दिनेश पगला


ऐसे चरित्र रोज रोज नहीं मिलते। पहले मुझे लगा कि वह कुछ मानसिक रूप से सरका हुआ है। पर उसने बताया कि गांव के आसपास के भगत लोगों के साथ उत्तराखण्ड, झारखण्ड, गया आदि कई जगहों पर पैदल यात्रा कर चुका है।

दैनिक दूध के विकल्प की तलाश


दैनिक जरूरतें हैं – आटा, दाल, चावल, सब्जी, दूध। जब इनकी कीमतें बढ़ती हैं तो उनको सस्ता पाने के विकल्प तलाशने में लग जाते हैं हम। यह पोस्ट उसी कवायद पर है।

प्रमोद शुक्ल और गड़ौली धाम की गायें


वे गौ पालन में किसी तरह के शॉर्ट-कट के पक्ष में नहीं नजर आये। “गांव वाला आदमी चारे में कॉम्प्रोमाइज कर दस रुपया बचाता है पर उससे वह 100 रुपया खो देता है। मैं वैसा काम कत्तई नहीं करूंगा।” – प्रमोद शुक्ल ने कहा।

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free