की मंजिल पर स्थित थी. उनके पास मैं अपने घुटने के दर्द के कारण सीढ़ी चढ़ कर नहीं जा सका. पर निकट भविष्य में उनसे मिलने जानने का विचार अवश्य है.
डिजाइन केटलॉग की पुस्तकें
अब, जब अधिकांश भदोही के कार्पेट व्यवसायी या तो असफलताओं से थक चुके हैं या “विगत” हो चुके हैं और सूर्या कार्पेट्स जीवंत और प्रगति कर रहा है; तो सशक्त डिजाइन टीम उसके पीछे जरूर होगी. आज के और आने वाले समय में वही बचेगा और प्रगति करेगा, जिसके पास नया सोचने और प्रस्तुत करने की ऊर्जा और माद्दा होगा!
मुझे यू ट्यूब पर सूर्या कार्पेट्स के डिजाइन केटलॉग का यह वीडियो मिला. आप देखने का कष्ट करें.
कारखाना देखने के बाद हम सूर्य मणि जी से मिले. उन्होंने अपने दफ्तर के बाहर हमारा स्वागत किया. उनके दफ्तर में कुछ समय हल्की-फुल्की बातचीत हुई. फिर तिवारी जी ने सवेरे के नाश्ते का आमंत्रण दिया. पराठा सब्जी और मीठा मट्ठा. वैसा जैसा एक मध्य वित्त परिवार पौष्टिक नाश्ता होता है. मुझे ऊपर उधृत पुस्तक की पंक्तियाँ याद हो आईं. मिलियनेयर व्यक्ति नाश्ता सामान्य ही करते हैं – रोज शैम्पेन (अमरीकी रहन सहन मुताबिक) नहीं पीते. 😀
नाश्ता तिवारी जी के दफ्तर के पीछे के एक कमरे में था. तिवारी जी की इस कमरे में ही रिहाइश है. एक औसत आकर का कमरा जिसमें एक बिस्तर, सेंटर टेबल और एक सोफा के अलावा ज्यादा जगह नहीं बचती. कमरे में कोई कीमती डेकोरेशन नहीं है. कुछ पुस्तकें, एक टेलीविजन, च्यवन प्राश जैसी कुछ बोतलें और देवताओं के कुछ चित्र भर हैं. हमारे आपके कमरे और तिवारी जी के कमरे में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं होगा.
श्री सूर्य मणि तिवारी जी
उनका दफ्तर भी बहुत बड़ा नहीं. भारत सरकार के जूनियर प्रशानिक ग्रेड के अफसर उससे कहीं बड़े और चमक दमक वाले चेंबर में काम करते हैं. दफ्तर में एक लैंड लाइन (या इंटर कॉम) फोन, दो मोबाइल (शायद एप्पल, एंड्रॉयड नहीं) और लैपटॉप के स्थान पर एक टैब – यही यंत्र थे. यानि, धन और दफ्तर का चमकदार होना समानुपातिक नहीं हैं.
नाश्ते के बाद मैंने तिवारी जी का कुछ समय अपने काम की बातों को पूछने में लिया. उन्होंने बड़े स्पष्ट उत्तर दिये.
पहला पूछने का मुद्दा कार्पेट व्यवसाय की वर्तमान दशा और इस व्यवसाय में सफलता/असफलता को लेकर था.
सूर्य मणि जी ने बताया कि आवश्यकताओं के अनुसार knotted, tufted और kelim प्रकार के गलीचे और दरी बनाए गलीचा उद्योग ने. पर अधिकांश व्यवसायी उन्नत होती तकनीक के साथ तालमेल नहीं बना पाए. इलाके में तकनीशियनों की कमी एक बड़ा मुद्दा रही.
सूर्या ने अमेरिकन दफ्तर खोल कर अपने को निर्यातकों की कतार से अलग कर आयातक बनाया. इसका फायदा मिला. अन्य निर्यातक अपनी पूंजी के प्रबंधन को भी कुशलता से नहीं कर पाए. कुछ ने तो अपनी पूंजी अपने व्यसनों में गंवाई. व्यवसाय में चरित्र पर लगाम महत्वपूर्ण होता है…
प्रशांत तिवारी. वे हमें सूर्य मणि जी से मिलवाने ले कर गए थे और उन्होंने परिसर अच्छे से घुमा कर दिखाया.
पर अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं. अब तक जितनी तेजी से बदली उससे कहीं ज्यादा तेजी से. ई-कॉमर्स से तालमेल बिठाना और उससे प्रतिस्पर्धा करना सरल नहीं है. वालमार्ट जैसे उपक्रमों की आर्थिक क्षमता का मुकाबला करना है. यह चिंता का कारक है. इसके अलावा अपने प्रॉडक्ट्स का सतत इनोवेशन करते रहना बड़ा चैलेंज है.
इकहत्तर साल से अधिक उम्र के व्यवसायी, तथाकथित वानप्रस्थ की उम्र में, जिस प्रकार स्टेट ऑफ टेक्नॉलजी और मार्केट पर अपने विचार रख रहे थे, वह सुन कर अपने रिटायरमेन्ट पर मुझे संकोच होने लगा. सूर्यमणि जी की मानसिक ऊर्जा से इर्ष्या होने लगी.
मैंने विषय बदला.
उनके जीवन विवरण से लोग क्या सीख समझ सकते हैं?
तिवारी जी की बेझिझक सोच थी कि अगर वे अपने अतीत को व्यक्त करेंगे तो उसका ध्येय यही होगा – एक गरीब नौजवान यह समझे कि बढ़ोतरी के लिए सिल्वर स्पून की नहीं, कड़ी मेहनत की जरूरत है. कड़ी मेहनत, नम्र व्यवहार, ईमानदारी और ईश्वर कृपा से सफलता साधी जा सकती है. उसके लिए पूंजी का होना अनिवार्य शर्त नहीं है.
अगर वे अपने जीवन और पुरानी यादों को लोगों के सामने रखेंगे तो उसका ध्येय नौजवान पीढ़ी को यही प्रेरणा देना होगा. निश्चय ही वह कथन/लेखन नौजवान पीढ़ी को केंद्र में रख कर होगा.
समाज बदला है. आगे और तेजी से बदलेगा. पर जीवन के नैतिक मूल्य वही रहेंगे. शाश्वत. उस बदलाव को दर्ज करते हुए तिवारी जी अपने अतीत की बात करना चाहते हैं. शाश्वत मूल्यों की भी बात कहना चाहते हैं. पर यह अभिव्यक्त करने में उन्हें हड़बड़ी नहीं है. वे अभी भी कर्म क्षेत्र में हैं और समय की लगाम अपने हाथ में दृढ़ता से थामे हैं.
हमें विदा करते समय वे गेट तक आए और बोले – इस मुलाकात के बाद अब वे नित्य की कुकुर छिनौती में लग जाएंगे!
दिन भर की सघन कार्य की व्यस्तता का वे मजाकिया नाम देते हैं – कुकुर छिनौती. 😀
बड़ा रोचक और प्रेरणास्पद रहा सवेरे के समय सूर्य मणि जी से मिलना. आजकल बहुधा उनका फोन सवेरे साढ़े पांच बजे आता है. वे लोगों को पहचानने और जोड़ने में पारंगत हैं. यह सवेरे का फोन शायद उसी का हिस्सा है.
लगता है हम दो बेमेल लोगों – कर्मक्षेत्र की लगाम कस कर थामे 71+ वर्षीय वे और अपनी रिटायर्ड जिन्दगी की विरक्त आसक्ति (?!) में डूबा मैं – का संपर्क आगे बना रहेगा.