भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
आज सवेरे अचानक मेरे तीन भाई (मेरी पत्नी जी के भाई) घर पर आये। वे लोग भदोही से लखनऊ जा रहे थे। रास्ते में यहां पड़ाव पर एक घण्टा रुक गये।
इनमें से सबसे बड़े धीरेन्द्र कुमार दुबे बेंगळूरु में प्रबन्धन की एक संस्था से जुड़े हैं। उनसे छोटे शैलेन्द्र दुबे प्रधान हैं। पिछला विधानसभा चुनाव लड़े थे भाजपा की ओर से। तीसरे, भूपेन्द्र कुमार दुबे अपनी डाटा प्रॉसेसिंग की संस्था चलाते हैं – भदोही-वारणसी में। चौथे, जो दिल्ली में होने के कारण नहीं आये थे, विकास दुबे हैं जो बस ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय में हैं। ये सभी अपने उद्यम के नियंता हैं। केवल मैं हूं, जो नौकर हूं – सरकारी नौकर।
जाते समय एक ग्रुप फोटो लिया गया घर के लॉन में।
पीछे की पंक्ति में बायें से – शैलेन्द्र, भूपेन्द्र, धीरेन्द्र और (मेरा लड़का) ज्ञानेन्द्र। आगे – रीता व मैं, मेरे पिताजी। मेरी अम्माजी अस्पताल में होने के कारण चित्र में नहीं हैं।
यह चित्र धीरेन्द्र के साले श्री रंजन उपाध्याय ने लिया था। अगले चित्र को मैने लिया है जिसमें मेरे अलावा शेष ऊपर के सभी हैं और रंजन उपाधाय हैं पीछे की पंक्ति में।
पीछे की पंक्ति में बायें से – शैलेन्द्र, भूपेन्द्र, धीरेन्द्र, रंजन और (मेरा लड़का) ज्ञानेन्द्र। आगे – रीता एवम् मेरे पिताजी।
अपनी मां के कूल्हे की हड्डी के टूटने के बाद के उपचार के सम्बन्ध में नित्य फाफामऊ आना-जाना हो रहा है। अठ्ठारह नवम्बर को दोपहर उनका ऑपरेशन हुआ। सफ़ल रहा, बकौल डाक्टर। [1] उन्नीस नवम्बर को सवेरे उनके पास जाने के लिये मैने नये पुल पर वाहन से जाने की बजाय ऐतिहासिक कर्जन ब्रिज से जाने का विकल्प चुना।
कर्जन ब्रिज वाहनों के लिये बन्द है। उसपर केवल साइड से दोपहिया वाहन आ-जा सकते हैं। मुख्य मार्ग पर ब्रिज के दोनो ओर बन्द गेट है और ताला लगा है। लोग उसपर सवेरे सैर के लिये आते जाते हैं।
सवेरे वहां पंहुचने का नियत समय मैने साढ़े छ रखा था, पर लगभग आधा घण्टा देर से पंहुचा। मेरे वाहन चालक मोहन ने मुझे तेलियरगंज की तरफ पुल के मुहाने पर छोड़ दिया और खुद दूसरी ओर मेरी पत्नीजी के साथ मेरी माता जी के पास चला गया अस्पताल। कर्जन ब्रिज के बन्द गेट के पास राजा भैया का एक बड़ा सा पोस्टर स्वागत कर रहा था। पूर्व में महाबीरपुरी की ओर रेलवे लाइन पार एक मन्दिर के पीछे सूर्य चमक रहे थे (यद्यपि मेरे स्मार्टफोन में मौसम कोहरे की घोषणा कर रहा था)। समय था – 7:02 बजे।
पुल पर घूमने वालों की संख्या भी बहुत नहीं थी। आस-पास के लोगों में सवेरे की सैर का बहुत चलन नहीं लगता। ब्रिज के दोनो ओर जिगजैग तरीके से चलते हुये दोनो ओर के चित्र लेने में मुझे असुविधा नहीं थी।
कर्जन ब्रिज का गूगल मैप। नया रोड ब्रिज चन्द्रशेखर आजाद सेतु के नाम से जाना जाता है।
सम्भवत: नया सड़क पुल (चन्द्रशेखर आजाद सेतु) बनने के बाद कर्जन ब्रिज पर सड़क यातायात 1990 के आस पास बन्द हुआ था। उसके बाद रेल का नया पुल बना और रेल यातायात उसपर 26 अक्तूबर 1996 को शिफ्ट किया गया। सन् 1990 से 2006 तक यह पुल सड़क यातायात के लिये बन्द रहा। हिन्दुस्तान टाइम्स का नेट पर उपलब्ध एक पन्नाबताता है कि जून 2006 में एक समारोह में उत्तरप्रदेश के मन्त्री उज्ज्वलरमण सिंह जी ने इसके जीर्णोद्धार के बाद पुन: इसे सड़क यातायात के लिये खोला एक समारोह में। पर कुछ ही साल सड़क यातायात चला होगा इसपर। मुझे याद है कि कुछ साल पहले मेरी कार इस पुल पर से गुजरी थी। पिछले डेढ़ साल से यह पुल पुन: बन्द दशा में है।
रेल-कम-रोड ब्रिज होने और रोड इसकी दूसरी मंजिल पर होने के कारण यह काफी ऊंचा हो जाता है। इसलिये साइकल पर पैडल मारते लोग इसपर नहीं दिखते। ऊंचाई के कारण कई लोगों को इसपर चलते नीचे गंगा नदी की ओर झांकने से झांईं छूटती होगी।
झांईं, आपको मालुम है झांईं क्या होता है? नहीं मालुम तो ऊंची अट्टालिका से नीचे झांक कर देखिये।
इलाहाबाद – फैजाबाद के लगभग 156 किलोमीटर सिंगल लाइन के लिये यह कर्जन ब्रिज 1901 में स्वीकृत हुआ। छ-सात साल में बन कर तैयार हुआ। एक किलोमीटर लम्बे इस ब्रिज में कुल 2181 फ़िट के 15 स्पान हैं। इसके खम्बे कम पानी के स्तर से 100फिट नीचे तक जाते हैं। पुल नदी की आधी चौड़ाई पर है। शेष आधा रास्ता दोनो तरफ़ जमीन के भराव से बना है। इस पर लगभग 9 दशक तक रेलगाड़ी चली। जैसा कि इण्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी है; लोगों ने पी.आई.एल. लगाईं इसपर सड़क यातायात पुन चालू करने के लिये। किसी ढंग के प्रान्त का मामला होता या पर्यटन के प्रति जागरूक शहर होता तो इसकी आज जैसी उपेक्षित दशा न होती। और तो और इसपर सवेरे सैर करने वालों की अच्छी खासी भीड़ लगती। उस भीड़ पर आर्धारित कई दुकानें/कारोबार होते। पर यह जो है, सो है।
कर्जन ब्रिज की सड़क समतल और ठीक ठाक लगती है। दोनो ओर की रेलिंग मजबूत दशा में है। यद्यपि उसकी पेण्टिंग नहीं हुई है और ऐसा ही रहा तो कुछ ही सालों में जंग लगने से क्षरण बहुत हो जायेगा।
इलाहाबाद की ओर से इसपर चलने पर इसके और चन्द्रशेखर आजाद सेतु के बीच मुझे मन्दिर, घाट, घाट पर पड़ी ढेर सारी चौकियां और नदी के किनारे किनारे चलती पगडण्डियां दिखी। ऊपर से देखने पर दृष्य मनमोहक लगता है। दाईं ओर रेल लाइन है। रेल पुल और इस ब्रिज के बीच झाड़ियां हैं। रेल ब्रिज शुरू होने पर सिगनल नजर आता है। उसके परे महाबीर पुरी की बस्ती है; जिसके बारे में मुझे बताया गया कि वह आधी तो रेलवे की जमीन दाब कर अवैध बसी है। टिपिकल यूपोरियन सिण्ड्रॉम!
रेल ब्रिज की तरफ़ मुझे गंगाजी के उथले पानी में मछली पकड़ने के लिये बड़े बड़े पाल डाले दिखे। इससे बहुत कम मेहनत में पकड़ी जाती है मछली। मल्लाहों की इक्का-दुक्का नावे ं भी इधर उधर हलचल कर रही थीं। मल्लाहों की दैनिक गतिविधि में बहुत विविधता है। अनेक प्रकार से वे मछली पकड़ते हैं। नदी के आर पार और धारा के अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकार का परिवहन करते हैं। उनके कार्य का प्रकार भी सीजन के अनुसार बदलता रहता है। इन्ही मल्लाहों की साल भर की गतिविधि पर बहुत रोचक दस्तावेज लिखा जा सकता है। उस देखने-लिखने के काम को भी अपनी विश लिस्ट में जोड़ लिया जाये। :-)
अगहन का महीना है। इस समय नदी में पानी अधिक नहीं है। दिनों दिन कम भी हो रहा है। पुल के दोनो ओर मुझे ऐसा ही दिखा। बीच में उभरे द्वीप भी नजर आये। फाफामऊ की ओर दायीं ओर अधिक नावें, अधिक घाट, अधिक चौकियां दिखीं। फाफामऊ की ओर कछारी सब्जी की खेती भी दिखी। उनकी रखवाली को मड़ईयां भी थीं। कछारी खेतों में कई जगहों पर गोबर की खाद के ढेर थे बिखेरे हुए। सवेरे तो नहीं देखा, पर दिन में आते जाते दिखा कि फाफामऊ की ओर, महाबीर पुरी के सामने गंगापार लोग ट्रेक्टर से या पैदल भी अर्थियां भी ले जा कर गंगा किनारे दाह संस्कार कर रहे थे। अर्थात इलाहाबाद की ओर रसूलाबाद का श्मशान घाट है और दूसरी ओर यह महाबीर पुरी के अपोजिट वाला दाह स्थल। उसका नाम भी पता करना शेष है।
आधे रास्ते पुल पर चला था कि फाफामऊ की ओर से एक ट्रेन आती हुयी दिखी। दस डिब्बे की पैसेंजर ट्रेन। इस मार्ग पर मुख्य यातायात सवारी गाड़ियों का ही है। महीने में पच्चीस-तीस माल गाड़ियां – औसत एक मालगाड़ी प्रतिदिन गुजरती है इस मार्ग पर।
दो सज्जन फाफामऊ के छोर पर पुल पर दिखे| सिंथेटिक चटाई बिछाकर सूर्योदय निहारते ध्यान लगाने का अभ्यास करते। वे वास्तविक साधक कम विज्ञापनी छटा अधिक दे रहे थे। उनके नाइक-एडीडास छाप जूते किनारे पर थे। एक सज्जन अधिक चकर पकर ताक रहे थे। बीच में उन्होने अपने बालों पर कंघी भी फेरी। ध्यान लगाते हुये भी आने जाने वालों को दिखने वाले अपनी छवि के बारे में जागरूक थे वे।
फाफामऊ छोर पर पुल के शुरू में एक छोटा बन्दर किसी की बिखेरी लाई खाने में व्यस्त था। मेरे फोटो लेने से कुछ सशंकित हुआ। पर सतर्कता बरतते हुये भी लाई खाना जारी रखा। उसके आगे पुल के अन्त की सड़क पर एक दूसरा बड़ा बन्दर भी दिखा। मुझे लगा कि कहीं वह मेरी ओर न झपटे। पर वह रेलिंग से कूदा और तेज कदमों से पुल पार कर दूसरी ओर चला गया। मेरा वाहन कर्जन पुल के बन्द गेट के बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैने समय देखा – सवेरे के 7:35 बजे। मुझे आराम से चित्र लेते हुये पुल पार करने में 33 मिनट लगे थे। इस दौरान पुल पर पांच मोटर साइकलें और एक मॉपेड गुजरे थे। लगभग 5 मिनट में एक दुपहिया वाहन। साइकल वाला कोई नहीं था।
कुल मिला कर यातायात नगण्य़ है कर्जन पुल पर। फिर भी (या इस कारण से) इतिहास के साथ आधा घण्टा गुजारना, साथ चलना अच्छा लगा मुझे। उसका कुछ अंश शायद आप को भी लगे।
मैने जो चित्र लिये, उनका एक स्लाइड-शो नीचे लगा रहा हूं, कैप्शन्स के साथ।
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[1] कालान्तर में अम्माजी को न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गयी और वे वहीं अस्पताल में आई.सी.यू. में भर्ती हैं 20 नवम्बर से।
मेरी अम्माजी अस्पताल में हैं। उनकी कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उनका ऑपरेशन हुआ है। चुंकि वे दशकों से खून पतला करने के लिये नियमित दवाई लेती रही हैं; ऑपरेशन के पहले उनकी यह दवा रोक कर उनके रक्त का प्रोथ्रोम्बाइन टाइम ऑपरेशन के लिये वांछित स्तर पर लाया गया। इसके लिये दवा लगभग एक सप्ताह रुकीं। फलस्वरूप, या ऑपरेशन के कारण हुये तनाव के कारण, अम्मा को न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गयी और यह आवश्यक हो गया कि किसी न्यूरोसर्जन-न्यूरोफीजिशियन की सलाह ली जाये।
डा. प्रकाश खेतान। चित्र उनके ब्लॉग से लिया गया।
मेरे सहकर्मी प्रदीप ओझा और उनकी पत्नी श्रीमती लता ओझा इस मौके पर काम आये। प्रदीप इस समय भोपाल में पदस्थ हैं, पर हैं इलाहाबाद के। उनके पारिवारिक मित्र हैं इलाहाबाद के प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डा. प्रकाश खेतान। प्रदीप के अनुरोध पर वे बहुत सरलता से मेरी अम्मा जी को देखने को तैयार हो गये। मुझे लगा कि मैं ऑपरेशन के कारण आई.सी.यू. के बिस्तर पर भर्ती अम्माजी को कैसे ले कर उनके पास जा सकूंगा, पर डा. खेतान ने कहा कि वे स्वयम् फाफामऊ के उस अस्पताल में आ कर देख लेंगे, जहां वे भर्ती हैं।
डा. खेतान का जब मुझे फोन मिला, तो मानो नैराश्य के गहन अन्धकार से मैं उबर गया।
डा. प्रकाश खेतान के नाम से मैने इण्टरनेट पर सर्च किया तो बहुत रोचक जानकारी मिली। एक आठ घण्टे की दुरुह न्यूरोसर्जरी कर 296 hydatid cyst (हाईडेटिड सिस्ट – ब्रेन में पेरासिटिक थक्के) निकालने के लिये गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में उनका नाम दर्ज है। यह है गिनीज रिकार्ड का पन्ना।
कल शाम साढ़े चार बजे डा. खेतान अस्पताल पंहुचे। उनकी विजिट से अस्पताल के डाक्टर और कर्मी गौरवान्वित महसूस कर रहे थे; ऐसा मुझे लगा। मेरी अम्माजी को उन्होने बहुत ध्यान से देखा। एक दक्ष डाक्टर की तरह उन्होने उनके परीक्षण किये। हाथ पैर का मूवमेण्ट करा कर देखा। आंखों और चेहरे का गहन परीक्षण किया। उस दौरान उपलब्ध डाक्टर और मैं उन्हें आवश्यक इनपुट्स देते रहे।
अस्पताल में मेरी अम्माजी। चित्र आई.सी.यू. में ले जाने के पहले का है।
परीक्षण के बाद उन्होने उनके ऑपरेशन और अन्य टेस्ट की जानकारी ली। मैने अम्माजी की जो मैडीकल हिस्ट्री ज्ञात थी, वह तरतीबवार लिख रखी थी। उसे और पुराने परीक्षणों के बारे में उन्हे बताया। इस दौरान वे बड़ी दक्षता से डाक्टर का पन्ना लिखते जा रहे थे। दवायें, परीक्षण की जरूरत और उपलब्ध आई.सी.यू. के डाक्टर महोदय को हिदायत वे देते गये। उसके बाद मुझे मामले के बारे में उन्होने बिना तकनीकी जार्गन के समझाया।
अपने लड़के की ब्रेन इंजरी के सन्दर्भ में अनेक न्यूरोडाक्टरों और न्यूरोसाइकॉलॉजिस्टों से मेरा सामना हो चुका है। मैं यह कहूंगा कि डा खेतान के साथ यह अनुभव बहुत री-एश्यूरिंग लगा। वे पन्द्रह किलोमीटर से अपने से आये, बहुत सरलता से इण्टरेक्ट किया और आधे-पौने घण्टे का गहन समय दिया मेरी अम्माजी के लिये। … मैं उनकी सज्जनता/सरलता/दक्षता का मुरीद हो गया।
डा. खेतान को विदा करते समय मैने उनसे हाथ मिलाते हुये कहा कि मैं पहली बार किसी गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड होल्डर से मिला हूं। बहुत सरलता-सहजता से उन्होने मेरा यह कॉम्प्लीमेण्ट स्वीकार किया!