धोख


मैं उसे बिजूका (scarecrow) के नाम से जानता था, यहां उसे गांव में धोख कहते हैं। शायद धोखा से बना है यह। खेत में किसान की फसल को नुक्सान पंहुचाने वाले हैं जंगली जानवर (नीलगाय या घणरोज़) और अनेक प्रकार की चिड़ियां। उनको बरगलाने या डराने के लिये है यह धोख।

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खेत के दूसरे किनारे के निकट था धोख। मैने अपनी साइकिल सडक के किनारे खड़ी की। जोन्हरी (ज्वार) का खेत था। बालें फूट गयी थीं। दो सप्ताह में फसल तैयार हो जायेगी। दिवाली तक कट जायेगी। खेत में और मेड़ पर नमी थी। पानी भी था कहीं कहीं। चलना कठिन काम था। एक बार तो सोचा कि धोख जी से मिले बगैर लौट लिया जाये। पर अन्तत: उन तक पंहुच ही गया।

धोख जी अटेंशन अपनी एक टांग पर खड़े थे। किसी सजग प्रहरी की तरह। उनकी एक टांग तो बांस था जिसपर उन्हे बनाया गया था। पजामे की दूसरी टांग यूं ही फहरा रही थी। मानो किसी दुर्घटना में एक पैर कट गया हो। एक कुरता पहना हुआ था धोख जी ने। ठीक ठाक और साफ़ था। हांथ पीटी करते व्यक्ति की मुद्रा में साइड में फैले थे। सिर किसी घरिया पर काला कपड़ा लपेट कर बनाया गया था। बहुत कलात्मक तो नहीं थे धोख जी, पर जीवन्त थे। उन्हे देख कर आभास होता था कि कोई व्यक्ति खड़ा है।

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कौव्वे, मुनियां, गौरय्या, मैना आदि जोन्हरी खाने आती हैं। जोन्हरी और बाजरे का तना मोटा होता है, इसलिये कौव्वे और तोते जैसे कुछ बड़े पक्षी भी दाना चुग लेते हैं।

चिड़ियां आपस में कहती होंगी – “अरे राम, कौनो मनई खड़ बा। हम न जाब (हे भगवान, कोई आदमी खड़ा है, मैं नहीं जाऊंगी)।”

DSC_1293जो जानकार होती होगी वह साहस बंधाती होती – मत डेराऊ गोंईयां, ई त मनई नाहीं, धोख हौ ( डरो मत सखी, यह आदमी नहीं धोख है)।

इसी तरह मादा नीलगाय भी ठिठकती होगी खेत के आसपास। कतरा कर निकलता चाहती होगी। पर अगर उसका झुण्ड का सरदार अनुभवी और लम्बी दाढी वाला कद्दावर घणरोज हुआ तो वह कहता होगा – “अरे डियर, फिकर नॉट। देखती नहीं हो, यह बिजूका है। धोख। इससे अगर हमारा झुण्ड डरता रहा तो भूखे मर जायेगा। चलो, घुसो और चर डालो खेत। बच्चे भी निष्कण्टक खेत में चलें।”

चित्र लेते समय मैं सोच रहा था – अगर मैं लिक्खाड़ लेखक होता तो “एक धोख की आत्मकथा” जैसा कुछ लिखता।

घर लौटने को देर हो गयी थी। सेण्डल खेत में पानी और कीचड़ से सन गयी थी। धोख का चित्र लेने का मिशन पूरा कर मैं सडक पर लौटा और साइकिल उठा, घर की ओर चला।


विजय बहादुर बिन्द और दिघवट का टीला


विजय बहादुर बिन्द की झोंपड़ी है दिघवट के टीले पर। वह टीला, जिसको सरसरी निगाह से देखने पर भी 2500 साल पहले की सभ्यता के दर्शन हो जाते हैं – पुरानी बिखरी ईटों और मृद्भाण्ड के टुकड़ों के माध्यम से। वह झोंपड़ी तो टीले की ग्राम सभा की जमीन पर है। झोंपड़ी तो यूं ही बना ली है। पास में उनकी चार बिस्से जमीन पर सब्जियां उगाई गयी हैं। उसके आगे करीब डेढ़ बीघा जमीन है – जिसमें दो फसलें लेते हैं विजय बहादुर। जमीन निचली है। फिर भी दो फसलें ले पाते हैं वे।

बकौल मेरे पुरातत्वविद मित्र रविशंकर जी के, वहां  हजारों साल पहले बहुत बड़ी झील हुआ करती थी जब गंगा का विस्तार ज्यादा हुआ करता था और उनके किनारे बहुत सा पानी झीलों के रूप में रुका करता था। यह झील नाले के माध्यम से गंगा नदी से जुड़ी थी। टीले पर रहने वाले पूर्वज झील पर निर्भर थे और नाव के माध्यम से गंगा नदी से जुड़े थे।

विजय बहादुर टीले की प्राचीनता से परिचित हैं पर वे भी (अन्य भदोहियों की तरह) प्राचीनता को भरों से जोड़ते हैं। भर एक जनजातीय समूह था जो इस इलाके में प्रभुत्व रखता था। विकीपेडिया में यह अंश देखें –

४०० साल पूर्व भदोही परगना में भरों का राज्य था, जिसके ड़ीह, कोट, खंडहर आज भी मौजूद हैं। भदोही नगर के अहमदगंज, कजियाता, पचभैया, जमुन्द मुहल्लों के मध्यम में स्थित बाड़ा, कोट मोहल्ले में ही भरों की राजधानी थी। भर जाति का राज्य इस क्षेत्र सहित आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, इलाहाबाद एवं जौनपुर आदि में भी था। गंगा तट पर बसे भदोही राज्य क्षेत्र में सबसे बड़ा राज्य क्षेत्र था। सुरियांवां, गोपीगंज, जंगीगंज, खमरिया, औराई, महाराजगंज, कपसेठी, चौरी, जंघई, बरौट आदि क्षेत्र भदोही राज्य में था। गंगा तट का यह भाग जंगलों की तरह था।

विकीपेडिया भरों को 400 साल पहले से जोड़ रहा है। यह पन्ना तथ्यात्मक रूप से सम्पादन मांगता है। सम्भवत: भर थोड़े समय के लिये इस इलाके पर कब्जा जमाये थे – सम्भवत: हजार साल पहले। पर वे प्राचीनता का प्रतीक तो नहीं ही हैं। हर एक भदोहिया एक गलत जानकारी रखता है अपने इतिहास के बारे में।

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विजय बहादुर नें बताया कि कोट (टीले) पर बहुत सम्पदा है। पर वह किसी को नहीं मिलेगी।

मैने पूछा – क्यों?

“वह (प्रेतात्मा) जो मांगती है, वह आदमी के बस में नहीं है दे पाना।”

राजन भाई ने एक्स्प्लीसिट प्रश्न किया – क्या मांगती है? बलि?”

“साधारण बलि नहीं, बहुत अलग तरह की जो आदमी दे नहीं सकता।”

जैसे?

“जैसे तीन टांग की गाय, एक टांग का मुरगा और अपना जेठ लड़का”

विजय बहादुर की यह (बलि और खजाने की) बात मुझे बहुत दकियानूसी लगी। पर यही सब प्रचलित होगा गांव देहात में। इन ग्रामीणों को न तो सही इतिहास की जानकारी है, न ही वे (21वीं सदी में भी) तन्त्र,मन्त्र, बलि आदि की अवधारणाओं से ऊपर उठ पाये हैं। मैं यही आशा करूंगा कि विजय बहादुर या उन जैसे लोग कभी दिग्भ्रमित हो, खजाने की खोज में न लग जायें टीले पर।

मैने बात पलट दी। पूछा टीले पर घणरोज (नीलगाय) हैं?

“कम आते हैं आजकल। पर आने पर फसल बरबाद जरूर करते हैं। उनसे बचाने के लिये ही मड़ई बना कर रहना पड़ता है। उनके अलावा मोर थे, पर अब यहां से चले गये हैं। सांप बहुत हैं। शायद मोर न रहने से बड़ गये हैं।”

चलते समय राजन भाई को कुछ करेले दिये विजय बहादुर ने। मैने चलते चलते कहा – मिलते आता रहूंगा आपसे।


गांव में अजिज्ञासु (?) प्रवृत्ति


गांव में बहुत से लोग बहुत प्रकार की नेम ड्रॉपिंग करते हैं। अमूमन सुनने में आता है – “तीन देई तेरह गोहरावई, तब कलजुग में लेखा पावई” (तीन का तेरह न बताये तो कलयुग में उस व्यक्ति की अहमियत ही नहीं)। हांकने की आदत बहुत दिखी। लोगों की आर्थिक दशा का सही अनुमान ही नहीं लगता था। यही हाल उनकी बौद्धिक दशा का भी था। हर दूसरा आदमी यहां फर्स्ट क्लास फर्स्ट था, पर दस मिनट भी नहीं लगते थे यह जानने में कि वह कितना उथला है। बहुत से लोगों को अपने परिवेश के बारे में न सही जानकारी थी, न जिज्ञासा। कई नहीं जानते थे कि फलानी चिड़िया या फलाना पेड़ क्या है? और वे अधेड़ हो चले थे।

पर निन्दा मनोविलास का प्रमुख तरीका दिखा। लोगों के पास समय बहुत था। और चूंकि उसका उपयोग अध्ययन या स्वाध्याय में करने की परम्परा कई पीढ़ियों से उत्तरोत्तर क्षीण होती गयी थी, लोगों के पास सार्थक चर्चा के न तो विषय थे, न स्तर।

मैने देखा कि बहुत गरीब के साथ बातचीत में स्तर बेहतर था। वे अपनी गरीबी के बारे में दार्शनिक थे। उनमें हांकने की प्रवृत्ति नहीं थी। अगर वे बूढ़े थे, तो वे जवानों की बजाय ज्यादा सजग थे अपने परिवेश के बारे में। उम्र ज्यादा होने के कारण वे ज्यादातर अतीत की बात करते थे और अतीत पर उनके विचारों में दम हुआ करता था। कई बार मुझे अपनी नोटबुक निकालनी पडती थी उनका कहा नोट करने के लिये।

ज्यादातर 25-50 की उम्र की पीढी मुझे बेकार होती दिखी। वे ज्यादा असंतुष्ट, ज्यादा अज्ञानी और ज्यादा लापरवाह नजर आये। बूढे कहीं बेहतर थे। यद्यपि इस सामान्य अनुभव के अपवाद भी दिखे, पर मोटे तौर पर यह सही पाया मैने।

मैं यह इस लिये नहीं कह रहा कि मेरी खुद की उम्र 60 से अधिक है। मैने बच्चे से लेकर बहुत वृद्ध तक – सभी से बिना पूर्वाग्रहों के सम्प्रेषण करने का किया है और जहां (भाषा की दुरुहता के कारण) सम्प्रेषण सहज नहीं हुआ, वहां ध्यान से निरीक्षण करने का प्रयास किया है। सम्प्रेषण और निरीक्षण में मेरी अपनी क्षमता की कमियां हो सकती हैं; नीयत की नहीं।

मेरे बारे में गांव के लोगों में जिज्ञासा यह जानने में अधिक थी कि सरकारी नौकरी में कितनी ऊपरी कमाई होती थी। मुझे नौकरी कितनी घूस दे कर मिली। मैं किसी को नौकरी दिलवा सकता हूं कि नहीं। रेलवे की भर्ती के लिये फ़ार्म भरा है, कैसे कुछ ले दे कर काम हो सकता है। किसी में यह जिज्ञासा नहीं थी कि एक सरकारी अफसर (मेरे अफ़सरी के बारे में वे जानते थे, इस क्षेत्र में कई बार रेलवे के सैलून में यात्रा की थी मैने, उसका ऑरा उन्होने देखा है) गांव में रह कर साइकिल से भ्रमण करने और छोटी छोटी चीजें देखने समझने की कोशिश क्यों कर रहा है? अगर वह “ऊपरी कमाई” से संतृप्त होता या उसकी प्रवृत्ति धन के विषय में उस प्रकार की होती तो क्या वह यहां आता और रहता?

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उनकी जो अजिज्ञासा (या क्या शब्द होगा इसके समकक्ष – इनडिफ़रेंस – का तर्जुमा) उनकी अपनी दशा, अपने परिवेश के बारे में थी, वही मेरे बारे में भी दिखी। मूलत: ये लोग पर्यवेक्षण और मनन की वह परम्परा कुन्द कर जुके हैं, जिसके बारे में प्राचीन भारत जाना जाता था और जिसकी अपेक्षा मैं कर यहां आया था।

उनका दूसरे के बारे में जानना या सम्बन्ध परनिन्दा की वृत्ति से ज्यादा उत्प्रेरित था। वे शायद बहुत अर्से से घटिया नेता, नौकरशाह, लेखक, शिक्षक आदि ही देखते आये हैं।

जब मैने श्रीलाल शुक्ल की रागदरबारी पढ़ी थी (और बार बार पढ़ी थी) तो यही समझा था कि यह मात्र सटायर है, जीवन का मात्र एक पक्ष या एक कोण है। पर (दुखद रहा यह जानना) कि गांव समाज “रागदरबारी” मय ही है – नब्बे प्रतिशत। गांव को किसी और तरीके से समझना, लोगों को बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट देकर क्लीन स्लेट से समझना – यह तकनीक भी बहुत दूर तक नहीं ले गयी मुझे।…

अगर गांव-देहात की कोई आत्मा होती है, तो वह मुझे अभी तक देखने में नहीं मिली। पर अभी मात्र तीन साल ही हुये हैं यहां। फिर से कोशिश, स्लेट पुन: साफ़ कर (बिना पूर्वाग्रहों के) की जा सकती है। मैं वह करूंगा भी। उसके सिवाय चारा नहीं है। अगर वह नहीं करूंगा तो मेरे अन्दर यहां आकर रहने की निरर्थकता उत्तरोत्तर और गहरायेगी।


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