लालती और पिताजी


पिताजी को तेइस दिन हो गए अस्पताल में. संक्रमण और वृद्धावस्था में डिमेंशिया के कारण अशक्तता उन्हें भ्रमित और लगभग कोमा जैसी दशा में होने को बाध्य करती है. कभी कभी वे “होश” में आते हैं. अन्यथा, बकौल डाक्टर साहब, उनका Glasgow Coma Score 9 के आसपास है. सामन्य व्यक्ति का 15 होता है.

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कन्दमूल फल, चिलम और गांजा – 2012 की पोस्ट पर री विजिट



सत्ताइस जनवरी 2012 को प्रकाशित की थी कन्द मूल बेचने वाले पर पोस्ट. उस पोस्ट पर एक टिप्पणी है – “राजा पिएं गांजा, बीड़ी पिएं चोर. चू** खाएं तंबाखू, थूंके चहूं ओर.” उससे लगता है कि (कम से कम ग्रामीण समाज में) गांजा को एक सीमा तक रिस्पेक्ट प्राप्त है, जो बीड़ी, खैनी या तंबाखू को नहीं मिलती.

गांजा अवैध है पर गंजेड़ी व्यापक हैं. निश्चय ही उन्हें गांजा नित्य प्रति मिलता ही है. और मिलने का माध्यम इतना कठिन नहीं होता होगा, जितना हमें लगता है.

प्रयाग में तो मैंने गंजेड़ी देखे नहीं थे. यह जरूर सुना था कि शिव कुटी के पास गंगा किनारे सुन्दर बगिया में उनका अड्डा जमता है…. पर गांव में आने के बाद चिलम भी देखी और गांजे की पुड़िया भी.

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मोकालू गुरू का चपन्त चलऊआ- पोस्ट पर री विजिट



यह मेरी ब्लॉगिंग के सबसे पुराने समय की पोस्ट है. सन 2007 में लिखी. उस समय भरत लाल मेरा बंगलों पियुन था. अपने गांव के किस्से मुझे सुनाया करता था. उसके किस्सों का भी प्रभाव था कि अंततः रिटायरमेंट के बाद उसी गांव – विक्रमपुर – में मैंने बसने का निर्णय लिया.

नेशनल हाइवे 19 (GT Road) के किनारे है गांव विक्रमपुर

भूत प्रेत, चुड़ैल, ओझा, सोखा का स्पेस गांव के जीवन में, मोबाइल और स्मार्ट फोन के युग में अभी भी है और उनका महत्व कम नहीं हुआ है. शिक्षा, मेडिकल सेवायें और औद्योगिक विकास अभी भी लचर हैं. जब तक वे ऐसे रहेंगे, ऑकल्ट का दबदबा बना रहेगा.

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