देवास से उज्जैन और उज्जैन में


पहले प्रतीक्षा में एक घण्टा बैठना पड़ा। फिर चार से पांच बजे के बीच महाकाल का सिंगार हुआ और उसके बाद एक घण्टा भस्म आरती। श्मसान की भस्म की आरती। छ बजे बाहर निकल कर उन्होने अपनी एक सेल्फी ली; यादगार के रूप में।

महाकालं, महाकालं, महाकालं नमोस्तुते!


त्रिपाठी जी और चौहान जी उन्हें साथ लेने आ चुके हैं। निकल ही लिये हैं प्रेमसागर महाकाल मंदिर के लिये। मैंने उन्हें शुभकामनायें दी। “हर हर महादेव भईया। ऐसे ही आशीर्वाद देते रहियेगा।” सुन कर मैं भी सेण्टीमेण्टल हो जाता हूं।

दौलतपुर से देवास


अच्छा लगा! यह रुक्ष कांवर यात्री मुझसे हास्य और विनोद का आदान-प्रदान करने की ओर खुला तो सही! आपसी सम्बंधों की बहुत सी बर्फ हम तोड़ चुके हैं। कई बार प्रेमसागर मुझसे झिड़की खा कर भी बुरा नहीं माने हैं। मेरी नसीहतें भले ही न मानी हों पूरी तरह; पर अवज्ञा का भाव कभी नहीं था। और अब यह हंसी ठिठोली – महादेव सही रूपांतरण कर रहे हैं अपने चेले का!

दौलतपुर के जंगल का भ्रमण


मसलन वन अधिकारी भी जंगल के वृक्षों में 5-10 को पहचानते हैं। यह तो वैसा ही हुआ कि घरनी को घर की चिंता ही नहीं है। महिला अपने एक दो बच्चों को नाम ले कर बुलाये और बाकी को सतकटा कह कर निपटा दे तो उस परिवार का भगवान ही मालिक।

आष्टा से दौलतपुर – जुते खेत और पगला बाबा


सवेरे समय से निकलना। रास्ते को देखते चलना। पगला बाबा से मुलाकात और सांझ ढलने के पहले मुकाम पर पंहुच जाना – बहुत बढ़िया चले प्रेमसागर! ऐसे ही चला करो, दिनो दिन। तब तुम पर खीझ भी नहीं होगी। प्रेम पर प्रेम बना रहेगा।

भोपाल के आगे निकले प्रेमसागर


लगभग 10 हजार किलोमीटर यह ज्योतिर्लिंग यात्रा है। उसका 12-15% अभी तक सम्पन्न हो चुका है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इससे यह विश्वास पुख्ता हुआ है कि प्रेमसागर यात्रा सम्पन्न करने में सक्षम हैं।